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भाषा का शास्त्रीय अर्थ | भाषा के विविध रूप | भाषा के अन्य रूप

भाषा का शास्त्रीय अर्थ | भाषा के विविध रूप | भाषा के अन्य रूप

भाषा का शास्त्रीय अर्थ

भाषा विचाराभिव्यक्ति का वह साधन है जिसमें ध्वनियों का व्यवहार किया जाता है। विद्वानों के मतानुसार भाषा व्यक्ति ध्वनि संकेतों के द्वारा मानव-विचारों की अभिव्यक्ति है। मानव के मुख से निस्तृत प्रत्येक ध्वनि भाषा नहीं कहीं जाती है। केवल सार्थक एवं शब्द-निर्माण में समर्थ ध्वनियां ही ‘भाषा’ को परिधि में आती हैं।

भाषा का शास्त्रीय अर्थ, बहुत ही संकुचित अर्थ में किया जाता है। भाषा विज्ञान के अनुसार मनुष्य की वाणी जब ऐसी ध्वनियों का उच्चारण करती है, जो सार्थक होती है और विवेचन-विश्लेषण का विषय बन सकती है, उन्हीं ध्वनियों को भाषा कहा जा सकता है। सारांश यह है कि विचार अभिव्यक्ति के लिए व्यक्त ध्वनि संकेतों के व्यवहार को भाषा कहते हैं।

भाषा के विविध रूप

मुख्यत: इतिहास, भूगोल (क्षेत्र), प्रयोग, निर्माण, मानकता और मिश्रण इन छ: आधारों पर भाषा में अनेकरूपता दृष्टिगोचर होती है। भाषा के प्रमुख रूप इस प्रकार है-

  1. मूलभाषा- अत्यन्त प्राचीन काल में बहुत से लोगों के एक साथ रहने के अनेक स्थानों में से किसी एक स्थान पर उत्पन्न जिस भाषा से ही ऐतिहासिक तथा भौगोलिक कारणों से अनेक भाषाएँ तथा बोलियों आदि विकसित हुई होगी- वहीं मूलभाषा है। मूलभाषा से उत्पन्न भाषाओं, बोलियों तथा उपबोलियों को एक ‘परिवार’ की संज्ञा दी जाती है। इस आधार पर संसार में जितनी मूल भाषाएँ हैं, उतने ही भाषा परिवार हैं। उदाहरणार्थ भारोपीय परिवार की मूल भाषा भारोपीय थी। जब मूल स्थान की जनसंख्या कई शाखाओं में बँटकर अलग-अलग दिशाओं में चली तो प्रारम्भ में उनकी भाषा एक ही रही होगी परन्तु नवीन भौगोलिक परिस्थितियों का जीवन के समान भाषा पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। अतः दस-बीस पीढ़ियों के उपरान्त इन शाखाओं की भाषा में पर्याप्त अन्तर आ गया होगा। फिर इन शाखाओं को जनसंख्या में वृद्धि के कारण ये भी उपशाखाओं में बटकर भिन्न-भिन्न प्रदेशों की ओर चले गये होंगे और भौगोलिक परिस्थितियों ने उनके जीवन और अभिव्यक्ति के माध्यम से भाषा को प्रभावित किया होगा। इससे उनको भाषा एक दूसरे से कुछ न कुछ भिन्न हो गई होगी। जब यह क्रम और आगे बढ़ा होगा तो भाषाओं का अन्तर स्पष्ट दिखाई देने लगा होगा। फलतः एक हो मूल भाषा अनेक रूप धारण कर अनेक नामों में बंट गई होगी।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि यह भी सम्भव है कि कुछ शाखाओं-प्रशाखाओं की परम्परा और आगे बढ़ती गई और उनकी भाषा भिन्न-भिन्न रूप नाम महण करती गई। परन्तु इसके विपरीत कुछ की परम्परा लुप्त होने से आगे न बढ़ पाई तथा उनकी  भाषा भी विकसित न हो सकी। इसे मनुष्य जाति के विकास के सन्दर्भ में इस प्रकार समझा जा सकता है-एक पिता के चार पुत्र हैं। इनमें एक की सन्तान वृद्धि नहीं होती, एक की सन्तान होती है, एक की दो-तीन सन्तानें होती हैं और एक को सात-आठ सन्तानें हो जाती हैं। यह क्रम पुनः आगे इसी रूप में चलता है। तीन-चार पीढ़ी के उपरान्त जैसे वे सब एक-दूसरे से बहुत कुछ भिन्न हो जाते हैं, वही स्थिति भाषा की होती है।

