समाज शास्‍त्र / Sociology

भारत में नगरों के विकास | भारत में नगरों के विकास की विवेचना

भारत में नगरों के विकास | भारत में नगरों के विकास की विवेचना | Development of cities in India in Hindi | Glimpses of development of cities in India in Hindi

भारत में नगरों के विकास

भारत में लगभग 20 प्रतिशत जनसंख्या ही नगरों में निवास करती हैं। इस सम्पूर्ण नगरीय जनसंख्या में 20 प्रतिशत जनता 10 लाख से ऊपर आबादी वाले नगरों में रहती है। नगरीय जनसंख्या में आधी से अधिक जनसंख्या एक लाख तक की जनसंख्या वाले कस्बों में निवास करती है। इस प्रकार भारत मुख्यतः गाँवों और छोटे कस्बों वाला देश है तथापि भारत में नगरीय विकास का गत दो दशकों में व्यापक अतिक्रमण हुआ है। भारत में 1961-71 ई0 की अवधि में 38.2 प्रतिशत नगरीय जनसंख्या का विकास हुआ है, जबकि ग्रामीण जनसंख्या का विकास इस अवधि में 22 प्रतिशत ही रहा है। भारत में सन् 1981 ई0 की जनगणना की रिपोर्ट के अनुसार नगरीय जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हुई। 1971-81 ई. की अवधि में भारत में 25 प्रतिशत जनसंख्या में वृद्धि हुई है। स्पष्टतया नगरों की जनसंख्या में भी व्यापक वृद्धि हुई।

भारत में नगरीय विकास की सम्भावनाएँ दिनानुदिन बढ़ती जा रही है।

भारतीय संस्कृति का उदयकाल ईसा पूर्व 5000 वर्ष माना जाता है। इसके साथ ही नगरों का विकास भी होता रहा है जो एक सामाजिक घटनाचक्र है। भारतीय नगर का इतिहास इस सन्दर्भ में 3000 ईसा पूर्व से माना जाता है, जबसे नगरों के विकास का उल्लेख मिलता है। इसलिए भारतीय नगरों को निम्न ऐतिहासिक विकास-क्रमों में माना गया है-

(1) पूर्व प्रारम्भिककाल या हड़प्पा काल

(2) पुरा ऐतिहासिक काल- 3000 ईसा पूर्व से 1500 ई०पू० तक,

(3) 1500 ईसा पूर्व 8 वीं सदी ईसा पूर्व,

(4) प्राचीन ऐतिहासिक काल 800 वीं सदी से 13 ईसवी तक,

(5) मध्य ऐतिहासिक काल 13वीं सदी से 1850 ईसवी तक

(6) वर्तमान काल 1850 ई0 के पश्चात् ।

उपर्युक्त कालों में भारत के विभिन्न भागों में नगरों का विकास होता रहा है लेकिन इसके साथ ही साथ कुछ नगर जो पूर्वकालीन थे मिट भी गये। इन तथ्यों को आधार मानकर विभिन्न कालों में विकसित नगरों के वितरण देखें तो यह बड़ा ही भिन्न मिलता है।

वर्तमान समय में नगरीय विकास की परम्परा को अधिक बल मिला है। ब्रिटिश काल में भारत में 493444 ग्राम और कस्बे थे। इनमें से 1490 ऐसे स्थान थे जहाँ 5000 से अधिक जनसंख्या निवास करती थी। 1770 ऐसे क्षेत्र थे जहाँ 10,000 से कम जनसंख्या निवास करती थी। 374 ऐसे क्षेत्र थे जहाँ 10,000 से 50,000 तक की जनसंख्या निवास करती थी। इस भाँति हमारे देश में कलकत्ता सबसे बड़ा नगर था। यह नगर जनसंख्या की दृष्टि से लन्दन की तुलना में दूसरे नम्बर का नगर था। कलकत्ता और इसके उपनगर की कुल मिलाकर जनसंख्या 7,95,000 थी। कलकत्ता के बाद मुम्बई भारत का प्रमुख नगर था। ब्रिटिशकाल अर्थात् 1871 ई० की जनगणना के समय यहाँ 6440000 लोग रहते थे। इस प्रकार, भारत में एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले कुल 12 प्रमुख नगर थे। इन नगरों में बनारस 1,75,000, पटना 159000, दिल्ली 1540000, आगरा 149000, इलाहाबाद 144,000, बंगलौर 143,0000, अमृतसर 136,000, कानपुर 1,36000, कानपुर देहात, 123000, पूना 1190000, अहमदाबाद 117,000, सूरत 107,000 और बरेली की जनसंख्या 1030000 थी।

भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व ये नगर महानगर माने जाते थे। एशिया और भारत में इन नगरों के अलावा कुछ छोटे नगर भी थे। नागपुर और मेरन की जनसंख्या 20,000 से अधिक थी, फर्रुखाबाद, त्रिचनापल्ली एवं शाहजहाँपुर की जनसंख्या 70000 से अधिक थी। इस प्रकार कुल मिलाकर भारत में 1871 नगर थे।

स्पष्टतया 19वीं शताब्दी में भारत में कुल 44 नगर थे जहाँ नगरीय विकास क्रमिक अवस्था में देखा जा सकता है। इस प्रकार सम्पूर्ण भारत की कुल 3 प्रतिशत जनसंख्या ही नगरीय थी। अन्य देशों की तुलना में यह प्रतिशत बहुत कम था। इस दृष्टि से इंगलैण्ड में उपस्थान नगर व कस्बों की परिभाषा आते थे। वहाँ 32 प्रतिशत जनसंख्या नगरीय के अन्तर्गत सम्मिलित की जाती थी। स्पष्टतयः भारत में 19वीं शताब्दी में ग्रामीण, जनसंख्या का बाहुल्य था। जहाँ ग्रामीण समुदाय अधिक थे, किन्तु कालान्तर में यह स्थिति तीव्रगामी परिवर्तन को प्राप्त हुई।

