अर्थशास्त्र / Economics

भारतीय जनसंख्या प्रक्षेपण 1996-2051 | प्रक्षेपण से सम्बन्धित मान्यताएं | नगर जनसंख्या प्रक्षेपण | जनसंख्या की संरचना

भारतीय जनसंख्या प्रक्षेपण 1996-2051 | प्रक्षेपण से सम्बन्धित मान्यताएं | नगर जनसंख्या प्रक्षेपण | जनसंख्या की संरचना

भारतीय जनसंख्या प्रक्षेपण (1996-2051)

इस सम्बन्ध में योजना आयोग ने परिवार नियोजन के निष्पादन सम्बन्धी अद्यतन आंकड़ों और जनन एवं मृत्यु-बरों के वर्तमान स्तरों और प्रवृत्तियों को ध्यान में रखते हुए, एक तकनीकी ग्रुप की नियुक्ति की जो कि नमूना पंजीकरण प्रणाली (Sample Registration System) से प्राप्त सामग्री के आधार पर 1996 से 2016 की अवधि के लिए जनसंख्या के प्रक्षेपण तैयार करे। इस तकनीकी ग्रुप ने अपनी रिपोर्ट अगस्त 1996 में प्रस्तुत की।

इस प्रक्षेपण के लिए यह मान्यता की गयी कि जनसंख्या के आयु-वितरण का जो अनुपात 1991 में वर्तमान था, वहीं 1996 के लिए अपरिवर्तित रहता है। इस आधार पर 1996 में भारत की जनसंख्या 93.4 करोड़ आंकी गयी।

प्रक्षेपण से सम्बन्धित मान्यताएं

तकनीकी ग्रुप (Technical group) ने सांख्यिकीय प्रक्षेपण करते समय निम्नलिखित मान्यताएं कीं-

(1) अन्तर्राष्ट्रीय प्रवसन (International Migration) की मात्रा नाममात्र मानी गयी।

(2) शुद्ध प्रजनन = 1को आधार बनाने की अपेक्षा, इन प्रेक्षपणों में सकल जनन (Total fertility rate) के साथ विस्थापित करने का निर्णय लिया गया ताकि इसका 2.1 का स्तर प्राप्त किया जा सके।

(3) चूंकि 15 मुख्य राज्यों की जनसंख्या कुल देश की जनसंख्या के 95.7 प्रतिशत के बराबर हैं, इसलिए इन राज्यों के आधार पर किए गए प्रक्षेपण जनांकिकीय दृष्टि से उचित अनुमान होंगे।

(4) जन्म पर प्रत्याशित आयु (Life expectancy at birth) में वृद्धि को मृत्यु-दर में गिरावट के रूप में संकेतक माना गया। आयु-विशिष्ट मृत्यु-दरों (Age specific death rates) के आधार पर पुरुषों और स्त्रियों की प्रत्याशित आयु परिकलित की गयी। इस प्रकार यह पता चला कि जन्म पर पुरुषों की प्रत्याशित आयु जो 1996-2001 के दौरान 62.3 वर्ष थी, बढ़कर 2011-2016 की अवधि के दौरान 67.0 वर्ष हो जाएगी और इसी अवधि के दौरान स्त्रियों की प्रत्याशित आयु 65.3 वर्ष से बढ़ कर 69.2 वर्ष हो जाएगी।

(5) पुरुषों के लिए शिशु मृत्यु-दर जो 1996-2001 के दौरान 78 प्रति हजार थी गिर कर 2011-2016 को दौरान 58 हो जाएगी और स्त्रियों के लिए इसी अवधि के दौरान यह गिर कर 80 से 59 तक पहुंच जाएगी।

तकनीकी ग्रुप ने नमूना पंजीकरण से प्राप्त जनन एवं मृत्यु-दरों के विश्वसनीय अनुमानों को आधार बना कर उत्तरजीवी अनुपात प्रणाली (Survivor ratio method) के प्रयोग द्वारा जनसंख्या प्रक्षेपण तैयार करने की सिफारिश की।

