शिक्षाशास्त्र / Education

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना क्या है? | शिक्षा किस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का विकास करने में सहायक हो सकती है? | अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के बाधक तत्वों का उल्लेख कीजिए।

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना क्या है? | शिक्षा किस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का विकास करने में सहायक हो सकती है? | अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के बाधक तत्वों का उल्लेख कीजिए।

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अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का तात्पर्य विश्वबन्धुत्व, विश्व मैत्री तथा नागरिकता पर आधारित उस भावना से है जिसके अनुसार कोई व्यक्ति अपने को केवल अपने राष्ट्र की इकाई ही नहीं बल्कि विश्व की इकाई समझने लगता है और अपने राष्ट्र के संकीर्ण हितों को भुलाकर विश्व के सभी राष्ट्रो तथा उसके निवासियों के कल्याण की आकाक्षा करने लगता है।

शिक्षा अन्तर्राष्ट्रीयता के लिए बालकों को इस प्रकार शिक्षित करती है जिससे बालक समझने लगे कि सम्पूर्ण मानव जाति एक है और विश्व एक इकाई है। यह एक ऐसी भावना है जो एक राष्ट्र के निवासियों से दूसरे राष्ट्र के निवासियों के प्रति मैत्री तथा बन्धुत्व का भाव उत्पन्न करती है। उन्हें उनके दुख-सुख में साथ देने के लिए प्रेरित करती है। उनमें विश्व के सभी राष्ट्रों का कल्याण करने की आकांक्षा उत्पन्न करती है। उनमें अपने राष्ट्र का ही नहीं बल्कि विश्व का

नागरिक समझने की भावना को भरती है। युनेस्को (UNESCO) के प्रधान निरदेशक डा० वाल्टर एच0 जा0 लेब्स ने अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का अर्थ प्रस्तुत करते हुए लिखा है, “सक्षप में अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का तात्पर्य आलोचनात्मक निरीक्षण करने तथा लोगों को राष्ट्रीयता या सस्कृति पर बिना ध्यान दिए हुए उनके व्यवहार की उत्तमताओं को एक-दूसरे से प्रशंसा करने की योग्यता से है। ऐसा करने के लिए मनुष्य को इस योग्य होना चाहिए कि वह समस्त राष्ट्रीयताओं, सस्कृतियों एवं प्रजातियों का इस पृथ्वी पर रहने वाले लोगों में समान रूप से निरीक्षण कर सके।   

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव के लिये शिक्षा-

अन्तर्राष्ट्रीय सद्दभावना के विकास में शिक्षा बहुत अधिक सहायक है। परन्तु शिक्षा किस प्रकार की हो तथा उसके उद्देश्य क्या हो यह प्रश्न महत्वपूर्ण है अतः इन प्रश्नों पर विचार करना महत्वपूर्ण है। कुछ प्रमुख विद्वानों ने इस सम्बन्ध में निम्नलिखित बातों पर बल दिया है-

  1. बालक एवं बालिकाओं को समाज के निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए तैयार किया जाय।
  2. उन्हें विश्व में एक साथ रहने के लिए आवश्यक बातों का ज्ञान प्रदान किया जाय।
  3. उन्हें अपने स्वयं के सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय पक्षों को महत्व न देने की शिक्षा प्रदान की जाय।
  4. उन्हें संसार के समस्त व्यक्तियों के रहन-सहन के ढंगों और आकांक्षाओं से परिचित कराया जाय।
  5. उन्हें सब स्थानों के लिए व्यक्तियों का एक-दूसरे के प्रति व्यवहार का आलाोंचनात्मक निरीक्षण करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाय ।
  6. उनमें सभी राष्ट्रीयताओं, संस्कृतियों एवं प्रजातियों के व्यक्तियों को समान समझने के लिए भावना का सृजन किया जाय।

उपर्युक्त उद्देश्यों के अतिरिक्त विद्यार्थियों के अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास के लिए शिक्षा के कुछ अन्य उद्देश्य अधोलिखित हैं-

