शिक्षाशास्त्र / Education

पर्यावरण शिक्षा के उद्देश्य | पर्यावरण शिक्षा का स्वरूप और प्रकृति | पर्यावरण शिक्षा की कार्य विधियाँ

पर्यावरण शिक्षा के उद्देश्य | पर्यावरण शिक्षा का स्वरूप और प्रकृति | पर्यावरण शिक्षा की कार्य विधियाँ | Objectives of Environmental Education in Hindi | Nature and nature of environmental education in Hindi | Methods of Environmental Education in Hindi

पर्यावरण शिक्षा के उद्देश्य

(Objectives of Environmental Education)

  1. पर्यावरण अवबोध को विकसित करना – यह आवश्यक शर्त है कि पर्यावरण के प्रति उचित अभिवृत्ति के विकास हेतु छात्रों को पर्यावरण सम्बन्धी आवश्यक ज्ञान प्रदान किया जाय। अतः इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु छात्रों को पर्यावरण के विभिन्न पक्षों से अवगत कराया जाता है। इसके लिए उन्हें अनेक विधियों, सामग्रियों तथा पर्यावरण को परस्पर अन्तःक्रियाओं के उदाहरणों की सहायता से समझाया जाता है जिससे वे वातावरण एवं उसका दैनिक जीवन में अटूट सम्बन्ध को भली-भांति अवशोषित कर सकें तथा प्रशंसा कर सकें।
  2. पर्यावरण कौशलों का विकास करना – छात्रों को पर्यावरण के अवबोध के साथ-साथ उससे उत्पन्न होने वाली संकटकालिक परिस्थितियों से जूझने के लिए आवश्यक समाधान प्राप्त करने के लिए आवश्यक कोशलों की दक्षता प्रदान करना भी इस शिक्षा का उद्देश्य है जिससे बालक अपनी परिस्थितियों में संरक्षण के साथ-साथ प्रदूषण जैसी समस्याओं को भी निपटा सकें, बचाव कर सकें। इसके लिए पाठ्क्रम में अवलोकन, संग्रह, तुलना, वर्गीकरण, विश्लेषण, सम्प्रेषण, चित्र निर्माण आदि व्यवहारों को विकसित किया जाता है।
  3. पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं का निदान करना- पर्यावरण शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में उनके हल ढूंढ़ना है। अतः अनेक बार किसी वास्तविक जीवन की समस्या को लेकर उसके विभिन्न पक्षों का अध्ययन किया जाता है तथा अनेक सम्भावित हलों को खोजबीन की जाती है। यह उद्देश्य आदर्श पर्यावरण शिक्षा के निकटस्थ जान पड़ता है। इसमें सभी आयामों को संजोने की सम्भावना में वृद्धि हो जाती है। जैसे-ईंधन, पानी, जलवायु प्रदूषण की समस्याएं आदि।
  4. पर्यावरण मूल्यों का स्पष्टीकरण- पर्यावरण शिक्षा के अन्तर्गत अनेक बार यह आवश्यक समझा जाता है कि मानव को उसके जीवन मूल्यों का ठीक प्रकार से अनुमान होना चाहिए जिससे कि फिर व्यक्ति स्वयं भी उन पर विचार करने की स्थिति में आ जाता है। यद्यपि मूल्य स्पष्टीकरण एक कठिन कार्य है क्योंकि इसमें वैयक्तिकता का समावेश रहता है जिससे प्रत्येक व्यक्ति की गोपनीयता भंग होने के साथ-साथ उसकी विवेचना भी अलग-अलग प्रकार से की जाती है। अतः मूल्य को सही-गलत दृष्टिकोण से पृथक कर उसकी प्राथमिकताओं समस्याओं, विसंगतियों की ही चर्चा करना तर्कसंगत प्रतीत होता है।
  5. पर्यावरण सम्बन्धी अभिवृत्ति का विकास करना- पर्यावरण सम्बन्धी रचनात्मक अभिवृत्ति का विकास करना पर्यावरण शिक्षा का व्यापक उद्देश्य कहा जा सकता है क्योंकि इसी के द्वारा यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नवीन परिस्थिति उत्पन्न होने पर लोगों के कार्य पर्यावरण संरक्षण की दिशा में होंगे। अभिवृत्ति दो प्रकार से विकसित की जा सकती हैं- एक तो पर्यावरण विषय तथा परिणामों के सम्बन्ध में अधिकाधिक जानकारी प्रदान करके यह आशा की जाती है कि उचित अभिवृत्तियों का विकास हो जायेगा। दूसरी युक्ति यह है कि अभिवृत्तियों को पहचानकर छात्रों में विभिन्न पाठ्य-सामग्री द्वारा सीधे-सीधे सम्प्रेषित किया जाय। यद्यपि पहला तरीका एक प्रत्यक्ष तरीका है जोकि दूसरो विधि की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ माना जाता है।

