समाज शास्‍त्र / Sociology

भारतीय नगरों की प्रमुख समस्याएँ | समस्या निराकरण के उपाय | भारतीय नगरों की प्रमुख समस्याओं के समाधान के उपाय स्पष्ट कीजिए

भारतीय नगरों की प्रमुख समस्याएँ | समस्या निराकरण के उपाय | भारतीय नगरों की प्रमुख समस्याओं के समाधान के उपाय स्पष्ट कीजिए | Major problems of Indian cities in Hindi | Problem solving solutions in Hindi | Explain the solutions to the major problems of Indian cities in Hindi

भारतीय नगरों की प्रमुख समस्याएँ

भारतीय नगरीय समुदाय आज विघटन के कगार पर खड़ा है। गत वर्षों से यहाँ जनजीवन में विभिन्न व व्यापक परिवर्तन हुए हैं। इससे यहाँ के सामाजिक, आर्थिक जीवन में अनेकानेक समस्याएँ हो गयी हैं। आधुनिक नगरों में जनाधिक्य होने के कारण यहाँ विभिन्न भौतिक व सामाजिक समस्याओं का उद्रेक हो गया है। इस दृष्टि से ये समस्याएं नगरीय जीवन में विघटन उत्पन्न करती हैं। भारतीय नगरीय समुदाय की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं-

  1. बेकारी की समस्या
  2. नगरों में भिक्षावृत्ति की समस्या,
  3. वेश्यावृत्ति एक नगरीय समस्या
  4. नगरों में अपराध की समस्या,
  5. अत्यधिक भीड़-भाड़ और आवास की समस्या
  6. गन्दी बस्तियों की समस्या।

1. बेकारी की समस्या- नगरीय जीवन में बेकारी की समस्या है जो अनेक गम्भीर समस्याओं को जन्म देती है। एक समस्या आर्थिक जीवन के साथ-साथ सामाजिक जीवन को भी अत्यधिक प्रभावित करती है। बेकारी की समस्या समाज में गरीबी, ऋणग्रस्तता और अपराध जैसी समस्याओं को जन्म देती है। समस्याओं के कारण वैयक्तिक विघटन का परिणाम वेश्यावृत्ति, मद्यपान, आत्महत्या, परित्याग, जुआवृत्ति तथा भिक्षावृत्ति आदि के रूप में आता है। इनसे सामाजिक विघटन की प्रक्रिया विकसित हो जाती है। इस प्रकार बेकारी की समस्या का रूप अपने आप में अभिशाप होने के साथ-साथ यह अनेक प्रकार से सामाजिक विघटन को जन्म देती है।

बेकारी की समस्या नगरीय जीवन में हो या ग्रामीण जीवन में दोनों दृष्टियों से हानिकारक है। नगरीय जीवन की बेकारी की समस्या के परिणाम ग्रामीण जीवन की बेकारी की तुलना में अति जटिल और गम्भीर होते हैं। क्योंकि जीवन की जटिलता नगरीय जीवन की प्रमुख विशेषता है।

बेकारी वैयक्तिक विघटन का एक स्वरूप है। इसमें व्यक्ति की असमर्थता, इच्छा-शक्ति और बाह्य परिस्थितियों के तत्व उल्लेखनीय स्थान रखते हैं। बेकारी वह वैयक्तिक और सामाजिक विघटन का रूप है जिसमें व्यक्ति की वे परिस्थितियाँ जन्म लेती हैं, जो दरिद्रता, भुखमरी व अन्य विघटन के कारकों को विकसित करती हैं। इन कारकों से सामाजिक कार्यों का विकास नहीं होता है और सामाजिक विघटन अवश्यम्भावी हो जाता है।

