इतिहास / History

जाति प्रथा का विकास | जाति प्रथा की विशेषतायें | development of caste system in Hindi

जाति प्रथा का विकास | जाति प्रथा की विशेषतायें | development of caste system in Hindi

जाति प्रथा का विकास

भारत में जाति प्रथा के विकास के विषय में अनेक बातें कही गई हैं। इसकी उत्पत्ति का स्रोत प्रायः प्राचीन भारतीय इतिहास में खोजा गया है तथा उसके आधार पर इसके विकास की विभिन्न दशाएँ बताई गई हैं। परन्तु हम इसके विकास को आधुनिक समय से लेकर प्राचीन समय की ओर जाते हुए खोजने का प्रयल करेंगे।

आज यदि हमसे कोई यह प्रश्न करता है कि तुम किस जाति के हो, तो हम अपनी जाति को अपने धर्मानुसार हिन्दू या मुसलमान या पारसी या सिख या ईसाई बताते हैं। यदि कोई हिन्दू को हिन्दू जानकर यह पूछता है कि तुम किस जाति के हो तो वह उत्तर देता है ब्राह्मण या क्षत्रिय या वैश्य या हरिजन । इस प्रकार एक तो हुई हिन्दू जाति और दूसरी हुई स्वयं हिन्दू की ही ब्राह्मण या क्षत्रिय या वैश्य या हरिजन जाति । जब यदि ब्राह्मण से पूछा जाये कि तुम कौन ब्राह्मण हो तो वह कहता है गौड या कान्यकुब्ज या अमुक ब्राह्मण। इस प्रकार जाति प्रथा एक गड़बड़ घोटाला सा प्रतीत होती है। यह गड़बड़ आज से नहीं, वरन् लगभग मुसलमानों के भारत आगमन काल से चली आ रही है।

मुसलमानों के आगमन के कुछ समय पूर्व भारतीय जाति प्रथा का एक दूसरा रूप था। इस समय वर्ण व्यवस्था अपना गौरवकाल व्यतीत कर चुकी थी तथा उसे अनेक विदेशी तत्वों का सामना करना पड़ रहा ता । वास्तविक रूप में इस समय वर्ण जैसी चीज कम रह गई थी तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र अपने को जाति मान चुके थे। उनका धर्म हिन्दू था या हिन्दू होते हुए भी वे अपने को ब्राह्मण जाति या क्षत्रिय जाति या वैश्य जाति कहते थे। इनका अर्थ यह हुआ कि अब वर्ण ने जाति का रूप धारण कर लिया था।

वैदिक युग में जाति प्रथा की स्थिति बड़ी स्पष्ट थी। एक आर्य जाति थी और दूसरी अनार्य जाति । आर्यों के मध्य कार्य विभाजन करने के लिए वर्ण व्यवस्था का नियमन किया गया। वर्ण व्यवस्था का निर्धारण विशुद्धतः रंग के आधार पर नहीं किया गया क्योंकि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तो लगभग एक ही रंग के थे। वर्ण व्यवस्था का मुख्य आधार कार्य क्षमता तथा कुशलता ही था । अनार्य वर्ण व्यवस्था से बाहर थे। हमें लगता है कि आर्य पहले ही दृष्टि में अनार्यों से घृणा करने लगे थे (Hate at first sight)। अतः उन्होंने अनार्यों को अपने से अलगाव देने के लिए उन्हें अलग जाति का कहा।

इस प्रकार जाति प्रथा का विकास आर्य तथा अनार्य जाति से प्रारम्भ हुआ। आर्यों के चारों वर्ण आर्य जाति थे। भले ही शूद्र अपवित्र माने गये परन्तु आर्यों ने उन्हें अपनी वर्ण व्यवस्था में स्थान तो दिया अनेक शूद्रों ने तो कर्म द्वारा ब्राह्मणत्व भी प्राप्त किया ता। बाद में जब जनसंख्या बढ़ी और वर्णों को पहचानना मुश्किल होने लगा तो अपनी श्रेष्ठता या अस्तित्व बनाये रखने के लिये प्रत्येक वर्ण अपने को जाति मान बैठा। जाति प्रथा का विकास इसी तरह होता रहा और आज भारत विभिन्न जातियों का अजायबघर बन गया।

जाति प्रथा की विशेषतायें

जाति प्रथा की विशेषताओं को दो प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है-

1. संरचनात्मक विशेषतायें-

इस विशेषता का सम्बन्ध जाति का निर्धारण तथा रचना से है। इस विशेषता को पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) जन्मानुसार जाति की सदस्यता का निर्धारण होना, मनु तथा प्रमुख सूत्रकारों ने जन्म को जाति निर्धारण माना है।

(2) जाति के भीतर ही विवाह किया जाना चाहिए। जन्म से जिस जाति की सदस्यता प्राप्त होती है, विवाह भी उसी जाति में करना चाहिए।

(3) मनुष्य की पूर्ण श्रद्धा तथा आज्ञाकारिता अपनी जाति के प्रति ही होती है, सम्पूर्ण मानव समुदाय के प्रति नहीं। इस विशेषता को खण्डात्मक विभाजन तथा उसके प्रति श्रद्धा होना भी कहा जाता है।

(4) जाति में प्रत्येक सदस्य का स्थान निश्चित तथा सुरक्षित रहता है।

(5) जाति का प्रत्येक सदस्य अपनी जाति के अन्य सदस्यों से धनिष्ट सम्बन्ध रखता है। जाति के बाहर उसका सामाजिक अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। इसे उदग्र सम्बन्ध भी कहा जाता है।

2. सांस्कृतिक विशेषताए-

इस शीर्षक के अन्तर्गत जाति की विशेषताओं का सम्बन्ध आचरण की अपेक्षा भावात्मक है। इस धर्म की विशेषताएँ तीन हैं-

(1) जातिगत स्तर की भावना प्रत्येक जाति कला अपना सामाजिक जीवन होता है तथा इस भावना के अनुरूप प्रत्येक जाति अपना सामाजिक स्तर बनाये रखने के लिए अनेकानेक प्रयत्न करती है।

(2) खान-पान तथा आचरण सम्बन्धी भावना–किसी जाति का सदस्य अन्य जाति के साथ खान-पान तथा आचरण के मुक्त सम्बन्ध नहीं रखता। प्रायः एक ही जाति के विभिन्न सदस्य जातिगत स्तर के अनुरूप ही ऐसे सम्बन्ध निर्धारित करते हैं।

(3) परम्परा सम्बन्धी भावना प्रत्येक जाति के निश्चित रीति-रिवाज तथा परम्पराएँ होती हैं। जाति के प्रत्येक सदस्य में यह भावना रहती है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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