समाज शास्‍त्र / Sociology

ग्रामीण नगरीय सातत्य | ग्रामीण नगरीय सातत्य प्रक्रिया

ग्रामीण नगरीय सातत्य | ग्रामीण नगरीय सातत्य प्रक्रिया | Rural urban continuum in Hindi | Rural urban continuum process in Hindi

ग्रामीण नगरीय सातत्य

ग्रामीण नगरीय सातत्य की अवधारणा ग्रामीण तथा नगरीय विशिष्टताओं की निरन्तरता पर ही आधारित है। ग्रामीण नगरीय विभिन्नता की प्रकृति जितनी भौगोलिक तथा भौतिक है उतनी समाजशास्त्रीय नहीं है, क्योंकि समाजशास्त्रीय विश्लेषण में ग्रामीण नगरीय विभिन्नता प्रकट करने में अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती है। ग्रामीण तथा नगरीय व्यवस्थाओं में समाजशास्त्रीय दृष्टि से मौलिक भेद करना अत्यन्त कठिन है। इसी कारण समाजशास्त्रियों में ग्रामीण नगरीय अखण्डता की अवधारणा का सूत्रपात किया है।

ग्रामीण नगरीय सातत्य का अभिप्राय है कि ग्रामीण लक्षण पूर्ण रूप से एक सिरे पर पाये जाते हैं और नगरीय लक्षण दूसरे सिरे पर फिर भी दोनों प्रकार के लक्षण कम या अधिक मात्रा में सभी क्षेत्रों में पाये जाते हैं। बस्ट्रेड ने इसी तथ्य पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि – “अनन्त के सिद्धान्त का प्रस्ताव रखने वाले महसूस करते हैं कि ग्रामीण शहरी अन्तर सम्बन्धित यात्रा में एक श्रृंखला है जो ग्रामीण और नगरीय दो इकाइयों के रूप में विचार में आती है।”

ग्रामीण और नगरीय सातत्य का मुख्य अभिप्राय यही है कि अति ग्रामीण से प्रारम्भ होकर अति नगरीय तक यह सातत्य चलता है। इस सातत्य के पैमाने के किसी भी बिन्दु पर कोई समुदाय हो सकता है।

यद्यपि अमेरिका में ग्रामीण समाजशास्त्र की अवधारणा और अध्ययन पद्धतियों का स्वतन्त्र रूप से विकास किया है। इस दृष्टि से अपने अध्ययन क्षेत्र को विशिष्ट बनाये रखने की दृष्टि से उन्होंने ग्रामीण समाजों और नगरीय समाजों में भेद करने के विभिन्न आधारों की सृष्टि की है। इन ग्रामीण समाजशास्त्रियों में सोरोकिन, जिम्मरमैन तथा गाल्विन के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।

फगयुइट्ठ ने उत्तरी अमेरिका के कृषकों का अध्ययन करके यह प्रकट किया है कि 1960 ई0 में 70 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या का कोई सम्बन्ध नहीं था। इस सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है- “यदि ग्रामीण और नगरीय समाजशास्त्र को अपने संरक्षक अनुशासन के विशिष्ट उपक्षेत्र को निरन्तर रखना है तो एक नवीन दिशामान की आवश्यकता स्वतः प्रमाणित है।”

इस दिशामान से तात्पर्य ग्रामीण नगरीय सातत्य की अवधारणा से ही है। इस प्रकार ग्रामीण  नगरीय सातत्य ग्रामीण तथा नगरीय समाजशास्त्र की भिन्न-भिन्न विशिष्टताओं अखण्डता पर बल देने सम्बनधी अवधारणा है। ग्रामीण नगरीय सातत्य की अवधारणा का विकास करने की दृष्टि से अमेरिका में विशिष्ट समाजशास्त्रियों ने कार्य किये हैं।

ग्रामीण नगरीय सातत्य की अवधारणा और पद्धतिशास्त्र का विकास करने की दृष्टि से डेवी बीनेट और हाउस का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

ग्रामीण नगरीय सातत्य की अखण्डता जो स्पष्ट करने की दृष्टि से भी विभिन्न समाजशास्त्रियों ने ग्रामीण नगरीय श्रेणियों का विकास किया है। इनमें बीफर, दुर्खीम, मैन रेडफील्ड, स्पेन्सर तथा वेबर प्रमुख हैं।

वस्तुतः ग्रामीण नगरीय सातत्य की अवधारणा ग्रामीण “नगरीय समुदायों की ध्रुवीय असमानताओं को व्यक्त करने से सम्बन्धित है। बरट्रेण्ड ने इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि- “सातत्य के सिद्धान्त के प्रवर्तक अनुभव करते हैं कि ग्रामीण नगरीय अन्तर तुलनात्मक अंशों में है और दो ध्रुवीय अतिरेकों, ग्रामीण तथा नगरीय के मध्य एक श्रृंखला में विकसित होते हैं।”

ग्रामीण नगरीय सातत्य प्रक्रिया

ग्रामीण नगरीय प्रक्रिया शास्त्र का अध्ययन करने की दृष्टि से विभिन्न समाजशास्त्रियों ने प्रयास किये हैं। डॉ. डी.एन. मजुमदार ने “कास्ट एण्ड कम्यूनिकेशन इन इण्डियन विलेजजेज’ में ग्राम विसिपारा का अध्ययन किया है। इसमें यह प्रतिपादित करने की चेष्टा की गयी है कि ग्रामीण मूल्यों और नगरीय मूल्यों में अन्तर किया जा सकता है।”