  1. व्यक्ति बोली- व्यक्ति विशेष को बोली भाषा का एक लघुतम एवं संकीर्णतम रूप है। यूँ तो जिस प्रकार संसार की प्रत्येक वस्तु क्षण प्रतिक्षण बदलती रहती है, वैसे ही व्यक्ति की बोली में भी कुछ-न-कुछ (अदृश्य ही सही) परिवर्तन होता ही रहता है। अतः व्यक्ति बोली का सही अभिप्राय समय विशेष में व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त भाषा ही है।
  2. उपबोली अथवा स्थानीय बोली- सीमित क्षेत्र विशेष में फैली व्यक्ति बोलियों के सामूहिक रूप का नाम ही उपबोली अथवा स्थानीय बोली है। यह समूह उन व्यक्तियों बोलियों का होता है जिनमें कोई स्पष्ट अन्तर नहीं होता। किसी बोली के दक्षिणी, पश्चिमी क्षेत्र विशेष के रूप का नाम ही उपबोली है।

डॉ० भोलानाथ तिवारी ने उपबोली के लिए हिन्दी के कुछ भाषाविज्ञानियों द्वारा प्रयुक्त ‘बोली’ शब्द को अनुचित माना है क्योंकि उनके अनुसार यह मूलतः डाइलेक्ट (Dialect) न होकर सब डाइलेक्ट (sub Dialect) है। उन्होंने बाबू श्यामसुन्दर दास आदि द्वारा उपबोली के स्थान पर प्रयुक्त ‘पैटवा’ शब्द को भी असंगत बतलाया है। उसके अनुसार पश्चिमी विद्वानों ने पैटवा में चार बातों का निर्देश किया है- (क) बोली से अपेक्षाकृत लघु और स्थानीय, (ख) असाहित्यिक, (ग) असाधु तथा (घ) समाज के निम्न वर्ग द्वारा व्यवहृत ।

इन चारों तत्वों से स्पष्ट है कि ‘उपबोली’ शब्द हो सर्वथा संगत प्रयोग है।

  1. बोली और भाषा- बहुत सौ मिलती-जुलती उपबोलियों का सामूहिक रूप बोली और मिलती-जुलती बोलियों का सामूहिक रूप भाषा है। इस प्रकार एक भाषा क्षेत्र में कई बोलियाँ होती हैं और एक बोली में कई उपबोलियाँ होती हैं। जैसे हिन्दी क्षेत्र में खड़ी बोली, बज, अवधी तथा राजस्थानी आदि बोलियाँ हैं और एक राजस्थानी की मेवाड़ी, मारवाड़ी तथा जोधपुरी आदि उपबोलिया है।

हिन्दी के कुछ विद्वानों ने बोली के स्थान पर विभाषा, उपभाषा तथा प्रान्तीय भाषा प्रभृति शब्दों का प्रयोग किया है।

यद्यपि बोली का क्षेत्र भाषा के क्षेत्र से अपेक्षाकृत छोटा होता है, तथापि प्रकृति की दृष्टि से दोनों में अन्तर करना कठिन होता है। डॉ० तिवारी वोली को इस प्रकार परिभाषित करते हैं-“बोली किसी भाषा के एक ऐसे सीमित क्षेत्रीय रूप को कहते है जो ध्वनि, रूप, वाक्य-गठन, अर्थ, शब्द-समूह अथवा मुहावरे आदि की दृष्टि से उस भाषा के परिनिष्ठित तथा अन्य क्षेत्रीय रूपों से भिन्न होता है किन्तु इतना भिन्न नहीं कि अन्य रूपों के बोलने वाले उसे समझ न सकें, साथ ही जिजिसके अपने क्षेत्र म कहीं भी बोलने वालों के उच्चारण, रूप-रचना, वाक्य-गठन, अर्थ, शब्द-समूह तथा मुहावरों आदि में कोई स्पष्ट और महत्वपूर्ण भिन्नता नहीं होती।”

किसी भी बोली को ‘भाषा’ बनाने वाले तत्व निम्नलिखित हैं-

(क) जीवन्तता- किसी क्षेत्र की कुछ बोलियों के किन्हीं कारणों के नष्ट हो जाने पर अवशिष्ट जीवन्त बोली अधिक महत्व प्राप्त कर भाषा के गौरव से मण्डित हो जाती है।

