शिक्षाशास्त्र / Education

बेसिक शिक्षा के गुण | बेसिक शिक्षा के दोष | Merits of Basic Education in Hindi | Demerits of Basic Education in Hindi

बेसिक शिक्षा के गुण | बेसिक शिक्षा के दोष | Merits of Basic Education in Hindi | Demerits of Basic Education in Hindi

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बेसिक शिक्षा के गुण (Merits of Basic Education)

बेसिक शिक्षा दर्शन, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र के सबसे अधिक आधुनिक और शुद्ध सिद्धान्तों पर आधारित है। इस दृष्टि से बेसिक शिक्षा को एक अति उत्तम प्रणाली कहा जा सकता है। इसमें निम्नलिखित गुणों का समावेश है।

(1) बाल केन्द्रित शिक्षा (Child-centered Education)-

बेसिक शिक्षा में किसी न किसी रूप में बालक को ही शिक्षा का केन्द्र माना जाता है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक कार्य बालकों की रुचियों, आवश्यकताओं, अभिवृत्तियों, बुद्धि आदि के अनुसार होता है। इस प्रकार बेसिक शिक्षा में बाल केन्द्रित शिक्षा की व्यवस्था है।

(2) क्रिया द्वारा शिक्षा की व्यवस्था (Provision of Learning by doing)-

बेसिक शिक्षा में हस्तकला के माध्यम से शिक्षा देने के कारण बालकों को क्रिया द्वारा शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता है जिससे उनके हाथ और मस्तिष्क दोनों सुप्रशिक्षित हो जाते हैं। वर्तमान समय में सभी शिक्षाशास्त्रियों को क्रिया द्वारा शिक्षा के सिद्धान्त माननीय हैं।

(3) व्यक्तित्व का सर्वागीण तथा सम्पूर्ण विकास (Harmonious and Complete Development of Personality)-

बेसिक शिक्षा में बालक को अपने व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं, यथा-शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, नैतिक आदि का समुचित विकास करने का अवसर प्राप्त होता है । जहाँ वे किसी हस्तकला को सीखकर शारीरिक परिश्रम करने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं वहाँ वे विभिन्न विषयों का परस्पर सम्बन्धित ज्ञान प्राप्त कर अपना मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक तथा नैतिक विकास कर लेते हैं। इस प्रकार बेसिक शिक्षा में बालकों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण तथा सम्पूर्ण विकास होता है।

(4) दार्शनिक आधार (Philosophical Basis)-

जिस प्रकार गाँधीजी का अहिंसावाद भारतीय आदर्शवादी दर्शन पर आधारित है उसी प्रकार बेसिक शिक्षा पद्धति भी आदर्शवाद पर आधारित है। यह पद्धति बालकों गुणों के विकास पर जोर देती है जिनका भारतीय यथार्थवादी विचारधारा में महत्वपूर्ण स्थान रहा है, जैसे-परोपकार, विश्व-बन्धुत्व, कर्त्तव्यपालन, त्याग, संयम, सत्य, सेवा भाव, व्यवहार कुशलता आदि। इस प्रकार यह पद्धति बालकों को एक आदर्श नागरिक तथा व्यवहार कुशल व्यक्ति बनाना चाहती है।

(5) मनोवैज्ञानिक आधार (Psychological Basis)-

इस पद्धति में हस्तकला को केन्द्र मानकर शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था के परिणामस्वरूप बालकों को ‘क्रिया द्वारा सीखने’ (Learning by Doing) का अवसर प्राप्त होता है जो एक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त है। क्रिया द्वारा सीखने से एक तो बालकों को अपनी नैसर्गिक तथा रचनात्मक प्रवृत्तियों के विकास तथा तुष्टि का अवसर मिलता है और दूसरे उन्हें हाथों तथा मस्तिष्क दोनों से एक साथ शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होता है जिससे सीखी हुई वस्तु उनके मस्तिष्क में स्थायी तथा अमिट हो जाती है। इस पद्धति में बालक ही शिक्षा का केन्द्र होता है। इस प्रकार यह पद्धति बाल-प्रकृति पर आधारित है अर्थात् मनोवैज्ञानिक है।

