राजनीति विज्ञान / Political Science

न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ | अमरीका में न्यायिक पुनरावलोकन | भारत में न्यायिक पुनरावलोकन | न्यायिक पुनरावलोकन और संविधान

न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ | न्यायिक पुनरावलोकन से आप क्या समझते हैं | अमेरिकी और भारतीय अनुभव के आधार पर उसके व्यावहारिक स्वरूप का परीक्षण | अमरीका में न्यायिक पुनरावलोकन | भारत में न्यायिक पुनरावलोकन | न्यायिक पुनरावलोकन और संविधान

न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ (Meaning)-

एक स्वतन्त्र न्यायपालिका, जिसे कानूनों की व्याख्या और उनके क्रियान्वयन का अधिकार सौंपा गया हो, पाश्चात्य राजनीतिक व्यवस्थाओं के सर्वाधिक महत्त्व पूर्ण लक्षणों में से एक है। न्यायिक पुनरावलोकन कोई सामान्य शक्ति नहीं है वरन एक देश के राजनीतिक जीवन पर इसका निर्णायक सांविधानिक प्रभाव पड़ता है।

न्यायिक पुनरावलोकन से आशय न्यायालयों की उस शक्ति से है जिसके आधार पर वे व्यवस्थापिका के उन कानूनों को अवैधानिक एवं अमान्य घोषित कर सकते हैं जो उनके मत में संविधान की किसी व्यवस्था के प्रतिकूल हों। न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के अधीन न्यायालय संविधान की व्याख्या करते हैं और कानूनों तथा प्रशासनिक आज्ञाओं की वैधानिकता- अवैधानिकता का निर्णय करते हैं। इस अधिकार का प्रयोग देश के छोटे से छोटे न्यायालय भी अपने अधिकार क्षेत्र में आनेवाले मामलों में कर सकते हैं, परन्तु अन्तिम निर्णय सदैव सर्वोच्च न्यायालय का ही होता है।

अमरीका में न्यायिक पुनरावलोकन

(Judicial Review in the U. S. A.)

न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का सर्वोत्तम उदाहरण अमरीका में देखने को मिलता है। यहाँ न्यायपालिका के अतिशय प्रभाव और सम्मान का आधार यही शक्ति है, जिसके अधीन वह न्यायालय की व्याख्या करती है और कांग्रेस तथा राज्य की व्यवस्थापिकाओं के कानूनी तथा अन्य प्रशासनिक आज्ञाओं की वैधानिकता अवैधानिकता का निर्णय करती है। यह गलत धारणा है कि केवल सर्वोच्च न्यायालय को न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार प्राप्त है बल्कि वास्तव में प्रत्येक राज्य के उच्च न्यायालय को भी अधिकार है कि राज्य का प्रमुख कानून संविधान के, अनुकूल है अथवा नहीं के प्रश्न पर अन्तिम निर्णय दे। संघीय जिला न्यायालय तथा अपील न्यायालय दोनों ही किसी संघीय कानून, राज्य कानून या राज्य के संविधान की किसी भी व्यवस्था को संघीय संविधान के प्रतिकूल घोषित कर उसे लागू करने से अस्वीकृत कर सकते हैं। सब अभियोगों का अन्तिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही किया जाता है। न्यायिक पुनरावलोकन के अपने इस अधिकार का प्रयोग सर्वोच्च न्यायालय ने इतने प्रभावशाली ढंग से किया गया है कि लोग यह कहने लगे हैं कि “संविधान वास्तव में वही है, जो उसे न्यायाधीश बताते हैं।”

आधार- कुछ विद्वानों के अनुसार न्यायिक पुनरावलोकन की इस शक्ति का कीई संवैधानिक आधार नहीं है। किन्तु अधिकांश विचारकों का निश्चित मत है कि संविधान की दो धाराओं में न्यायपालिका की वह शक्ति निहित है जिसका उपयोग करते हुए वह कांग्रेस एवं राष्ट्रपति के कार्यों का अर्थात् व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका के कार्यों का न्यायिक पुनरावलोकन कर सकती है। ये दो धाराएँ हैं—(i) संविधान की चौथी धारा की दूसरी उपधार और (ii) संविधान की तीसरी धारा की दूसरी उपधारा ।