(ख) साहित्यिक श्रेष्ठता- कुछ बोलियों में ऐसे समर्थ साहित्यकार साहित्य रचना करते हैं कि जिससे वह बोली अन्य बोलियों से विशिष्टता प्राप्त कर लेती हैं और ‘भाषा’ के रूप में समाहित होने लगती हैं।

(ग) धार्मिक श्रेष्ठता- किसी धर्म विशेष को अधिक मान्यता मिलने पर उस धर्म द्वारा अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में अपनाई जाने वाली बोली भी महत्व प्राप्त कर भाषा बन जाती है। उदाहरणार्थ आर्य समाज के प्रभाव के कारण खड़ी बोली को “आर्यभाषा” के रूप में मान्यता प्राप्त हो गई।

(घ) सामाजिक श्रेष्ठता- किसी बोली में बोलने वालों का उन्नत आर्थिक सामाजिक स्तर भी उनकी बोली को ‘भाषा’ का गौरव देने में सहायक होता है। उद्योग, व्यापार आदि में बढ़े चढ़े लोगों की बोली को अपनाने में दूसरे लोग प्रायः गौरव का ही अनुभव करते हैं। इससे उनकी बोली सहज में ही विकसित होकर भाषा बन जाती है।

(ङ) राजनैतिक स्थिति- राजनैतिक गतिविधि को केन्द्र स्थल की बोली निश्चित रूप से महत्व प्रहण कर शीघ्र ही भाषा बन जाती है। खड़ी बोली का अपनी अपेक्षा अधिक विकसित ब्रज, अवधी तथा मैथिली आदि बोलियों के स्थान पर भाषा बन जाने का कारण उसका भारत की राजधानी दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्र की भाषा होना है।

(च) अन्य कारण- उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त शिक्षा, प्रशासन तथा न्यायालय आदि में माध्यम के रूप में स्वीकृत बोली भी भाषा बन जाती है। ब्रिटिशकाल में ‘उर्दू” न्यायालय में प्रचलित होने के कारण विकसित होकर ‘भाषा’ बन गई।

(छ) क्षेत्रीय आधार- यहाँ यह उल्लेखनीय है कि कोई भी बोली भाषा तब बन पाती है जब उसके विभाजक तत्व अथवा अन्यान्य बोलियों से पृथक् करने वाली विशेषताएँ स्पष्ट हो जाती हैं और वह उन बोलियों के बोलने वालों के लिए भी सुबोध बनी रहती है।

जिस बोली को ये सभी तत्व सुलभ हो जाते हैं, यह बोली ‘भाषा’ का रूप ग्रहण कर लेती है। ‘खड़ी बोली’ तथा आधुनिक भारत की प्रान्तीय भाषाए-पंजाबी, मराठी, बंगाली आदि- इसके संजीव उदाहरण है। इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक भाषा अपने प्रारम्भिक रूप में बोली ही होती है और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि महत्व की स्थिति अल्पकालिक होती है। ‘ब्रज’ और ‘अवधी’ इनके उदाहरण हैं।

  1. विभाषा- जब कोई बोली अपना क्षेत्र विस्तृत करके परिमार्जित हो जाती है तथा परिनिष्ठित रूप में प्रयुक्त होने लगती है तथा एक बड़े क्षेत्र के निवासियों द्वारा बोली जाने लगती है, तब वह विभाषा कही जाने लगती है। जैसे अवधी और ब्रजभाषा। अवधी और बजभाषा ने जायसी, तुलसी और सूर के कारण बोली से विभाषा का पद प्राप्त किया। बोली का यह विकसित रूप बोली और भाषा के बीच की कड़ी है। जहाँ तक लिपि का प्रश्न है, विभाषा की कोई भी ‘लिपि’ विशेष नहीं होती। एक विभाषा बोलने वाला व्यक्ति दूसरी विभाषा को समझ सकता है, किन्तु एक भाषा भाषी दूसरी भाषा तब तक सकता जब तक नहीं समझ सकता जब तक उसने उसे लिपि ज्ञान सहित सीखा न हो। एक भाषा के भौगोलिक क्षेत्र के अन्तर्गत अनेक विभाषाएँ बोली जा सकती हैं। इसी कारण एडवर्ड सपीर (Edward Sapier) ने भाषा और विभाषा में कोई अन्तर नहीं माना है।
  2. मानक भाषा- इसे परिनिष्ठित, आदर्श अथवा टकसाली भाषा नाम भी दिए जाते हैं। शिक्षित वर्ग के लोगों की शिक्षा, साहित्य, कला तथा दैनिक व्यवहार की भाषा मानक-भाषा कहलाती है। मानक भाषा को ही प्रतिनिधि भाषा कहा जाता है।

