अर्थशास्त्र / Economics

स्थिर बनाम लचीली विदेशी विनिमय दरें | परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरें | स्थिर और लोचशील विनिमय दर के गुण और दोषों

स्थिर बनाम लचीली विदेशी विनिमय दरें | परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरें | स्थिर और लोचशील विनिमय दर के गुण और दोषों | Fixed Vs Flexible Foreign Exchange Rates in Hindi | Variable Foreign Exchange Rates in Hindi | Advantages and disadvantages of fixed and flexible exchange rates in Hindi

स्थिर बनाम लचीली विदेशी विनिमय दरें

(Stable versus Flexible Foreign Exchange Rates)

अस्थिर विदेशी विनिमय दरों के विपरीत स्थिर विदेशी विनिमय दरों के समर्थन में निम्न गुणों का उल्लेख किया गया है।

स्थिर विदेशी विनिमय दरें अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के विकास को प्रोत्साहित करती है क्योंकि ये आयातकर्ताओं तथा निर्यातकर्ताओं को इस बात का ज्ञान प्रदान करती हैं कि घरेलू मुद्राओं में आयातकर्ताओं को अपने आयातों का कितना भुगतान करना होगा तथा निर्यातकर्ताओं को अपने निर्यातों से कितना भुगतान प्राप्त होगा। दूसरी ओर, स्वतंत्रतापूर्वक परिवर्तनीय विदेशी विनिमय दरें अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार जोखिमों में वृद्धि करती हैं क्योंकि परिवर्तनीय विदेशी विनिमय दरों में घरेलू मुद्रा में मूल्यों की गणना अनिश्चित तथा कठिन होती है।

अस्थिर विदेशी विनिमय दरों में आर्थिक विकास तथा समुद्रपार के विनियोग के विस्तार के क्षेत्र में संकुचन से अर्द्धविकसित देशों में विकास कार्यक्रमों की उन्नति के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है, क्योंकि आर्थिक विकास के लिए विदेशी पूंजी के प्रवाह को संचालित करने में सट्टेबाज मार्ग अवरुद्ध करते हैं।

स्थिर विदेशी विनिमय दरें क्षेत्रीय व्यवस्थाओं के विकास के लिए अधिक उपयुक्त हैं जैसे स्टालिंग क्षेत्र या डालर क्षेत्र जहां रिजर्व मुद्रा के लिए एक परिवर्तनीय विदेशी विनिमय दर उस क्षेत्र के सदस्यों को जोड़ने में एक अस्थि का कार्य कर सकती है।

छोटे राष्ट्रों जैसे डेनमार्क, बेल्जियम तथा इंगलैंड जिनकी राष्ट्रीय आय में विदेशी आयत का प्रमुख योगदान है के लिए विनिमय दर की स्थिरता ही सरकार के अनुकरण की एक उपयुक्त नीति है तथा जितना ही कम वे इस नीति से विचलित होते हैं उतना ही हितकर है। यदि कोई देश अपनी मुद्रा इकाई की विदेशी विनिमय दर को स्थिर रखने में असफल हो जाता है तो विदेशी विनिमय दर में उच्चावचनों के द्वारा विदेशी व्यापार भी अस्त-व्यस्त हो जायेगा और आर्थिक सम्पन्नता खतरे में पड़ जाएगी। इस प्रकार जब वे छोटे देश, जिनके राष्ट्रीय उत्पादन में विदेशी व्यापार एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, परिवर्तनीय विदेशी विनिमय दरों में महंगे प्रयोग की लागत को वहन करने में असमर्थ रहते हैं और यदि वे अपने आर्थिक विकास के लिए विदेशी पूंजी पर निर्भर हैं तो उन्हें प्रत्येक लागत पर विदेशी विनिमय दर को स्थिर रखने का तब तक प्रयास करना चाहिए जब तक विदेश में स्थिर मौद्रिक प्रणाली वाला कोई देश हो जिससे वे अपनी मुद्रा इकाई का सम्बन्ध स्थापित कर सकें।

स्थिर विदेशी विनिमय दरें अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा तथा पूंजी बाजारों के विकास के लिए आवश्यक हैं क्योंकि ये पूंजी प्रवाहों के लिए आवश्यक हैं। जब विदेशी विनिमय दरों में भारी उच्चावचन होते हैं तो विदेशी विनियोगकर्ता विदेशियों को उधार देने में असमंजस में पड़ जाता है। ‘तीसा’ का मौद्रिक इतिहास इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। जब तक स्वर्णमान के अन्तर्गत स्थिर  विदेशी विनिमय दरों की प्रणाली विद्यमान रही तब तक विश्व व्यापार तथा अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक बाजरों के विकास से प्राप्त होने वाले लाभों को प्राप्त करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय ऋणों का प्रवाह भी जारी रहा। परन्तु अन्तर्राष्ट्रीय स्वर्णमान के खण्डने के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय ऋण व्यवस्था भी अकस्मात् ही समाप्त हो गयी।

परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरें

(Flexible Foreign Exchange Rates)

परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरों के समर्थन में स्थिर विदेशी विनिमय दरों के विरुद्ध दिये गए तर्कों को प्रस्तुत किया जाता है। स्थिर विदेशी विनिमय दरों पर यह आरोप लगाया जाता है। कि ये स्वतंत्र बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के निर्विघ्न प्रवाह को प्रोत्साहित करती हैं परन्तु इस तर्क की पुष्टि युद्धोपरान्त वर्षों के इतिहास द्वारा नहीं होती। दिन प्रतिदिन के उच्चावचन के बावजूद भी विदेशी विनिमय बाजार में मुद्रा मूल्य की प्रवृत्ति का समान्य अनुमान लगाया जा सकता

देश के भुगतान-शेष के संतुलन की स्थिति में विदेशी विनिमय दर में महत्वपूर्ण परिवर्तन की संभावना नहीं होती क्योंकि औसत व्यापार के लेन-देन में समय लगता है जबकि असंतुलन की स्थिति में बाजार के झुकाव का अनुमान लगाया जा सकता है। दोनों ही स्थितियों में अग्रिम विदेशी विनिमय बाजार आयातकर्ताओं को संरक्षण देते हैं।

द्वितीय, परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरों के समर्थक यह तर्क देते हैं कि ऐसी प्रणाली विदेशी विनिमय दरों को अपने प्राकृतिक स्तर, अर्थात् भुगतान-शेष में संतुलन को प्राप्त करने में सहायता प्रदान करती है।

तृतीय, परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरें आंतरिक संतुलन को समायोजित कर सकती है। तथा ये दरें बारम्बार आने वाले भुगतान-शेष के संकटों को स्थिर विदेशी विनिमय दरों की तुलना में अधिक प्रभावशाली ढंग से रोक सकती हैं। इसके परिणामस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय ऋणों पर उनका प्रभाव लाभप्रद होता है।

चतुर्थ, स्थिर विदेशी विनिमय दरें किसी भी मौद्रिक क्षेत्र के लिए आवश्यक नहीं हैं। स्टार्लिंग क्षेत्र उस क्षेत्रीय भुगतान समूह का नमूना है जिसका ढांचा ‘तीसा’ में पौण्ड स्टर्लिंग के विपरीत विनिमय दर स्वतंत्र विदेशी विनिमय बाजार में परिवर्तित होने में स्वतंत्र थी। स्टलिंग क्षेत्र के विभिन्न देश निश्चित आर्थिक राजनैतिक तथा समाजिक बंधनों से बंधे हैं तथा यदि क्षेत्र के सदस्यों के परामर्श के पश्चात् पौण्ड स्टलिंग की परिवर्तनशील विनिमय दर रहती है तो इन बंधनों में ढील नहीं आएगी।

परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरों की प्रणाली के अन्तर्गत भुगतान-शेष में समायोजन का कार्य घरेलू आय तथा मूल्यों की अपेक्षा विदेशी विनिमय दरों के द्वारा सम्पन्न किया जाता है। घरेलू आर्थिक नीतियों पर बिना कोई दबाव डाले बाह्य संतुलन को बनाए रखने की समस्या के संदर्भ में एक देश को विदेशी विनिमय की मांग तथा पूर्ति के द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक विदेशी विनिमय दर के अनुकूल होने देना चाहिए। परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरें देश को मौद्रिक व्यवस्था के संचालन में स्वतंत्रता प्रदान करती है।

