अर्थशास्त्र / Economics

अर्द्ध-विकसित अर्थव्यवस्था | अर्द्ध-विकसित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ | भारतीय संदर्भ में एक अल्पविकसित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ

अर्द्ध-विकसित अर्थव्यवस्था | अर्द्ध-विकसित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ | भारतीय संदर्भ में एक अल्पविकसित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ | semi-developed economy in Hindi | Characteristics of a semi-developed economy in Hindi | Characteristics of an underdeveloped economy in the Indian context in Hindi

अर्द्ध-विकसित अर्थव्यवस्था

अर्थव्यवस्था को अल्प-विकसित कहने की बजाय संयुक्त राष्ट्र के प्रकाशनों में इन्हें “विकासशील अर्थव्यवस्थाओं” के रूप में संबोधित किया जाता है। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के शब्द से यह बोध होता है कि चाहे ये अर्थव्यवस्थाएँ अल्प-विकसित हैं, किंतु इनमें विकास प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है।

अर्द्ध-विकसित अर्थव्यवस्था की एक आदर्श परिभाषा अल्प-विकसित देश की एक आदर्श परिभाषा इस प्रकार दी जा सकी है- “अर्द्धश्-विकसित अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है जहाँ जनसंख्या की वृद्धि की दर अपेक्षाकृत अधिक हो, पर्याप्त मात्रा में प्राकृतिक साधन उपलब्ध हों, परंतु उसका संपूर्ण विदोहन नहीं हुआ हो, लोगों का जीवन-स्तर अत्यन्त नीचा हो, जहाँ विनियोग के विस्तृत क्षेत्र हों, परंतु पूँजी-निर्माण की गति अत्यंत धीमी हो, जनता की उपभोग- वृत्ति बहुत ऊँची हो, जबकि बचत न्यूनाधिक शून्य हो, छिपी हुई बेरोजगारी विद्यमान हो, कृषि अत्यंत प्राचीन ढंग से की जाती हो, उद्योग व्यसापार एवं यातायात तकनीकी दृष्टिकोण से अत्यंत पिछड़ी हुई अवस्था में हो, परंतु फिर भी उस देश के निवासी रहन-सहन के स्तर में वृद्धि करने हेतु राष्ट्रीय साधनों का सर्वोत्तम ढंग से उपयोग करने में कार्यरत हों।”

अर्द्ध-विकसित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ

(Characteristics of Underdeveloped Economy)

अर्द्ध-विकसित राष्ट्रा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(क) आर्थिक विशेषताएँ (Economic Characteristics)-

अर्द्ध-विकसित देश की प्रमुख आर्थिक समस्याएँ निम्नलिखित हैं-

(1) कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था अर्द्ध- विकसित राष्ट्रों में अधिकांशतः कृषि की प्रधानता रहती है और वहाँ मुख्यतः खाद्यान्न व कच्चा माल ही उत्पादित किया जाता है। इन देशों में 65 से 85% तक जनसंख्या कृषि व्यवसाय में लगी होती है। राष्ट्रीय आय का 50% से भी ज्यादा भाग कृषि से ही प्राप्त होता है। रोजगार का सबसे बड़ा साधन कृषि उद्योग ही माना जाता है और संपूर्ण अर्थव्यवस्था कृषि पर ही निर्भर होती है।

प्रो. बेयर एवं मामे के विचारानुसार, “अर्द्ध-विकसित देशों में संपूर्ण आर्थिक व उत्पादन क्रियाओं में कृषि एक भूमिका अदा करती है तथा कृषि जोतों के निर्माण, सुधार एवं विकास में ही समस्त राष्ट्रीय साधन लगा दिये जाते हैं’ उदाहरणार्थ, 1981 की जनगणना के अनुसार भारत में 64.3% जनसंख्या कृषि कार्यों में संलग्न है तथा राष्ट्रीय आय का 42% भाग केवल कृषि- उद्योग से ही प्राप्त होता है। अर्द्ध-विकसित देशों में कृषि पर अधिक भार होने से एक ओर निर्माणकारी उद्योगों का विकास नहीं हो पाता तो दूसरी ओर उपविभाजन पट्टे, अनार्थिक जोत, भूमिहीन कृषक आदि समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। निम्न प्रति व्यक्ति आय व पूँजी निर्माण की धीमी गति, बाजार की अपूर्णताएँ तथा असंतुलित आर्थिक विकास कृषि उद्योग की व्यसापकता की ही देन है। भारत, चीन, बांग्लादेश तथा सूडान में 70% जनसंख्या कृषि में सलंग्न है, जबकि अमेरिका, कनाडा तथा पश्चिमी जर्मनी में यह प्रतिशत क्रमशः 4,5, तथा 6 है। कृषि में इतना अधिक संकेंद्रण गरीबी की निशानी है।

