शिक्षाशास्त्र / Education

ई-लर्निंग का अर्थ | ई-लर्निंग की प्रकृति एवं विशेषतायें | ई-लर्निंग के विविध रूपों एवं शैलियों का उल्लेख

ई-लर्निंग

ई-लर्निंग का अर्थ | ई-लर्निंग की प्रकृति एवं विशेषतायें | ई-लर्निंग के विविध रूपों एवं शैलियों का उल्लेख | The meaning of e-learning in Hindi | Nature and characteristics of e-learning in Hindi | Mention of various forms and styles of e-learning in Hindi

ई-लर्निंग का अर्थ 

ई-लर्निंग अथवा ई-शिक्षा का तात्पर्य इन्टरनेट से सूचना देने अथवा प्राप्त करने से कहीं अधिक है। ई-शिक्षा (ई-लर्निंग) को सभी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक समर्थित शिक्षा और अध्यापन के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो स्वाभाविक तौर पर क्रियात्मक होते हैं और जिनका उद्देश्य शिक्षार्थी के व्यक्तिगत अनुभव, अभ्यास और ज्ञान के संदर्भ में ज्ञान के निर्माण को प्रभावित करना है। सूचना एवं संचार प्रणालियाँ, चाहे इनमें नेटवर्क की व्यवस्था हो या न हो, शिक्षा प्रक्रिया को कार्यान्वित करने वाले विशेष माध्यम के रूप में अपनी सेवा प्रदान करती है।

इस प्रकार की ई-लर्निंग युक्त अधिगम सुविधाओं के संदर्भ में ही रोजेनवर्ग (2001) ने ई-लर्निंग पद को अपने शब्दों में परिभाषित करते हुए लिखा है-

“ई लर्निग से तात्पर्य इन्टरनेट तकनीकियों के एसे उपयोग से है जिनसे विविध प्रकार के ऐसे रास्ते खुले जिनके द्वारा ज्ञान और कार्यक्षमताओं में वृद्धि की जा सके।”

ई-शिक्षा शब्द का प्रयोग एक ऐसे ढाँचे के रूप में किया जाता है जो लगभग सभी इलेक्ट्रानिक माध्यमों (इन्टरनेट, इंट्रानेट, एक्सट्रानेट, कृत्रिम उपग्रह प्रसारण, ऑडियो/वीडियो, इंटरैक्टिव टेलीविजन, सी-डी (CD-ROM) इत्यादि को पेशेवर शिक्षा को विद्यार्थियों तक बड़े ही रोचक तरीके से पहुँचाता है।

ई-शिक्षा शब्द का प्रयोग कई जगहों पर किया जाता है। जैसे-ऑनलाइन शिक्षा, कम्प्यूटर आधारित शिक्षा, सूचना जाल आधारित शिक्षा, सूचना जाल संसाधन आधारित शिक्षा, नेटवर्क सहयोगी शिक्षा, कम्प्यूटर समर्थित सहयोगी शिक्षा। इसे खुद ब खुद या अनुदेशक के नेतृत्व में किया जा सकता है और इसका माध्यम पाठ, एनीमेशन, स्ट्रीमिंग और ऑडियो है। ई-शिक्षा हमारी कक्षा व्यवस्था का ही विकसित रूप है, सिर्फ अन्तर यही है कि यहाँ पर शिक्षा को विद्यार्थी की सुविधा के अनुसार बनाया जा रहा है, वह अपने द्वारा निश्चित किए गए समय पर, अपने गति से सीख सकता है।

ई-शिक्षा अनिवार्य रूप से कौशल एवं ज्ञान का कम्प्यूटर एवं नेटवर्क समर्थित अंतरण है। ई-शिक्षा इलेक्ट्रानिक अनुप्रयोगों और सीखने की प्रक्रियाओं के उपयोग को संदर्भित करता है। ई-शिक्षा के समानार्थक शब्दों के रूप में सीबीटी (CBT) (कम्प्यूटर आधारित प्रशिक्षा), आईबीटी (IBT) (इंटरनेट आधारित प्रशिक्षा) या डब्ल्यूबीटी (WBT) (वेब-आधारित प्रशिक्षा) जैसे संक्षिप्त शब्द रूपों का इस्तेमाल किया जा सकता है। आज भी कोई व्यक्ति ई-शिक्षा (ई-लर्निग/e-learning) के विभिन्न रूपों, जैसे- e-learning, Elearning और eleaming (इनमें से प्रत्येक ई-लर्निंग/इंशिक्षा) के साथ-साथ उपरोक्त शब्दों का भी इस्तेमाल होता देख सकता है।

