समाज शास्‍त्र / Sociology

नगरीय संस्कृति | नगरीकरण से उत्पन्न समस्यायें | Urban culture in Hindi | Problems arising from urbanization

नगरीय संस्कृति | नगरीकरण से उत्पन्न समस्यायें | Urban culture in Hindi | Problems arising from urbanization

नगरीय संस्कृति

संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का वह सम्पूर्ण योग है जो एक समाज के लोगों की विशेषताओं को बतलाता है और जो इसी कारण प्राणिशास्त्रीय विरासत का परिणाम रही है।

इस प्रकार संस्कृति से तात्पर्य उन सभी भौतिक-अभौतिक वस्तुओं से है जो कि मानव समाज के पास हैं। जैसे-कला, विचार, विश्वास, प्रथा, विज्ञान व विविध प्रकार के उपकरण इत्यादि। संक्षेप में जीवनयापन के जितने भी विशिष्ट स्वरूप समाज में विकसित होते हैं, उन्हें ही उस समाज की संस्कृति कहा जा सकता है। इसके अन्तर्गत बौद्धिक तथा अबौद्धिक दोनों प्रकार के तत्वों का समावेश रहता है।

नगरीय संस्कृति को मोटे तौर पर हम भौतिक, उपयोगितावादी और व्यावहारिक संस्कृति कह सकते हैं। इसमें आदर्श की अपेक्षा व्यावहारिक उपयोगिता को अधिक स्थान दिया गया है। कला, संस्कृति, साहित्य आदि सभी का मूल्यांकन उपयोगिता के आधार पर किया जाता है इस संस्कृति का सम्बन्ध यथार्थ से अधिक होता है। धर्म का महत्व कम होता है और लोग आध्यात्मिक सुख की अपेक्षा भौतिक सुख को अधिक महत्व देते हैं। यही कारण है कि नगरीय संस्कृति विज्ञान को प्रोत्साहित करती है। आर्थिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा का विकास होता है। वैधानिक क्षेत्र में प्रथा और परम्परा के स्थान पर लिखित कानूनों को अधिक महत्व दिया जाता है। नगरीय संस्कृति के इन लक्षणों का विकास पन्द्रहवीं शताब्दी से आरम्भ हो गया था।

मिल्टन सिंगर का मत है कि नगरीय संस्कृति में परिवर्तन की दिशा लोकप्रियता और व्यावहारिकता की दिशा में है। इसमें यद्यपि निरपेक्षीकरण की प्रवृत्तियाँ हैं किन्तु फिर भी नगरीय संस्कृति परम्परात्मक पवित्र संस्कृति के परिवेश से मुक्त नहीं है। मिल्टन सिंगर के शब्दों में-

There are, indeed, secultarising tendencies but they have not yet cut off urban culture… The traditional culture media not only continuous to service in the city but have also been in corporated in novel into an emerging popular and classical culture.

नगरीय सामान्य संस्कृति का अधिकांश भाग व्यावहारिक है। नृत्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में व्यावसायिकता का विकास हुआ है। भक्ति संगीत को फिल्म के प्रभाव से आधुनिक स्वरूप प्रदान किया जाता है। मिल्टन सिंगर का मत है कि नगरीय संस्कृति ने तो पूरी तरह परम्परात्मक पवित्र संस्कृति पर आधारित है और न लोक संस्कृति पर । इसमें पाश्चात्य तत्वों को भी समावेश हुआ है। औद्योगीकरण और नगरीयकरण के फलस्वरूप नगरीय संस्कृति में पाश्चात्य प्रभावों का समावेश हुआ है। वेशभूषा, खानपान और रहन-सहन के क्षेत्र में ये तत्त्व विशेष रूप से उभर कर आये हैं।

नगरीकरण से उत्पन्न समस्यायें-

 नगरीय के कारण, अनेक प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं। इन समस्याओं का जन्म नगरीकरण के फलस्वरूप जीवन के विविध क्षेत्रों में परिवर्तन के कारण होता है। दूसरी ओर यह समस्याएं जीवन की विधि में भी परिवर्तन कर देती हैं। स्वयं भारत इन समस्याओं का शिकार है। भारत एक विकासशील देश है और यहाँ नगरीकरण की गति तीव्र हो रही है, नगरीकरण की इस गति के कारण यहाँ अनेक प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इन समस्याओं का अध्ययन हम निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कर सकते हैं-