  1. विद्यार्थियों को विश्व की नागरिकता के लिए तैयार किया जाय ।
  2. उनकी संकीर्ण एवं अच्छी राष्ट्रीयता को समाप्त किया जाय ।
  3. उनकी लेखन चिंतन, निर्णय, लेखन तथा भाषण की योग्यता का विकास किया जाय।
  4. उन्हें उन समस्त आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक तत्वों की पूर्ण जानकारी कराई जाय जिसके कारण विश्व के समस्त राष्ट्र एक-दूसरे पर आधारित हैं।
  5. उन्हें उन समस्त आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक तत्वों की पूर्ण जानकारी कराई जाए जिसके कारण विश्व के समस्त राष्ट्र एक-दूसरे पर आधारित हैं।
  6. उन्हें सांस्कृतिक विभिन्नताओं में मानव हित के लिए कल्याणकारी समाज तत्वों को खोजने के लिए प्रोत्साहित तथा प्रशिक्षण प्रदान किया जाये।
  7. उन्हें विश्व की उन सभी समस्याओं से परिचित कराया जाए जो सभी देशों के सामान्य रूप से प्रतिबंधित हैं और उनका समाधान करने के लिए जनतंत्रीय पद्धतियों का ज्ञान कराया जाए।
  8. उन्हें विश्व समाज के निर्माण के लिए मूल्यों एवं उद्देश्यों में आस्था रखने की शिक्षा प्रदान की जाए।
  9. उन्हें राष्ट्रों की उपलब्धियों का आदर तथा मूल्यांकन करना सिखाया जाए जिससे कि मानव संस्कृतियों तथा विश्व नागरिकता का विकास हो।

यद्यपि अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकस के लिए रेडियो, टेलीवि वन, चलचित्र, पत्र तथा भाषण इत्यादि अनेक महत्वपूर्ण साधन हो सकते हैं। किन्तु इन साधनों में शिक्षा का सर्वश्रेष्ठ स्थान है। इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि जिन संस्थाओं के द्वारा शिक्षा प्रदान की जाती है, वे सर्वोत्तम सांस्कृतिक तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं और निष्पक्षता ‘यूनेस्को’ द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘टुवार्डस वर्ल्ड अण्डरस्टैंडिंग’ में लिखा गया है, “विद्यालय आस-पास की संस्कृति में निहित सर्वोत्तम तत्वों को व्यक्त कर सकते हैं और साधारणतः करते भी हैं। वे ईमानदारी एवं निष्पक्षता से समाज के सामान्य मूल्यों को काफी ऊँचा उठाने का प्रयत्न करते हैं।”

अन्तर्राष्ट्रीय अवबोध के बाधक तत्व-

अन्तर्राष्ट्रीय अवबोध के विकास में कुछ बाधक तत्व भी हैं। ये निम्नलिखित हैं-

(1) कट्टर राष्ट्रवाद- कट्टर राष्ट्रवाद अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास में बाधक होता है कट्टर राष्ट्रवादी लोग अपने देश को सर्वोपरि मानते हैं तथा दूसरे देशों को हीन समझकर उनकी उपेक्षा करते हैं।

(2) कट्टर धार्मिकता- कट्टर धार्मिकता भी अन्तर्राष्ट्रीयता अवबोध में बाधक है। धर्मान्ध व्यक्ति सदैव दूसरे धर्मों की उपेक्षा करता है जिससे दूसरे धर्म के लोगों से उसका विरोध हो जाता है।

(3) मानव मूल्यों का अभाव- मानवतावादी मल्यों का अभाव होने पर भी अन्तर्राष्ट्रीय भावना को ठेस लगती है। संकीर्ण मूल्य तंत्र मानवतावादी मूल्यों के विरोधी होते हैं।

(4) साम्राज्यवादी प्रवृत्तियाँ- अधिकांश देशों के अन्तर्गत साम्राज्यवादी प्रवृत्तियाँ पायी गयी हैं। ये देश दूसरे देशों पर अपना आधिपत्य जमाना चाहते हैं तथा विश्व बन्धुत्व के लिए खतरा उत्पन्न करते हैं।

(5) आर्थिक प्रतिस्पर्धा- देश की आर्थिक प्रतिस्पर्धा भी अन्तर्राष्ट्रीय अवबोध में बाथक हैं। प्रतिस्पर्धा करने वाले देश दूसरे देशों को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं।

(6) आर्थिक असन्तुलन- विभिन्न देशों का आर्थिक असन्तुलन भी अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना को प्रभावित करता है। अधिकांशतः देखा गया है कि धनी देशों के लोग गरीब देश के लोगों को हेय समझते हैं।

(7) जातीयता- जातीयता की भावना एवं जातीय संघर्ष भी मानवीय सहयोग की भावना के लिए घातक है। अफ्रीकी देशों में होने वाली जातीय दंगे इस प्रकार की भावना के लिए बाधक हैं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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