इस प्रकार भारत की जनसंख्या जो 1996 में 93.4 करोड़ थी के 2006 तक बढ़कर 109.4 करोड़ होने का अनुमान लगाया गया जो सन् 2016 तक और बढ़कर 126.4 करोड़ हो जाएगी। इस प्रकार 1996-2006 के दशक के दशक के दौरान जनसंख्या की चक्रवृद्धि-दर 1.58 प्रतिशत प्रतिवर्ष आंकी गयी जिसके 2006 से 2016 के दशक के दौरान गिर कर 1.45 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच जाने की आशा है।

तालिका- भारत की प्रक्षेपित जनसंख्या 1996-2006

वर्ष करोड़ व्यक्ति प्रतिशत वितरण
पुरुष स्त्रियां व्यक्ति पुरुष स्त्रियां
1996

2001

2006

2011

2016

48.5

52.4

56.4

60.7

64.9

44.9

48.8

53.0

57.2

61.5

93.4

101.2

109.4

117.9

126.4

51.9

51.8

51.6

51.5

51.3

48.1

48.2

48.4

48.5

48.7

तालिका से पता चलता है कि 20 वर्षों की अवधि 1996-2016 के दौरान भारत की जनसंख्या 93.4 करोड़ से बढ़कर 126.4 करोड़ हो जाएगी अर्थात् इसमें 35.3 प्रतिशत की वृद्धि होगी। परन्तु पुरुष जनसंख्या में 33.8 प्रतिशत की वृद्धि (18.5 करोड़ से 64.9 करोड़) होने की प्रत्याशा है जबकि स्त्री जनसंख्या में 37 प्रतिशत (44.9 करोड़ से 61.5 करोड़) वृद्धि की प्रत्याशा है। स्पष्ट है स्त्री जनसंख्या की वृद्धि-दर पुरुष जनसंख्या की तुलना में अधिक होगी। परिणामतः कुल जनसंख्या में पुरुष जनसंख्या का अनुपात जो 1996 में 51.9 प्रतिशत था थोड़ा सा गिर कर 2016 में 51.3 प्रतिशत हो जाएगा और इसके तद्नुरूप स्त्रियों का अनुपात 48.1 प्रतिशत से थोड़ा बढ़कर 48.7 प्रतिशत हो जाएगा।

नगर जनसंख्या प्रक्षेपण

प्रेक्षपणों से पता चलता है कि नगर जनसंख्या जो 1996 में 27.23 प्रतिशत थी, बढ़कर 2016 में 33.67 प्रतिशत हो जाएगी। कुल रूप में नगर जनसंख्या जो 1996 में 25.43 करोड़ थी बढ़कर 2016 में 42.56 करोड़ हो जाएंगी।

जनसंख्या की संरचना

जनसंख्या की आयु संरचना का विश्लेषण करने से पता चलता है कि 0-14 आयु वर्ग में बाल जनसंख्या 1996 में 35.3 करोड़ थी और 2016 में इसके गिर कर 35 करोड़ हो जाने की प्रत्याशा है। इसका कारण जन्म-दर में प्रत्याशित गिरावट है। इस प्रकार 0-14 आयु वर्ग में जनसंख्या का अनुपात जो 1996 में 37.7 प्रतिशत था गिर कर 2016 में 27.7 प्रतिशत हो जाएगा।

इसके विरुद्ध 15-59 वर्ष के कार्यकारी आयु वर्ग में जनसंख्या जो 1996 में 51.9 करोड़ थी से बढ़कर 2016 में 80 करोड़ हो जाने की संभावना है। 15-59 आयु वर्ग मे जनसंख्या का अनुपात 1996 में 55.6 प्रतिशत बढ़कर 2016 में 63.3 प्रतिशत हो जाने की प्रत्याशा है। वृद्ध व्यक्तियों की जनसंख्या (60 और इसके ऊपर के आयु वर्ग में) के 1996 में 6.2 करोड़ की तुलना में 2016 में 11.3 करोड़ तक बढ़ जाने की प्रत्याशा है। परिणामतः वृद्ध व्यक्तियों का जनसंख्या में अनुपात जो 1996 में 6.7 प्रतिशत था बढ़कर 2016 में 9 प्रतिशत हो जाएगा।

