अर्थशास्त्र / Economics

निर्वाधावाद | प्रकृतिवाद के जन्मदायी कारक | प्रकृतिवाद के प्राकृतिक विधान का सिद्धान्त | प्रकृतिवाद प्राकृतिक व्यवस्था का विज्ञान है

निर्वाधावाद | प्रकृतिवाद के जन्मदायी कारक | प्रकृतिवाद के प्राकृतिक विधान का सिद्धान्त | प्रकृतिवाद प्राकृतिक व्यवस्था का विज्ञान है

निर्वाधावाद अथवा प्रकृतिवाद के जन्मदायी कारक

(Main Forces Responsible for the Rise of Physiocracy)

वणिकवाद के अपनी चरम सीमा पर पहुंचते-पहुंचते यह प्रतीत होने लगा कि प्रत्येक देश एक-दूसरे का शत्रु है। हर साधन सम्पन्न राष्ट्र अपने से कमजोर राष्ट्र को अपने अधीन कर उसका शोषण करने लगा। वणिकवादी नीतियों के परिणामत: जहाँ यूरोप के कुछ देश धनी हो गये वहीं फ्रांस आदि देशों में अराजकता फैलने लगी। उसी काल में फ्रांस में एक ऐसे बौद्धिक वर्ग का उदय हुआ जिसने वणिकवाद की कड़ी आलोचना करते हुए उसका परित्याग करने पर जोर दिया। यह वर्ग प्राकृतिक नियमों (Natural Laws) को मानव विकास का आधार मानता था इसलिए इन्हें ‘प्रकृतिवादी’ (Physiocrats) कहा गया तथा इनके विचारों को ‘प्रकृतिवाद’ (Physiocracy) की संज्ञा दी गयी।

प्रकृतिवाद का उदय यद्यपि वणिकवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ था तथापि उसके उदय के लिए कुछ अन्य कारक भी उत्तरदायी थे, जिनका विवरण निम्न प्रकार है-

(1) फ्रांस की आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियाँ- 18 वीं शताब्दी के मध्य में फ्रांस की आर्थिक दशा अत्यन्त शोचनीय थी। सम्राट लुई चौदहवें के 72 वर्ष एवं लुई पद्रहवें के 60 वर्ष के शासनकाल में फ्रांस को अनेक युद्धों का सामना करना पड़ा था। साथ ही शासन की फिजूलखर्ची के कारण राज्य तथा जनता की आर्थिक स्थिति अत्यधिक कमजोर हो गयी थी। लगातार युद्धों के बाद भी फ्रांस को अपने अनेक उपनिवेश खोने पड़े। सरकारी खर्चों को पूरा करने के लिए भारी मात्रा में ऋण लिये गये, जिसके परिणामस्वरूप फ्रांस की स्थिति एक दीवालिया राष्ट्र जैसी हो गयी।

(2) अत्यधिक करारोपण- राज्य के बढ़ते हुए खर्चों को पूरा करने के लिए कृषकों पर भारी मात्रा में कर लगाये गये, जिनका भुगतान करने में वे पहले से ही असमर्थ थे। पादरी और अभिजात वर्ग को, जिनके पास कुल भूमि का 2/3 भाग था, इस करारोपण से मुक्त रखा गया। निर्धन कृषकों की स्थिति दयनीय होती गयी, क्योंकि उनका भू-स्वामियों एवं सरकार दोनों ही के द्वारा शोषण किया जाने लगा। इसी प्रकार शिल्पकारों पर अनुचित ढंग से कर लगाये गये। स्थानीय सरकारों ने सीमा कर लगाकर आन्तरिक व्यापार को एक बड़ी सीमा तक प्रभावित किया। निर्धन वर्ग पर करों की दर तो अधिक थी ही उन्हें (करों को) मनमाने ढंग से वसूल किया जाता था। सरकारी तन्त्र भ्रष्ट हो गया था। अत्यधिक करारोपण और मालिकों के शोषण के परिणामस्वरूप फ्रांस का कृषक तथा दस्तकार समुदाय, जो वहाँ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी था, अपना विकास नहीं कर सका और फ्रांस की दशा दिन-प्रतिदिन खराब होती गयी।

