शिक्षक शिक्षण / Teacher Education

डाल्टन योजना का अर्थ | डाल्टन योजना के उदेश्य | डाल्टन योजना के सिद्धान्त

डाल्टन योजना
डाल्टन योजना

डाल्टन योजना का अर्थ | डाल्टन योजना के उदेश्य | डाल्टन योजना के सिद्धान्त

 डाल्टन योजना का अर्थ

इस योजना में बालक के साथ एक समझाता किया जाता है जिसके अनुसार बालक को एक निश्चित समय में निश्चित कार्य सम्पन्न करना होता है। बालक को कार्य को सम्पन्न  करने के लिए सभी प्रकार की सुविधायें प्रदान की जाती हैं तथा कार्य करने की सम्पूर्ण स्वतन्त्रता दी जाती है। बालक शिक्षक के निर्देशन में नवीन ज्ञान की खोज के लिए प्रयोग करता है और नवीन सिद्धान्तों को खोजता है। वास्तव में डाल्टन योजना एक शिक्षण पद्धति नहीं है बल्कि नवीन तथ्यों की खोज करने की एक विधि मात्र है। वास्तव में डाल्टन योजना विद्यालय के कार्य को इस प्रकार से संगठित करने की विधि है जिससे बालक स्वयं उद्देश्यपूर्ण क्रियायें करने में संलग्न रहते हैं। मिस हेलन बार्खस्स्ट के अपने ही शब्दों में ‘डाल्टन प्रयोगशाला योजना शिक्षण की प्रणाली या पद्धति नहीं है। यह शैक्षिक पुनर्गठन की एक विधि है जो सिखाने और सीखने की संबद्ध क्रियाओं में एकता स्थापित करती है।”

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डाल्टन योजना के उदेश्य

हेलेन पार्खस्ट ने याजना पद्धति के दो प्रमुख उद्देश्य बताये है-

  1. डाल्टन योजना का उद्देश्य बालकों और बालिकाओं को साधारण कक्षा में मिलने वाली जीवन की पूर्णतया विभिन्न दशाओं में रखकर एक नये प्रकार के शैक्षिक समाज की रचना और विद्यालय के सामाजिक जीवन का पुनर्गठन करना है।
  2. डाल्टन योजना का उद्देश्य संश्लेषणात्मक उद्देश्य है। यह एक ऐसी सरल और मितव्ययी विधि प्रस्तुत करती है जिसके द्वारा विद्यालय समग्र रूप से समाज के सदृश्य कार्य कर सकता है।

