भूगोल / Geography

मिट्टी के कटाव का तात्पर्य | मिट्टी के अपरदन को रोकने के उपाय | मिट्टी की उर्वरता को बनाये रखने के लिए उर्वरकों के महत्व पर प्रकाश

मिट्टी के कटाव का तात्पर्य | मिट्टी के अपरदन को रोकने के उपाय | मिट्टी की उर्वरता को बनाये रखने के लिए उर्वरकों के महत्व पर प्रकाश

मिट्टी के कटाव का तात्पर्य

प्रकृति प्रदत्त मिट्टी समस्याविहीन रही है। मानव अपने सभ्यता के इतिहास के प्रारंभ से ही मिट्टियों में बिना किसी प्रकार निवेश (input) के उसका शोषण करता आ रहा है।  एक ओर तो मानव ने प्राकृतिक वनस्पतियों का अंधाधुंध विनाश किया तथा दूसरी ओर मिट्टियों में विद्यमान मौलिक उर्वरता का शोषण किया, इन सब प्रक्रियाओं का कुल परिणाम यह हुआ कि मिट्टी में अनेक समस्याएँ पैदा हो गयीं। इन समस्याओं को चार वर्गों में रखा जा सकता है।

(i) भूमि-उर्वरता ह्रास की समस्या

(ii) भूमि-अपरदन या कटाव की समस्या।

(iii) उत्खात एवं खड्ड (Badland & Ravine) के विकास की समस्या |

(iv) मरूप्रदेश के विस्तार की समस्या।

  1. भूमि-उर्वरता ह्रास की समस्या

जिस देश की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर जीवन निर्वाह करती है वहाँ पर उर्वरकों एवं खादों का विशेष महत्त्वपूर्ण होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। भारतवर्ष एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ के कृषि क्षेत्रों की अधिकांश मिट्टियाँ विश्व की सर्वश्रेष्ठ मिट्टियों में मानी जाती हैं किंतु पौधों के पोषक तत्त्वों से भरपूर श्रेष्ठतम मिट्टी का भंडार भी अपरिमित नहीं हो सकता है। कहावत है कि उपभोग करते-करते कुबेर का खजाना भी खाली हो जाता है। भिन्न-भिन्न पौधे मिट्टी से भिन्न-भिन्न प्रकार के तत्त्व ग्रहण करते हैं इसलिए यदि एक क्षेत्र में निरंतर एक ही तरह की फसल पैदा की जाती रहे तो वहाँ की मिट्टी सर्वथा बेकार हो जाती है। इन तत्त्वों को सर्वथा विलुप्त होने से बचाने के लिए फसलों का हेर फेर अर्थात् एक फसल के बाद दूसरी फसल पैदा करना एक उपयोगी तरीका है। इन नष्ट हुए तत्त्वों की आंशिक पूर्ति कुछ प्राकृतिक उपायों द्वारा हुआ करती है अर्थात् मिट्टी को कुछ तत्त्व वायु से, कुछ कीड़ों से और कुछ वनस्पतियों से प्राप्त होते हैं।

मिट्टी की प्रति हेक्टेयर पैदावार को ऊँचा बनाये रखने के लिए उसमें कुछ पदार्थों को मिलाया जाना आवश्यक होता है। जिनमें पौधों के पोषक तत्त्व मिले रहते हैं। इन्हीं बाहर से मिलाये जाने वाले पदार्थों को उर्वरक का नाम दिया जाता है।

उर्वरकों का वर्गीकरण

व्यापक तौर पर उर्वरकों एवं खादों को दो वर्गों में बाँटा जाता है-

(1) रासायनिक एवं खनिज उर्वरक (Chemical & Minaralk Fertilizers), (2) जैविक खादें (Organic Maures)।

प्रथम वर्ग के अंतर्गत खनिज एवं रासायनिक उर्वरक सम्मिलित हैं, जबकि द्वितीय वर्ग में गोबर की खाद, हरी खाद, खली की खाद, हड्डियों एवं खुरों के चूर्ण की खाद, खून की खाद, मछली की खाद आदि आते हैं।

