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शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन क्या है | शाखीय अभिक्रम के सिद्धान्त | शाखीय अभिक्रम की अवधारणाएं

शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन
शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन

शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन क्या है | शाखीय अभिक्रम के सिद्धान्त | शाखीय अभिक्रम की अवधारणाएं | What is branching instruction in Hindi | Principles of branching programming in Hindi | Concepts of branching programming in Hindi

शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन

शाखीय अनुदेशन का आविर्भाव मनोविज्ञान की प्रयोगशाला से हुआ जबकि रेखीय अनुदेशन का विकास मानवीय प्रशिक्षण की समस्याओं से हुआ। नार्मन ए, क्राउडर ने 1954 में संयुक्त राज्य अमेरिका में इसका विकास किया। क्राउडर महोदय ने शाखीय अभिक्रम की व्याख्या अधोलिखित ढंग से की है। इसमें छात्र को छोटी-छोटी तर्कबद्ध इकाइयों के जरिये अधिगम सामग्री प्रस्तुत की जाती है। जैसे ही छात्र ऐसी एक इकाई को पढ़कर उसे भली प्रकार हृदयगंम कर लेता है, उसमें इकाई पर आधारित बहविकल्पी प्रश्न पूछ लिये जाते हैं। छात्र सही उत्तर देता है तो उसे अगले पद की ओर अग्रसर होने के लिए कहा जाता है।

यदि छात्र का उत्तर ठीक नहीं है तो उसे उपचारात्मक निर्देश दिये जाते हैं तथा उसे फिर से पहले पद का उत्तर देने के लिए कहा जाता है, यह प्रक्रियां तब तक चलती रहती है जब तक शिक्षार्थी ठीक उत्तर नहीं दे देता। ठीक उत्तर आने पर ही उसे अगले पद की ओर जाने के लिये कहा जाता है।

इस प्रकार कुशाग्र बुद्धि एवं कमजोर दोनों ही प्रकार के छात्रों को अलग-अलग पदों के माध्यम से अन्तिम लक्ष्य (व्यवहार) तक पहुंचने को कहा जाता है।

शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन में कमजोर छात्र की अपेक्षा एक प्रतिभाशाली छात्र अन्तिम व्यवहार तक जल्दी पहुंचता है। अभिक्रम की इस शैली में छात्रों को त्रटियां करने की अपेक्षा उनके निदान पर ज्यादा जोर दिया जाता है।

इस प्रकार के अभिक्रमण को शाखीय अभिक्रमण इसलिये कहा जाता है क्योंकि इसमें सभी छात्र रेखीय अभिक्रमण की भांति एक पद से दूसरे पद तक बढ़ने के लिये एक ही पथ नहीं अपनाते, वरन् वे अपने-अपने उत्तरों पर आधारित अलग-अलग (शाखीय) रास्ते अपनाते हुए अपने अन्तिम पद तक पहुचंते हैं। इसमें समस्त अनुक्रियाओं पर नियन्त्रण छात्रों द्वारा रहता है। अतः इसे आन्तरिक (अभिक्रम) भी कहते हैं।

शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन के तीन व्यवहारिक अधिनियम हैं-

(1) व्याख्यात्मक अधिनियम (Expository Principle)

( 2) निदानात्मक अधिनिमय (Principle of Diagnosis)

(3) उपचारात्मक अधिनियम (Principle of Remediation)

इस आव्यूह में पाठ्यवस्तु को छोटे-छोटे पदों में न रखकर एक इकाई या प्रत्यय के रूप में रखा जाता है, प्रत्येक पद का आकार बड़ा होता है, इस प्रकार की पाठ्यवस्तु मे दो प्रकार के पृष्ठ होते हैं-

(1) गृह पृष्ठ (Home Page)

(2) त्रुटि पृष्ठ (Wrong Page)

(1) गृह पृष्ठ- गृह पृष्ठ पर नवीन प्रत्यय की व्याख्या की जाती है, जिसका कार्य शिक्षण करना है। प्रत्यय की व्याख्या के अन्त में एक बहुनिर्वचन रूप का प्रश्न दिया जाता है। इसमें से छात्रों को सही अनुक्रिया का चयन करना होता है । इसका उद्देश्य परीक्षण करना नहीं अपितु निदान करना होता है।

(2) त्रुटि पृष्ठ (Error Page)- यदि छात्र गलत विकल्प का चयन करता है तब वह त्रटि उसी पृष्ठ पर जायेगा जिसकी संख्या विकल्प के सम्मुख अंकित है। यहां उसे ज्ञात होगा कि उसकी अनुक्रिया गलत है, साथ ही उसे गलती के कारण का बोध होगा। यह पृष्ठ त्रुटि पृष्ठ होगा त्रुटि पृष्ठ पर निर्देश मिलेगा कि आप ग्रह पृष्ठ पर लौट जाइये, सूचना को ध्यानपूर्वक पढ़ें और सही अनुक्रिया का चयन करें। (इस प्रकार त्रुटि पृष्ठ पर सुधारात्मक तथा उपचारात्मक अनुदेशन दिये जाते हैं। इस प्रकार त्रुटि पृष्ठ का प्रमुख कार्य छात्रों की कमजोरियों के सुधार के लिए उपचारात्मक अनुदेशन प्रदान करना है।)

