समाज शास्‍त्र / Sociology

विकास के समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र | संरचना और विकास | संस्कृति और विकास | उद्यमिता और विकास

विकास के समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र | संरचना और विकास | संस्कृति और विकास | उद्यमिता और विकास | Subject area of ​​sociology of development in Hindi | Structure and development in Hindi | Culture and Development in Hindi | Entrepreneurship and Development in Hindi

(क) विकास के समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र-

यहां तक हम समझ चुके हैं कि विकास की अवधारणा आर्थिक विकास या सामाजिक विकास की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक हैं। यह सामाजिक एवं आर्थिक विकास दोनों को ही अपनी परिधि के अन्तर्गत रखता है। जहां सामाजिक और सांस्कृतिक कारक व्यापक रूप से विकास की प्रकृति और मात्रा को निर्धारित करते हैं, यहीं आर्थिक विकास भी किसी समाज के सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में परिवर्तन उत्पन्न करता है। अतः विकास के समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र, किसी समाज के आर्थिक और गैर-आर्थिक पक्षों के मध्य सम्बन्ध के आधार पर तय होता है। विकास का समाजशास्त्र निम्नलिखित क्षेत्रों का अध्ययन करने का सुझाव देता है-

(ख) संरचना और विकास-

विद्वानों ने सामाजिक संरचना की प्रकृति के विकास में सकारात्मक या नकारात्मक भूमिका का पता लगाने के लिए सामाजिक संरचना का व्यापक अध्ययन किया है। सामान्यतया यह देखा गया है कि परम्परागत सामाजिक संरचना विकास की प्रक्रिया में सहायक नहीं हैं, क्योंकि इसकी प्रकृति सत्तावादी होती है। इसमें किसी व्यक्ति की प्रस्थिति तथा अधिकार एंव कर्तव्य अर्जित न होकर प्रदत्त होते हैं। संयुक्त परिवार एवं जाति व्यवस्था जैसे सूक्ष्म- संरचनाओं तथा आधुनिक अभिजात वर्ग एवं नौकरशाही जैसी वृहद् संरचनाओं का अध्ययन, विकास प्रक्रिया में उनकी सकारात्मक और नकारात्मक भूमिकाओं का पता लगाने के लिए आवश्यक है। जहां तक भारतत के आर्थिक विकास में भारतीय जाति एवं परिवार व्यवस्था की भूमिका का सवाल है, यह विवादित विषय रहा है। भारत में सामाजिक संरचना (परिवार, जाति) एवं व्यापार के बीच सम्बन्धों को समझने के लिए के सुजाता, टिम्बर्ग, बर्न, शिवबहाल सिंह, चौधरी आदि को पढ़ा जा सकता है।

(ग) संस्कृति और विकास-

किसी समाज में सिर्फ सामाजिक संरचना नहीं बल्कि संस्कृति भी विकास की मात्रा एवं प्रकृति का निर्धारण करती हैं। अतः यह भी विकास के समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। धार्मिक अनुकूलता तथा सांस्कृतिक सुधारों की आवश्यकता, विकास के लिए सांस्कृतिक रूप से सहायक कारक सिद्ध हुए हैं, इसलिए ये विकास के समाजशास्त्र में अध्ययन के लिए आवश्यक मुद्दे हैं। सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक जीवन के प्रति व्यक्तियों के मानवीय और उदार दार्शनिक अभिकरण, ऐसे मुद्दे हैं, जिनका इस विषय के अन्तर्गत अध्ययन किया जाना चाहिए। मैक्स वेबर, कैंप, पपनेक, मोमिन आदि न इन्हीं बिंदुओं पर अपने विचार रखने का प्रयास किया है।

(घ) उद्यमिता और विकास-

विकास का तात्पर्य उत्तरोत्तर आर्थिक वृद्धि के साथ सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास हैं। औद्योगिकरण एवं आर्थिक विकास, मात्र पर्याप्त अवसंरचना और पूँजी, प्रौद्योगिकी और श्रम का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह अनिवार्य रूप से योग्य उद्यमियों की उपलब्धता का परिणाम है। यह उद्यमी न तो पूँजीपति होता है और न ही एक सामान्य व्यापारी। उद्यमी एक ऐसा व्यापारिक नेता है जो एक व्यापारिक उत्पादन संस्थान को केवल नवाचार के द्वारा स्थापित करने का जोखिम उठाता है। उद्यमी, विशेष सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण में निर्मित एक विशिष्ट व्यक्तित्व का स्वामी, एक असाधारण व्यक्ति होता है। अतः यह समाजशास्त्रियों एवं मनोवैज्ञानिकों दोनों के लिए अध्ययन की महत्वपूर्ण विषय वस्तु होता है। उद्यमिता इस प्रकार विकास के समाजशास्त्र का एक आवश्यक अंग हैं।