(6) सामाजिक आधार (Social Basis)-

बेसिक शिक्षा में सामाजिक पहलू पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। हस्तकला द्वारा शिक्षा देने से बालक न केवल व्यावहारिक कुशलता प्राप्त करता है बल्कि उसमें अनेक सामाजिक गुणों यथा-आज्ञापालन, सहयोग, सद्भावना, सहानुभूति, सेवाभाव, प्रेम, विश्व-बन्धुत्व इत्यादि का विकास होता है । फलस्वरूप वह समाज की उन्नति में योगदान करने योग्य होता है। शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति भी किसी हस्तकला की शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं जिससे समाज उनके भार से मुक्त हो जाता है।

(7) आर्थिक आधार (Economic Basis)-

वर्तमान समय में भारत में गरीबी तथा बेकारी की समस्या बहुत ही विकराल रूप ग्रहण किये हुए है। इसका प्रमुख कारण यह है कि यहाँ के शिक्षालयों में बालकों क दस्तकारी की शिक्षा प्राप्त नहीं होती है जो कि भविष्य में जीविकोपार्जन में सहायक हो। बेसिक शिक्षा में बालकों को दस्तकारी के माध्यम से निःशुल्क शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की गई है। शिक्षा के स्वावलम्बी होने के कारण सरकार पर आर्थिक बोझा भी नहीं पड़ता है। इस प्रकार शिक्षा देश की आर्थिक समस्याओं का सामना करने में सहायक होती है।

(8) सौन्दर्यानुभूति का विकास (Development of Aesthetic feeling)-

बेसिक शिक्षा के अन्तर्गत बालक एक-दूसरे से अधिक सुन्दर तथा सुडौल वस्तुओं को बनाने का प्रयास करते हैं ताकि उनके द्वारा निर्मित वस्तुओं को प्रशंसा हो। इस प्रकार के प्रयत्नों के परिणामस्वरूप बालकों में सौन्दर्यानुभूति का विकास होता है और साथ ही साथ उनकी मूलवृत्तियों का ‘शोधन’ (Sublimation) तथा ‘मार्गान्तीकरण’ (Redirection)होता है।

(9) श्रम का महत्व (Importance of Labour)-

ब्रिटिश काल से चली आने वाली वर्तमान शिक्षा ने, जिसमें हस्तकला का कोई स्थान नहीं है, श्रम के प्रति तिरस्कार की भावना उत्पन्न कर दी है। फलस्वरूपसमाज दो वर्गों में विभाजित हो गया है-श्रमजीवी एवं धनवान । इन दोनों वर्गों के बीच खाई को पाटने के  लिए गाँधीजी ने बेसिक शिक्षा में हस्तकला के माध्यम से शिक्षा देने पर बल दिया है। इसके परिणामस्वरूप मनुष्यों में श्रम एवं श्रमिकों के प्रति प्रेम की भावना उत्पन्न हो गई है। इस प्रकार बेसिक शिक्षा में श्रम को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

(10) समन्वय की विशेषता (Characteristic of Correlation)-

बेसिक शिक्षा में हस्तकला को केन्द्र मानकर समस्त विषय पढ़ाये जाने के कारण उनमें समन्वय स्थापित हो जाता है। परिणामस्वरूप उससे हमें समन्वय या सानुबन्ध शिक्षा के लाभ प्राप्त होते हैं । इससे बालकों को विभिन्न विषयों की जो भी शिक्षा प्राप्त होती है वह अलग-अलग न होकर परस्पर सम्बन्धित रहती है और इस प्रकार जीवन के विभिन्न पहलुओं में सम्बन्ध बना रहता है।

बुनियादी शिक्षा के दोष (Demerits of Basic Education)

प्रत्येक शिक्षा पद्धति में गुणों के साथ-साथ उसमें कुछ न कुछ दोष अवश्य पाये जाते हैं, बुनियादी शिक्षा इस तथ्य का अपवाद नहीं है। इसमें भी निम्नलिखित दोष अथवा असफलता के कारण हैं-