19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत में नगरीय विकास की गति अधिक तीव्र हुई। इसका प्रमुख कारण यह था कि यहाँ औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप यान्त्रिकी का विकास हुआ। इससे यातायात साधनों का विकास हुआ। इन कारणों के फलस्वरूप जनसंख्या में गतिशीलता का विकास हुआ। इस गतिशीलता से भारत के व्यापारी समुदाय अधिक प्रभावित हुए। अर्थात् प्रथम व्यापारिक समुदायों ने स्थानान्तरण प्रारम्भ किया। इस प्रकार 1891 ई0 में भारतीय जनगणना का आयोजन हुआ और नगरीय तथा ग्रामीण जनसंख्या का विभाजन हुआ। इस विभाजन के आधार भी विकसित किये गये। कारण कि जनसंख्या में स्थानान्तरण की प्रक्रिया 1871 ई0 से 1891 ई0 के बीच अधिक विकसित हुई। इस दृष्टि से नगरपालिका क्षेत्र में रहने वाली जनसंख्या को नगरीय जनसंख्या कहा गया। जहाँ स्थानीय शासन था और नगरपालिका के शासन विकसित नहीं हुए थे, वहाँ जनता की औद्योगिक व वाणिज्यिक क्रियाओं के आधार पर उसे नगरीय घोषित किया गया। इस प्रकार कालान्तर में यह निश्चित किया गया कि 5000 से अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्र को नगरीय क्षेत्र कहा जाये और परिणामतः यहाँ रहने वाली जनता को नगरीय जनता माना गया।

1891 ई0 की जनगणना के विभिन्न आधारों पर 2035 नगरीय क्षेत्र थे। इस प्रकार भारत में 9.48 प्रतिशत जनसंख्या नगरीय थी। 19वीं शताब्दी के अन्त तक भारत में 20,000 की जनसंख्या वाले नगरों की अधिकता थी। ये कस्बे ग्रामीण क्षेत्रों में केन्द्रों में स्थित रहे।

20वीं शताब्दी में भारत में नगरीय विकास की प्रक्रिया में परिवर्तन आया। 1901 ई0 की जनगणना के समय नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत 10 हो गया। भारत में नगरीय क्षेत्रों में सम्मिलित करने का मुख्य आधार जनसंख्यात्मक ही रहा। इस दृष्टि से यह जनसंख्या 5000 या उससे अधिक ही मानी जाती रही।

1921 ई० के उपरान्त भारत में नगरीय जनसंख्या में लगातार वृद्धि होती रही। 1931ई0 में नगरीय जनसंख्या ।। प्रतिशत थी। 1931-41 के दशक में एक लाख से ऊपर की जनसंख्या होने के कारण 23 कस्बे नगरों के रूप में परिणत हो गये। नगरीय जनसंख्या में 60 लाख की वृद्धि हुई।

1951 ई० में भारत में कुल 3018 कस्बे और नगर थे। इस प्रकार 3569 लाख जनसंख्या में से 619 लाख जनसंख्या कस्बों तथा नगरों में रह रही थी। भारत में इस भाँति बड़े नगरों का विकास और कस्बों का नगरों के रूप में परिणत होना इस दशक की विशेषता रही है। 1951 ई० की जनगणना के अनुसार दक्षिण भारत में नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत 19.7 मध्य भारत में 15.8 और उत्तर भारत में 13.6 रहा है। भारत के प्रमुख नगरों में 1951 ई० में जनसंख्या का विवरण निम्न प्रकार रहा है-

नगर (उपनगर सहित)

जनसंख्या (लाखों में)

1- वृहद् कलकत्ता

45.78

2- वृहद् मुम्बई

28.39

3- चेन्नई

24.16

4- दिल्ली

13.84

5- हैदराबाद

10.86

6- बंगलौर

7.05

7- पूना

5.88

8- लखनऊ

4.97

भारत में 1961 ई0 व 1971 ई० में नगरीय जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हुई। 1971 ई० की जनगणना में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत 20 रहा। इस दृष्टि से सबसे ज्यादा नगरीकरण महाराष्ट्र में हुआ। इस समय 52 प्रतिशत नगरीय जनसंख्या 1 लाख से अधिक आबादी वाले नगरों में निवास करती थी। 1971 ई0 में बड़े नगरों में जनसंख्या का प्रव्रजन अधिक हुआ। भारत में इस समय 10 लाख और इससे ऊपर की जनसंख्या के 9 नगर थे। इस दृष्टि से कलकत्ता, बृहद्, मुम्बई, चेनई, हैदराबाद, अहमदाबाद, बंगलौर और कानपुर तथा पूना है।

1981 ई0 में कुल नगरीय जनसंख्या 156.19 मिलियन थी अर्थात् 1981 ई० में 23.7 प्रतिशत जनसंख्या नगरीय थी। अर्थात् नगरीय जनसंख्या में वृद्धि 46.1 प्रतिशत रही, जबकि पिछले दशक 1961-71 ई० में यह प्रतिशत 37.7 था। इस प्रकार नगरीय जनसंख्या में यह तीव्र वृद्धि थी।

वर्तमान दशकों में नगरीय जनसंख्या में वृद्धि तीव्र गति से होती जा रही है और आज यह एक विकट समस्या बनती जा रही है। अतएव अपेक्षित है कि ग्रामीण क्षेत्रों में नगरीय सुविधाओं का विस्तार किया जाये जिससे ग्रामों से नगरों में जनसंख्या के प्रवास को नियन्त्रित किया जा सके।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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