(2) निर्यात पर निर्भरता- अर्द्ध-विकसित देशों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः निर्यात उन्मुखी अर्थव्यवस्था होती है। ये राष्ट्र राष्ट्रीय आय का एक बहुत बड़ा भाग निर्यात से ही प्राप्त करते हैं। वेश के उत्पत्ति के साधन निर्यातम होने वाले माल के उत्पादन में ही लगे रहते हैं जिससे देश का सर्वांगीण विकास नहीं हो पाता। कुछ ही वस्तुओं के निर्यात पर निर्भर रहने से देश की अर्थव्यवस्था आर्थिक चक्रों (व्यापार चक्रों) का शिकार हो जाती व्यापार चक्र प्रारंभ होने पर वस्तुओं की माँगें कम हो जाती हैं तथा देश को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। इसके विपरीत विकसित राष्ट्रों में ऐसा न होने से यह समस्या नहीं पायी जाती।

(3) बेकारी व अर्द्ध-बेकारी की विशेषताएँ- अर्द्ध-विकसित देशों में जनसंख्या का एक बड़ा भाग किसी न किसी रूप में बेकारी से त्रस्त रहता है। जनसंख्या का कृषि पर अधिक भार रहता है तथा अकुशल श्रमिकों की अधिकता पायी जाती हैं। देश में प्रति व्यक्ति उत्पादकता बहुत कम होती है। कृषि के क्षेत्र में बेरोजगारी, अर्द्ध-रोजगारी एवं सामयिक बेरोजगारी (Seasonal unemployment) दृष्टिकोण होता है। परिवार में संख्या बढ़ने से भूमि पर मजदूरों की संख्या में वृद्धि हो जाती है, परंतु उससे उत्पादन में कोई वृद्धि नहीं हो पाती। ऐसी परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को बेरोजगार कहना कठिन होता है। बेरोजगारी का विद्यमान होना अर्द्ध-विकसित देशों के लिए कोई आधार नहीं माना जा सकता।

(4) आधुनिक व बड़े पैमाने के उद्योगों का अभाव (Shortage of modern and large scale industries)- अर्द्ध-विकसित राष्ट्रों में आधुनिक व वैज्ञानिक आधार पर बड़े उद्योगों का सर्वथा अभाव पाया जाता है। इन राष्ट्रों में मशीनों व पूंजीगत माल का उत्पादन शून्य के बराबर होता है और उपभोक्ता वस्तुओं के कारखानों के लिए विदेशों से मशीनों का आयात किया जाता है।

(5) अविकसित बैंकिंग सुविधाएँ (Undeveloped Banking Facilities) – अर्द्ध- विकसित देशों में बैंकिंग सुविधाएँ सीमित मात्रा में ही पायी जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं का अभाव पाया जाता है। जिससे साख-मुद्रा की मात्रा में भी कमी हो जाती है। साख की मात्रा बैंकों में जमा धनराशि पर निर्भर रहती है।

(6) आर्थिक कुचक्र (Economic vicious circle)- अर्द्ध-विकसित देशों में आर्थिक कुचक्रों की प्रधानता रहती है। पूँजी की कमी व साधनों से पिछड़ेपन के कारण उत्पादकता कम होती है और वास्तविक आय गिर जाती है जिससे बचत व पूँजी-निर्माण में कमी आ जाती है। दूसरी ओर, वास्तविक आय कम होने से माँग गिर जाती है और विनियोग में भी कमी रहती है। इसी प्रकार साधनों के अविकसित होने से व्यक्ति पिछड़ जाते हैं और साधनों का उपयोग संभव नहीं हो पाता। इस प्रकार के कुचक्र लगातार चलते रहने से अर्थव्यवस्था को निरंतर प्रभावित करते रहते हैं।

(7) बाजार संबंधी अपूर्णताएँ (Imperfection market)- अर्द्ध-विकसित देशों में बाजार संबंधी अनेक अपूर्णताएं पायी जाती हैं, जैसे-विशिष्टीकरण का अभाव, अज्ञानता, उत्पत्ति के साधनों में गतिशीलता का अभाव, आर्थिक ढाँचे में लोच तथा पूर्ण प्रतियोगिता का अभाव एवं एकाधिकार की उपस्थिति आदि। इन सबके कारण उत्पत्ति के विभिन्न साधनों में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है जिससे अर्थव्यवस्था गतिहीन व स्थिर हो जाती है। विकसित राष्ट्रों में ये अपूर्णताएँ नहीं पायी जाती हैं।