(.) राजनीति एंव विकास-

राजनीतिक कारक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विकास का कोई भी कारक चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों द्वारा समर्थन न प्राप्त होने की दशा में कोई भी परिणाम देने में सफल नहीं होगा। सरकार की औद्योगिक नीतियाँ उद्यमिता विकास एवं औद्योगिक विस्तार का गहरा असर डालती हैं। देश में आर्थिक विकास सुनिशित करने के लिए सरकार प्रलोभन समर्थन तथा सुरक्षा जैसी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाती हैं। देश के विभिन्न राज्यों में असमान औद्योगिक विकास उनकी औद्योगिक नीतियों में भित्रता के कारण हैं। अतः किसी देश के राजनीतिक कारकों का भी अध्ययन किया जाना चाहिए।

(च) सतत् विकास-

अभी तक के विकास में नकारात्मक परिणामों का भी अनुभव विश्व ने किया, परन्तु पिछली सदी में अस्सी के दशक के लगभग मध्य से ही लोग विकास की प्रकृति के नकारात्मक प्रभावों के प्रति सचेत हुए हैं। विकास की दो मुख्य समस्याओं पर लोगों का ध्यान गया, पहला-पर्यावरण प्रदूषण एवं दूसरा- प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण। तकनीक के उपयोग एवं प्राकृतिक संसाधनों के निर्मम दोहन से उत्पन्न विकास के इन दो खतरनाक परिणामों ने प्राणी जीवन के समक्ष गंभीर संकट पैदा कर दिया है। उसी समय से व्यक्तियों को विकास के ऐसे पथ पर प्रेरित करने का प्रयास शुरू हो गया है, जिससे कि धरती पर जीवन संकटग्रस्त बनाने की अपेक्षा उसे सतत् बनाए रखा जा सके। मौजूदा विकास योजनाओं एंव तरीकों का उपयुक्त विकल्प तलाशना, विद्वानों के लिए एक गंभीर चुनौती हैं।

(छ) व्यक्तियों का विस्थापन एवं पुनर्वास-

व्यक्तियों का विस्थापन सरकार द्वारा चलाई जा रही विकास परियोजनाओं का अक्सर घटित होने वाला एक नकारात्मक परिणाम है। विकास परियोजनाओं द्वारा उत्पन्न वह एक बड़ी सामाजिक समस्या है। विस्थापित परिवारों का समुचित तरीके से पुनर्वास होना जरूरी है। इसके लिए राज्य के पास सुविचारित नीतियां होनी चाहिए, जो उचित एवं न्यूनतम विख्यापन सुनिश्चित कर सकें। भारत आज भी एक बड़ी कृषि एंव ग्रामीण अवस्था है यहाँ देहात में अधिकांश लोग छोटे या सीमान्त किसान हैं या फिर भूमिहीन है। विकास परियोजनाएं अपने प्रभाव क्षेत्र में आने वाले विशाल देहाती इलाकों के सीमान्त और कमजोर तबके को अधिक प्रभावित करती हैं। बड़े भू-स्वामियों का जीवन स्तर अधिक प्रभावित नहीं होता, बल्कि वे विकास प्रक्रिया में कुछ खाने के बजाय ज्यादातर लाभान्वित ही होते हैं। विकास परियोजनाओं के परिणामी के सामाजिक नैतिक एवं वैधानिक मुद्दे जुड़े हुए हैं। यदि किसी समाज में प्रष्टाचार इतना अनियंत्रित हो जाए कि यह ईमानदारी के उच्च मूल्यों को प्रतिस्थापित करता प्रतीत हो, तो स्थिति अत्यन्त हो जाती है। हम पिछले पांच दशकों में भूमि सुधार एवं सामुदायिक कार्यक्रमों के सम्बन्ध में इसका अनुभव करते रहे हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि के विभिन्न भागों में विस्थापित और मुआवजा प्राप्त लोगों में संतुष्टि की मात्रा के आधार पर भारत सरकार की नीतियों की समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण की जाए।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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