भूगोल / Geography

ध्वनि प्रदूषण क्या है | ध्वनि प्रदूषण के स्त्रोत | ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभाव | ध्वनि प्रदूषण के नियन्त्रण के उपाय

ध्वनि प्रदूषण क्या है | ध्वनि प्रदूषण के स्त्रोत | ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभाव | ध्वनि प्रदूषण के नियन्त्रण के उपाय

ध्वनि प्रदूषण 

ध्वनि प्रदूषण क्या है – ध्वनि प्रदूषण की परिभाषा-प्रचलित परिभाषा के अनुसार शोर एक अवांछित ध्वनि है। उदाहरणार्थ किसी मोटे गले के (आवाज) व्यक्ति के मन को अच्छा न लगने वाले तथा असहनीय गायन को हम शोर कहेंगे, क्योंकि इससे हमें झुँझलाहट तथा असुविधा होती है। इसके विपरीत किसी अच्छे गायक का स्वर जो हमें मधुर लगता है उसे हम शोर नहीं कहते। ऐसी भी होता है कि कोई ध्वनि विशेष एक व्यक्ति को संगीतमय लगती है तथा दूसरे व्यक्ति को शोर। इसी प्रकार जब आवाज मन्द हो तो मधुर लगती है तथा तीव्र होने पर शोर। अतः कोई भी ध्वनि जो अवांछनीय हो उसे शोर कहना उचित होगा तात्पर्य यह है कि कोई भी ध्वनि जब मानसिक क्रियाओं में विघ्न उत्पन्न करने लगती है तो शोर के अन्तर्गत आ जाती है। वस्तुतः शोर तथा ध्वनि में मुख्य अन्तर तीव्रता का ही होता है।

शोर को मापने की इकाई डेसीबल (Decibel) है, जो शून्य से प्रारम्भ होती है। इसे डीबी (DB) से दर्शाते हैं। ध्वनि की तीव्रता को निम्नलिखित समीकरण द्वारा डी वी से प्रदर्शित कर सकते हैं-

शोर को मापने की इकाई = मापी गई ध्वनि तीव्रता / सन्दर्भ तीव्रता

ध्वनि प्रदूषण के स्त्रोत (Sources of Noise Pollution)-

 ध्वनि औद्योगिक एवं आधुनिक युग की देन है। शोर का चक्रव्यूह हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं। अतः बिस्तर से उठने पर मुर्गे की बाँग का शोर, अला्म घड़ी का शोर, सड़क पर आए तो चारों ओर शोर, आसमान पर उड़ते हवाई जहाज का शोर, बाजार का शोर, आफिस में गपशप का शोर, कल-कारखानों में मशीनों का शोर, खेतों में ट्रेक्टर का शोर, कोई पैदा हो तो शोर, शादी-विवाह एवं मांगलिक अवसरों पर शोर, चुनाव प्रचार का शोर।

ध्वनि प्रदूषण के स्रोत को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

(अ) प्राकृति स्नरोत

(ब) कृत्रिम स्रोत

(अ) प्राकृतिक स्त्रोत- शोर के प्राकृतिक स्रोतों के अन्तर्गत बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली की कड़क, तूफानी हवायें, ऊँचे पहाड़ों से तेजी से गिरते पानी की ध्वनि, भूकम्प तथा ज्वालामुखी के फूट पड़ने से उत्पन्न घ्वनियाँ तथा वन्य जीवों की आवाजें सम्मिलित की जा सकती हैं। प्राकृतिक स्रोतों से उत्पन्न शोर क्षणिक तथा यदा-कद होने वाला होता है, अंतः इसका प्रभाव भी क्षणिक होता है।

(ब) कृत्रिम स्त्रोत- औद्योगीकरण तथा शहरीकरण के साथ-साथ हमारे जीवन में कृत्रिमता आयी है।

मानव निर्मित ध्वनि के स्रोतों के अन्तर्गत निम्न ध्वनि आती हैं-

(i) औद्योगिक ध्वनि

(ii ) यातायात के साधन की ध्वनि और

(iii ) शहरी या घरेलू ध्वनि।

ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभाव (Effects of Noise Pollution)-

शोर मानव जीवन को विभिन्न रूपों में प्रभावित करता है। शोर जहाँ एक ओर मानव स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालता है, वहीं दूसरी ओर उसकी कार्य क्षमता भी घटाता है। शोर मानवीय क्रिया-कलापों में मुख्यतः तीन प्रकार से बाधक होता है।

(1) ध्वनि श्रवण स्तर पर- शोर सामान्य ध्वनि के श्रवण तथा फलस्वरूप वार्तालाप की प्रक्रिया में बाधक होता है।

(2) प्राणी कार्यकीय स्तर पर- शोर मनुष्य के सामान्य सामाजिक आचरण को प्रभावित करता है।

(3) मानव आचरण के स्तर पर- शोर मनुष्य के सामान्य क्रियाविधियों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है।

ध्वनि प्रदूषण का नियन्त्रण

शोर का निश्चित निवारण एक अत्यन्त जटिल समस्या है, क्योंकि इसके निवारण में हमें आधुनिक प्रगति के फलस्वरूप प्राप्त सुख-सुविधाओं का त्याग या उनकी संख्या में कमी करना पड़ सकता है। इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना है कि नियन्त्रण की प्रक्रिया से औद्योगिक उपलब्धि भी प्रभावित न हो। इस प्रकार शोर का आमूल निराकरण तो असम्भव है, पर कुछ नियन्त्रण अवश्य किया जा सकता है।