(8) उत्पादन की न्यूनतम स्तर (Minimum level of Production)- अर्द्ध-विकसित देशों में उत्पादकता का स्तर काफी निम्न रहता है। विकसित राष्ट्रों में यह समस्या नहीं पायी जाती। विश्व के कोयले, पेट्रोल व खनिज-लोहे की पूर्ति से संयुक्त राज्य अमेरिका का स्थान 30.2% है, जबकि अन्य राष्ट्रों में यह प्रतिशत कम रहता है।

(9) पूँजी की न्यूनता (Deficiency of Capital)- अर्द्ध-विकसित देशों में पूंजी की न्यूनता पायी जाती है, जिससे प्रति व्यक्ति पूंजी की मात्रा कम होती है एवं पूंजी निर्माण की दर भी कम होती है। अविकसित देशों में पूंजी की कमी का एक कारण वहाँ अप्रचलित व अवैज्ञानिक उपकरण व विधियों का प्रयोग करना है। अधिकांश व्यक्ति पुराने व पैतृक धंधों में ही काम करते हैं और परिवार के लगभग समस्त सदस्य उसी व्ययवसाय में लगे रहते हैं, जिससे अदृश्य बेरोजगारी व्यापक रूप में पायी जाती है और प्रति व्यक्ति उत्पादन की मात्रा कम हो जाती है जो पूंजी-निर्माण में बाधा उपस्थित करती है। कम आय वाले राष्ट्रों में पूंजी की न्यूनता के कारण पूंजी श्रम अनुपात औद्योगिक दृष्टि से विकसित राष्ट्रों की तुलना में बहुत कम होता है।

(10) राष्ट्रीय आय का निम्न स्तर (Low level of National Income)- अर्द्ध- विकसित देशों में उत्पादकता का स्तर निम्न होता है जिससे प्रति व्यक्ति आय कम होती है। इसके विपरीत विकसित राष्ट्रों की प्रति व्यक्ति आय अधिक होती है, क्योंकि वहाँ उत्पादकता का स्तर ऊँचा रहता है। अनुमान है कि विकसित राष्ट्रों में औसत आय 500 डालर से अधिक व अविकसित राष्ट्रों में यह आय 100 डालर के लगभग रहती है। विश्व की आय के वितरण को निम्न प्रकार से रखा जा सकता है-

निम्न आय वाले राष्ट्रों में विश्व की कुल आय का केवल 15% भाग है, जबकि उच्च आय वाले देश में यह 65% है।

(ख) सामाजिक विशेषताएँ (Social Characteristics)-

(1) छुआछूत की कुप्रवृत्ति (Untouchability)- अविकसित देशों में छुआछूत का पालन कठोरता से किया जाता है और इसे न मानने वालों का बहिष्कार कर दिया जाता है। एक जाति के लोग दूसरी जाति के व्यक्तियों से अलग रहने का प्रयास करते हैं।

(2) पुरुषों और स्त्रियों द्वारा गहनों का प्रयोग (Use of Ornaments by Male and Female)- अर्द्ध-विकसित व विकसित देशों में समाज की परंपराओं व रीति-रिवाजों के  अनुसार स्त्रियों के अतिरिक्त पुरूष भी कहने पहने हुए घूमा करते हैं। जिसका नतीजा यह होता है  कि देश की सम्पत्ति विकास कार्यों में नहीं लग पाती।

(3) वर्गों में विभाजित (Distribution in Classes)-अर्द्ध-विकसित देशों में समाज कई वर्गों में विभाजित होता है, जिसमें प्रत्येक वर्ग अपनी रूढ़िगत परंपराओं एवं आचरणों का प्रयोग करता है। नवीन प्रवर्तनों (New innovations) का अभ्यास न होने से वे इसका विरोध करते हैं।

(4) स्त्रियों को निम्न स्थान (Low Place of women)- अविकसित राष्ट्रों में स्त्रियों को निम्न स्थान दिया जाता है। स्त्रियों को किसी भी प्रकार की कोई स्वतंत्रता नहीं होती। उनका भाग्य पुरुष के भाग्य के साथ जुड़ा रहता है।

(5) अशिक्षा (Illiteracy)- अर्द्ध-विकसित अथवा अल्पविकसित देशों में शिक्षा का अभाव पाया जाता है और समाज के अधिकांश व्यक्ति अशिक्षित एवं गंवार होते हैं जो नवीन  बातों को सीखने के लिए तत्पर नहीं होते।

