अर्थशास्त्र / Economics

आर्थिक नियोजन क्या है | आर्थिक नियोजन की विशेषताएँ | भारत में आर्थिक नियोजन के लाभ

आर्थिक नियोजन क्या है | आर्थिक नियोजन की विशेषताएँ | भारत में आर्थिक नियोजन के लाभ

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आर्थिक नियोजन क्या है

आर्थिक नियोजन योजनाबद्ध ढंग से किया गया आर्थिक विकास समझा जाता है, जिसे एक निश्चित समय विशेष में पूरा किया जाता है।

डॉ0 डॉल्टन (Dr. Dalton)- “विशाल अर्थ में आर्थिक नियोजन समस्त साधनों के संरक्षण द्वारा निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति हेतु आर्थिक क्रियाओं का सचेष्ट निर्देशन है।”

आर्थिक-नियोजन की विशेषताएँ

उद्देश्यों एवं प्राथमिकताओं का निधधारण (Fixation of Objects and Priorities)-

आर्थिक नियोजन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें राष्ट्र के आर्थिक विकास को कौन दिशा प्रदान की जाये, जिससे देश की विषम समस्याओं का निराकरण हो सके। इस दृष्टि से उद्देश्यों एवं प्राथमिकताओं का निर्धारण किया जाता है। अतः आर्थिक नियोजन की मुख्य विशेषता यह है कि कौन-कौन से उद्देश्य निश्चित किये जायें ताकि देश विकास से जुड़ सके।

निश्चित समय (Fixed Time) –

आर्थिक-नियोजन की दूसरी विशेषता यह है कि आर्थिक-नियोजन का कार्यक्रम एक निश्चित अवधि के लिए बनाया जाता है। इस अवधि में कार्यक्रमों के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कार्य संपन्न किया जाता है। प्रायः आर्थिक-नियोजन का कार्यक्रम “पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से पूरा किया जाता है। भारत में प्रत्येक योजना “पाँच वर्ष” के लिए बनाई जा रही है।

प्राकृतिक साधनों का विदोहन (Utilisation of Natural Resources) –

आर्थिक-नियोजन के माध्यम से प्राकृतिक साधनों का योजनाबद्ध ढंग से पूर्ण विदोहन करते हैं। लेकिन समाजवादी व्यवस्था में जहाँ आर्थिक -नियोजन अनिवार्य है, वहाँ प्राकृतिक साधनों का प्रयोग विवेक एवं क्षमता के अनुसार किया जाता है।

संगठित प्रणाली (Organised System) –

आर्थिक-नियोजन समाजवादी व्यवस्था का स्वरूप है, जिसमें संगठित प्रणाली का प्रयोग किया जाता है। अंतः सार्वजनिक उपक्रमों का विकास होता है। जबकि पँजीवादी व्यवस्था जिसमें निजी उपक्रमों की प्रधानता होती है, ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था भी उपलब्ध रहती है। अतः निजी क्षेत्र में रुचि रखने वाले उद्यमी हतोत्साहित नहीं होते हैं।

राज्यीय हस्तक्षेप (State Interference)-

आर्थिक-नियोजन की एक विशेषता यह है कि इसमें राज्य का हस्तक्षेप रहता है, अतः निजी क्षेत्र के उद्योगों का संचालन पूर्णरूपेण स्वतंत्र नहीं रहता है, क्योंकि सरकार (राज्य) के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होता है। यदि कोई उद्योग अथवा संस्था राज्य के निर्दशों का पालन नहीं करती है, तो सरकार ऐसी संस्थाओं या उद्योगों का अधिग्रहण भी करती है।

एकाधिकारी शक्तियों पर अंकुश (Control On Monopolist Powers) –

आर्थिक-नियोजन द्वारा एकाधिकार शक्तियों पर नियंत्रण रखा जाता है, क्योंकि एकाधिकारी शक्तियाँ बड़े उद्योग स्थापित करके जब बाजार को अपने नियंत्रण में ले लेती हैं, तो सरकार उनके मुकाबले में समान आकार के उद्योग स्थापित करके उनके एकाधिकारी अस्तित्व को समाप्त कर देती है। इसी प्रकार सरकार ऐसी शक्तियों के नियंत्रण हेतु कुछ नियम एवं कानून भी बनाती है।

सरकार का कार्यक्रम (Programme of the Government)-

आर्थिक नियोजन सरकार का एक ऐसा कार्यक्रम है, जिसमें सरकारी नीति का निर्माण होता है। अतः आर्थिक नियोजन की यह विशेषता है कि सरकारी नीति के आधार पर ही विकास कार्यक्रम अपनाया जाता है।

