अर्थशास्त्र / Economics

आर्थिक सिद्धान्त का अर्थ | आर्थिक सिद्धान्त का महत्व | आर्थिक सिद्धान्त की सीमायें

आर्थिक सिद्धान्त का अर्थ | आर्थिक सिद्धान्त का महत्व | आर्थिक सिद्धान्त की सीमायें

आर्थिक सिद्धान्त का स्वभाव तथा अर्थ

(The Nature and Concept of Economic Doctrine)

आर्थिक सिद्धान्त अवलोकित आर्थिक घटनाओं के कारण तथा परिणाम के सम्बन्ध को बताता है तथा उनकी व्याख्या करता है। आर्थिक सिद्धान्त इन सम्बन्धों के संक्षिप्त तथा व्यवस्थित कथन होते हैं। आर्थिक सिद्धान्त को इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं :

‘आर्थिक सिद्धान्त एक तार्किक तथा व्यवस्थित ढाँचा प्रदान करता है जो कि इस बात की व्याख्या करता है कि एक बात दूसरी से किस प्रकार सम्बन्धित है। आर्थिक सिद्धान्त पारस्परिक निर्भरताओं तथा कारण और परिणाम के सम्बन्धों से रिश्ता रखता है।”

आर्थिक सिद्धान्त की उपरोक्त परिभाषा के अभिप्राय निम्न विवरण से स्पष्ट हो जाते हैं; एक सिद्धान्त निम्न बातों से बनता है-

(i) ‘परिभाषाओं का समूह’ (a set of definitions)- जो यह बताता है कि विभिन्न शब्दों से हम क्या समझते हैं।

(ii) ‘मान्यताओं का एक समूह’ (a set of assumptions)- जो इन दशाओं को बताता है जिनके अन्तर्गत सिद्धान्त लागू होगा। परिभाषाओं’ तथा ‘मान्यताओं’ दोनों को, यदि हम चाहें तो गणितात्मक समीकरणों (mathematical equations) द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।

(iii) ‘अगामी चरण है तर्क द्वारा’- इन मान्यताओं के अभिप्रायों (implications) को ज्ञात करना; ऐसा करने में शब्दों, रेखागणित या गणित किसी का भी प्रयोग किया जा सकता है, मान्यताओं के आधार पर निकाले गये इन अभिप्रायों की वास्तविक आँकड़ों द्वारा जाँच की जाती है। तत्पश्चात हम एक निष्कर्ष अर्थात एक सिद्धान्त पर आते हैं : या तो सिद्धान्त त्याग दिया जाता है यदि वह वास्तविक आँकड़ों से मेल नहीं खाता, या सिद्धान्त स्वीकार कर लिया जाता है, यदि वह वास्तविक आँकड़ों से मेल खाता है।

आर्थिक सिद्धान्त की दो मुख्य विशेषताएँ, या पक्ष हैं: (i) वे ‘सामान्य कथन’ (generalizations) होते हैं, तथा (ii) उनमें अमूर्तनाएँ (abstractions) होती हैं। अब हम इन दोनों पक्षों की नीचे विस्तृत रूप से विवेचना करते हैं-

(1) सामान्यीकरण (Generalizations)-  प्राय: आर्थिक तयों में बहुत विभिन्नता होती है; कुछ व्यक्ति तथा संस्थाएँ एक दिशा में कार्य करती हैं और कुछ दूसरी दिशा में अत: ऐसी स्थिति में आर्थिक सिद्धान्त औसतों या सांख्यिकीय सम्भावनाओं (averages or statistical probabilities) के शब्दों में व्यक्त किये जा सकते हैं। इस प्रकार आर्थिक सिद्धान्त सामान्य कथन होते हैं, उनके अपवाद (exceptions) हो सकते हैं और वे रूप से अपूर्ण या कम निश्चित (quantitatively imperfect or imprecise) हो सकते हैं।

(ii) अमूर्तताएँ (Abstractions)- अमूर्तता का अर्थ है वास्तविक संसार में से अनार्थिक तथा अनुपयुक्त आँकड़ों को त्याग देना तथा उपयुक्त आँकड़ों (relevant data) का चुनाव करके उनको व्यवस्थित करना। अमूर्तता की प्रक्रिया के अन्तर्गत जिन वास्तविक परन्तु अनावश्यक या अनुपयुक्त बातों को त्याग दिया जाता है उनकी क्षतिपूर्ति (compensation) इस बात से हो जाती है कि समझने की शक्ति, जो कि आर्थिक सिद्धान्त प्रदान करता है, में वृद्धि हो जाती है।

अत: आर्थिक सिद्धान्त उपयुक्त आँकड़ों का चुनाव व क्रमस्थापन करके आंकड़ों को अर्थ प्रदान करता है।

‘आर्थिक सिद्धान्त’ (economic doctrine) के स्थान पर ‘आर्थिक मॉडल’ (economic model) के शब्द का भी प्रयोग किया जाता है।

उपर्युक्त विशेषताएँ आर्थिक सिद्धान्त के स्वभाव पर प्रकाश डालती हैं। अब हम आर्थिक सिद्धान्त के स्वभाव के सम्बन्ध में समस्त स्थिति को इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं

“आर्थिक सिद्धान्त आर्थिक जीवन का एक पूर्ण चित्र नहीं होता, वह उसका केवल एक नक्शा होता है। जिस प्रकार से हम एक नवशे से यह आशा नहीं करते हैं कि वह प्रत्येक वृक्ष, प्रत्येक मकान और जमीन पर घास की प्रत्येक पत्ती बतायेगा, उसी प्रकार हमें आर्थिक विश्लेषण (या आर्थिक सिद्धान्त ) से आशा नहीं करनी चाहिए कि आर्थिक व्यवहार की प्रत्येक सूक्ष्म बात तथा प्रत्येक हेर-फेर व तोड़-फोड़ को शामिल करेगा। एक नक्शा जो बहुत अधिक विस्तृत है और बहुत अधिक सूक्ष्म बातों को दिखाता है उसकी नक्शे के रूप में, कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी आर्थिक नक्शे (अर्थात् आर्थिक सिद्धान्त) अच्छे नक्शे रहे हैं, बल्कि उनमें से अनेक वास्तविकता की मोटी रूपरेखा को भी बताने में गलत सिद्ध हुए हैं। परन्तु फिर भी हम एक नक्शे की खोज करते हैं, न कि एक विस्तृत चित्र की।’ संक्षेप में, आर्थिक सिद्धान्त केवल वास्तविकता के सार को पकड़ता है।”

आर्थिक सिद्धान्त का महत्व

(Importance of Economic Theory)

कुछ व्यक्ति यह सोच सकते हैं कि ‘आर्थिक सिद्धान्तों’ का अध्ययन एक बेकार की कसरत (useless exercise) है क्योंकि वे अमूर्त (abstract) होते हैं। परन्तु ऐसा सोचना गलत है। यद्यपि आर्थिक सिद्धान्त अमूर्त होते हैं, परन्तु वे चीजों को व्यवस्थित ढंग से देखने के लिए सैद्धान्तिक यन्त्र (tools) प्रदान करते हैं और उनका अध्ययन अत्यन्त उपयोगी है :

“आर्थिक सिद्धान्त का उद्देश्य व्याख्या करना, निष्कर्ष निकालना या भविष्यवाणी करना तथा नियंत्रण करना है।”

अब हम उपर्युक्त तीनों उद्देश्यों का थोड़ा विस्तृत विवेचन देते हैं:

(i) व्याख्या (Explanation)

आर्थिक सिद्धान्त वास्तविक जगत से विशाल तथा गुथे हुए आँकड़ों से उपयुक्त व सम्बन्धित तत्वों (relevant facts) के चुनाव तथा उनके वर्गीकरण व क्रमस्थापन (classification and systematization) में सहायता करके आर्थिक घटनाओं के कारण और परिणाम के बीच सम्बन्ध का एक ढाँचा (a pattern of relationship) बताता है, और इस प्रकार से उन शक्तियों की व्याख्या करता है जो कि आर्थिक घटनाओं को निर्धारित करती हैं। दूसरे शब्दों में, आर्थिक सिद्धान्त एक अर्थ व्यवस्था के कार्यकरण (operation) के समझने में एक महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करता है।

(ii) निष्कर्ष निकालना या भविष्यवाणी करना (Prediction)

आर्थिक सिद्धान्त आर्थिक घटनाओं के कारण और परिणाम के बीच सम्बन्ध की व्याख्या करता है। इसलिए आर्थिक सिद्धान्त आर्थिक घटनाओं की भविष्यवाणी कर सकता है, अर्थात् यदि आर्थिक चरों में परिवर्तन होता है तो आर्थिक सिद्धान्त ये बता सकेगा कि क्या परिणाम होंगे : दूसरे शब्दों में,

“सिद्धान्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भविष्यवाणी करने की शक्ति प्रदान करता है। एक बहुत बड़ी समस्या अनिश्चितता की है जिसका मनुष्य को सामना करना पड़ता है। चूंकि आर्थिक सिद्धान्त हमें पूर्वज्ञान कराता है, इसलिए यह सिद्धान्त हमें अनिश्चितता के ऊपर नियन्त्रण प्राप्त करने की योग्यता प्रदान करता है।”

परन्तु आर्थिक नियमों या सिद्धान्तों की भविष्यवाणी करने की शक्ति उतनी सही व निश्चित नहीं होती जितनी प्राकृतिक या भौतिक विज्ञानों की। इसका कारण है कि अर्थशास्त्र तथा प्राकृतिक विज्ञानों की विषय सामग्री में अन्तर होता है। आर्थिक सिद्धान्त की भविष्यवाणी करने की शक्ति की स्थिति को हम निम्न शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं :

“आर्थिक सिद्धान्त एक निश्चित व सही भविष्यवाणी नहीं कर सकता; वह एक बुद्धिमानी का अनुमान प्रदान करता है। आर्थिक सिद्धान्त इस बात की भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि क्या निश्चित है : वह इस बात की भविष्यवाणी कर सकता है कि क्या सम्भाव्य है।”

