समाज शास्‍त्र / Sociology

विकास और दुविधाएं | विकास बनाम अविकास | देशी बनाम विदेशी विकास

विकास और दुविधाएं | विकास बनाम अविकास | देशी बनाम विदेशी विकास | Development and dilemmas in Hindi | Development vs underdevelopment in Hindi | Domestic vs foreign development in Hindi

विकास की दुविधाएं

अब तक हम विकास की बहुत सी प्रक्रियाओं से गुजर चुके हैं। इन प्रक्रियाओं ने देश के सामने कुछ दुविधाजनक स्थितियां उत्पन्न की हैं। इन दुविधाजनक स्थितियों ने देशों के समक्ष विकास और सुधार की नीतियों को लेकर अनिता पैदा की है। आज आर्थिक विकास को प्रेरित करने  वाली प्रौद्योगिकी क्रान्ति हो चुकी है। लोगों का आधुनिकीकरण हो रहा है और वे तार्किक हो रहे हैं। उनकी विश्वदृष्टि पूर्णतया अथोन्मुखी हो चुकी है। लोगों की सम्पत्ति नही है तथा जीवन स्तर में सुधार हुआ है, लेकिन इस प्रक्रिया का दूसरा देश इतना अधिक सुस्पष्ट है कि उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है। बेरोजगारी में वृद्धि हुई है तथा अमीर गरीब के बीच खाई और गहरी हुई है। वैशीकरण में वृद्धि हुई है, परन्तु इसने अस्मिताओं के संघर्ष का प्रश्न खड़ा किया है और बहस छेड़ दी है।

एस.सी दुबे ने विकास की चार दुविधाओं का उल्लेख किया है, जो आज बहस के महत्वपूर्ण विषय है। विभिन्न देश इनमें से कोई विकल्प चुनने को लेकर उलझन में हैं। ये दुविधाएं है

अ. विकास बनाम अविकास

ब. देशी विकास बनाम विदेशी विकास

स. आत्मनिर्भरता बनाम अन्योन्याश्रितता

द. वृद्धि बनाम वितरण

विकास बनाम अविकास :

तकनीकी उन्नति और आर्थिक विकास के परिणामों ने बहुत से राष्ट्रों एंव लोगों का मोहभंग कर दिया। इससे आगे चलकर वे विकास मार्ग से भटक गए और उनका विकास रुक गया। विकास को मानव समाज के लिए एक संकट के रूप में देखा गया। आज पूरी दुनिया जिस तरह से पर्यावरणीय असंतुलन एंव प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण का सामना कर रही है, वह गम्भीर चिन्ता का विषय है। विकास से दूर रहने की बात कही जा सकती है, परन्तु आज मानव समाज विकास और आधुनिकीकरण के मार्ग से पीछे हटने में सक्षम नहीं है। विकसित देश अल्प विकसित देशों को विकास से विरत रहने की सलाह नहीं दे सकते हैं। विकास के संकटो का समाधान विकास प्रक्रिया को पूरी तरह से रोककर नहीं किया जा सकता। आज इलाज बीमारी से ज्यादा खतरनाक है।

लोगों को उत्पादन और उपभोग में संयम बरतने की सलाह दी जा सकती हैं। विकास को स्वंय अपना रास्ता तय करने के लिए पूरी तरह स्वतन्त्र भी नहीं छोड़ा जा सकता। विकास के फायदे सभी को उपलब्ध कराने तथा विकास का मानवीय चेहरा सुनिश्चित करने के लिए सरकारों को हस्तक्षेप करना ही होगा।

देशी बनाम विदेशी विकास :

आज की दुनिया में बहुत दिलचस्प तरीके का विरोधाभास मौजूद है। एक तरफ तो पूँजीवादी बाजार व्यवस्था राष्ट्रों को एक छत के नीचे, एक-दूसरे के और अधिक करीब ला रही है। वैीकरण राष्ट्रीय सीमाओं से परे पूँजी, श्रम और वस्तुओं का निर्वाध संचरण सम्भव बना रहा है। वहीं, दुनिया भर में राष्ट्रीय, धार्मिक, सांस्कृतिक एंव भाषायी अस्मिताओं के क्षेत्र में एक नए तरीके का असन्तोष भी दिखाई पड़ता है। आधुनिकीकरण के मानव सिद्धान्तों के समक्ष बहुत है बिनापूर्ण स्थितियां उत्पन्न हो गई है। उदाहरण के लिए बाजार अर्थव्यवस्था में व्यक्तियों की अथोन्मुखी क्रियाएं विशुद्ध तौर पर तार्किक है, परन्तु धार्मिक, साम्यायिक एवं लक्ष्यों की ओर प्रेरित क्रियाएं पूरी तरह से अतार्किक हैं। शिक्षितों का एक बड़ा भाग बहुत ही बेतुके तरीके से इतिहास को अनदेखा करता है। वह इतिहास, भूगोल एवं संस्कृति को पुनर्स्थापित करने के लिए धर्मग्रन्थों को पाठों का आँख मूंदकर एवं अतार्किक रूप से पालन करता है। यह तथ्य वास्तव में काफी बेतुका एवं असंगत प्रतीत होता है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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