(3) इंग्लैण्ड की कृषि क्रान्ति अथवा कृषि पर अत्यधिक बल– जिस काल में फ्रांस में कृषि तथा कृषकों की दशा अत्यधिक शोचनीय थी उसी काल में इंग्लैण्ड ने कृषि में क्रान्ति लाकर न केवल खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता प्राप्त की, अपितु वह खाद्य पदार्थों का निर्यातक देश भी हो गया। इंग्लैण्डवासियों ने बड़े पैमाने की खेती को अपनाया, जिसके परिणामस्वरूप कृषि में किये गये पूँजीगत विनियोगों पर उचित प्रतिफल प्राप्त हुआ। फ्रांस के प्रसिद्ध प्रकृतिवादी विचारक इंग्लैण्ड की क्रान्ति से अत्यधिक प्रभावित हुए तथा उन्होंने फ्रांस में भी वणिकवादी नीतियों का परित्याग करने तथा कृषि में विकास करने पर जोर दिया।

(4) वणिकवादी नीतियों का विरोध- वणिकवादी नीतियों (राजकीय नियन्त्रण एकाधिकार, वाणिज्य तथा उद्योगों का विनिमय आदि) का भारी विरोध किया जाने लगा। प्रकृतिवादी लेखकों ने ‘जाने दो, रोको मत’ (Laissez-faire Laissez-passes) नीति पर जोर देकर प्राकृतिक व्यवस्था अपनाने पर बल दिया। वे उद्योग, व्यापार अथवा कृषि पर किसी भी प्रकार का नियन्त्रण लगाने के प्रबल विरोधी थे। इसके साथ ही वे राज्य की शक्ति को कम करने के पक्षधर थे तथा एकाधिकार को समास करना चाहते थे। वणिकवादियों ने जहाँ व्यापार पर अत्यधिक जोर दिया, वहीं प्रकृतिवादियों ने कृषि को प्रधान माना।

(5) असंगत शक्तियाँ- वणिकवादी नीतियों को समाप्त करने में कुछ असंगत शक्तियों ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। फ्रांस में कुछ ऐसे दार्शनिकों का प्रादुर्भाव हुआ जिन्होंने व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता देने तथा सरकारी हस्तक्षेप को समाप्त करने पर जोर दिया। ये दोनों माँगें धीरे-धीरे जोर पकड़ती गर्मी और वणिकवादी आधार निरन्तर कमजोर होता गया।

(6) नवीन वैज्ञानिक खोजें- चारों ओर नित नयी वैज्ञानिक खोजें हो रही थीं। इन अनुसन्धानों का प्रयोग कृषि एवं औद्योगिक दोनों ही क्षेत्रों में किया जा रहा था। वैज्ञानिक खोजों का प्रभाव पुरातन मान्यताओं एवं अन्धविश्वासों पर पड़ा और धीरे-धीरे ये समाप्त होते गये। इंग्लैण्ड में कृषि का व्यावसायीकरण (Commercialization) कर दिया गया तथा कपड़े के निर्माण में मशीनों के प्रयोग ने कपड़ा उत्पादन को बहुत अधिक बढ़ा दिया।

(7) पुरानी मान्यताओं का विरोध- विज्ञान के विकास के साथ फ्रांस में पुरानी मान्यताओं का विरोध किया जाने लगा। चर्च तथा पादरियों की महत्ता कम हो गयी, शासकों द्वारा किये जा रहे शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई जाने लगी तथा वणिकवाद के अन्तर्गत जन्मे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता रुपी विचार और अधिक सक्रिय रूप में प्रकट होने लगे। कैने आदि विचारकों ने जब जनता को प्राकृतिक शाश्वत सत्यों की महत्ता के बारे में अवगत कराया तो लोगों में इसकी और भी अधिक जान लेने की उत्कंठा जागृत हुई।

इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि वणिकवादी नीतियों को प्रयोग में ला रहे अभिजात वर्ग, शासक वर्ग तथा पादरियों एवं बड़े-बड़े भू-स्वामियों आदि के शोषण से ग्रस्त आम नागरिकों को जब कैने जैसे विचारक ने प्राकृतिक अवस्था को प्राथमिकता देकर उन (नागरिकों) के उत्थान की बात कही तो वे वणिकवाद को एक बुराई समझकर उसका विरोध करने के लिए तत्पर हो गये और इस प्रकार प्रकृतिवाद के पौधे को स्वतः ही ऐसी मिट्टी प्राप्त हो गयी जिसमें उसकी जड़ें बिना किसी कठिनाई के समाती चली गयीं।

इस प्रकार प्रकृतिवाद केवल फ्रांस की गिरती हुई आर्थिक दशा की प्रतिक्रिया स्वरूप ही नहीं जन्मा, अपितु इसके उदय एवं विकास में अन्य अनेक तात्कालिक परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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