रासायनिक खनिज अथवा आकर्बनिक उर्वरक

मिट्टी की उत्पादकता को बनाये रखने के लिए उसमें निम्न खनिज तत्त्वों का होना आवश्यक है- (1) फास्फोरस, (2) चूना, (3) पोटैशियम, (4) नाइट्रोजन, (5) लौह एवं (6) मैंगनीज इन खनिज तत्त्वों में प्रथम चार अर्थात् फास्फोरस, चूना, पोटैशियम एवं नाइट्रोजन पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक हैं। अतः इन चारों तत्त्वों का किसी भी मिट्टी में भरपूर मात्रा में होना आवश्यक है। शेष दो खनिज तथा लोहा एवं मैंगनीज पौधों में बीमारियों की रोकथाम में सहायक होते हैं। इसलिए इन तत्त्वों का भी थोड़ी बहुत मात्रा में होना वांछनीय होता है। उक्त  खनिज तत्त्वों की कमी की पूर्ति के लिए निम्न रासायनिक उर्वरकों का उपयोग एवं उत्पादन किया जा रहा है-

(1) फास्फोरस- पौधों की वृद्धि के लिए फास्फोरस अत्यंत उपयोगी होता है। यह तत्त्व झमुख्य रूप से एपेटाइट खनिजों से प्राप्त होता है। तथापि यह खनिज कई प्रकार की शैलों में पाया जाता है। मिश्रित फास्फेट शैलों में यह खनिज काफी मात्रा में पाया जाता है। बिहार के मुंगेर, गया और हजारीबाग जनपदों में मिलने वाली अभ्रक उत्तम कोटि का होता है। सिंहभूमि और मान भूमि जनपदों की धारवाड़ शैलों में यह खनिज 20-25 प्रतिशत तक पाया गया हैं। बंबई के चासकोटे क्षेत्र में 30 प्रतिशत तक और मद्रास जिले की काडुराइछ शैलों में इससे भी अधिक मात्रा तक पायी जाती है। आग्नेय तथा कार्यान्तरित शैलों में भी फास्फेट पाया जाता है। ऐसी शैलें त्रिचुरापल्ली और मंसूरी के समीप पायी जाती है।

(2) पोटाश या पोटैशियम- फास्फोरस की भाँति पोटैशियम भी पौधों की वृद्धि के लिए बहुत आवश्यक होता है। पोटाश खनिज तत्त्व कई खनिजों में मिला पाया जाता है। पोटाश मिश्रित खनिज बिहार और राजस्थान की शैलों में काफी मात्रा में वर्तमान है। पोटैशियम सल्फेट, पोटैशियम, क्लोराइड और पोटैशियम नाइट्रेड तथा लकड़ी के चूरे आदि में पोटाश तत्त्व सबसे अधिक पाया जाता है। भारत में पोटाश की प्राप्ति के दो प्रमुख क्षेत्र हैं- (क) साँभर झील की नमक की क्यारियों के निकट रेह मिलती है। यह नमकीन मिट्टी होती है जिसमें 7 प्रतिशत से अधिक पोटाश मिली रहती है। (ख) जबलपुर के निकट चुई और शिमला की पहाड़ियों पर पोटाश मिश्रित रेत विशाल मात्रा में पायी जाती है।

(3) नाइट्रोजन- भारत में पायी जाने वाली अधिकांश मिट्टियों में इस तत्त्व की कमी पायी जाती है। यह तत्त्व सोडियम नाइट्रेट, पोटैशियम नाइट्रेड या शोरा और अमोनियम सल्फेट में बहुत पाया जाता है। सोडियम नाइट्रेट को चिली का शोरा भी कहा जाता है। यह शोरा उत्तरीय चिली के रेगिस्तान में विशाल परिणाम में उपलब्ध है। यह उत्तम कोटि की खाद होती है। यह पानी में बहुत जल्द घुल जाती है और जल्द ही मिट्टी में मिल जाती है। परंतु कई वर्ष तक इसके प्रयोग से मिट्टी में क्षय उत्पन्न हो जाता है। इसके इलाज के लिए खेतों में एक वर्ष सोडियम नाइट्रेट दिया जाय तो दूसरे वर्ष अमोनिया सल्फेट का प्रयोग करना चाहिए।