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ई-लर्निंग की प्रकृति एवं विशेषताएँ

ऊपर जो कुछ भी चत्चा ई-लर्निंग के बारे में की गई है और उसकी जो वर्तमान स्वरूप हमें देखने को मिल रहा है, उसके आधार पर हम इसकी प्रकृति एवं विशेषताओं के बारे में निम्नलिखित निष्कर्ष निकाल सकते हैं-

  1. ई-लर्निंग या इलेक्ट्रानिक अधिगम पद का संबंध इस प्रकार के अधिगम से है। जिसके संपादन से कम्प्यूटर सेवाओं की अनिवार्य रूप से आवश्यकता पड़ती है।
  2. ई-लर्निंग शब्दावली का प्रयोग कम्प्यूटर विज्ञान की इंटरनेट तथा वेब तकनीकी पर आधारित ऑन लाइन लर्निंग तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।
  3. कम्प्यूटर आधारित अधिगम या कम्प्यूटर सहाय अनुदेशन की तुलना में ई- लर्निंग की अवधारणा कुछ अधिक व्यापक मानी जानी चाहिए।
  4. ई-लर्निंग की अवधारणा कुछ अन्य समरूप पदावलियों जैसे ऑन लाइन लर्निंग तथा आन लाइन एजूकेशन से कुछ अधिक व्यापक मानी जानी चाहिए क्योंकि इन दोनों का संबंध पूरी तरह से केवल मात्र वेब आधारित लर्निंग या अधिगम से है जबकि ई-लर्निंग में इस कार्य से कुछ आगे बढ़कर अनुवर्ती कार्य तथा अध्यापक और विद्यार्थियों के बीच, आवश्यक संप्रेषण एवं अंतरक्रिया बनाए रखने पर ध्यान दिया जाता है।
  5. ई-लर्निंग या अधिगम को दृश्य-श्रव्य अधिगम, दूरवर्ती शिक्षा या दूरवर्ती अधिगम का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए। यह सही है कि आज के दिन दृश्य श्रव्य बहुमाध्य तकनीकी तथा दूरवर्ती शिक्षा संबंधी कार्यक्रम कम्प्यूटर द्वारा सुलभ इंटरनेट वेब सेवाओं पर बहुत कुछ निर्भर है परन्तु इससे इन्हें ई-ल्निंग का पर्याय न मानकर ई -लर्निंग में सहायक परिस्थितियों या ई-लर्निग प्रणाली की उप्रणालियों के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।

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ई-लर्निंग के विभिन्न प्रारूप एवं शैलियाँ

जैसा कि हम अच्छी तरह से जान चुके हैं कि किसी अधिगम या लर्निंग को तभी ई- लर्निंग का दर्जा दिया जा सकता है जबकि उसमें प्रदत्त अधिगम सामग्री का अनुदेशन को किसी आधुनिक विकसित इलेक्ट्रानिक माध्यम या उपकरण जैसे कम्प्यूटर मल्टीमीडिया तथा मोबाइल के उपयोग करते हुए अधिगमकर्ताओं को प्रदान किया जाए। इस शर्त की अनुपालना करते हुए ई-लर्निंग में जो विविध प्रारूप एवं शैलियाँ आज हमें दिखाई दे रही हैं उन्हें मुख्य रूप से निम्न प्रकार सामने रखा जा सकता है।