जनसंख्या-प्रक्षेपणों से यह संकेत मिलता है कि जनसंख्या की आयु संरचना में एक संरचनात्मक परिवर्तन होने की संभावना है जिससे जनसंख्या की औसत आयु बढ़ जाएगी। इसका कारण प्रत्याशित आयु में वृद्धि और वृद्ध व्यक्तियों में उत्तरजीवी-अनुपात में वृद्धि है।

तालिका- जनसंख्या की आयु संरचना

आयुवर्ग 1996 2016
करोड़ व्यक्ति प्रतिशत करोड़ व्यक्ति प्रतिशत
0-14

15-59

60 और अधिक

35.27

51.92

6.23

37.7

55.6

6.7

35.04

80.01

11.30

27.7

63.3

9.0

कुल 93.4 100.0 126.35 100.0

सकल जनन दर के 2.1 लक्ष्य को प्राप्त करना

तकनीकी ग्रुप ने यह लक्ष्य तय किया है कि प्रत्येक राज्य की सकल जनन दर को कम करके 2.1 के स्तर पर लाना होगा। यदि हाल ही के वर्षों में सकल जनन दर में कमी की गति बनी रहती है, तो तकनीकी ग्रुप के विश्लेषण के अनुसार राज्यों को चार वर्गों मे विभक्त किया जा सकता है।

वर्ग 1 में दो राज्य अर्थात् केरल और तमिलनाडु शामिल हैं, जिन्होंने पहले ही सकल जनन दर का 2.1 का लक्ष्य प्राप्त कर लिया है इन दोनों की जनसंख्या समग्र भारत की जनसंख्या का केवल 9.7 प्रतिशत है।

वर्ग 2 में पांच राज्य अर्थात् आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा हैं, जो सन् 2010 तक सकल जनन दर का 2.1 का लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे। इन सभी राज्यों में कुल मिला कर 34 प्रतिशत जनसंख्या विद्यमान है।

वर्ग 3 में दो राज्य अर्थात् गुजरात और असम शामिल हैं जो सन् 2016 तक सकल जनन दर का 2.1 लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे। कुल मिलाकर वे भारत की कुल जनसंख्या का 7.5 प्रतिशत है।

वर्ग 4 में छ: राज्य हैं अर्थात पंजाब, हरियाणा, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश। इनमें कुल मिला कर भारत की 44.5 प्रतिशत जनसंख्या रहती है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि पंजाब और हरियाणा ने आर्थिक विकास में शानदार रिकार्ड कायम किया है और प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद के आधार पर प्रथम और द्वितीय स्थान प्राप्त किया है, परन्तु मानवीय विकास के आधार पर इन का स्थान नीचा है और वे जन्मदर को कम करने में पिछड़ गए हैं और परिणामतः सन् 2016 में सकल जनन दर का 2.1 का लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे परन्तु इन दोनों की जनसंख्या कुल मिलाकर भारत की जनसंख्या का केवल 4.4 प्रतिशत है।

परन्तु परिवार नियोजन के हमारे प्रयास में वास्तविक बाधा तो चार राज्य हैं- बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, और उत्तर प्रदेश जो कुल मिलाकर भारत की जसंख्या का 40 प्रतिशत हैं। जिस धीमी गति से इन राज्यों में सकल जनन दर में गिरावट आ रही है, उसका संकेत तो स्पष्टतः इस बात से लगाया जा सकता है कि सकल जनन दर का 2.1 प्रतिशत का लक्ष्य तो मध्य प्रदेश में सन् 2060 के पश्चात् और उत्तर प्रदेश में सन् 2100 के पश्चात् प्राप्त हो सकेगा। इन दोनों राज्यों की जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का 25 प्रतिशत है। बिहार और राजस्थान को भी इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बहुत अधिक समय लगेगा। इसी कारण जनसंख्या प्रक्षेपणों के तकनीकी ग्रुप 1996 की रिपोर्ट में इस बात पर बल देते हुए उल्लेख किया गया यदि भारत को सन् 2011 या 2016 तक सकल जनन दर का 2.1 का एच्छित लक्ष्य प्राप्त करना है तब इसके लिए बिहार, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सरकारों को अपनी जनन दर को तेजी से कम करने के लिए फौरी उपाय करने होंगे।