प्रभाव और मूल्यांकन- अमरीका के राजनीतिक जीवन पर न्यायिक पुनरावलोकन के शक्ति का पर्याप्त संवैधानिक प्रभाव पड़ा है। इस शक्ति का प्रयोग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान को एक नयी दिशा दी है। इस शक्ति के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य विधान मण्डलों और कांग्रेस द्वारा निर्मित सैकड़ों कानूनों को अवैधानिक घोषित करके न्यायिक सर्वोपरिता के सिद्धान्त को बल दिया है। दूसरा प्रभाव यह हुआ है कि राज्यों की तुलना में संघ की स्थिति शुद्ध हो गई है। किन्तु, साथ ही इस शक्ति ने राज्य के अधिकारों की रक्षा में भी सहायता की है। तीसरे न्यायिक पुनरावलोकन का व्यापक प्रभाव राज्य के ‘पुलिस अधिकारों पर भी पड़ा है।

सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के बल पर नीतियों का निर्धारण भी किया है। इसीलिए न्यायाधीशों को ‘संविधान का नया निर्माता’ कह दिया गया है। न्यायिक पुनरावलोकन संविधान की पवित्रता की रक्षा का एक अमोघ अस्त्र सिद्ध हुआ है। इसने संविधान की रक्षा करते हुए लोकतन्त्र के आदेश तथा प्रशासन की मनमानी पर अंकुश लगाया है। अनेक अवसरों पर न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के प्रयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों की प्रान्तीय संकीर्ण प्रवृत्ति को रोककर राष्ट्रीय एकता की भावना को समृद्ध बनाया है।

आलोचना- (1) इस शक्ति के कारण सर्वोच्च न्यायालय न्यायसम्बन्धी मौलिक कार्यों को करना भूल गया है।

(2) सर्वोच्च न्यायालय ने अपने को संघीय अथवा राज्यों के न्याय क्षेत्र तथा कानून निर्माण के कार्य का पुनरावलोकन करने तक ही सीमित नहीं रखा है।

(3) सर्वोच्च न्यायालय की नीति और निर्णयों में एकरूपता का अभाव रहा है।

(4) न्यायिक पुनरावलोकन की व्यवस्था आधुनिक सामाजिक एवं आर्थिक दशाओं के लिए अनुपयुक्त हैं। संविधान की रक्षा के नाम पर न्यायिक समीक्षा की शक्ति के सहारे न्यायपालिका प्रगति के मार्ग में बाधा डाल सकती है।

(5) सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के बल पर कांग्रेस द्वारा कठोर परिश्रम से निर्मित विधि को नर कर देता है।

 इसको ‘न्यायिक अत्याचार’ भी कहा गया है तथा सर्वोच्च न्यायालय की इस शक्ति पर रोक की माँग की जाती है।

उपर्युक्त अध्ययन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अमरीका का सर्वोच्च न्यायालय बड़ा शक्तिशाली है। उसे देश के संविधान का चौथा पहिया कहा जाता है। यह अमेरिकन शासन पद्धति का अत्यन्त सफल और लाभकारी निकाय है, जिसने अमरीका के जीवन को सर्वाधिक प्रभावित किया है।

भारत में न्यायिक पुनरावलोकन

भारतीय संविधान विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं का समन्वय है। इसी प्रकार न्यायिक क्षेत्र में भी न्यायिक सर्वोच्चता के अमेरिकन सिद्धान्त का और संसदीय सर्वोच्चता के ब्रिटिश सिद्धान्त के समन्वय का प्रयत्न किया गया है। यह इसलिए आवश्यक था कि संविधान-निर्माता यह नहीं चाहते थे कि न्यायालय एक तीसरे सदन के रूप में कार्य करने लगे। वे यह भी नहीं चाहते थे कि संसद की सर्वोच्चता इतनी हो कि वह निरंकुश बन जाय । अतः उन्होंने नियन्त्रण और सन्तुलन का मार्ग अपनाते हुए न्यायपालिका से यह अपेक्षा रखी कि वह एक ओर तो विधायी प्रस्तावों तथा कार्यकारी आदेशों के बीच असंगत पर ध्यान दे और दूसरी ओर संविधान के शब्दों को दृष्टिगत रखते हुए संविधान की व्याख्या करे । संविधान निर्माताओं ने ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ को स्वीकार किया।