तकनीकी तथा सैद्धान्तिक दृष्टि से शोर समस्या के मूल तीन वस्तुएँ होती हैं-(1) शोर का स्रोत, (2) शोर का पथ, (3) ग्राही अंग। अतः शोर नियन्त्रण के सभी प्रयासों में इन तीनों का ध्यान रखते हुए आवश्यकतानुसार कदम उठाना फलदायी हो सकता है। शोर प्रदूषण नियन्त्रित करने के कुछ उपाय निम्नलिखित हैं-

  1. शोर का उद्गम के स्थान पर ही रोकना सबसे सीधा व सरल उपाय है। यद्यपि शोर के स्रोतों की संख्या घटाना व्यावहारिक नहीं है फिर भी कानून की सहायता से अधिक शोर उत्पन्न करने वाली खटारा मोटर गाड़ियो, ट्रक, मोटर साइकिल इत्यादि का शहर के मुख्य मार्गों तथा रहवासी क्षेत्रों से निकलने पर रोक लगा कर इस दिशा में अपेक्षित परिणाम पाये जा सकते हैं। अनेक देशों में वाहनों द्वारा शोर प्रदूषण को सीमित करने के लिए विधान बनाये गये हैं। उदाहरणार्थ ब्रिटेन में कारों की अधिकतम शोर सीमा 85 डेसीमल तथा ट्रक आदि भारी वाहनों की 90 डेसीमल निर्धारित की गई है।

स्पष्ट है कि समस्या का समाधान वाहनों की संख्या में कमी करके या उनकी गति पर रोक लगाकर नहीं किया जा सकता है। उनके इंजन एवं अन्य शोधकारक भागों की रचना में आवश्यक सुधार द्वारा ही इसका समाधान निकाला जा सकता है।

  1. मोटर वाहनों में बहुध्वनि वाले हॉर्न बजाने पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।
  2. कल-कारखानों को शहर से दूर स्थानों पर स्थापित करना चाहिए।
  3. उद्योगों द्वारा उत्पन्न शोर को कम करने के लिए विभिन्न तकनीकी व्यवस्थाओं का

उपयोग किया जाना चाहिए, जैसे कारखानों में शोर शोषक दीवार तथा मशीनों के चारों ओर मफलरों का कवच लगाकर शोर का स्तर 90 डेसीमल तक कम किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रचलित मशीनों की पुनर्रचना तथा नवीन मशीनों की अभिकल्पना में शोर कम रखने का उद्देश्य ध्यान में रखते हुए मशीन निर्माण से 20 डेसीमल तक ‘शोर लाभ’ प्राप्त किया जा सकता है।

  1. उन उद्योगों में जहाँ शोर को सीमित करना असम्मभव हो, वहाँ श्रमिकों द्वारा कर्ण प्लग (car Plugs) तथा कर्ण बन्दको (earmuffs) का प्रयोग अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। इन दोनों के संयुक्त प्रयोग द्वारा 40 से 50 डेसीमल का शारलाभ प्राप्त किया जा सकता है।
  2. अत्यधिक शोर वाले कल-कारखानों में ‘पाली’ (shifts) की व्यवस्था होनी चाहिए।
  3. रेलों द्वारा उत्पन्न शोर को ब्लास्ट विहीन (blast less) रेल पथों के निर्माण द्वारा कम किया जा सकता है।
  4. हवाई यातायात से उत्पन्न शोर भी गम्भीर चिन्ता का विषय है। विभिन्न देशों में इस दिशा में कई प्रयत्न भी किये गये हैं । अनेक अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डीं पर अधिकतक शोर सीमा निर्धारित की गई है। उदाहरण के लिए लन्दन हवाई अड्डे पर रात्रि में 102 डेसीबल से अधिक शोर की मनाही है। इसी प्रकार न्यूयार्क के केनेडी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अधिकतम शोर सीमा 112 डेसीबल निर्धारित की गई है।
  5. विमानों को विशेष ढाल पर उतारा तथा चढ़ाया जाता है जिससे कम शोर हो।
  6. आजकल जेटयानों के शोर को कम करने के लिए उनके टर्बोजेट इंजिनों के निर्गम पर शोर अवशोषक प्रयोग का किया जाता है।
  7. जेट विमानों के इंजिनों को पंखों के नीचे लगाने तथा इंजिन के निर्गम पाइप को ऊपर आकाश की ओर मोड़कर ध्वनि को पृथ्वी की विपरीत दिशा में मोड़कर शोर कम करने की दिशा में प्रयत्न किये जा रहे हैं।
  8. आवास गृहों, कार्यालयों, पुस्तकालयों, चिकित्सालयों आदि में उचित निर्माण सामग्री तथा उपयुक्त बनावट द्वारा शोर का नियन्त्रण किया जा सकता है।
  9. विकसित देशों में तो ध्वनिशोषक सड़कों तथा ध्वनिरोधी भवनों के निर्माण का विचार किया जा रहा है।
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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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