समाज शास्‍त्र / Sociology

विक्षरण | प्रसारवाद | प्रसारवादी सिद्धान्त | प्रसारवाद के प्रमुख सम्प्रदाय

विक्षरण | प्रसारवाद | प्रसारवादी सिद्धान्त | प्रसारवाद के प्रमुख सम्प्रदाय

विक्षरण

अथवा

प्रसारवाद क्या है?

प्रसारवाद- मानवशास का वह सिद्धान्त जिसके अनुसार यह माना जाता है कि संस्कृति का विकास एवं वृद्धि, सांस्कृतिक तत्वों के एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में फैलने के द्वारा होती है, प्रसारवाद कहलाता है। इस सिद्धान्त का उद्भव अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में मूलतः उद्विकास की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप हुआ। प्रसारवादी मानते हैं कि विभिन्न संस्कृतियों में समान तत्वों की विद्यमानता का कारण स्वतन्त्र रूप से आविष्कार न होकर प्रसार है। पारस्परिक लेन-देन के कारण रीति-रिवाजों, प्रथाओं, धर्म, कला तथा भौतिक वस्तुओं आदि का एक समाज से दूसरे समाज में प्रसार होता है। अतः एक स्थान पर आविष्कृत सांस्कृतिक एवं सामाजिक तत्व जब दूसरे स्थान पर फैलते हैं, तो इसे प्रसारवाद के नाम से जाना जाता है।

प्रसारवाद के दो प्रमुख रूप उभर कर आये हैं- प्रथम, जर्मन प्रसारवाद जिसके समर्थक विद्वान ग्रेबनर, एंकरमेन तथा स्मिथ आदि रहे हैं। ये विद्यान यह मानते हैं कि संस्कृति-संकुल विभिन्न कालों में संससार के विभिन्न भागों में विकसित होकर बाद में अन्य भागों में प्रसारित होते रहे हैं। इसके विपरीत द्वितीय सिद्धान्त के प्रतिपादक यह मानते है कि संस्कृति का उद्भव किसी एक स्थान से हुआ है और बाद में प्रसार द्वारा उसका फैलाव हुआ अपने इस विचार की पुष्टि में मानवशास्त्रियों ने माया संस्कृति के मन्दिरों और मिश्र के पिरामिडों में पाई गई समानता को उदाहरण के रूप में पेश किया है। इस विचार के प्रतिपादक अंग्रेज विद्वान् इलियट तथा पैरी यह मानते हैं कि मिस्र से ही संस्कृति का विश्वव्यापी प्रसार हुआ है। उनके अनुसार संसार के समस्त संस्कृतियों के आवश्यक लक्षण केवल मिस्र की नील नदी की घाटी से ही प्रसारित हुए है।

रॉबर्ट लॉबी जैसे प्रसारवादियों ने संस्कृतियों को उधार लिये गये लक्षणों को चम्पाकारी कहा है जिसमें उत्कृष्ठ लक्षण, केन्द्र से बाहर चले जाते हैं।