जनसंख्या प्रक्षेपण

(Population Projections) (1996-2051)

आगामी 50 वर्षों के लिए जनसंख्या के संशोधित प्रक्षेपणों से पता चलता है कि भारतीय जनसंख्या के सन् 2001 तक 101.2 करोड़ और सन् 2021 तक 134.5 करोड़ तक बढ़ जाने की प्रत्याशा है अर्थात् 1.44 प्रतिशत औसत वार्षिक वृद्धि-दर। यह आशा की जाती है। सन् 2051 तक भारत की जनसंख्या बढ़कर 164.6 करोड़ हो जाएगी अर्थात् 2021 और 2051 की 30-वर्षीय अवधि में औसत वृद्धि-दर 0.68 प्रतिशत रहेगी।

जनसंख्या प्रक्षेपणों के राज्यवार विश्लेषण से पता चलता है कि बिमारू राज्यों (BIMARU States) अर्थात् बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में 1996 से 2051 के दौरान 47.2 करोड़ जनसंख्या की वृद्धि होगी। समग्र भारत में 71.2 करोड़ की कुल वृद्धि में, इन चार राज्यों का भाग 66.2 प्रतिशत होगा। केवल उत्तर प्रदेश द्वारा 28.4 करोड़ का योगदान किया जाएगा जो कि कुल वृद्धि का 39.9 प्रतिशत होगा। अतः यदि परिवार नियोजन कार्यक्रम का संकेन्द्रण इन राज्यों की ओर किया जाए, विशेषकर उत्तर प्रदेश की ओर, तभी देश अपने जनसंख्या स्थिरीकरण (Population Stabilisation) के लक्ष्य में सफलता प्राप्त कर सकता है। 1996 में इन राज्यों का कुल जनसंख्या में भाग 40 प्रतिशत था अर्थात् देश की 93.4 करोड़ कुल जनसंख्या में 37.4 करोड़। सन् 2051 में देश की 164.6 करोड़ जनसंख्या में इन चार राज्यों का भाग 84.6 करोड़ हो जाएगा। अर्थात् 51.3 प्रतिशत। इससे यह बात पुष्ट होती है कि देश को इन चार राज्यों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करना होगा जो जनसंख्या नीति के कार्यान्वयन में बहुत पिछड़ गए हैं।

तालिका- भारत और 15 बड़े राज्यों में जनसंख्या-प्रक्षेपण

करोड़ों में
1996 2001 2021 2051 1996-2051 के बीच वृद्धि
कुल प्रतिशत (करोड़)
1.उत्तर प्रदेश 15.7 17.4 26.9 44.1 28.4 181.2
2. बिहार 9.3 10.3 14.0 16.3 7.0 75.7
3. मध्य प्रदेश 7.4 8.1 11.0 12.8 5.4 72.3
4.राजस्थान 5.0 5.5 8.2 11.4 6.4 129.7
5. महाराष्ट्र 8.7 9.3 11.6 12.4 3.7 42.9
6. आंध्र प्रदेश 7.2 7.6 9.0 9.3 2.1 28.1
7. पं० बंगाल 7.5 7.9 9.5 9.7 2.2 30.6
8. तमिलनाडु 5.9 6.2 7.1 6.9 1.0 16.4
9. कर्नाटक 4.9 5.3 6.6 7.0 2.1 42.7
10. गुजरात 4.6 4.9 5.8 6.0 1.4 31.8
11. उड़ीसा 3.4 3.7 4.5 4.6 1.2 34.9
12. केरल 3.1 3.3 3.8 3.9 0.8 25.9
13. असम 2.5 2.7 3.4 3.7 1.2 48.3
14. पंजाब 2.2 2.4 2.8 2.8 0.6 26.2
15. हरियाणा 1.9 2.0 2.4 2.6 0.7 39.7
अखिल-भारत 93.4 101.2 134.5 164.6 71.2 76.2
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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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