  1. अवलंब अधिगम (Support Learning)- ई-लर्निंग अपनी इस भूमिका में कक्षा में चल रही शिक्षण-अधिगम गतिविधियों को सहारा देकर आगे बढ़ाने का कार्य कर रही होती है। इस प्रकार के ई-लर्निंग प्रारूप का उपयोग शिक्षक और विद्यार्थीगण दोनों ही अपने-अपने शिक्षण और ई-लर्निंग कार्यों को बेहतर बनाने हेतु कर सकते हैं। उदाहरणार्थ वे मल्टीमीडिया इंटरनेट तथा वेब टेक्नालोजी का उपयोग कक्षा शिक्षण के दौरान शिक्षण और अधिगम दोनों ही कार्यों में अपेक्षित सफलता प्राप्त करने हेतु कर सकते हैं।
  2. मिश्रित अधिगम (Mixed Learning)- ई-लर्निंग के प्रारूप में परंपरागत तथा सूचना एवं संप्रेषण तकनीकी पर आधारित दोनों ही प्रकार के तकनीकियों के मिश्रित रूप का प्रयोग किया जाता है। इस प्रारूप को अपनाने में कार्यक्रम और गतिविधियों को इस प्रकार नियोजित और क्रियान्वित किया जाता है कि परंपरागत कक्षा शिक्षण तथा ई-लन्निंग आधारित अनदेशन दोनों को उचित प्रतिनिधित्व देकर दोनों के ही लाभ शिक्षण अधिगम हेतु भली – भोंति उठाएँ जा सकें ।
  3. पूर्णरूपेण ई लर्निंग या अधिगम (Complete e-learning)- इस प्रकार के लर्निंग प्रारूप में परंपरागत कक्षा शिक्षण का स्थान पूरी तरह से अवास्तविक कक्षा कक्ष शिक्षण द्वारा ले लिया जाता है। इस प्रकार के अधिगम प्रारूप में परंपरागत विद्यालय शिक्षा की तरह कक्षा कक्षों, विद्यालय तथा उनमें मिलने वाले सजीव पारस्परिक अंतःक्रियायुक्त शिक्षण अधिगम वातावरण का कोई अस्तित्व नहीं होता। विद्यार्थियों के सामने पूरी तरह संरकचित एवं निर्मित ई- लर्निंग कोर्स तथा अधिगम सामग्री होती है जिन्हें वे स्वतंत्र रूप से अपनी-अपनी अधिगम गति से ग्रहण करने का प्रयत्न करते हैं । उनकी बहुत सारी अधिगम गतिविधियाँ ऑन लाइन ही संपन्न होती हैं परन्तु वे अपनी आवश्यकतानुसार उन सीडी रोम तथा डीवीडी की भी सहायता ले सकते हैं जिनमें वांछित अधिगम सामग्री उचित सूचनाओं या अधिगम पैकेज के रूप में संग्रहीत की गई हो। इस प्रकार की ई-लर्निंग मुख्य रूप से दो निम्न संप्रेषण शैलियों का उपयोग करती हुई पायी जाती है-

(i) एसेंक्रोनस संप्रेषण शैली (Asynchronous Communication Style)- इस संप्रेषण में अधिगम कोर्स सम्बन्धी सूचनाएँ तथा अधिगम अनुभव अधिगमकर्त्ता को ई-मेल द्वारा प्रेषित की जाती है अथवा ये उसे वेब पेज वेब लोग या ब्लोग्स, विकीज और रिकॉर्ड किए गए सीडी रोम एवं डीवीडी के रूप में उपलब्ध रहती हैं। इस तरह इस प्रकार के संप्रेषण हेतु अध्यापक तथा विद्यार्थियों की समय विशेष में एक साथ उपस्थिति आवश्यक नहीं होती। अध्ययन सामग्री पहले से ही मौजूद रहती है। इसे विद्यार्थियों द्वारा अपनी इच्छानुसार किसी भी समय अपनी स्वरगति से अध्ययन करने हेतु काम में लाया जा सकता है।

(ii) सेंक्रोनस संप्रेषण शैली (Synchronous Communication Style)- इस संप्रेषण शैली में शिक्षण अधिगम हेतु आवश्यक सीधा शिक्षक-शिक्षार्थी संप्रेषण इंटरनेट पर ऑन लाइन चैटिंग तथा ऑडियो-वीडियो कांफ्रेंसिंग के रूप में होता रहता है। इस कार्य हेतु शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों को ही शिक्षण अधिगम् प्रक्रिया के संपादन हेतु आवश्यक संप्रेषण करने के लिए एक समय विशेष में एक साथ इंटरनेट पर उपस्थित रहना होता है। परिणामस्वरूप इस प्रकार का संप्रेषण एक अध्यापक के लिये अपने विद्यार्थियों के साथ किसी भी प्रकार की आवश्यक सूचना, अधिगम सामग्री इत्यादि की भलीभाँति भागीदारी करने के अमूल्य अवसर प्रदान करता है। विद्यार्थी जहाँ कोई शंका हो उसके निवारण हेतु तुरंत ही अपना प्रश्न पूछ सकते हैं और अध्यापक द्वारा आवश्यक प्रतिपुष्टि प्राप्त कर सकते हैं। अध्यापक अपने विद्यार्थियों की अधिगम प्रगति के बारे में भी पूरी तरह अवगत रहने के लिए प्रश्न और अधिन्यास की सहायता लेकर विद्यार्थियों से उनके उत्तर ऑन लाइन तुरत ही देने की अपेक्षा कर सकते हैं। इस तरह इस प्रकार के संप्रेषण में परंपरागत कक्षा शिक्षण की भाँति अंतःक्रिया करने के लिए यथोचित प्रयत्न किए जाते हैं।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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