डाल्टन योजना के सिद्धान्त

डाल्टन योजना शिक्षण के निम्न सिद्धान्तों पर आधारित है-

  1. बाल केन्द्रित शिक्षा (Child Cantered Education)- डाल्टन योजना में बाल केन्द्रित शिक्षा के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है। इस योजना में शिक्षण तो गौण रहता है किन्तु बालक की क्रियाओं को प्रधानता दी गयी है। बालक को अपनी रुचिरयों के आधार पर शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्वतन्त्र छोड़ दिया जाता है और किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए छात्र के साथ एक समझोता कर लिया जाता है। इस समझौते के अनुसार छात्र को स्वतन्त्र रहते हुए एक निर्धारित समय में इस कार्य को सम्पन्न करना होता है।
  2. चरित्र निर्माण (Character Building)- डाल्टन योजना में बालकों के चरित्र निर्माण के सिद्धान्त को भी अपनाया गया है। बालकों को व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से विविध कार्यों के करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है । व्यक्तिगत कार्य बालकों में उत्तरदायित्व, परिश्रम और आत्मनिर्भरता के गुणों को विकसित करते हैं और सामूहिक कार्य उनमें सहानुभूति, सद्भावना, सामुदायिक भावना, स्वार्थहीनता आदि गुणों का विकास करते हैं। इन सब गुणों के विकसित होने पर बालक चरित्रवान बनते हैं।
  3. स्वशिक्षा का सिद्धान्त (Principle of Self Education)- डाल्टन योजना बालकों द्वारा स्वयं करके सीखने के सिद्धान्त का अनुमोदन करती है। ज्ञान अर्जित करने का पूरा उत्तरदायित्व स्वयं छात्र पर रहता है। बालक का किसी भी, विषय के अध्ययन की पूर्ण स्वतन्त्रता रहती है। शिक्षक तो मात्र एक निर्देशक के रूप में ही कार्य करते हैं। इस प्रकार इस योजना में छात्र शिक्षकों के पथ प्रदर्शन, अपने साथियों की सहायता, पुस्तकों के अध्ययन, वस्तुओं के अवलोकन आदि से स्वयं शिक्षा ग्रहण करते हैं।
  4. स्वतन्त्रता का सिद्धान्त (Principle of Freedom)- डाल्टन योजना बालक को अध्ययन के लिए स्वतन्त्र छोड़ देती है। इसके अन्तर्गत अध्ययन की किसी समय सारणी की आवश्यकता नहीं होती। बालक जितनी देर चाहे पुस्तकें पढ़ सकते हैं, प्रयोगशाला में रह सकते हैं और अपनी रुचि के अनुसार कार्य कर सकते हैं। कार्य करते समय बालकों पर कक्षा नियमों वार्षिक या अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं आदि का कोई बन्धन नहीं होता।
  5. सामाजिक सम्बन्धों का सिद्धान्त (Principle of Social Relations)- डाल्टन योजना सामाजिक सम्बन्धों के सिद्धान्त को भी मान्यता प्रदान करती है। बालक अन्य, बालकों के साथ अन्तःक्रियायें करते हुए विभिन्न प्रकार के अनुभवों को ग्रहण करता है और विद्यालय में उसी प्रकार के अन्तःसम्बन्धों का निर्माण एवं विकास करता है जो उसे अपने भावी जीवन में स्थापित करने हैं।
  6. व्यक्तिगत कार्य (Individual Work)- मिस हेलेन का मानना था कि कोई भी दो बालक एक समान नहीं होते। अतः उसने अपनी योजना में छात्रों की व्यक्तिगत भितन्नताओं को विशेष स्थान दिया। इस योजना में बालकों को सम्पन्न करने के लिए दिया जाने वाला कार्य पूर्ण रूप से उनकी रुचि, क्षमता और आवश्यकता के अनुकूल होता है। कार्य करने पर किसी प्रकार का भी प्रतिबन्ध उन पर नहीं लगाया जाता है और कार्य करने के लिए उसे स्वतन्त्र छोड़ दिया जाता है। कार्य को सम्पन्न करने की कोई समय सीमा भी निर्धारित नहीं की जाती। जिस कारण इस योजना से साधारण व तीव्र बुद्धि वाले बालक दोनों ही लाभान्वित होते हैं।
  7. रुचि का सिद्धान्त (Principle of Interest)- मिस हेलेन का मानना है कि “जब बालक में रुचि होती है तभी वह मानसिक रूप से अधिक उत्सुक, अधिक सावधान और अध्ययन में उत्पन्न होने वाली किसी भी कठिनाई पर विजय प्राप्त करने में अधिक सक्षम होता है।”

मिस हेलेन ने अपनी योजना को प्रतिपादित करते समय बालकों की रुचि पर विशेष बल दिया है। बालकों को उनकी रुचि और अरुचि को ध्यान में रखते हुए ही कार्य दिया जाता है।

৪. आत्मानुशासन का सिद्धान्त (Principle Of Self-decision)- इस योजना में जहां बालक को कार्य करने की सम्पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की गयी हैं वहां साथ ही साथ कुछ उत्तरदायित्व भी निभाने की बात कही गयी है। बालकों को जो कार्य दिये जाते हैं उन्हें सम्पूर्ण करने के साथ-साथ उन्हें कुछ उत्तरदायित्वों को भी निभाना होता है। इस व्यवस्था के कारण बालकों में आत्मानुशासन का गुण विकसित होता है। इस योजना के अन्तर्गत बालक अपने उत्तरदायित्वों को निभाने और कार्य को सम्पन्न करने में इतने व्यस्त रहते हैं कि अन्य बालकों की स्वतन्त्रता में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न करने का उन्हें समय ही नहीं मिलता जिस कारण विद्यालय में अनुशासन बना रहता है।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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