(ग) जनांकिकीय संबंधी विशेषताएँ (Characteristics Relating to Demography)-

अर्द्ध-विकसित राष्ट्रों के आर्थिक विकास की समस्या जनसंख्या से जुड़ी है। जनसंख्या श्रम के रूप में उत्पत्ति का महत्त्वपूर्ण साधन माना जाता है। अर्द्ध- विकसित राष्ट्रों की जनसंख्या संबंधी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) जनसंख्या में तीव्र वृद्धि (Rapid growth in population)- अर्द्ध-विकसित देशों में जनसंख्या की वृद्धि 3% से भी अधिक पायी जाती है। भारत की जनसंख्या 1951 में 36.1 करोड़ थी जो 1961 में बढ़कर 43.9 करोड़ तथा 1981 में 68.3 करोड़ हो गयीं। सन् 1991 में 84.6 करोड़ तथा सन् 2001 में 102.9 करोड़ हो गयी। वर्तमान में भारत की जनसंख्या 121.09 करोड़ पार कर चुकी है। इसके परिणामस्वरूप, इस प्रकार की अर्थव्यवस्थाएं जनाधिक्य के रोग से पीड़ित होने लगी हैं, जो अंत में बहुस्तरीय बेरोजगारी की समस्याएँ को जन्म देती हैं। जनाधिक्य के कारण अनेक समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं, जैसे-बेरोजगारी, निर्धनता, बीमारी, सामाजिक असंतोष, उपभोग वृत्ति में वृद्धि, कम बचत, सीमित पूँजी निर्माण तथा आर्थिक अस्थिरता। एशिया के अधिकांश देशों में विशेषकर भारत जैसे देश में जनसंख्या के लगातार विस्तार ने एक विस्फोटक स्थिति का रूप धारण कर लिया है। उदाहरणार्थ, लैटिन अमेरिका के देश, ऑस्ट्रेलिया आदि बहुत से अर्द्ध-विकसित देशों में आज भी जनसंख्या की कमी है, फिर भी यह देश अल्प-विकसित है।

(2) ऊँची जन्म व मृत्यु दर (High birth and death rate)- अल्प-विकसित देशों में जन्म व मृत्यु दर दोनों ही विकसित राष्ट्रों की अपेक्षा अधिक होती है। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर किये गये प्रयत्नों तथा चिकित्सा विज्ञान में पिछलें चार- पाँच दशकों में हुए सुधारों के कारण जहाँ एक ओर मृत्यु दर में कमी हुई है, वहीं जन्म-दर में आनुपातिक गिरावट नहीं हो पायी है जिसका परिणाम यह हुआ है कि इन देशों में जनाधिक्य की समस्या चरम सीमा पर है।

(3) जनसंख्या का गाँवों में अधिक निवास (Major population inhabited in village)- अर्द्ध-विकसित देशों में अधिकांश जनसंख्या गाँवों में निवास करती है और वहाँ नगरों की ओर जनसंख्या का झुकाव कम रहता है।

(4) जनसंख्या अकुशल होना (Unskilled population)- यह अर्द्ध-विकसित  देशों की जनसंख्या शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पौष्टिक भोजन के अभाव में सापेक्षिक व तुलनात्मक दृष्टि से अकुंशल रहती है। इसके विपरीत विकसित देशों में अच्छी सुविधाएँ प्राप्त होने से वहाँ की जनसंख्या कुशल व दक्ष होती है।

(5) जनसंख्या का घनत्व (Density of Population)- अर्द्ध-विकसित देशों की जनसंख्या संबंधी एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इन राष्ट्रों में प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या का घनत्व अपेक्षाकृत अधिक होता है जिसका स्पष्ट कारण जनसंख्या वृद्धि की अधिक दर होती है और परिणाम यह होता है कि इन देशों में स्वास्थ्य तथा सक्षमता की निम्न दशाएँ पायी जाती हैं।

(6) आश्रितों की अधिकता (Good number of dependents)- अर्द्ध-विकसित देशों में काम न करने वाले आश्रितों की संख्या अधिक पायी जाती है। आश्रितों में बालक, वृद्ध, असहाय व्यक्ति, महिलाएँ एवं भिखारी आदि सम्मिलित किये जाते हैं। उदाहरणार्थ, भारत में 2011 की जनगणना के आधार पर देश की कुल 121.09 करोड़ जनसंख्या में से 19 करोड़ व्यक्ति या 34 प्रतिशत जनसंख्या कार्य करने वाली एवं शेष आश्रित व्यक्ति थे। इससे आश्रितों की अधिकता प्रदर्शित होती है।