इस प्रकार परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरों के विरुद्ध दिये गये कुछ प्रबल तर्क उनकी शक्ति के सामने धराशायी हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, स्थिर विदेशी विनिमय दरें अन्य दोषों के कारण महत्वहीन हो जाती है। एक स्थिर विदेशी विनिमय दर मुद्रा के अस्थिरीकरण को प्रोत्साहित करती है जिससे विदेशी विनिमय नियंत्रण के बावजूद मुद्रा की स्थिरता को खतरा उत्पन्न हो सकता  है तथा एक बार अवमूल्यन होने के संदेह के कारण मुद्रा इकाई के मूल्य में हांस हो जाने पर एक ही विनिमय दर को बनाए रखना असंभव हो जाता है। सट्टेबाजी ने, सितम्बर 1949 में पौण्ड- स्टलिंग के अवमूल्यन, या जून 1966 में भारतीय रुपये के अवमूल्यन या दिसम्बर 1971 तथा पुनः फरवरी 1973 में अमरीकी डालर के अवमूल्यन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। इसके अतिरिक्त, स्थिर विदेशी विनिमय दरों से दो देशों के मध्य वास्तविक लागत मूल्य के सम्बन्ध में ज्ञान नहीं हो सकता है। विदेशी विनिमय दरें केवल प्रारम्भिक दरों को ही प्रस्तुत करती है। जब देश विभिन्न आर्थिक नीतियों को अपनाते हैं तो लागत मूल्य सम्बन्ध बहुधा परिवर्तित हो जाता है। स्थिर विनिमय दरों तथा भूत के कुछ दशकों के अनुभवों के विरुद्ध सैद्धांतिक तर्क, परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरों के पक्ष में, स्थिर विनिमय दरों का त्याग करने की प्रेरणा देते

यह स्मरण रखने योग्य है कि कुछ समयावधि के अतिरिक्त कोई भी देश अपनी विदेशी विनिमय दर को अन्तर्राष्ट्रीय तथा बाहय आर्थिक दशाओं में दिन प्रतिदिन होने वाली उन्नति का अनकरण करने की अनमति देने का प्रयत्न नहीं करता है। ऐसी नीति को अपनाने के फलस्वरूप विदेशी विनिमय दर में अस्थिरता आ जाएगी और अस्थिरता का न केवल व्यापार पर वरन् देश की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्थ पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरें घरेलू अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए असंगत हैं। विदेशी विनिमय दरों में अनियंत्रित उच्चावचनों के कारण आयातों तथा निर्यातों के मूल्यों में भी उच्चावचन होते हैं। परिणामस्वरूप, कुछ वस्तुएं, जिनका पहले अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार नहीं होता था, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में सम्मिलित की जाती हैं जबकि कुछ अन्य वस्तुएं, जिनका पहले व्यापार किया जाता था, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से बहिष्कृत की जाती हैं। इसके फलस्वरूप न केवल अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का विकास तथा निर्विघ्न प्रवाह होगा वरन् अर्थव्यवस्था में उद्योगों में उत्पादन के साधनों का आबंटन विदीर्ण हो जाएगा। परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरों के कारण निर्यात तथा घरेलू बाजार के उद्योगों के मध्य उत्पादन के घरेलू साधनों में अस्थिर परिवर्तन होंगे, ये परिवर्तन विघ्न डालने वाले तथा अपव्ययपूर्ण हो सकते है।”

स्फीति की अवधि में परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरों के कारण अर्थव्यवस्था में अवमूल्यन तथा स्फीति का दुष्चक्र प्रारंभ हो जाता है। दूसरी ओर, जब तक आंतरिक मूल्यों में स्थायित्व नहीं आता है तब तक परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दरें मुद्रा के अधिमूल्यन को रोकने के लिए आवश्यक नहीं हैं। घरेलू मूल्य अस्थायित्व की दशाओं में विदेशी विनिमय दर का मूल्य, अपेक्षाकृत अधिक स्फीति में वृद्धि करते हुए गिरता है। इससे भी अधिक, यदि एक देश आर्थिक स्थिरता को कायम करने के उद्देश्य से मौद्रिक नीति को नहीं स्वीकार करता है तो उसकी परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दर में परिवर्तन एक निश्चित मूल्य के दायरे में न होकर हास्यमान प्रवृत्ति के दायरे में होंगे।

विदेशी विनिमय दर में अनियंत्रित उच्चावचन हानिप्रद हैं क्योंकि ऐसे उच्चावचन दीर्घकालीन विदेशी विनियोग के प्रवाह में बाधा उपस्थित करते हैं। जहां विदेशी ऋण, ऋणी देश की मुद्रा में लिए जाते हैं वहां साख प्रदान करने वाले देश को विदेशी विनिमय दर के उच्चावचनों के परिणामस्वरूप खतरे का सामना करना पड़ता है। ऋणदाता देश की मुद्रा में ऋण लिए जाते हैं तो परिवर्तनशील विदेशी विनिमय दर से ऋणी देश की मुद्रा के मूल्य में ह्रास, जो कि ऋणों के भुगतान में वृद्धि करता है, होने का खतरा बढ़ जाता है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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