(4) कैल्शियम या चूना- यह तत्त्व चूने की चट्टानों में अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है। चूने चट्टानें भारत में बहुतायत से पायी जाती हैं। चूने की चट्टानें बिहार में रोहतासगढ़ व शाहाबाद जिले, मध्य प्रदेश में कटनी, राजस्थान में जोधपुर और बूँदी, असम में खासी एवं जतिया की पहाड़ियों पर बहुत अधिक पायी जाती है। डोलोमाइट चट्टानों में भी चूना होता है।

जैविक खादें या कार्बनिक उर्वरक

(1) गोबर की खाद- पशुओं के गोबर एवं उनकी पेशाब से उत्तम प्रकार की प्राकृतिक खाद तैयार होती है। भारत की कृषि में गाय-बैल एवं भैंस का पर्याप्त महत्त्व है। उनके गोबर-मूत्र को एक गढ़े में एकत्र करके मिट्टी से ढँक देने से कुछ दिनों में कम्पोस्ट खाद तैयार होती है। परंतु गरीबी के कारण कृषक गोबर के उपले बनाकर ईंधन के रूप में उपयोग करते हैं। केवल वर्षा ऋतु में जब जब उपले बनाने की सुविधा नहीं रहती है तो गोबर को खाद के लिए एकत्र कर लिया जाता है। अनुमानतः भारत में प्रतिवर्ष 60 करोड़ टन गोबर को उपले बनाकर जला दिया जाता है और यदि समस्त गोबर खाद की तरह उपयोग में लाया जाय तो कृषि की उपज बहुत बढ़  सकती है किंतु गरीब किसान को घर में जलाने के लिए सस्ता ईंधन चाहिए। किसान के पास जलाने के लिए लकड़ी या अन्य कोई ईंधन नहीं होता है और न उसके पास इतना धन ही होता है कि वह ईंधन खरीद ही सकें। अभी हाल ही में भारतीय कृषि अनुसंधान शाला में डॉ० जोशी ने एक ऐसे यंत्र का आविष्कार किया है जिसके द्वारा गोबर से मीथेन गैस निकाली जाती है। यह गैस घरों में ईंधन एवं रोशनी का काम करती हैं तथा बचे हुए गोबर को खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

  1. हरी खाद- जब तक खेत में कोई खरीफ की फसल न बोयी जा रही हो, तब तक वहाँ हरी खाद की फसलें बोयी जा सकती हैं। अगस्त के मध्य में खेत जोत कर हरी फसल को भी जोत देते हैं जो कि खेत में सड़ जाने के बाद भूमि की उर्वराशक्ति में वृद्धि कर देती है। फलस्वरूप उत्पादन में वृद्धि हो जाती है।
  2. मछली की खाद- मलाबार तट या तमिलनाडु तट पर मछली का तेल निकालने के बहुत से कारखाने हैं। इन कारखानों में मछली को उबालकर उसका तेल निकाल लेते हैं और शेष बचे हुए भाग को सुखाकर खाद बनाया जाता है। मछली की खाद में 20% नाइट्रोजन और एक प्रतिशत फासफोरस होता है। अतः यह बहुत ही उपयोगी खाद होती है।

2. भूमि अपरदन या कटाव की समस्या

मिट्टी कृषक की एक महत्त्वपूर्ण संपत्ति होती है। उसका भाग्य मिट्टी की दशा पर निर्भर होता है। मिट्टी का अपरदन मिट्टी के स्तर को नष्ट करता है परिणामस्वरूप उसकी उर्वरता समाप्त होती है अथवा घट जाती है जिसका अंतिम परिणाम मानव रहन-सहन के स्तर में गिरावट होती है। इसीलिए भूमि कटाव आधुनिक भारतीय कृषि की ज्वलंत समस्या है। इस समस्या की गंभीरता पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र एवं बिहार में सर्वाधिक है। भारत में लगभग 148 लाख हेक्टेयर भूमि इससे प्रभावित है। इसके अतिरिक्त लगभग 25 लाख हे0 भूमि जलाक्रांत, क्षारीयता जैसे कारणों से समस्याग्रस्त है।

