शिक्षक शिक्षण / Teacher Education

11 शिक्षण सूत्र | शिक्षण के सूत्र | शिक्षण सूत्र का अर्थ | Maxim’s of Teaching in Hindi

11 शिक्षण सूत्र | Maxim's of Teaching in Hindi
11 शिक्षण सूत्र | Maxim’s of Teaching in Hindi

11 शिक्षण सूत्र,  शिक्षण के सूत्र, शिक्षण सूत्र का अर्थ, Maxim’s of Teaching in Hindi

अध्यापक द्वारा पाठ्यवस्तु को कक्षा में पेश करने का तरीका शिक्षण की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका का निवहन करता है। अतः शिक्षक को चाहिए कि वह पाठ्य सामग्री को कक्षा में इस प्रकार से प्रस्तुत करे कि छात्र सुगमता के साथ इस सामग्री को ग्रहण कर सकें और याद रख सके। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ ऐसे शिक्षण सूत्रों की खोज की गयी है जिनसे शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया में गति आती है और वे आगे की ओर बढ़ते हैं। प्रमुख शिक्षण सूत्र निम्न हैं-

शिक्षण के सूत्र

  1. सुगम से कठिन की ओर (From Simple to Complex)

इस सूत्र का मुख्य आधार पाठ्य सामाग्री का प्रस्तुतीकरण सरल से कठिन की ओर करना है अर्थात शिक्षक को चाहिए कि पाठ्य विषय से सम्बन्धित सामग्री के सरल तथ्यों को वह पहले छात्रों के सम्मुख प्रस्तुत करें और फिर शनैः-शनैः कठिन और पेचीदा पाठ्यवस्तु की ओर बढ़े। यह एक  मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है कि सरल बातें हमें जल्दी समझ में आती हैं और याद हो जाती हैं। कठिन बातें भी इन्हीं सरल बारतों पर आधारित होती है। जब हम सरल बाता को पहल समझ चुके होते हैं तो कठिन बातों को समझना छात्रों के लिए आसान हा जाता है। शिक्षण की प्रक्रिया में शिक्षण का यह सूत्र बहुत उपयोगी एवं प्रभावशाली है। इस सूत्र का अपनाकर छात्रां को कठिन से कठिन विषयों को समझाया जा सकता है। उदाहरण के लिए यादि हम बच्चा का भारत का इतिहास पढ़ाना है तो हमें इस इतिहास को छोटी-छोटी ऐतिहासिक घटनाओं के रूप में पढाना प्रारम्भ करना चाहिए और धीरे-धीरे विभिन्न राजाओं के शासन प्रबन्ध और महत्वपूर्ण घटनाओं को बताना चाहिए। ऐसा करने से इतिहास का अध्ययन अधिक रोचक व सरल हो जाएगा और छात्र इसे सरलता से याद कर पायेंगे।

  1. ज्ञात से अज्ञात की ओर (From Known to Unknown)

छात्रों के पूर्व ज्ञान पर नये ज्ञान को आधारित करना ज्ञात से अज्ञात की और बढ़ना है। इस सूत्र के अनुसार शिक्षक को छात्रों को पहले वह बातें बतानी चाहिए जिससे कि छात्र परिचित हैं। फिर शनैः- शनैः इन परिचित बातों से सम्बन्धित अपरिचित या अज्ञात बातें इन परिचित बातों के साथ जोड़कर छात्रों को बतानी चाहिए। टी. रेमान्ट का मानना है कि – “धीरे-धीरे एक के पश्चात् दूसरा पग इस प्रकार बढ़ाना चाहिए कि-नवीन ज्ञान पूर्ववर्ती ज्ञान से अनायास ही परिचित हो जाए और व्यवस्थित होकर समुचित ज्ञान बनता चला जाए। किसी बात में रुचि तथा ध्यान तभी सम्भव है जब उसमें जानकारी तथा नवीनता दोनों ही तत्व विद्यमान हों।%” यदि शिक्षक छात्रों के पूर्व ज्ञान को उनकी चेतना में लाकर उसका सम्बन्ध नवीन ज्ञान से कराएगा तो निश्चित ही शिक्षण बहुत प्रभावशाली बन जाएगा।

  1. मूर्त से अमूर्त की ओर (From Concrete to Abstract)

