इतिहास / History

बौद्ध तथा हिन्दू धर्म का तुलनात्मक अध्ययन | बौद्ध धर्म तथा हिन्दू धर्म की तुलना कीजिए | Compare Buddhism with Hinduism in Hindi

बौद्ध तथा हिन्दू धर्म का तुलनात्मक अध्ययन | बौद्ध धर्म तथा हिन्दू धर्म की तुलना कीजिए | Compare Buddhism with Hinduism in Hindi

बौद्ध तथा हिन्दू धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

बौद्ध तथा हिन्दू धर्म का जन्म भारत में हुआ तथा इनके समस्त अर्थ और उद्देश्यों में भारतीय जनजीवन की आकांक्षाओं की प्राप्ति की अभिव्यक्ति है। इस आधार पर विचार करने से हमें पता चलता है कि केवल बौद्ध तथा हिन्दू धर्म ही नहीं। अपितु भारत भूमि पर जन्मे समस्त धर्मों का उद्देश्य समान था। परन्तु उद्देश्य की समानता का अर्थ यह नहीं समझना चाहिये कि सभी धर्मों ने समान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जिस मार्ग को अपनाने का निर्देश दिया-वह भी समान था। यदि उद्देश्यों के समान, मार्ग तथा साधन भी समान होते तो धर्म वैभिन्य का प्रश्न ही नहीं उठता। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि बौद्ध तथा हिन्दू धर्म में अनेक समानताएँ तथा असमानताएँ हैं।

समानताएँ

बौद्ध धर्म कोई नवीन धर्म नहीं था और न ही महात्मा बुद्ध का उद्देश्य किसी अति नवीन धर्म की स्थापना ही करना था। महात्मा बुद्ध पूर्णतः सुधारवादी थे। अपने मत का प्रतिपादन करते समय उन्होंने हिन्दू धर्म के श्रेष्ठतम गुणों की न तो अवहेलना ही की और न ही उनका खण्डन किया। विवादग्रस्त तथा गूढ प्रश्नों पर वे मौन धारण करते थे तथा केवल यही मानते थे कि तत्व तथा सिद्धान्त मीमांसा का निर्वाण प्राप्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है। वस्तुतः उन्होंने हिन्दू धर्म के श्रेष्ठ गुणों को ग्रहण करके, प्राचीन धर्म की असंगतियों को अमान्य घोषित किया। रिडेविस ने इस बात को निम्न शब्दों में अभिव्यक्त किया है-

“The fact we should never forget is that Gautam was born and brought up and lived and died as a Hindu. On the whole he was regarded by the Hindus of that time as a Hindu. Without the intellectual work of his predecessors, his own work, however original, would have been impossible. He was the greatest and wisest and best of the Hindus and throughout his career, characteristic Indian.”

इस कथन से सिद्ध होता है कि महात्मा बुद्ध शुद्धतः एक हिन्दू थे। प्रश्न उठता है कि हिन्दू होते हुए, उन्होंने जिस धर्म की स्थापना की, क्या वह हिन्दू धर्म ही था ? हापकिन्स महोदय ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए लिखा है-

“The founder of Buddhism did not strike out a new system of morals, he was not a democrat; he did not originate a plot to overthrow the Brahmanic pricsthood; he did invent the order of monks.”

बौद्ध धर्म शुद्धतः हिन्दू धर्म का प्राकृतिक विकसित रूप था तथा उस समय एक समाज के नये वातावरण में हिन्दू धर्म ने इस रूप में ये बस्त्र धारण किये थे।

क्या यह सच नहीं है कि बौद्ध धर्म को पूर्णतः समझने तथा पहचानने के लिये वेदों तथा उपनिषदों का ज्ञान होना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि बौद्ध ग्रन्थ त्रिपिटकों का। प्रोफेसर मैक्समुलर ने लिखा है-

“To my mind, having approached Brahmanism after a study of the ancient religion of India, the religion of Veda, Buddhism has always seemed to be not a new religion, but a natural development of the Hinduism in its various manifestations, religious, philosophical, social and political.”