(1) आवास की समस्या- नगरीकरण के कारण जनसंख्या में वृद्धि होती है और इस बढ़ती हुई जनसंख्या के रहने के लिये अधिक संख्या में मकानों आदि की आवश्यकता होती है। बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुरूप नगरों में मकानों की व्यवस्था नहीं हो पाती। इसका परिणाम यह होता है कि बहुत सी मलिन बस्तियों का विकास हो जाता है, खराब मकान बनकर खड़े हो जाते हैं और लोगों को विवश होकर यहाँ रहना पड़ता है। नगरों का जीवन काफी खर्चीला होता है और इस कारण लोगों के पास इतना अधिक पैसा नहीं रह पाता कि वे ऊंचे किराये के मकान ले सकें इसका परिणाम यह होता है कि अनेक स्वास्थ्य सम्बन्धी तथा सामाजिक और व्यक्तिगत विघटन के दर्शन होते हैं। भारतवर्ष में भी स्थिति यही है। जहाँ एक ओर नगरीकरण हो रहा है वहाँ बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुरूप मकान नहीं मिल पा रहे हैं। स्वयं सरकार ने बदलती हुई परिस्थितियों का सामना करने के लिए आवास की समस्या का समाधान के लिए विविध योजनायें बनाई हैं और उनको लागू कर रही हैं। इतना होते हुए भी आवास की समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है।

(2) यातायात की समस्या- बढ़ती हुई जनसंख्या का एक कारण, औद्योगीकरण रोजगार के नये साधनों का विकास आदि होता है। रोजगार के नये साधनों के विकास के फलस्वरूप लोगों को दूर-दूर जाना होता है। सभी के काम एक स्थान के पास नहीं मिल पाते। बढ़ती हुई जनसंख्या आवास के स्थान तक पहुँचने के लिये यातयात के साधनों, मोटरों, बसों, कार आदि की वृद्धि होती है। सवारी की परम्परागत साधनों में वृद्धि होती है। सवारियों और यातायात के साधन व्यवस्थित और अनुशासित ढंग से चल सकें इसके लिये जहाँ सड़कों के चौड़े किये जाने की समस्या सामने आती है वहाँ इस बात की भी समस्या होती है कि वर्तमान सड़कों पर यातायात नियंत्रण रखा जाये। इसके लिए सरकार और शासन को, यातायात नियंत्रण और पुलिस व्यवस्था करनी होती है। दूसरी ओर बढ़ती हुई यातायात और तेज यातायात के कारण दुर्घटनाओं में वृद्धि होती है।

(3) शिक्षा की समस्या- नगरों की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिये उचित शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता होती है। इसका अर्थ यह है कि नगरीकरण के साथ-साथ शिक्षा के प्रचार और उसके गुणात्मक विकास की ओर भी ध्यान देना होता है। नगरीकरण के फलस्वरूप जनसंख्या उतनी बढ़ जाती है कि शिक्षा संस्थाओं की समस्या और शिक्षा की उसमें उपलब्ध सेवायें कम हो जाती हैं। इसका लाभ उङ्गाकर कभी-कभी लोग शिक्षा संस्थाओं को व्यावसायिक ढंग से चलाने लगते हैं। दूसरी ओर शिक्षा संस्थाओं में शिक्षा की आवश्यक सुविधाओं के अभाव में छात्रों के अनुशासन की समस्या भी उभर कर सामने आ जाती है। भारत के बड़े नगरों में आजकल शिक्षा की समस्या बड़े विकराल रूप से उभर कर सामने आ गई है।

(4) मनोरंजन की समस्या- जीवन के लिये मनोरंजन आवश्यक होता है। यह मनोरंजन घर के अन्दर हो सकता है या घर के बाहर। नगरों में आवास की व्यवस्था की कमी के कारण घरेलू मनोरंजन के साधन और उसकी सुविधायें बहुत नहीं होतीं। घर के बाहर मनोरंजन के साधन भी नगरों में जनसंख्या के अनुपात में उपलब्ध नहीं होते। नगरों रहने वालों के पास इतना धन नहीं होता है कि वे अपनी पसन्द के मनोरंजन को खरीद सकें। इस सब का परिणाम यह होता है कि सस्ते मनोरंजन और बुरी कुरीतियाँ, नगरीकरण के साथ-साथ मनोरंजन के नाम पर विकसित हो जाती हैं। नगर के संघर्ष और दैनिक जीवन से विश्राम पाने के लिये मनोरंजन के ऐसे साधनों को अपना लेते हैं जो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं होते। नगरों में सिनेमा का प्रभाव इसका स्पष्ट उदाहरण है।

(5) सुरक्षा और सामाजिक कल्याण की समस्या- नगरीकरण, औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण के फलस्वरूप व्यक्तिगत का बोलबाला हो रहा है। व्यक्ति की सुरक्षा का दायित्व अब परिवार या उसके सम्बन्धी लेने को तैयार नहीं होते। व्यक्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी समाज अथवा शासन को लेनी होती है। इसी कारण आज के सामाजिक जीवन में सुरक्षा और कल्याण की आवश्यकता की वृद्धि हो रही है। नगरीकरण में तीव्रता से आज सुरक्षा और सामाजिक कल्याण की समस्यायें अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई हैं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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