प्रसारवादी सिद्धान्त | प्रसारवाद के प्रमुख सम्प्रदाय

अथवा

विसरण वाद

प्रसारवाद से तात्पर्य विस्तारवादी विचारधारा से है। वस्तुतः प्रसारवाद एक ऐसा सिद्धान्त है जिसमें एक सांस्कृतिक समूह दूसरे सांस्कृतिक समूह में सांस्कृतिक तत्वों या संकुल आदान-प्रदान कर विस्तार या फैलाव करता है। यहीसांस्कृतिक फैलाव या विस्तार ‘प्रसार’ कहलाता है, जबकि इस विचारधारा को प्रसारवाद कहा जाता है। प्रसारवादी सिद्धान्त को एक अर्थ में उद्विकासीय सिद्धान्त की प्रतिक्रिया के रूप में भी व्याख्यायित किया जाता है। उद्विकासीय सिद्धान्त को मानने वाले विद्वान इस बात पर जोर देते हैं कि शरीर के विकास की भाँति सांस्कृतिक विकास भी स्वयं तथा कुछ आन्तरिक कारकों के कारण होता है। अर्थात् इन विद्वानों का मानना है कि सांस्कृति विकास में बाह्य कारकों का कोई हाथ नहीं होता है। परन्तु कुछ विद्वान इस विचार से सहमत नहीं है। क्योंकि अलग-अलग समाजों की संस्कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन से यह बात ज्ञात होती है कि अनेक सांस्कृतिक तत्वों का आदान-प्रदान विभिन्न सांस्कृतिक समूहों में हुआ है। प्राप्त तथ्यों के आधार पर उद्विकासीय सिद्धान्त को कई विद्वानों ने इसीलिये स्वीकार नहीं किया है। इन विद्वानों का मानना है कि साधारण निरीक्षण से भी यह ज्ञात हो जाता है कि सांस्कृतिक तत्व और सांस्कृतिक संकुल भी यातायात तथा संचार के साधनों के माध्यम से तथा लोगों के एक देश से दूसरे देश को आने-जाने से एक समूह से दूसरे समूह को गतिशील रहते हैं। यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान या सांस्कृतिक विस्तार, विशेषकर उन सांस्कृतिक समूहों में अधिक हाता है जो एक दूसरे के अधिक नजदीक होते हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि संस्कृति सीखी जाती है, इस कारण यह सीखने की प्रक्रिया उनके लिये आसान हो जाती है, जो एक दूसरे के के निकट सम्पर्क रहते हैं। निकट सम्पर्क में रहने क काण वे एक-दूसरे के वस्त्र, बर्तन, मकान, भाषा, आचार तथा प्रथाओं को देखकर और सुनकर सीखते रहते हैं। इसी प्रकार सांस्कृतिक तत्व या संकुल एक देश या एक सांस्कृतिक समुदाय से दूसरे सांस्कृतिक समुदाय में जाकरअसने वाले लोगों की साथ-साथ प्रसारित हो सकता है तथा होता भी है। जैसे- भारत के देश-विभाजन के बाद भारत में पाकिस्तान से आ बसने वाले शरणार्थी अपने साथ वहाँ के सांस्कृतिक तत्वों को भी यहाँ ले आये, जो बाद में यहाँ के लोगों में फैल गया। इसी प्रकार भारत में पाश्चात्य संस्कृति का प्रसार तब हुआ जब इंग्लैण्ड के निवासियों ने यहाँ आकर शासन की बागडोर सम्भाली। इस प्रकार स्पष्ट है कि एक सांस्कृतिक समूह से दूसरे सांस्कृतिक समूह में सांस्कृतिक तत्वों के विस्तार को ही ‘प्रसार’ कहा जाता है।

अब यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि ‘प्रसार’ क्यों होता है? यहाँ इस प्रश्न के दो उत्तर दिये जा सकते हैं –(1) संस्कृति को सीखा जाता है तथा सीखा जा भी सकता है। अतएव देखकर, सुनकर, जानबूझकर, अनुकरण करके दूसरों की संस्कृति को अपना लेने से संस्कृति का ‘प्रसार’ होता हैं (2) स्वयं कोई वसतु आविष्कार करने की अपेक्षा दूसरों से नई चीजें ग्रहण करना आसान जान पड़ता है। यही कारण है कि अनेक सांस्कृतिक तत्व पूरी पृथ्वी पर विस्तुत हो जाते हैं, यद्यपि इस प्रकार से विस्तार होने में अधिक, समय अवश्य लग जाता है। क्रोवर महोदय के अनुसार, “तम्बाकू का प्रयोग सबसे पहले मध्य अमेरिका में आरम्भ हुआ तथा वहाँ से बड़ी तेजी से दूसरे स्थानों में प्रसारित होने लगा परन्तु एस्किमों प्रदेश तक फिर भी पहुँच न सका।पुनः जैसे ही स्पेन के लोगों ने अपनाया वैसे ही यह प्रथा फिर नयी गति से पूर्व दिशा के देशों में प्रसारित होने लगी और दुनिया का चक्कर लगाते हुए प्रदेशों में विस्तृत हो गयी जहाँ इसके पूर्व धूम्रपान नहीं किया जाता है। इस प्रकार एस्किमों प्रदेश में भी धूम्रपान प्रसारित हुआ।

प्रसारवाद के प्रमुख सम्प्रदाय

(Main School of Diffusionism)

प्रसारवाद के मुख्यतः तीन सम्प्रदाय हैं-

(i) ब्रिटिश प्रसारवादी सम्प्रदाय या पान इजिप्शियन (Pan-Egyptian), सम्प्रदाय,

(ii) जर्मनआस्ट्रियन संस्कृति-ऐतिहासिक सम्प्रदाय (German-Austrian Culture Historical School) तथा

(iii) अमेरिकन सम्प्रदाय (American School)