अतः वास्तविकता यही है कि हिन्दू धर्म एक ही जाति तथा जीवन के प्रतीक हैं। हाँ, यह अलग बात है कि हिन्दू धर्म के अनेक आडम्बरों, कर्मकाण्ड तथा पुरोहित वर्ग की स्वार्थी प्रवृत्ति का निराकरण करने के लिये, किसी न किसी रूप में सुधार प्रक्रिया की आवश्यकता हुई। बौद्ध धर्म ने तत्कालीन समय में इस आवश्यकता की पूर्ति की। सभी विद्वान इस बात पर सहमत हैं कि बौद्ध धर्म भारतीय परम्परा की ही शाखा है तथा इसका मूल हिन्दू धर्म है।

इन दोनों धर्मों की एक अन्य समानता सिद्धान्तों तथा आचरणों में भी विद्यमान है। बौद्ध धर्म संसार को दुःखमय मानता है तथा उपनिषदों में भी यही माना गया है। बौद्ध धर्म ने यदि अहिंसा तथा अस्तेय पर विशेष बल दिया तो हिन्दू धर्म के लिये भी ये सिद्धान्त अमान्य नहीं थे। बौद्ध धर्म ने जिस आचरण तथा व्यवहार की व्यवस्था की, हिन्दू धर्म के अनेक अनुयायी उस आचरण तथा व्यवहार में विश्वास रखते थे। श्री मैक्समुलर के अनुसार बौद्ध धर्म ने जिस आदर्श जीवन की कल्पना की वे हिन्दू धर्म के ही आदर्श थे। उन्हीं के शब्दों में-

“Buddhism achieved, in one sense, the Brahmanical ideals.” “

उपरोक्त समानताओं के कारण अनेक विद्वान बौद्ध धर्म को ‘सुधारवादी हिन्दू धर्म’ के नाम से पुकारते हैं। बौद्ध धर्म ने वस्तुतः हिन्दू धर्म के सिद्धान्तों पर ही अपना ताना-बाना बुना है तथा बौद्ध धर्म के समस्त विचार, आचारतत्व, नियम, अहिंसा, सत्य, क्षमा, करुणा, वेदना आदि हिन्दू धर्म में भी प्राप्य हैं।

असमानताएँ

उपरोक्त पंक्तियों में बौद्ध तथा हिन्दू धर्म की जिन समानताओं का वर्णन किया है वे अपने मूल में समान थी, अभिव्यक्ति में नहीं। इन दोनों धर्मों की असमानताओं का निरूपण करने से पहले हम यह स्पष्ट कर देना आवश्यक समझते हैं कि यह निर्विवाद है कि बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म का परिवर्तित तथा संशोधित रूप है। परिवर्तन तथा संशोधन के परिणामस्वरूप इन दोनों धर्मों की असमानताओं का वर्णन निम्नलिखित है-

(1) हिन्दू धर्म के अनुसार आत्मा शाश्वत तथा अनन्त है परन्तु बौद्ध धर्म अनात्मवादी है।

(2) वेदों को अपौरुषेय मानकर, हिन्दू धर्म उनमें पूर्ण निष्ठा रखता है अतः उनके विरुद्ध किसी भी तर्क को स्वीकार करने में वह असमर्थ है। इसके विपरीत बौद्ध धर्म वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं करता तथा तर्क को प्रमुख मानता है।

(3) हिन्दू धर्म वर्णव्यवस्था में विश्वास रखता है तथा उसी के समानान्तर व्यवस्था के जीवन को ही सन्तुलित तथा आदर्श जीवन मानता है। हिन्दू व्यवस्था में शूद्रों को मोक्ष प्राप्ति, वेद अध्ययन का कोई अधिकार नहीं है। बौद्ध धर्म इन व्यवस्थाओं का विरोध करता है। बौद्ध जीवन प्रणाली में जातिगत बन्धन तथा आश्रम व्यवस्था केलिये कोई स्थान नहीं है। उसके अनुसार धर्म का सम्बन्ध मन से है, जाति या आयु से नहीं।

(4) हिन्दू धर्म बहुदेववादी है तथा ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखता है। बौद्ध धर्म इस विषय में मौन है।

(5) हिन्दू धर्म में कर्मकाण्ड, यज्ञ, हवन, बलि, पूजा आदि का महत्व है परन्तु बौद्ध धर्म इन्हें आडम्बर तथा पाखण्ड मानता है। बौद्ध मत सदाचार के गुणों पर विशेष बल देता है।

(6) हिन्दू धर्म में किसी भी मानवीय व्यक्तित्व तथा ‘परमपुरुष’ को उपास्य नहीं माना गया है। जब कि बौद्ध अनुयायी महात्मा बुद्ध को ‘परम पुरुष’ के रूप में उपास्य मानते हैं।

निष्कर्ष-

हिन्दू तथा बौद्ध धर्म की समानताओं तथा असमानताओं के अध्ययन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अपनी निकटता तथा दूरी के कारण ये दोनों धर्म अपनी सीमाओं का उल्लंघन कर एक-दूसरे से गले मिलते हैं और फिर अपनी-अपनी सीमाओं में चले जाते हैं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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