(1) बेसिक शिक्षा महँगी है (Basic Education Is costly)-

बेसिक शिक्षा सामान्य-शिक्षा से महँगी है। बेसिक स्कूलों को यदि साज-सज्जा और शिक्षण-सामग्री से पूर्ण किया जाये तो अत्यधिक धन की आवश्यकता होगी। इन विद्यालयों में शिक्षण का स्तर निम्न होने के कारण अप्रशिक्षित अध्यापक हैं। यदि अध्यापकों के प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की जाये तो उसके लिए भी अधिक धन की आवश्यकता होती है। मूल्यांकन समिति के अनुसार-“सामान्य धारणा यह है कि बेसिक स्कूल साधारण स्कूल से अधिक महंगे हैं। यही कारण है कि बेसिक स्कूल में शिक्षा का शीघ्रता से प्रसार नहीं किया जा सकता है।”

(2) हस्तशिल्प का चुनाव अनुचित है (Selection of Hand-Crafts Is Not Suitable)-

बेसिक स्कूलों में हस्त-शिल्प का चुनाव उचित ढंग से नहीं किया जाता है। अधिकतर विद्यालयों में कताई और बुनाई की व्यवस्था होती है। गाँव के विद्यालयों में इन शिल्पों के अतिरिक्त बागवानी या कृषि की शिक्षा देने की व्यवस्था है। इस प्रकार हम देखते हैं कि हस्तशिल्प की शिक्षा अत्यन्त सीमित रूप में दी जाती है। इसमें छात्रों की रुचियों का ध्यान नहीं रह पाता है। डॉ० एस० एन० मुकर्जी के अनुसार-“यह शिक्षा बालक की रुचियों और प्रवृत्तियों का विकास होने से पूर्व और उसका वास्तविक ज्ञान प्राप्त किये बिना बालक को अल्प आयु ही किसी हस्त शिल्प में बाँध देती है।”

(3) आत्मनिर्भरता का सिद्धान्त अवांछनीय है (Self-Supporting Principle is Not Logical)-

बेसिक-शिक्षा आत्मनिर्भरता का चुनाव चिह्न नहीं है। शिक्षा को आत्म-निर्भर बनाने पर यदि बल दिया जाता है तो विद्यालय ‘ग्राम उद्योग केन्द्र’ या ‘लघु उद्योग केन्द्र’ का रूप लेंगे। छात्र और अध्यापक के मध्य एक नौकर और मालिक के सम्बन्ध स्थापित होंगे। छात्र शिक्षा को ज्ञान के लिए न सीखकर जीविका के लिए एक साधन मानने लगेंगे।

(4) औद्योगिक प्रगति में बाधक (Hinders in Industrial Development)-

बेसिक शिक्षा नगरों की अपेक्षा गाँवों के लिए अधिक उपयुक्त मानी जाती है। वर्तमान युग विज्ञान का युग कहलाता है। यदि बेसिक शिक्षा के अनुसार शिक्षा दी जाती है तो देश की औद्योगिक प्रगति में बाधा उत्पन्न होगी। मिरडेल ने कहा है कि-“गांधी जी के केवल ग्रामों के प्रति ध्यान दिये जाने और परम्परागत संस्कृति पर बल दिये जाने के कारण उनके बेसिक शिक्षा के प्रचार को परिवर्तन, गतिशीलता और विकास का शत्रु समझा गया।”

(5) हस्तशिल्प पर अधिक बल (Stress On Hand Crafts)-

बेसिक शिक्षा में हस्त शिल्प पर अधिक बल दिया जाता है। समय सारणी के 5 घण्टे 20 मिनट में 3 घण्टे 20 मिनट शिल्प और 2 घण्टे बेसिक शिक्षा को दिये जाते हैं । हस्तकला के माध्यम से सभी विषय की शिक्षा देना भी उचित नहीं है।  हस्तकला पर अधिक बल देने से बालक की अवहेलना होने लगती है।

(6) शिल्प द्वारा सभी विषयों की शिक्षा असम्भव (Instruction Of All Subjects Through Handicrafts Is Impossible)-

शिल्प द्वारा सभी विषयों की शिक्षा देना कठिन ही नहीं अपितु असम्भव है। यदि सभी विषयों को अनिवार्य रूप से शिल्प से सम्बन्धित किया जाता है तो अपितु शिक्षण के सिद्धान्तों के विपरीत होगा। प्रो० हुमायूं कबीर के अनुसार-“बीजगणित, दर्शन, भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र एवं तर्कशास्त्र जैसे विषयों की शिक्षा समन्वित पद्धति से सम्भव नहीं है।”

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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