शिक्षाशास्त्र / Education

भावनात्मक एकता के विकास में शिक्षा किस प्रकार सहायक हो सकती है? | बच्चों को भावनात्मक एकता के लिए शिक्षा देना क्यों आवश्यक है?

भावनात्मक एकता के विकास में शिक्षा किस प्रकार सहायक हो सकती है? | बच्चों को भावनात्मक एकता के लिए शिक्षा देना क्यों आवश्यक है?

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भावनात्मक एकता का अर्थ

भावात्मक एकता द्वारा राष्ट्र व्यक्ति वे आधार में हम कुछ निश्चित परिवर्तन लाना चाहते हैं। भारत एक राष्ट्र है, इसमें कोई सन्देह नहीं। समूचे राष्ट्र को एक मानना भी आवश्यक है। हममें संवेगात्मक अनुभूति भी तदनुरूप ही होनी चाहिए, भावात्मक एकता का लक्ष्य राष्ट्रीय एकता है। इसलिए राष्ट्रीय एकता और भावात्मक को लगभग एक ही अर्थ में प्रस्तुत कर दिया जाता है। राष्ट्रीय एकता बहुत कुछ रा्ट्रीयता के विकास से संबंधित है।

व्यक्तियों के भावात्मक संसार के आधार पर ही राष्ट्र का निर्माण होता है। यदि हम भाषा, जाति, सम्प्रदाय के आधार पर ही प्रेम, सहानुभूति, क्रोध, संवेगों का विकास करेंगे ते हमारा राष्ट्र भी उसी जाति, भाषा आदि के आधार पर छिन्न-भिन्न होगा। व्यक्ति और समाज में पास्परिक विरोध नहीं है। यदि व्यक्ति के संवेगों का उचित ‘मागन्तीकरण और शोध’ होगा तो निस्सन्देह वह राष्ट्र से प्रेम करेगा और राष्ट्र तथा समाज का विकास होगा भावात्मक एकता का नकारात्मक अर्थ विघटनकारी तत्वों से घृण करना और राष्ट्र को फूट से बचाना। इसका सकारात्मक अर्थ राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयत्न करना है संपूर्ण राष्ट्र को अपना समझकर उससे प्रेम करना है।

अन्तर संस्कृति भावना-

भारत के वर्तमान समाज की जड़े बहुत गहरी हैं। इसका अतीत बड़ा ही गौरवमय रहा है। यह देश बहुत बड़ा है उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में हिन्दमहासागर पर्यन्त तथा पूर्व में नागालेण्ड और असम से लेकर पश्चिम में पंजाब तक यह फैला हुआ है। इतने बड़े देश में अनेक प्रकार की प्रथाएँ, परम्पराएँ एवं रीतियाँ प्रचलित हैं। लोगों के खान-पान भिन्न हैं। मद्रास में चावल अधिक खाया जाता है तो किरल की सामान्य जनता ‘टपियोका’ पर निर्भर है। पंजाब में गेहूँ अधिक खाया जाता है तो बंगाल में मछली और चावल मुख्य भोजन है। दक्षिण की ‘इडली’, ‘डोसा’ उत्तर भारत का निवासी नहीं जानता। खान-पान ही नहीं खाने का ढंग भी अलग है।

भाषा की दृष्टि से भिन्नता है। भारतीय संविधान में 22 मुख्य भाषाओं की गणना की जाती है। इनके अतिरिक्त अंग्रेज़ी का भी चलन है। धर्म और सम्प्रदाय की दृष्टि से भी भिन्नता है। आदर्शों, मूल्यों एवं. मान्यताओं में भी अन्तर है। इस दृष्टि से भारत में अनेक उपसंस्कृतियाँ हैं। किसी वेश-भूषा, रहन-सहन, खान-पान, भाषा आदि से घृण करना ठीक नहीं है। सभी को अपनी वेश-भूषा, रहन-सहन प्रिय है। अतः बालक में सभी प्रकार की उपसंस्कृतियों की समझ उत्पन्न की जाये जिससे यह भिन्न मान्यताओं को समझकर उनकी सराहना कर सके। इसमें अन्तर सांस्कृतिक भावना का विकास होना भावात्मक एकता के लिए अन्तर सांस्कृतिक भावना का विकास आवश्यक है। अन्तर सांस्कृतिक भावना से राष्ट्र सुदृढ़ होगा। इससे अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण के विकास में भी सहायता मिलती है।

भावनात्मक एकता के स्तर-

एकता के चार स्तर होते हैं। पहले स्तर पर लोग एक-दसरे के साथ रहना प्रारम्भ करते हैं। इस स्तर पर लागो में अकेले की अपेक्षा समूह, समुदाय या राष्ट्र में रहने की आदत पड़ती है।

दसरे स्तर पर लोग जो एक-दूसरे क पास रहते हैं। एक-दूसरे को समझना प्रारम्भ करते हैं। पहले स्तर पर समझने की उत्सुकता नहीं होती है। उस स्तर पर केवल सामूहिक जीवन की आदत पड़ती है। दूसरे स्तर पर दूसर का समझने की कोशिश की जाती है। तीसरे स्तर पर एक-दूसरे को समझना ही पर्याप्त नहीं है। सामन का सम्बन्ध केवल बुद्धि से होता है। इसमें रोगात्मक सम्बन्ध का अभाव रहता है। तासरा स्तर रोगात्मक सम्बन्ध का है।

हम इस स्तर पर दूसरे की प्रथाओं में रुचि लेने लगते हैं। इस स्तर पर दूसरे की परम्पराओं से घृणा समाप्त हो जाती है लोग शान्तिपूर्वक रहते हैं।

चौथे स्तर पर सभी लोग जो एक-दूसरे के पास रहते हैं, एक-दूसरे की परम्पराओं, रीतियों एवं मान्यताओं को अपना समझने लगते हैं और उन सभी से प्रभावित होते हैं। यह चौथा स्तर भावात्मक उससे प्रेम करने लगता है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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