(iii) नियन्त्रण (Control)

आर्थिक चरों के बीच सम्बन्धों की जानकारी आर्थिक घटनाओं या परिणामों की भविष्यवाणी सम्भव बनाती है, और भविष्यवाणी आर्थिक घटनाओं के नियंत्रण’ को सम्भव करती है। दूसरे शब्दों में ‘नियंत्रण’ का अर्थ है ‘आर्थिक नीति का निर्माण’ ताकि सम्भावित परिणामों पर नियंत्रण किया जा सके और यदि किसी घटना का नियंत्रण सम्भव न हो सके तो भविष्यवाणी के कारण कम से कम उस घटना के परिणामों के साथ समायोजन (adjustment) करने की तैयारी के लिए उचित समय मिल जाता है।

आर्थिक सिद्धान्त की ठोस व गहरी पकड़ (firm grasp) हमें आर्थिक नीति का एक ढाँचा (frame work of policy) प्रदान करने में निम्न प्रकार से सहायता होती है :

(a) आर्थिक सिद्धान्त कुछ उद्देश्यों में विसंगति होने की स्थिति स्पष्ट कर सकता है और इस प्रकार नीति (या नियंत्रण) में सहायक होता है।

(b) आर्थिक सिद्धान्त दिये हुए उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए वास्तविक विकल्पों के परिणामों को प्रस्तुत करके उनके बीच बुद्धिमानी के साथ चुनाव करने का रास्ता दिखाता है (सरकार या राजनीतिज्ञों को) इस प्रकार आर्थिक नीति में सहायक होता है।

आर्थिक सिद्धान्त की सीमायें

आर्थिक सिद्धान्त या मॉडल वास्तविकता के सरलीकृत रूप (simplifications of reality) होते हैं, इसलिए उनकी कुछ सीमाएँ या खतरे हैं जिन्हें अर्थशास्त्री मानते हैं। मुख्य सीमाएँ या खतरे निम्नलिखित हैं-

(i) एक अर्थशास्त्री उपयुक्त तथा अनुपयुक्त तथ्यों (relevant and irrelevant facts) के बीच सही अन्तर व चुनाव करने में गलती कर सकता है।

यदि अर्थशास्त्री कुछ उपयुक्त तथ्यों को छोड़ देता है तो प्राप्त सिद्धान्त एक असम्बद्ध (disjointed), भ्रमकारी तथा अपूर्ण विश्लेषणात्मक यन्त्र (tool) होगा। परिणामस्वरूप एक ऐसे सिद्धान्त या मॉडल का निर्माण हो जायेगा जो कि ‘अत्यधिक काल्पनिक’ (hyper abstract) हो और उसका वास्तविकता से कोई सम्पर्क (touch) न रह गया हो।

(ii) इस बात का डर सकता है कि कुछ अर्थशास्त्री आर्थिक सिद्धान्त या मॉडल का प्रयोग करते समय उसकी मान्यताओं को ध्यान में न रखें।

उदाहरणार्थ, एक सिद्धान्त जिसमें यह मान लिया जाता है कि एक उपभोक्ता अपनी सीमित आय को इस प्रकार से व्यय करेगा कि उसे अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त हो, उस स्थिति में ठीक नहीं उतरेगा जहाँ पर उपभोक्ता अपनी उपयोगिता को अधिकतम करने की बात से प्रभावित होकर व्यवहार नहीं करता है।

(iii) इस बात का डर हो सकता है कि हम आर्थिक सिद्धान्त या मॉडल से कुछ नैतिक गुणों की आशा करने लग जायें।

वास्तव में आर्थिक सिद्धान्त तो केवल विश्लेषणात्मक यन्त्र होते हैं। जिनका नैतिकता से कोई सम्बन्ध नहीं होता।

निष्कर्ष

आर्थिक सिद्धान्त के अध्ययन के पश्चात् निम्न बातों का दावा कर सकते हैं कि “अर्थशास्त्र का सिद्धान्त ऐसे सुनिश्चित निष्कर्ष नहीं प्रदान करता है जिनका नीति के रूप में तत्काल प्रयोग हो सके। यह तो एक रीति है न कि एक विश्वास, मस्तिष्क का एक यन्त्र तथा विचार करने की एक तकनीक है, जो इसके अधिकारी को सही निष्कर्ष प्राप्त करने में सहायता करती है।” अत: कीन्स महोदय का कहना उचित है कि-

“Economic Doctrine is a technique of thinking which helps to draw correct conclusions……… It provides a logical, organized frame work which helps to explain how one thing relates to another. Thus, such doctrine is concerned with interdependencies and relationships of cause and effect.”

अर्थशास्त्र महत्वपूर्ण लिंक

Disclaimer: sarkariguider.com केवल शिक्षा के उद्देश्य और शिक्षा क्षेत्र के लिए बनाई गयी है। हम सिर्फ Internet पर पहले से उपलब्ध Link और Material provide करते है। यदि किसी भी तरह यह कानून का उल्लंघन करता है या कोई समस्या है तो Please हमे Mail करे- sarkariguider@gmail.com

About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

Leave a Comment

error: Content is protected !!