हरबर्ट स्पन्सर का कहना है कि “हमारे पाठ का प्रारम्भ स्थूल बातों से होना चाहिए और अन्त सूक्ष्म बातों से।” पेस्टॉल्जी का भी यही मानना है कि “ऐसी वस्तुओं के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए जो बालकों के सम्पर्क में आती हों जिनका बालकों की रुचि, भावना और विचारों के साथ तत्कालिक सम्बन्ध हों।” शिक्षण के इस सूत्र के अनुसार शिक्षक को पहले ऐसी बातों का ज्ञान छात्रों को कराना चाहिए जो मूर्त हों और फिर शर्नै:- शनैः अमूर्त की ओर बढ़ना चाहिए। यहां यह उल्लेखनीय है कि शिक्षक को मूर्त बातों पर ही नहीं रुके रहना चाहिए बल्क मूर्त बातों का परिचय देते हुए उसे शनैः-शनैः अमूर्त तथ्यों की ओर बढ़ते रहना चाहिए। ऐसा करने से छात्र मूर्त बातों के साथ-साथ अमूर्त बातों को भी आसानी से आत्मसात कर सकेंगे। उदाहरण के लिए यदि बालक को घटाने की विधि को समझना है तो उसे कुछ वस्तुए देकर उनमें से कुछ वापस ले लेनी चाहिए। ऐसा करने से वापस ले लेने के बाद चीजों की घटी हुई संख्या उसे घटाने की प्रक्रिया का बाध कराएगी और वह घटाने की विधि को सरलता से समझ पायेगा।

  1. सम्पूर्ण से खंड की ओर (From Whole to part)

शिक्षण के इस सूत्र के अनुसार शिक्षक को पूर्ण से अंश की ओर बढ़ना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि बालक को गुलाब के फूल का ज्ञान कराना है तो उसे पहले गुलाब का पूरा पौधा दिखाया जाना चाहिए और फिर धीरे-धीरे पौधे के विभिन्न अंगों का ज्ञान कराकर गुलाब के फूल के बारे में जानकारी देनी चाहिए। इसी प्रकार यदि बालकों को अक्षरों का ज्ञान कराना है तो पहले उन्हें सम्पूर्ण वाक्य का ज्ञान कराया जाना चाहिए और फिर अक्षरों का।

  1. विशेष से सामान्य की ओर (From Particular to General)

शिक्षक को चाहिए कि वह छात्रों को विशिष्ट ज्ञान से सामान्य ‘ज्ञान की ओर ले जाए। बालको को अनेक उदाहरणों की सहायता से एक सामान्य सिद्धान्त से परिचित कराया जाना चाहिए क्योंकि बालक के स्वयं करके सीखते है उनके मस्तिष्क पटल पर स्थायी रहता है।

  1. प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर (From seen to unseen)

अध्यापक को चाहिए कि वह अपने शिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को सर्वप्रथम उन वस्तुओं का ज्ञान कराए जिनसे बालक का प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। उसके बाद ही जिनका उससे अप्रत्यक्ष सम्बन्ध है, उनका ज्ञान कराना चाहिए। छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों का यह मत है कि ये विद्यार्थी ज्ञान के स्तर (Perceptual Level) पर ही कार्य करते हैं। अतः बालकों को सर्वप्रथम वर्तमान का ज्ञान प्रदान किया जाए उसके बाद ही भूत एवं भविष्य काल का दिया जाए। अर्थात् शिक्षक को चाहिए कि वह बालको को ऐसे उदाहरण दें जिनसे बालक का प्रत्यक्ष सम्बन्ध हो और उन्हीं वस्तुओं से सम्बन्धित शिक्षण सहायक सामग्री का प्रयोग करें ताकि अप्रत्यक्ष ज्ञान भी बालक आसानी से प्राप्त कर लें। इससे प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष का ज्ञान सरलता से प्राप्त हो जाएगा।

  1. अनुभूति से युक्ति – युक्त की ओर (From empirical to rational)

बालक प्रारम्भ में अपने अनुभवों के आधार पर सीखता है। बालक में सीखने की प्रबल जिज्ञासा होती है लेकिन अपने अपरिपक्व अनुभवों के आधार पर वह बहुत से तथ्यों एवं घटनाओं को वास्तविक रूप से समझने में असफल रहता है। वह जो ज्ञान प्राप्त करता है वह तर्क पर आधारित नहीं होता है। अतः शिक्षक उसके अनुभवों से प्राप्त ज्ञान को तर्क संगत बनाकर स्थायी कर सकता है। जैसे बालक रोजाना सूरज को पूरब से निकलते देखता है और पश्चिम में छिपते हुए लेकिन वह तर्क के आधार पर सिद्ध कर सकता है। इस प्रकार उसका अनुभव अथवा कार्य प्रणाली को समझ लेगा तो वह इसे सिद्ध कर सकता है। इस प्रकार का अनुभव अथवा ज्ञान युक्ति-युक्त हो जाता है। अतः प्राप्त ज्ञान अथवा अर्जित अनुभवों को तर्क युक्त बनाना अति आवश्यक है।