भूमि कटाव या अपरदन दो प्रकार का होता है- (क) स्तर अपरदन (Sheet Erosion) एवं (ख) अवनालिका अपरदन (Gully Erosion) । प्रथम प्रकार के अपरदन में मिट्टी की पूरी परत अपना स्थान छोड़ देती है और वर्षा के जल प्रवाह से ऊपरी परत बह जाती है। इस प्रकार के अपरदन का प्रभाव मैदानी भागों में विशेष रूप से नदियों के किनारे के भागों में असम, उत्तरी बिहार तथा उत्तर प्रदेश में पाया जाता है। जल द्वारा इस प्रकार के अपरदन का मूल कारण वनस्पति के आवरण का नष्ट हो जाना होता है।

भूमि अपरदन के निम्नलिखित छः प्रमुख कारण हैं- (1) नदियों की बाड़ द्वारा, (2) तेज एवं मूसलाधार वर्षा द्वारा, (3) धरातल की बनावट एवं ढाल, (4) वनस्पतिविहीन धरातल, (5) पशु-चारण, (6) तीव्र वायु प्रवाह।

भूमि संरक्षण (Soll Conservation)- 

भूमि संरक्षण का तात्पर्य मिट्टी की अपरदन से रक्षा ही नहीं होती है बल्कि इसका व्यापक अर्थ होता है जिसके अंतर्गत मिट्टी के दोषों को दूर करना, खादों का उपयोग, उचित समानावर्तन, सिंचाई आदि का विकास भी सम्मिलित होता है। इन साधनों की सहायता से मिट्टी की उर्वरता के स्तर को ऊंचा बनाये रखने में सहायता मिलती है। भारतवर्ष में विभिन्न राज्यों में भूमि संरक्षण के लिए सर्वेक्षण कराया गया है। विभिन्न क्षेत्रों में भूमि अपरदन की जाँच के लिए अनुसंधान केंद्र खोले गये हैं। पहाड़ी भूमि के लिए देहरादून,  चंडीगढ़, ऊटकमंड, क्षारीय भूमि के लिए कोटा, ऊसर भूमि के लिए बयान (गुजरात), बीहड़ भूमि के लिए आगरा (उ.प्र.), काली मिट्टी के लिए बल्लारि (कर्नाटक), जोधपुर (राजस्थान) में अनुसंधान केंद्र स्थापित किये गये हैं। देहरादून में राजपत्रित कर्मचारियों कोटा, ऊटी, बल्लारि एवं हजारी बाग में अन्य कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है। लगभग 40 केंद्रों पर प्रदर्शन योजनाएँ कार्यान्वित की गई हैं।

भूमि संरक्षण की विधियाँ-

(1) मेड़बंदी एवं बाँध निर्माण, (2) समोच्च रेखा जुताई, (3) फसलों का हेर-फेर, (4) खाद का उपयोग, (5) वृक्षारोपण, (6) नदियों की बाढ़ की रोकथाम के लिए बाँध का निर्माण।

  1. उत्खात (Badlands) एवं खड्ड (Ravines) के विकास की समस्या

प्रायः भूमिगत जल स्तर के ऊँचा उठ जाने से मिट्टी पानी से सम्पृक्त हो जाती है। प्रायः सिंचित भू-भागों में यह स्थिति पायी जाती है। इस प्रकार मिट्टी पर रेह की परत जम जाती है। जहाँ जल-स्तर बहुत ऊँचा हो जाता है वहाँ नालियाँ काटकर अथवा कुएँ खोदकर जल स्तर को नीचा कर देना चाहिए। रेह में जिप्सम भी बिखेरते रहना चाहिए। ऊसर खेतों में नमक प्रिय फसलें चना, ढैचा आदि ही बोना चाहिए। इस प्रकार क्षारीय तथा अम्लीय भूमि को उपजाऊ बनाया जाता है।

दलदली तथा काँसा-पतवार से ढँकी भूमि भी उपजाऊ बनायी जा सकती है। दलदली भूमि के पानी को निकाल कर, चरागाह के रूप में उपयोग करना चाहिए तथा उनमें बबूल एवं बेर आदि के वृक्ष उगाने चाहिए। कांस-पतवार, सरकण्डों से आच्छादित भूमि को ट्रैक्टर द्वारा जोतकर खेती के योग्य बनाया जा सकता है। पाँचवीं एवं छठीं पंचवर्षीय योजनाओं के अंतर्गत कृषि योग्य भूमि के विस्तार की विशाल योजना बनायी गई है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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