2. भिक्षावृत्ति की समस्या- भिक्षावृत्ति एक नगरीय सामाजिक एवं आर्थिक समस्या है। यह एक ऐसी समस्या है कि जनमत इसके विरूद्ध नहीं है। वस्तुतः नगरों में भिक्षावृत्ति एक गम्भीर आर्थिक समस्या है। भीख के रूप में लाखों रूपया प्रतिदिन भिखारियों को दिया जाता है। इस रूपये का कोई उत्पादन नहीं होता है। यदि यही रूपया उत्पादन में लगाया जाये तो इससे राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी। एम0एम0 गौर महोदय ने इस पक्ष पर बहुत अधिक बल दिया है।

भिक्षावृत्ति के उन्मूलन के उपाय – इस सम्बन्ध में अनेक समितियों ने अपने सुझाव दिये हैं। गौर अध्ययन समिति के सुझाव निम्नलिखित हैं-

(i) भिन्न प्रकार के भिखारियों जैसे- कुष्ठ रोगी, शारीरिक बाधित स्त्रियों, बूढ़े बालक आदि के लिए पृथक-पृथक सुधार-गृहों की स्थापना की जानी चाहिए।

(ii) चूँकि अधिकांश भिखारी व्यवसाय के अयोग्य हैं। इसलिए जन सहायता से इनकी देखभाल की व्यवस्था की जानी चाहिए।

(iii) जो भिखारी कोई कला कार्य सीखना चाहते हैं, उन्हें इसको सिखाने का प्रबन्ध किया जाना चाहि।

(iv) एक स्वागत केन्द्र खोला जाये जहाँ गिरफ्तार करके लाये गये भिखारियों को रखा जाये और उनकी प्राथमिक देखभाल की जाये।

3. वेश्यावृत्ति- एक नगरीय समस्या- वेश्यावृत्ति नगरों में एक गहन सामाजिक समस्या है। यह सामाजिक विघटन का एक प्रकार है। यह सामाजिक विघटन का एक स्वरूप है। यह सामाजिक विघटन का कारण एवं परिणाम दोनों हैं। क्योंकि वेश्यावृत्ति सामाजिक विघटन को जन्म देती है तथा सामाजिक विघटन के परिणामस्वरूप वेश्यावृत्ति प्रारम्भ हो जाती है। इसका सम्बन्ध पारिवारिक विघटन से अधिक है। वेश्यावृत्ति नैतिक मान्यताओं एवं आदर्शों पर भयंकर कुठाराघात है। वेश्यावृत्ति में सर्वाधिक अग्रणी देश अमेरिका है। उद्योगशील देश इस समस्या से ग्रसित हैं।

भारत की परिस्थितियों को देखते हुए यह समस्या अत्यन्त घृणित है। भारत के प्रत्येक बड़े शहर में विशेष करके बड़े औद्योगिक शहरों में वेश्यावृति का सबसे घृणित रूप पाया जाता है। विश्व में वेश्यावृत्ति के अतिरिक्त कोई भी रीति ऐसी नहीं होगी जिसमें स्त्रियों का इतना शोषण और हीन अस्तित्व पाया जाता हो। ये वेश्याएँ हैं जो कि समाज से बहिष्कृत, भग्न हृदय, मनुष्यता और नैतिकता के नाम पर ठुकरायी हुई समाज की वे ललनाएँ हैं, जिन्हें माँ और पत्नी कहलाने का सौभाग्य शायद ही प्राप्त हो।

समाधान- नगरीय क्षेत्रों में इस समस्या के समाधान के भरसक उपाय किये जाने अपेक्षित है। सरकारी स्तर पर इस व्यापार में संलग्न स्त्रियों की वास्तविक समस्याओं की जानकारी प्राप्त करके उनके निराकरण के हरसम्भव प्रयास किये जाने चाहिए। सामान्यतः ऐसी सम्भावनाएँ अधिक होती हैं कि अधिकांश इस वृत्ति का चयन अपनी कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में करती हैं। यदि उनकी इन समस्याओं का समाधान कर दिया जाये तो यह समस्या बहुत हद तक हल हो सकती है।