(iv) ब्रिटिश प्रसारवादी समप्रदाय या पॉन इजिप्शियन (Pan-Egyptian) सम्प्रदाय- इलियट स्मिथ एवं पैरी इस सम्प्रदाय के सर्वप्रमुख हैं। इलियट स्मिथ एक शरीर-रचना विशेषज्ञ (Anatomist) थे तथा काफी समय तक मिश्र में रहकर अपने शोधकार्य सम्पन्न किये। स्मिथ मिश्र की प्राचीन संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित थे तथा मिश्र की संस्कृति के विविध पक्षों का अध्ययन करके इस निष्कर्ष पर पहुँचें कि संसार में सबसे पहले संस्कृति का उद्भव मिश्र में ही हुआ तथा वही से उसके तत्व विश्व के अन्य देशों में फैला। स्मिथ महोदय का यह विश्वास था कि केवल भूमध्य सागरीय देशों में अफ्रीका, भारत आदि की संस्कृतियों का ही नहीं अपितु इण्डोनेशिया, पापीनेशिया तथा अमेरिका की संस्कृतियों का भी आदि स्रोत मिस्र की संस्कृति ही हैं स्मिथ महोदय के इस विचार का समर्थन श्री पैरी ने भी किया। पैरी महोदय ने अपने विचारों का विस्तृत वर्णन अपनी पुस्तक ‘The Children of the Sun’ में किया है। ब्रिटिश प्रसारवादी सम्प्रदाय या पॉन इजिप्शियन सम्प्रदाय का मानना है कि प्रसार ही एक मात्र साधन है जिसमें सांस्कृतिक परिवर्तन सम्भव हो सकता हैं तात्पर्य यह है कि मनुष्य का मस्तिष्क स्वभाव से ही अविष्कार हेतु उपयुक्त नहीं है, आविष्कार तो तभी सम्भव होता है जब उसे अनुकूल परिस्थितियों या पर्यावरण से प्रेरक शक्ति प्राप्त होती है। इनके अनुसार इस तरह की अनुकूल परिस्थितियाँ प्राचीन मिस्र में ही एकमात्र पायी जाती थी। इसीलिये सूर्य पुत्र मिश्रवासी ही समस्त उच्च संस्कृति के जनक है। मिस्र को ही संस्कृति और सभ्यता का आदि स्रोत मानने के कारण ही यह सम्प्रदाय पॉन इजिप्शियन सम्प्रदाय (Pan Egyptian School) भी कहलाता है।

इस प्रकार उपरोक्त के आधार, पर निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि इस सम्प्रदाय की मान्यताओं में बातों को बिना किसी प्रमाण के अत्याधिक बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया है। कोई वैज्ञानिक भी इस बात या मायन्ता को नहीं स्वीकार कर सकता कि मिस्र की संस्कृति ही आदि संस्कृति है तथा अन्य सभी संस्कृतियों का उद्भव उसी से हुआ है। यहाँ सम्भव है कि विविध देशों के सांस्कृतिक तत्व एक समान परन्तु इन समानताओं से यह कदापि नहीं सिद्ध होता है कि सबका मूल स्रोत भी एक ही होगा। ऐसा दिखाई भी पड़ता है तथा इसके प्रमाण भी मिलते हैं कि बिल्कुल ही अलग-अलग कारणों से तथा भिन्न देशों में एक ही प्रकार का सामाजिक आविष्कार हुआ है। जैसे एशिया तथा फ्रांस दोनों ही देशों में बन्दूक का आविष्कार स्वतंत्र रूप में हुआ था। इस प्रकार ब्रिटिश प्रसारवादी सम्प्रदाय के विचारों से सहमत होना असम्भव है।

(ii) जर्मन प्रसारवादी या संस्कृति-ऐतिहासिक सम्प्रदाय (Culture Historische School)  इस सम्प्रदाय के प्रमुख प्रवर्तक एफ, गैबनर (E.Grapher) एवं ई. फॉय (E. Foy) आदि विद्वान थे। इन विद्वानों के सिद्धान्त प्रसारवादी होने के साथ उद्विकासीय सिद्धान्त को स्पर्श किये हुए हैं। इस सम्प्रदाय के विद्वानों की मान्यता है कि -“विकासवादियों का यह निष्कर्ष ठीक हे कि अलग-अलग स्थानों में स्वतंत्र रूप से विधि संस्कृति-संकुल उत्पत्र हुए, परन्तु इसके साथ ही यह भी मानना पड़ेगा कि उन संस्कृति-संकुलों का बाद में वहाँ दुनिया के अन्य भागों में प्रसार भी हुआ। अतः ब्रिटिश प्रसारवादी एवं जर्मन-प्रसारवादी सम्प्रदाय में एक मुख्य अन्तर यह है कि ब्रिटिश प्रसारवादी लेखकों के अनुसार संस्कृति का विकास या प्रसार एक ही स्थान मिस्र से दुनिया के अन्य स्थानों में हुआ जबकि जर्मन प्रसारवादी लेखकों के मतानुसार संस्कृति का विकास एवं विस्तार किसी एक स्थान विशेष से नहीं बल्कि विभिन्न स्थानों से हुआ। एक ही स्थान पर प्रत्येक वस्तु का आविष्कार असम्भव है, विभिन्न वस्तुओं का आविष्कार तो विभिन्न स्थानों एवं विभिन्न समयों में होता है और हुआ भी है फिर उन विभिन्न स्थानों से वे आविष्कार या संस्कृति- संकुल संसार के विभिन्न स्थानों या समाजों में फैल गये।