वैली ने भी ग्रामीण नगरीय संस्कृति में महान अन्तर बताये हैं परन्तु मिचेल आदि ने बताया है कि ग्रामीण विशिष्टताएँ नगरीय अवसान की प्रक्रिया में समाप्त हो जाती हैं।

पाहल ने लिखा है कि- भूतकाल से ग्रामीण नगरीय सातत्य की अवधारणा वस्तुतः नगरीयकरण की प्रक्रिया के रूप में समझी जाती रही है। इसका प्रमुख आधार भौतिक एवं जनसंख्यात्मक था। स्पष्टतया प्रक्रिया के विश्लेषण में कालगत तत्त्व का पूरी तरह से उपयोग नहीं होता था। इसलिए भूतकाल में प्रमुख रूप से प्रकार शास्त्र की दृष्टि से ही इस प्रक्रिया के मूल्य पर ग्रामीण नगरीय सातत्य की अवधारणा का विश्लेषण किया जाता था।

ग्रामीण नगरीय सातत्य की दृष्टि से यदि भारतीय परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाये तो प्रतीत होगा कि आधुनिक युग में यह अवधारणा यहाँ स्पष्ट रूप से प्रचलित नहीं है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त से भारत में  ग्रामीण विकास की विभिन्न योजनाएँ कार्यान्वित की गयी हैं। इन योजनाओं को प्रभावित करने की दृष्टि से अधिकांशतः नगरीय व्यक्तियों को इस कार्य में संलग्न किया गया है।

ग्रामों के विकास की प्रक्रियाएँ प्रधानतः उनके रहन-सहन में उन्नति करने से सम्बन्धित नहीं हैं। परन्तु परोक्ष रूप से वहाँ नगरीयता के तत्त्वों का विकास हुआ है और दूसरी ओर इन प्रक्रियाओं से नगरीय तत्वों का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में निरन्तर अग्रसर हो रहा है। सामुदायिक विकास योजनाओं के प्रभाव के कारण ग्रामों में कृषि सम्बन्धी प्रक्रियाओं का आधुनिकीकरण हो रहा है।

कृषि अब ग्रामीण जीवन की सामाजिक एवं सांस्कृति आधारशिला न रहकर उसका स्वरूप औद्योगिक होता जा रहा है। ग्रामों में इस प्रकार अनेकानेक रूप में समाज के नवीन कार्यक्रमों का दिन प्रतिदिन विस्तार हो रहा है। संस्कृतीकरण और सर्वव्यापीकरण की प्रक्रियाएँ भी ग्रामों में विकसित हो रही हैं। इस प्रकार ग्राम और नगर के किंचित भेद भी अब समाप्त हो रहे हैं। नगरीयत्व के तत्त्वों का ग्रामों में विकास हो रहा है। इससे भविष्य में ऐसे लक्षण पूर्णतः विकसित होने की सम्भावनाएँ अब और बढ़ गयीं हैं जिससे ग्राम और नगर एक हो जायेंगे। ग्रामीण तत्व नगरीयता में विलीन होते जा रहे हैं। पश्चिमी समाजों के समान अब भारतीय समाज में भी नगरीय तत्त्वों की सार्वभौमिकता विकसित हो रही है। भारतीय समाज व्यवस्था आज परिवर्तन की ओर तेजी से उन्मुख है। औद्योगीकरण और नगरीयकरण की प्रक्रियाएँ अब बड़ी तीव्र गति से ग्रामीणता की विशिष्टता को समाप्त कर रही हैं। महानगर क्षेत्र की कल्पना भी भारत में साकार हुई है। नगर-ग्रामों पर अपना स्वरूप आच्छादित कर रहे हैं। ग्राम नगरों के समीप आ रहे हैं। ग्रामीणता और नगरीयता एक दूसरे में विलीन होती जा रही है। इस प्रकार स्पष्टतः ग्रामीण नगरीय सातत्य की विचारधारा भारत में भी अस्पष्ट होती धूमिल हो रही है।

भविष्य में ऐसी सम्भावनाएँ विकसित हो रही हैं कि ग्राम और नगरों की भिन्नताएं शीघ्र ही समाप्त हो जायेंगी। पश्चिमीकरण की प्रक्रियाओं का भारत में भी प्रभाव बढ़ता जा रहा है। जिस प्रकार पश्चिमी समाजों में ग्रामीणता लुप्तप्राय हो रही है उसी भाँति भारत में भी यह प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। नगरों में भी ग्रामीणता अपना प्रभाव बढ़ाती जा रही है। इससे कालान्तर में वह अपना विशिष्ट स्वरूप नगरीयता में परिणत कर रही है। आज जो ग्रामीणता और नगरीयता का सम्मिलन हमें दृष्टिगोचर होता है वह भविष्य में भी ग्रामीण नगरीयता की सातत्य के रूप को समाप्त कर देगा। इस प्रकार कालान्तर में ग्रामीण नगरीय सातत्य पूरी तरह से भारत में विलीन हो जायेगा और ग्रामीण नगरीय विभेद लगभग समाप्तप्राय हो जायेगा।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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