न्यायिक पुनरावलोकन और संविधान

भारतीय संविधान में न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का उल्लेख निम्नलिखित अनुच्छेदो में मिलता है:-

(अ) अनुच्छेद 13 (2)– इस अनुच्छेद के अनुसार-“राज्य ऐसा कोई कानून नही बनायेगा जो मूल अधिकार भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनता या कम करता हो और इस खण्ड का उल्लंघन करने वाला प्रत्येक कानून उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगा।” इस प्रकार उच्चतम न्यायालय राज्य द्वारा किये गये कार्यों को अनुच्छेद 13 (2) के आधार पर देखता है और यदि वे उसके अनुकूल नहीं हैं तो उन्हें असंवैधानिक घोषित कर सकता है।

(ब) अनुच्छेद 246- इस अनुच्छेद द्वारा उच्चतम न्यायालय की न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार प्राप्त है। इसमें संघ तथा राज्यों की एक-दूसरे के विधायी क्षेत्रों में कानून बनाने की शक्तियों का उल्लेख है। चूंकि केन्द्र और राज्यों की विधायी सीमा का उल्लेख संविधान में कर दिया गया है; अत: किसी भी पक्ष द्वारा इस सीमा का उल्लंघन संविधान के विरुद्ध है और उच्चतम न्यायालय अपनी न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग कर उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता। उच्चतम न्यायालय इस सम्बन्ध में ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के अनुसार कार्य की वैधता की जाँच करता है। यह अमरीका की तरह ‘स्वविवेक का प्रयोग’ नहीं करता।

(स) अनुच्छेद 32- इस अनुच्छेद में नागरिकों के वैधानिक उपचारों का उल्लेख है। अत: कोई भी नागरिक अपने अधिकार के उल्लंघन पर उच्चतम न्यायालय की शरण ले सकता है। उच्चतम न्यायालय को अधिकार है कि वह देखे कि क्या वास्तव में राज्य के किसी कार्य या कानून से उस नागरिक के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है।

अनुच्छेद 32 (2) के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय को बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार पृच्छा लेख निकालने का अधिकार है। ये लेख या आदेश ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के आधार पर ही निकाले जाते हैं, अमरीका की भाँति ‘प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त’ के अनुसार नहीं।

(द) अनुच्छेद 131 एवं 132- अनुच्छेद 131 में उच्चतम न्यायालय के प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार का और अनुच्छेद 132 में संवैधानिक मामलों में उसके अपीलीय क्षेत्राधिकार का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार के दोनों अनुच्छेद उच्चतम न्यायालय को संघीय और राज्य सरकारों द्वारा निर्मित विधियों के पुनरावलोकन का अधिकार देते हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि अमरीका की भाँति ही भारत में भी न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का आधार संविधान है। उच्चतम न्यायालय भारत में न्यायिक पुनरावलोकन के अपने अधिकार का प्रयोग ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के अनुसार ही कर सकता है।

विभिन्न संविधान में संशोधनों द्वारा उच्चतम न्यायालय की पुनरावलोकन की शक्ति में कटौती कर दी गई है। जैसे- आपातकालीन स्थिति की घोषणा के अध्यादेशों को न्यायालय के क्षेत्राधिकार से अलग रखा गया है। इसी प्रकार राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और संसद के अध्यक्ष के चुनावों पर विचार करने के न्यायालय के अधिकार समाप्त कर दिए गए। प्रधानमंत्री को भी राष्ट्रपति और राज्यपालों की भाँति दाण्डिक तथा दीवानी कार्यवाहियों से विमुक्ति प्रदान कर दी गई है। उच्चतम न्यायालय को अपने निर्णयों और आदेशों के पुनरावलोकन का अधिकार प्राप्त है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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