  1. विश्लेषण से संश्लेषण की ओर (From analysis to synthesis)

इस शिक्षण सूत्र का शिक्षण में महत्वपूर्ण योगदान है। इसके अनुसार सर्वप्रथम विभिन्न तथ्यों का विश्लेषण किया जाता है और उसके बाद ही उनका संश्लेषण किया जाता है। अर्थात् किसी भी शिक्षण विषय की सम्पूर्ण विषय सामग्री को पहले समग्र रूप में अध्ययन करते हैं उसके बाद ही उसे खण्डों में अथवा उपभागों में विभाजित करके प्रत्येक खण्ड अथवा उपभाग का अलग-अलग अध्ययन करते हैं। अन्त में इन खण्डों अथवा उपभागों को सह-सम्बन्धित करके विषय सामग्री का समग्र रूप में अध्ययन करते हैं। इस प्रकार विश्लेषण छात्रों को किसी विषय सामग्री का ज्ञान प्राप्त करने में सहायता देता है और सश्लेषण उस ज्ञान को सुनिश्चित करता है। जैसे- भूगाल, रेखागणित, विज्ञान, व्याकरण आदि। इन सभी का विश्लेषण आवश्यक है। समस्या का विश्लषण करते समय नवीन समस्याओं के उत्पन्न हो जाने पर उनका समाधान संश्लेषण द्वारा चाहिए। ये एक-दूसरे के पूरक होते हैं। अर्थात् न केवल विश्लेषण से ही काम चल सकता है और न केंवल संश्लेषण से। ये दोनों ही आवश्यक हैं। अतः यह संश्लेषण एवं विश्लेषण की एक उत्तम विधि हे।

  1. अनिश्चित से निश्चित की ओर (From Indefinite to Definite)

इस सूत्र के अनुसार बालकों को पहले अनिश्चित का ज्ञान कराया जाना चाहिए और फिर शनैः-शनैः निश्चित। ज्ञान की ओर बढ़ना चाहिए। बालको का प्रारंम्भिक ज्ञान अनिश्चित तथा अस्पष्ट होता है। अध्यापक को बालको के इस अनिश्चित ज्ञान को स्पष्ट अथवा निश्चित करना चाहिए। यही अनिश्चिततता की ओर से निश्चितता की ओर ले जाने का शिक्षण सिद्धान्त है।

  1. वर्तमान से भविष्य की ओर (From Present to Future)

बालकों का पहले वर्तमान क़ा ज्ञान कराया जाना चाहिए और वर्तमान के तथ्यों, परिस्थितियों तथा वस्तुओं से परिचित करा लेने के बाद ही उसे भविष्य की बातों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि वर्तमान या प्रत्यक्ष की वस्तुओं को बालक जल्दी ही सीख जाते हैं। इन प्रत्यक्ष या वर्तमान की बातों के साथ जब भविष्य की घटनाओं को जोड़कर समझाया या बताया जाता है तो छात्र इसे शीघ्रता से ग्रहण कर लेते हैं।

  1. प्रकृति के अनुसार करो (Follow the Nature)

शिक्षण का अन्तिम और महत्वपूर्ण सूत्र बालक को उसकी प्रकृति के अनुसार ही शिक्षित करना है । शिक्षक को चाहिए कि वह बालकों के मानसिक स्तर का गम्भीरता से अध्ययन करें और उसी के अनुरूप बालको का शिक्षित करने का प्रयास करें। टी, रेमान्ट ने इस सूत्र के अर्थ को समझाते हुए कहा है, “इस सूत्र का अभिप्राय यह है कि हमको अपने साधनों को बालकों के शारीरिक तथा मानसिक विकास के अनुकूल बनाना चाहिए।” शिक्षक को चाहिए कि वह अपने शिक्षण के दौरान किन्हीं कृत्रिम परिस्थितियों एवं वातावरण को अपने शिक्षण में सम्मिलित न होने दें और वास्तविक परिस्थितियाँ के आधार पर ही छात्रों को शिक्षित करने का प्रयास करें।

शिक्षण के इन सभी महत्वपूर्ण, मुख्य व उपयोगी सूत्रों को अपना कर शिक्षक शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावशाली बना सकते हैं और शिक्षण उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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