पर्यावरण शिक्षा का स्वरूप और प्रकृति

(Forms and Nature of Environmental Education)

विश्व पर्यावरण के समानान्तर ही पर्यावरण शिक्षा के स्वरूपों को विकसित किया गया है। इसका मुख्य ध्येय शिक्षा को पर्यावरण शिक्षा के अनुकूल ढाला जाना है। विषयों के आधार पर भी पर्यावरण शिक्षा को दो वर्गों (अन्तः विषयक एवं बहुविषयक) में विभाजित किया जा सकता है। अन्त:विषयक से यहां तात्पर्य है विभिन्न विषयों के द्वारा पर्यावरण शिक्षा का आयोजन करना  जैसे- गणित, भूगोल, कला, सामाजिक, अध्ययन, व्यावसायिक अध्ययन प्राणिशास्त्र, भौतिकशास्त्र आदि।

जैसे निम्नलिखित उदाहरण द्वारा अन्तः विषयक शिक्षा को अभिव्यक्त किया जा रहा है-

  1. पेड़ों के उपयोग-विज्ञान, सामाजिक अध्ययन,
  2. पेड़ों के विभिन्न प्रकार-जीव विज्ञान,
  3. पेड़ों का मूल्य-विज्ञान, अर्थशास्त्र, रसायनशास्त्र,
  4. पेड़ सम्बन्धी खेल-विज्ञानं, गणित, मनोरंजन |

इसी प्रकार पेड़ों के इस अध्ययन को बहुविषयक भी बनाया जा सकता है। यद्यपि अन्तः विषयक तथा बहुविषयक स्वरूप की अपनी-अपनी सीमाएं हैं। इसलिए पर्यावरण शिक्षा के क्षेत्र में चार धारणाएं प्रचलित हैं-

(1) पर्यावरण शिक्षा को एक पृथक विषय के रूप में पढ़ाया जाय।

(2) पर्यावरण शिक्षा को विभिन्न विषयों के समन्वय द्वारा पढ़ाया जाय।

(3) पर्यावरण शिक्षा हेतु विशेष कार्यक्रम प्रचलित किए जायं।

(4) पर्यावरण शिक्षा हेतु केन्द्रीय विधि को अपनाया जाय अर्थात इसे समस्त पाठ्य-चर्चा का मुख्य केन्द्र बनाकर शिक्षण व्यवस्था की जाय।

पर्यावरण शिक्षा की कार्य विधियाँ

(Methodologies of Environmental Education)

पर्यावरण शिक्षा के क्षेत्र में प्रमुख प्रचलित कार्य विधियां निम्नांकित हैं-

  1. समूह चर्चा द्वारा, 2. सूक्ष्म प्रयोजन, 3. परिभ्रमण, 4. अनुकरण एवं खेल।

समूह चर्चा के अन्तर्गत सामूहिक छात्र शिक्षक परिचर्चाओं का आयोजन किया जाता है। छात्र प्रकरण सम्बन्धी समस्त आवश्यक जानकारी सन्दर्भ ग्रन्थों से एकत्रित करते है तथा फिर वाद-विवाद में उन प्रत्ययों का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करते हैं।

सूक्ष्म प्रायोजना का सम्बन्ध छात्रों के पर्यावरण सम्बन्धी गहन अध्ययन से होता है जिसमें छात्र प्रायोगिक परीक्षणों द्वारा ठोस परिणामों तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। साथ ही आवश्यक कौशल, रुचि, अभिवृत्तियों को भी विकसित करते हैं।

परिभ्रमण में देशाटन द्वारा विभिन्न प्रकार की जलवायु, भू-संरचना, प्राकृतिक संसाधन, मौसम, वनस्पतियों, प्राणियों का अध्ययन करने हेतु छात्रों को प्रेरित किया जाता है तथा छात्र सम्बन्धित कौशलों का प्राप्त कर लेते हैं।

अनुकरण एवं खेल द्वारा छात्र मनोरंजनात्मक तरीके से शिक्षाप्रद अध्ययन प्राप्त कर लेते हैं। इसमें विशिष्ट पर्यावरण सम्बन्धी समस्त पक्षों को खेलों के माध्यम से पूरा किया जाता है। इस प्रकार छात्रों में पर्यावरण सम्बन्धी ज्ञान, कौशल, अभिवृत्ति तथा सृजनात्मकता का विकास होता है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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