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मानव जीवन में मूल्यों का महत्व | मानवीय मूल्यों के ह्रास के कारण व आधुनिकीकरण एवं सांस्कृतिक हास

मानव जीवन में मूल्यों का महत्व | मानवीय मूल्यों के ह्रास के कारण व आधुनिकीकरण एवं सांस्कृतिक हास | Importance of values ​​in human life in Hindi | Causes of degradation of human values ​​and modernization and cultural decline in Hindi

मानव जीवन में मूल्यों का महत्व

(Importance of values in human life)

मूल्यों का मानवे जीवन में बहुत महत्व है। वास्तव में मूल्यों के आधार पर ही हम मानव समाज को पशु समाज से अलग करते हैं। मूल्य समाज के सदस्यों की आन्तरिक भावनाओं का ही प्रतिबिम्बन करते हैं एवं उसे एक मनोवैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करते हैं। मूल्य ही व्यक्ति को पशुता से उठाकर मानवता के उच्च स्तर पर प्रतिस्थापित करते हैं तथा उसे आदमी से इन्सान बनाते हैं। मूल्य समाज में एकरूपता लाकर उसे व्यवस्थित, संगठित एवं सशक्त बनाते हैं। व्यक्ति की बहुमुखी क्रियाओं को दिशा निर्देश देते हैं तथा उसे असद् से सद् एवं कुमार्ग से सुमार्ग की ओर ले जाते हैं। एक ओर ये व्यक्ति को नियन्त्रित करते हैं तो दूसरी ओर समाज की शक्तियों को बिखरने से बचाते हैं। ये व्यष्टिवाद के स्थान पर समष्टिवादी भावना का प्रसार करते हैं जिससे सभी भाई-चारे एवं सहयोग की डोर में बंधकर समाज एवं विश्व को शान्ति की ओर ले जाये।

मूल्य व्यक्ति के मनोबल को ऊँचा रखने एवं मुसीबतों को हँसते हुए झेलने की भी प्रेरणा देते हैं। ये व्यक्ति को दिन प्रतिदिन की समस्याओं के निराकरण करने एवं परिस्थितियों के साथ अनुकूलन करने में भी सहायक होते हैं। मैकाइवर एवं पेज ने सत्य ही कहा है कि संस्थाओं एवं मूल्यों को अनुपस्थिति में व्यक्ति को कदम-कदम पर मानसिक संकट का सामना करना पड़ता है। मूल्य असंख्य मानसिक तनाव को कम करने में भी सहायक होते हैं। इसके अतिरिक्त मूल्य व्यक्ति को विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों के समझने में भी सहायक होते हैं क्योंकि ये एक मान्य व्यवहार प्रतिमान प्रस्तुत करते हैं तथा समाज के प्रत्येक सदस्य से यह आशा की जाती है कि वह आचरण के उस मान को बनाये रखे। यही समाज में एकरूपता लाते हैं एवं संगठन को सुदृढ़ बनाते हैं।

किन्तु मूल्यों के इस प्रकार्य के साथ-साथ उनके कुछ अकार्य भी हैं। कभी-कभी सामजिक मूल्य विघटन का भी कारण बनते हैं। मूल्यों के अनुसार व्यक्ति की धारणायें एवं मनोवृत्तियाँ बनती हैं किन्तु कभी-कभी परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ व्यक्ति उनके साथ अनुकूलन नहीं कर पाता एवं तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है जिससे वैयक्तिक विघटन के साथ-साथ सामाजिक विघटन की भी स्थिति पैदा हो जाती है। इस प्रकार मूल्यों का समाज पर प्रभाव संगठनात्मक एवं विघटनात्मक दोनों हो प्रकार का हो सकता है। कहने का आशय यह है कि समय एवं परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ-साथ मूल्यों में भी परिवर्तन आना स्वाभाविक है तभी वे उपयोगी रह सकते हैं।

मानवीय मूल्यों के ह्रास के कारण व आधुनिकीकरण एवं सांस्कृतिक हास

(Factors for decline in human values and modernization and cultural lag)

चूँकि समाज एक गतिशील अवधारणा है। सामाजिक जीवन के सभी पक्ष निरन्तर परिवर्तित होते रहते हैं। हमारी समस्त मान्यतायें भी परिवर्तन के इस प्रवाह में पड़कर बदलती रहती हैं। सत्य, अहिंसा, न्याय, प्रेम का मन्त्रोच्चारण जो अभी तक मानव मात्र के हृदय को उद्वेलित कर विश्व शान्ति के लिए मार्ग प्रशस्त करा रहा है, अब मन्द पड़ रहा है तथा इसके स्थान पर कटुता, ईर्ष्या, द्वेष एवं गलाघोट प्रतिस्पर्धा का वातावरण तैयार हो रहा है, पर ऐसा क्यों है? इसका स्पष्ट

 उत्तर है-मानवीय मूल्यों में हास। अंग्रेजी के कवि वसवर्थ (Wordsworth) ने मानव जीवन के बदलते स्वरूप पर अफसोस प्रकट करते हुए लिखा था- “What man has made of man “