शाखीय अभिक्रम के सिद्धान्त (Principle of Branching Programme)

  1. व्याख्यात्मक अधिनियम (Principle of Exposition)- छात्र के सम्मुख समूचा घटना रूप प्रस्तुत करना चाहिए। इसका अभिप्राय है कि छात्रों के सम्मुख यदि सम्पूर्ण प्रत्यय (Concept) प्रस्तुत किया जाये तो वह बेहतर सीखता है।
  2. निदानात्मक अधिनियम (Principle of Diagnosis)- निदान का सिद्धान्त छात्रों की कमजोरी पहचानने से सम्बन्धित है। विवृति (व्याख्या) के पश्चात् इस बात की जांच की जाती है कि छात्र प्रस्तुत धारणा सीख सकता है या नहीं। यदि वह नहीं सीख सकता है तो उसके क्या कारण हैं, छात्रों की कमाजोरी का निदान करने के लिये बहुचयनात्मक प्रश्नों का निर्माण किया जाता है ।
  3. उपचारात्मक अधिनियम (Principle of Remediation)- निदान उपचार के लिये आधार प्रदान करता है। उपचारात्मक निर्देश ‘त्रुटि पृष्ठ’ पर दिये जाते हैं। यदि छात्र गलत उत्तर चुनता है तो उसे त्रुटि पृष्ठ की और जाना होता है जहा उसे उपचारात्मक अनुदेशन प्रदान किया जाता है और (Home Page) गृह पृष्ठ की ओर वापस आने का निर्देश दिया जाता है। उसे ठीक अनुक्रिया चुनने को कहा जाता है ।

शाखीय प्रोग्राम की अवधारणाएं (Assumptions of Branching Programming)

(1) शिक्षार्थी की आवश्यकतायें (Needs of the Learner)- यदि छात्र की आवश्यकताओं की ओर ध्यान दिया जाये तो वह अच्छी तरह सीखता है।

(2) विषय-वस्तु की सम्पूर्णता (Wholeness of the Learner)- यदि विषय-वस्तु पूर्ण रूप से प्रस्तुत की जाये तो छात्र अच्छी प्रकार से सीखता है।

(3) सार्थक इकाइयां (Meaningful Units)- छात्र के सम्मुख यदि विषय-सामग्री सार्थक इकाइयों में प्रस्तुत की जाये तो उसके लिये अधिगम सुगम हो जाता है।

(4) कार्य का विश्लेषण (Analysis of the Task)- यदि किसी कार्य का विश्लेषण एवं संश्लेषण किया जाये तो छात्र उस कार्य को अच्छी तरह सीखता है।

(5) नई सामग्री (New Material)- यदि छात्र के सम्मुख नई सामग्री प्रस्तुत की जाये तो वह अच्छी प्रकार से सीखता है।

(6) परम्परागत विधियां (Traditional Methods)- यदि छात्र को परम्परागत ट्यूटोरियल विधि (Tutorial method) के अनुरूप सिखाया जाये तो वह अच्छी प्रकार से सीखता है।

(7) उद्दीपन की भूमिका (Role of Stimulus)- अधिगम में अनुक्रिया (Response)की अपेक्षा उद्दीपन की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है।

(৪) गलतियों से कोई बाधा नहीं (No Hindrance by Errors)- यह आवश्यक नहीं कि छात्र की गलतियां उसके अधिगम में बाधक बनें। यदि कोई गलती होती है तो उसे पकड़ा जा सकता है और उसे ठीक करने के पश्चात् छात्र को आगे बढ़ाया जाता है।

(9) उपचारात्मकता (Remediation)- यदि छात्र की गलतियों एवं कठिनाइयों का साथ-साथ उपचार किया जाये तो छात्र अच्छी प्रकार से सीखता है।

(10) बहुचयनात्मक मदें (Multiple Choice Items)- अधिगम प्रक्रिया में एक अकेली ठूंसी गई अनुक्रिया की अपेक्षा बहुचयनात्मक मदें अधिक सहायक होती है।

(11) पर्याप्त स्वतन्त्रता (Sufficient Freedom)- यदि छात्र को अपनी आवश्यकताओं के अनुकूल शिक्षण को ढालने में पर्याप्त स्वतन्त्रता दी जाये तो वह अच्छी प्रकार से सीख सकता है।

(12) विभेदीकरण (Discrimination)- एक शाखा के प्रस्तुतीकरण से अधिगम-प्रक्रिया में विभेदीकरण प्राकृतिक रूप से ही हो जाता है।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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