4. आवास की समस्या- अत्यधिक भीड़-भाड़ एवं नगरीय जीवन के विभिन्न क्षेत्रों पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि जनसंख्या का नगरों में अतिक्रमण होने से विभिन्न समस्यायें विकसित हो गयी हैं। आज नगरों में व्याप्त विभिन्न समस्याओं में से कुछ ऐसी हैं जिनसे नगरीय जीवन विघटित अवस्था को प्राप्त कर रहा है। नगरीय समाजशास्त्र में इन समस्याओं को पर्यावरण सम्बन्धी तथा परिस्थितिकीय समस्याएँ कहते हैं। नगरीय जीवन में अत्यधिक भीड़-भाड़ के कारण जनस्वास्थ्य की समस्या उत्पन्न हो जाती है। निम्न आय के कारण लोगों में दरिद्रता का विकास हो गया है। इस दरिद्रता और महंगाई के कारण लोगों को स्वास्थ्य उपचार, औषधियाँ, सन्तुलित भोजन आदि तो दूर पूरा भोजन भी नहीं मिल पाता है।

नगरों में ग्रामों की अपेक्षा स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण का अभाव रहता है। खुले रोशनदान, मकानों की कमी, गन्दी गलियों एवं बस्तियों का बाहुल्य, फैक्ट्रियों मिलों एवं कारखानों का कूड़ा-करकट, धुओं, अधिक भीड़-भाड़ स्वच्छता की कमी आदि इस दृष्टि से उल्लेखनीय कारक हैं। नगरों के मकानों में योजनापूर्ण व्यवस्था का बहुत अभाव है।

आवास की समस्या नगरों में अपना विकराल रूप धारण किये हुए है। यहाँ आवास हेतु समुचित मकानों के अभाव के साथ-साथ अस्वास्थ्यकर आवास का बाहुल्य है।

भारत के नगरों में अपेक्षित निवास स्थानों की कमी है। यहाँ स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण में निर्मित आवास गृहों का अन्य देशों की अपेक्षा अधिक अभाव पाया जाता है। यहाँ मकानों की समस्या तो अपर्याप्त होने के कारण विकसित है ही, साथ ही मकान आयोजन एवं व्यवस्था से नहीं बनाये रखे जाते हैं।

नगरों में अत्यधिक भीड़-भाड़ के फलस्वरूप उम्र आवास की समस्या के प्रति अपने विचार व्यक्ति करते हुए डॉ० राधाकमल मुकर्जी लिखते हैं-

“भारतीय औद्योगिक केन्द्रों की श्रम बस्तियों की दशा इतनी भयंकर है कि वहाँ मानवता का विध्वंस होता है, महिलाओं के सतीत्व का नाश होता है और देश के भावी आधार स्तम्भ शिशुओं का गला घुट जाता है।”

समाधान- नगरीकरण की प्रक्रिया से उत्पन्न अत्यधिक भीड़-भाड़ और आवास की समस्या को सुलझाने के लिए भारत सरकार द्वारा निम्नलिखित प्रयत्न किये गये हैं-

(i) औद्योगिक गृह योजना, 1984 ई०

(ii) आर्थिक सहायता प्राप्त औद्योगिक गृह योजना,

(iii) प्रथम पंचवर्षीय योजना अवधि में 13 लाख मकानों का निर्माण कराया गया,

(iv) द्वितीय पंचवर्षीय में विभिन्न स्तर के लोगों के गृहनिर्माण के लिए 20 करोड़ रूपयेक्षव्यय करके 19 लाख मकान बनाने की योजना बनायी गयी,

(v) तृतीय एवं चतुर्थ पंचवर्षीय योजनाओं में क्रमशः 1 अरब 47 करोड़ 55 लाख रूपये तथा 2 अरब 42 करोड़ 92 लाख रूपये आवास निर्माण के लिए निर्धारित किये गये।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् योजना आयोग, श्विराव कमेटी, श्रम जाँच समिति व अन्य रिपोर्टों एवं सिफारिशों के आधार पर गृह निर्माण की ओर भारत सरकार ने विशेष ध्यान दिया है।