आधुनिक युग में मूल्य हास के अनेक कारण है जिनमें से प्रमुख निम्न है-

विज्ञान का बढ़ता हुआ प्रभाव – आज विज्ञान का युग है। इस युग का मानव एक मशीन की भाँति यन्त्रवत कार्य करना जानता है और जिस प्रकार एक मशीन में कोई आत्मा नहीं होती, वह भी आत्माहीन सा होता जा रहा है। विश्वास को त्याग वह हर चीज को तर्क की कसौटी पर कसना चाहता है।

सामुदायिक भावना में गिरावट- समुदाय में हम की भावना होती थी जो कि व्यक्ति को सामूहिकता के सन्दर्भ में ही सोचने की प्रेरणा देती थी किन्तु आज उस साभ दायिक भावना में गिरावट आने के कारण व्यक्ति केवल वैयक्तिक सन्दर्भ में ही सोचता है तथा उच्च मानवीय मूल्यों में उसकी आस्था दिन पर दिन कम होती जा रही है।

भौतिकवादिता- विज्ञान के प्रभावों ने व्यक्ति को आज आवश्यकता से अधिक भौतिकवादी बना दिया है। वह प्राचीन आदर्शों एवं उच्च जीवन मूल्यों को त्याग कर आज क्षणिक सांसारिक सुखों के पीछे भागने लगा है उसे अब परलोक नहीं बल्कि इहलोक को समृद्धिशालो एवं सुखी बनाने की धुन अधिक है। वह हर कार्य को भौतिक लाभ के पैमाने से मापने लगा है। यही कारण है कि वह मानवीय मूल्यों की अवमानना करते हैं।

औद्योगीकरण एवं नगरीकरण का कुप्रभाव- बढ़ते हुए औद्योगीकरण ने सम्पूर्ण प्राकृतिक वातावरण को प्रदूषित एवं सामाजिक जीवन को तनाव एवं कोलाहलपूर्ण बना दिया है। सहयोग के स्थान पर आज प्रतिस्पर्धा का बोलबाला है। आज व्यक्ति हर भले या बुरे तरीके से पैसा कमाकर रातों रात लखपति और करोड़पति बनना चाहता है। इस प्रकार के भौतिकवादी दृष्टिकोण वाले मानव के लिए मानवीय या नैतिक मूल्यों का कोई महत्व नहीं। औद्योगोकरण ने सामुदायिकता को भावना को भी समाप्त कर दिया है। नगरीकरण ने सांस्कृतिक विषमता का वातावरण पैदा करके व्यक्ति को असमंजस में डाल दिया है कि वह अपने ग्रामीण मूल्यों के अनुसार आचरण करे या नगरीय मूल्यों को स्वीकार करे।

व्यक्तिवादिता- भौतिकवादी दृष्टिकोण ने आज व्यक्ति के अहं को इतना बढ़ा दिया है कि एक घोंघे की भाँति वह केवल अपने में सिमट कर रह गया है। परोपकार, दया एवं क्षमा आदि उसे व्यर्थ की बकवास प्रतीत होते हैं। सामूहिकता में उसका गला घुटता है वह तो स्वच्छन्द पक्षी की भाँति उन्मुक्त रूप से कल्पना लोक में विचरण करना चाहता है।

गन्दी राजनीति- यह सत्य है कि प्रजातन्त्र की स्थापना, समानता, स्वतन्त्रता एवं भाई-चारे के महान मूल्यों को बढ़ावा दिया है परन्तु लोगों के अहं, निजी स्वार्थों, शक्ति तथा पदलोलुपता की भावना ने प्रजातन्त्र की आत्मा का हनन कर राजनीति को संघर्ष, हिंसा एवं अनैतिकता के दलदल में ढकेल दिया है। साधारण व्यक्ति भ्रष्ट नेताओं की बातों में आकर अपने को उनकी कठपुतली बना देता है। उसकी अन्तरात्मा की आवाज अन्दर ही घुट कर रह जाती है।

धर्म के प्रभाव में कमी- धर्म को पृथ्वी को धारण करने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है पर आज तर्क प्रधान समात्र धार्मिक उपदेशों को निराधार एवं खोखला मानकर उसके अनुसार आचरण करने में अपनी मानहानि समझता है। कार्ल मार्क्स का कथन : Religion is opium for the people’ इसी दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है। आज का व्यक्ति धर्म को आधुनिकता एवं प्रगति में बाधक बनकर उसके उपदेशों की अवज्ञा करता है।

दूरदर्शन तथा फिल्मों का प्रसार-वर्तमान समय में टी०वी० पर प्रचार प्रसार अधिक बढ़ता जा रहा है। नित्य प्रति नये-नये चैनल, डेस्क-वायर तथा ट्रान्समीटर खोजे जा रहे हैं विभिन्न देशों की संस्कृति पर आधारित फिल्में प्रसारित होती जा रही हैं। इससे अनेकों संस्कृतियों का मिश्रण मानव पर छाता जा रहा है। फलस्वरूप भारतीय संस्कृति के तत्वों का नष्ट होना अथवा उनका हास्य  आरम्भ हो गया है। संस्कृति के इस ह्रास से हमारी शिक्षा भी अछूती नहीं रह सकी है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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