(7) बेरोजगारी में वृद्धि (Increase in unemployment)- अर्द्ध-विकसित देशों में बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण श्रम शक्ति में वृद्धि होती है, जिससे इनकी पूर्ति माँग से अधिक हो जाती हैं। इस प्रकार से देश में बेरोजगारी की स्थिति बनी रहती है।

प्रो. गुन्नार मिर्डल के अनुसार, “बेरोजगारी तथा अदृश्य बेरोजगारी अर्द्ध-विकसित क्षेत्रों का मुख्य आभूषण है।”

(घ) राजनीतिक विशेषताएँ (Political Characteristics) :

अल्प-विकसित देशों की राजनीतिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) कमजोर राष्ट्र (Weak nations)- अर्द्ध-विकसित राष्ट्र राजनीतिक दृष्टि से कमजोर रहते हैं और इन्हें दूसरे देश के आक्रमण का सदैव भय बना रहता है।

(2) राजनीतिक अधिकारों के प्रति अज्ञानता (Unknown about the political rights)- अर्द्ध-विकसित देशों में जनता गरीब होती है, उसकी प्रति व्यक्ति आय बहुत कम होती है। जनता अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में ही लगी रहती है। गरीबी के कारण लोग अपने राजनीतिक अधिकारों के बारे में अज्ञानी बने रहते हैं और उसमें समानता का अभाव पाया जाता है।

(ङ) प्राविधिक विशेषता (Technological Characteristics)-

प्राविधिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

प्राविधिक पिछड़ापन (Technological Backwardness)- प्राविधिक पिछड़ापन अर्द्ध-विकसित देशों की एक मुख्य विशेषता है। प्रा. कुजनेट्स (Prof. Simon Kuznets) के विचारानुसार, प्राविधिक विकास के चार महत्त्वपूर्ण चरणों-वैज्ञानिक खोज, आविष्कार, नवीन प्रवर्तन तथा सुधार आदि का इस प्रकार के देशों में पूर्णतया अभाव पाया जाता है, जिसके फलस्वरूप इनकी वास्तविक उत्पादन लागत बहुत ऊँची होती है। उत्पत्ति के साधनों का सर्वोत्तम विदोहन नहीं हो पाता।”

(च) अन्य विशेषताएँ (Other Characteristics)-

अर्द्ध-विकसिमत देशों की अन्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) योग्य प्रशासन का अभाव (Shortage of good administration)- अर्द्ध- विकसित देशों में कुशल व योग्य प्रशासकों का अभाव बना रहता है। राजनीतिक कार्यों में भाग  लेने वाले व्यक्ति व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना से प्रेरित होकर कार्य करते हैं और समाज व देश-हित पर ध्यान नहीं देते। अधिकारी वर्ग भ्रष्ट हो जाते हैं, जिससे सरकारी नीतियों में परिवर्तन होना स्वाभाविक हो जाता है।

(2) पूँजी निर्माण की निम्न दर (Low rate of capital formation) – पूँजी निर्माण किसी भी देश के आर्थिक विकास की मूलभूत समस्या है। पूंजी निर्माण स्वतः बचत की मात्रा पर निर्भर करता है। अर्द्ध-विकसित देश में प्रति व्यक्ति आय कम होने के कारण घरेलू बचते अत्यंत कम हो जाती हैं, जबकि उपभोग- प्रवृत्ति अधिक होती है। इसका परिणाम यह होता है कि भावी विकास के लिए उचित विनियोग पूरे नहीं हो पाते, जिससे पूँजी-निर्माण व आर्थिक विकास का कार्य रूक जाता है।

क्या भारत एक अर्द्ध-विकसित देश है? (Is India an underdeveloped country?)-

अर्द्ध-विकसित देशों की विभिन्न विशेषताओं को देखते हुए तथा बाह्य दृष्टि से भारतीय अर्थव्यवस्था पर ध्यान करने पर निःसंदेह यही कहा जायगा कि भारत एक अर्द्ध- विकसित राष्ट्र है। जनाधिक्य, प्रति व्यक्ति निम्न आय, कृषि की प्रधानता, धीमी पूंजी निर्माण, प्राविधिक पिछड़ापन, भीषण बेरोजगारी तथा औद्योगिकीकरण का अभाव आदि। देश में उपलब्ध होने वाली ऐसी कसौटियाँ हैं जो भारत को पिछड़ेपन के धरातल पर रखकर खड़ा कर देती है, परंतु पिछले कुछ वर्षों से भारत विकास की स्थैतिक अवस्था से निकलकर प्राविधिक अवस्था में पहुंच चुका है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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