इतना होते हुए क्षभी भीड़-भाड़ की समस्या व आवास निर्माण की समस्या के समाधान हेतु सरकारी प्रयत्न सार्थक नहीं सिद्ध हो पा रहे हैं।

5. गन्दी बस्तियों की समस्या- नगरीय व्याधिकी और विकार का प्रमुख स्वरूप गन्दी बस्तियों में देखने को मिलता है। गन्दी बस्तियाँ सदा सामाजिक विघटन उत्पन्न करती हैं। गन्दी बस्तियों में रहने वाली जनसंख्या अधिकांशतः परिवर्तनशील प्रकृति की होती है। वहाँ न तो पारिस्थितिकीय व्यवस्था होती है और न सामाजिक संगठन की सुविधाएँ गन्दी बस्तियों में गृहविहीन, बेकार नशावृत्ति वाले, वेश्याएँ तथा वेश्यागामी, श्रमिक, अपराधी और भिक्षुक लोग रहते हैं। इन लोगों से स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था और संगठन की लेशमात्र मी आशा नहीं की जा सकती। गन्दी बस्तियाँ पारिस्थितिकीय दृष्टि से पृथकता वाली होती है। यह पारिस्थितिकीय पृथकता, सामाजिक पृथकता को उत्पन्न करती है। इस दृष्टि में नगरीय सामुदायिक जीवन की गतिविधियों में गन्दी बस्तियों के लोग लेश मात्र भी रूचि नहीं रखते। इसके स्थान पर नगर विघटन की क्रियाओं हेतु गन्दी बस्तियों केन्द्र बन जाती है। इन बस्तियों में अपराधियों के अड्डे, जुएं के केन्द्र भिक्षुकों के गृह, वेश्यालय व नशावृत्ति विकसित होते हैं। यहाँ स्वस्थ सामाजिक और सामुदायिक जीवन विकसित नहीं होता है।

डॉ० मेहता ने गन्दी बस्तियों के जीवन के लक्षण की एक सूची दी है, जो निम्न है-

(i) वेश्यावृत्ति का उद्भव,

(ii) अपराध,

(iii) जुआखोरी

(iv) गिरोहबन्दी

(v) पतित और शिथिल यौवन,

(vi) प्रमाद।

वे सब समाज विरोधी दृष्टिकोण, समाज-विरोधी व्यवहार और समाजविरोधी क्रियाओं में परिणत हो जाते हैं।

समस्या निराकरण के उपाय

नगर विकास और कल्याण की आधुनिकतम परियोजनाओं में नगरीय सामुदायिक विकास कार्यक्रम अत्यन्त महत्व का विषय है। भारत में नवीन विचारधारा की प्रगति अति शिथिल है लेकिन अन्य प्रगतिशील देशों में यह काफी विकसित हो चुकी है। मौलिक रूप से नगरीय सामुदायिक विकास नगरीय जन-जीवन के कल्याण और पुनर्निर्माण से सम्बन्धित है। यह वह योजना अथवा कार्यक्रम है जो नगरीय समस्याओं के उन्मूलन हेतु नवीन वैज्ञानिकों प्रयत्नों को दिशा प्रदान करता है।

गन्दी बस्तियों का उन्मूलन आन्दोलन, आवास निर्माण आन्दोलन से सम्बन्धित है। इस सन्दर्भ में सामाजिक आवास योजनाओं के अन्तर्गत भी सरकारी तौर पर इस समस्या का निदान किया गया है। इसी सन्दर्भ में औद्योगिक कर्मचारियों और कमजोर वर्गों के लिए योजनाएँ निम्न आय वर्ग आवास योजना, बागान कर्मचारियों के लिए सहायता प्राप्त आवास योजना आदि भी इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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