आर्थिक नियोजन से सामाजिक उत्थान (Social Uplift by Economic Planning)-

आर्थिक नियोजन की प्रमुख विशेषता सामाजिक उत्थान है। अतः प्राथमिकता के आधार पर कार्यक्रम निश्चित करने से अधिकतम सामाजिक लाभ होता है। इससे समाज की शिक्षा, जीवन के स्तर एवं सुख सुविधाओं में वृद्धि होती है, क्योंकि समाज की आय में वृद्धि से गरीबी एवं बेकारी का ही उन्मूलन नहीं होता है बल्कि सामाजिक बुराइयों का भी अन्त होता है।

भारत में आर्थिक नियोजन के लाभ/महत्व

साधनों का सर्वोत्तम प्रयोग (Best Use of Resources) –

आर्थिक नियोजन से साधनों का सर्वोत्तम उपयोग सम्भव है, क्योंकि साधनों के रूप में एक ओर प्राकृतिक संसाधन व दूसरी ओर मानवीय संसाधन जो किसी भी देश में उपलब्ध होते हैं, उनका जनहित में पुर्ण उपयोग होता है। भारत प्राकृतिक सम्पदा का एक धनी राष्ट्र है। इसके संसाधनों का उचित विदोहन आर्थिक नियोजन द्वारा ही सम्भव हो रहा है, यह एक सन्तोष की बात है। इसी प्रकार पूँजी एवं श्रम आदि साधनों का निरन्तर उपयोग बढ़ रहा है।

उत्पादन में वृद्धि (Increase in Production)-

आर्थिक नियोजन से उत्पादन में वृद्धि होती है, क्योंकि देश के सभी उत्पादन क्षेत्र योजनाबद्ध रूप से उत्पादकता में वद्धि के मापदण्ड अपनाते हैं। इस प्रकार देश में केवल उद्योगों का उत्पादन ही नहीं बढ़ता है, बल्कि कृषि व खनन क्षेत्र का उत्पादन भी बढ़ने लगता है।

आर्थिक समानता (Economic Equality)-

आर्थिक विषमता किसी देश का ऐसा रोग है, जिससे देशवासियों की क्षमताओं का ह्रास होता है। अतः देश से आर्थिक विषमता को कम करने के लिए आर्थिक-नियोजन एक उपयुक्त उपाय है। आर्थिक-नियोजन का दृष्टिकोण समाजवादी समाज की रचना है, जिसमें सभी को समान अवसर उपलब्ध होते हैं। फलतः सम्पत्ति व साधनों का समान वितरण होता है।

आर्थिक स्थायित्व (Economic Stability)-

वर्तमान युग में प्रत्येक राष्ट्र आर्थिक उच्चावचन (Economic Flectuation) का शिकार है, क्योंकि कीमत वृद्धि, बकारी में वृद्धि, व्यापारिक अस्थिरता एवं वितरण में विषमता जैसे आर्थिक तत्वों ने अनेक राष्ट्रों की आर्थिक स्थिति को डाँवाडोल कर रखा है। ऐसे आर्थिक कुचक्रों का सामना करने के लिए आर्थिक-नियोजन की प्रक्रिया अत्यन्त उपर्युक्त है।

पूँजी निर्माण (Capital Formation)-

अर्द्धविकसित देशों पूँजी निर्माण की दर न्यून होने के कारण पूँजी का अभाव होता है। इस समस्या का निराकरण आर्थिक नियोजन मात्र है, क्योंकि आर्थिक-नियोजन से आर्थिक विकास की दर तीव्र हो जाती है, जिससे उत्पादन में वृद्धि होती है और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होने लगती है।

जन शक्ति नियोजन (Man Power Planning)-

यद्यपि वर्तमान युग में बेरोजगारी की समस्या विश्वव्यापी है, लेकिन अरद्धविकसित देशों में यह समस्या और भी गम्भीर है, क्योंकि शिक्षित एवं अशिक्षित बेकार युवकों की लम्बी-लम्बी कतारें हैं। इस दृष्टि से भी आर्थिक-नियोजन महत्वपूर्ण है।

अधिकतम सामाजिक लाभ (Maximum Social Advantages)-

आर्थिक नियोजन का उद्देश्य अधिकतम सामाजिक लाभ प्रदान करना है। इस दृष्टि से आर्थिक-नियोजन द्वारा सड़के, रेलमार्ग, अस्पताल, विद्यालय व मनोरंजन संस्थाओं का निर्माण आदि किया जाता है। ऐसे कार्यों से सामाजिक उत्थान ही नहीं होता है, बल्कि गरीबों को भी ऐसी सुविधायें उपलब्ध होने लगती हैं, जबकि पूँजीवादी व्यवस्था में समस्त कार्य धनार्जन से जुड़े होते हैं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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