सम्प्रदाय भी कहा जाता है। परन्तु इसका आशय यह नहीं है कि सांस्कृतिक तत्वों या संकुल का प्रसार एक निश्चित घेरे (चक्र) या प्रदेश में ही होता हैं अपितु इनके प्रसार की कोई निश्चित सीमा नहीं होती है, इतना अवश्य है कि ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि एक संस्कृति की किसी इकाई का स्थान विशेष में प्रसार हुआ था।यहाँ प्रदेश, चक्र या घेरा शब्द को इसी संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है।

ग्रैबनर (Grabner) महोदय ने सांस्कृति प्रसार के अध्ययन के दो स्पष्ट आधार निश्चित किये हैं-(अ) स्वरूप (Form) (ब) परिणाम (Quantity)।

ग्रैबनर महोदय के अनुसार, यदि इमें दो समूहों की संस्कृतियों में समानतायें दिखलाई पड़े तो उन्हीं समानताओं के आधार पर ही प्रसार का निर्णय कर लेना उचित होगा। समानताओं की विवेचना में दो बातों को ध्यान में रखना होगा। प्रथम तो स्वरूप की समानता और द्वितीय परिणाम की समानता। इन दोनों बातों में दो संस्कृतियों में जितनी अधिक समानता हो, प्रसार की सम्भावना भी उसी अनुपात में अधिक होती है।

इस सिद्धान्त का कमजोर पक्ष यह है कि इससे हमें अधिक से अधिक यह ज्ञात होता है कि प्रसार क्या है? सांस्कृतिक प्रसार क्यों होता है? इस प्रश्न का उत्तर हमें कहीं भी नहीं मिलता है। ऐसा लगता है जैसे सांस्कृतिक प्रसार के कारणों का विश्लेषण, इसके क्षेत्र (Scope) से पूर्णतया बाहर है। अतः सांस्कृतिक विकास या परिवर्तन को समझने में यह सिद्धान्त पूरी तरह से सफल नहीं हो सका।

(iii) अमेरिकन प्रसारवादी (American Diffusinist)- इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक फ्रांज बोआस थे। फ्रांज बोआस ने सर्वप्रथम संस्कृति-ऐतिहासिक सम्प्रदाय की कमियों को दूर करने का प्रयास किया तथा इस प्रश्न का उत्तर प्रस्तुत किया कि सांस्कृतिक प्रसार क्यों होता है? साथ ही साथ, इसकी विवेचना भी इन सम्प्रदाय के विद्वान करते हैं। इन विद्वानों ने समस्त संसार के सांस्कृतिक प्रसार के विवेचना एक साथ करने की बजाय यह उचित समझा कि संसार को विभिन्न सांस्कृतिक क्षेत्रों में विभक्त कर लिया जाये तथा तब तक एक-एक सांस्कृतिक क्षेत्र के उन सांस्कृतिक तत्वों का विश्लेषण किया जाय जो उस क्षेत्र में प्रसार के द्वारा आये हैं, और अन्त में इन प्रसार के कारणों को खोजा जाये। इन कारणों को खोजने में, श्री फ्रांज बोआस के अनुसार मानव के मनौवैज्ञानिक आधारों की अवहेलना हमें नहीं करनी चाहिय। बोआस के मत का समर्थन क्लार्क विसलर महोदय ने भी किया है। क्लार्क विसलर महोदय ने इस बात पर जोर दिया है कि प्रसार के समय सांस्कृतिक तत्वों या संकुलों के मूल रूप में अनेकों परिवर्तन भी होते हैं। विशेष रूप से यदि सांस्कृतिक तत्व अभौतिक है तब तो ऐसे तत्व बिना परिवर्तित हुए अधिक दूर तक फैल नहीं सकते है। श्री बिसलर महोदय ने सांस्कृतिक तत्वों के प्रसार में बाधाओं का उल्लेख भी किया है, जैसे-घने जंगल, पहाड़, रेगिस्तान, महासमुद्र आदि।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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