मानक भाषा के रूप की निश्चितता के लिए उसे व्याकरण के नियमों में बांध दिया जाता है, जिससे उसका रूप स्थिर हो जाता है और वह धीरे-धीरे न केवल प्राचीन हो जाती है अपितु उसका विकास भी रुक जाता है। जब तक मानक भाषा परिवर्तन  सहन करती रहती है तब तक बहु भाषा बनी रहती है और जब उसमें संकीर्णता आ जाती है, तब कोई अन्य बोली उसे अपदस्य कर उसका रूप ग्रहण कर लेती है।

मानक भाषा का स्वरूप पूरे क्षेत्र में एक समान नहीं होता, उस पर प्रादेशिकता का कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य पड़ता है और इससे रूप-भिन्नता आ जाती है। इन प्रादेशिक रूपों के अतिरिक्त मानक भाषा के लिखित और मौखिक रूप भी भिन्नता लिए रहते हैं। जहाँ बोलचाल का रूप अपेक्षाकृत सरल, आक्य समास-रहित तथा छोटे-छोटे होते हैं। वहाँ लिखित रूप इससे भिन्न होता है। उच्चरित रूप सहज होता है तो लिखित रूप सर्वथा आयास-जन्य तथा कृत्रिम होता है। इसके अतिरिक्त उच्चरित रूप में प्रादेशिकता आ जाती है परन्तु लिखित रूप इस प्रभाव से प्रायः मुक्त हो होता है।

  1. अपभाषा- परिनिष्ठित भाषा की तुलना में विकृत अथवा भ्रष्ट समझी जाने वाली भाषा ‘अपभाषा’ कहलाती है। इस प्रकार की भाषा के रूप और वाक्य रचना आदि न केवल परनिष्ठित भाषा के प्रयोग से भिन्न होते हैं अपितु परिनिष्ठित भाषा से बहिष्कृत अथवा अगृहीत मुहावरों का तथा अश्लील समझे जाने वाले शब्दों का भी स्वतन्त्र प्रयोग होता है।
  2. राष्ट्रभाषा- जब कोई बोली आदर्श भाषा बनने के पश्चात् और अधिक उन्नत होकर अधिक महत्वपूर्ण बन जाती है तथा देश के सभी भाषा क्षेत्रों में सभी सार्वजनिक कार्यों में प्रयुक्त होने लगती है तो वह भाषा ‘राष्ट्रभाषा’ का गौरवपूर्ण पद पा जाती है। हिन्दी की इसी स्थिति के कारण उसे भारत की राष्ट्रभाषा’ का पद मिला है।
  3. विशिष्ट भाषा- वर्ग विशेष में प्रयुक्त भाषा विशिष्ट भाषा कहलाती है। इस प्रकार की भाषा का मूल रूप तो आदर्श भाषा का रहता है परन्तु अर्थ, प्रयोग और मुहावरों में वर्ग विशेष की छाप रहती है। इसी से वह ‘व्यापारियों की भाषा’, ‘विद्यार्थियों की भाषा’ तथा ‘किसानों की भाषा’ आदि नाम महण करती है।
  4. कृत्रिम भाषा- कुछ सीमित व्यक्तियों के गुप्त अथवा सामान्य व्यवहार के प्रयोजन विशेष के लिए निर्मित भाषा कृत्रिम भाषा कहलाती है। इसमें शब्दों के सामान्य प्रचलित अर्थ से भिन्न अर्थ निश्चित कर लिए जाते हैं और फिर दूसरों की उपस्थिति में भी उनसे गुप्त रखते हुए उन शब्दों से विचार-विनिमय किया जाता है। उदाहरणार्थ ‘नारायण’ का अर्थ- ‘नाले में फेंकना’, ‘दामोदर’ का अर्थ- ‘गले में रस्सी डाल कर बाँधना’, ‘वासदेव’ का अर्थ- ‘लाठी से पिटाई करना’ आदि निश्चित कर लेने पर साथियों को वैसे ही निर्देश दिए जाते हैं। इस प्रकार की कृत्रिम भाषा कई अन्य प्रकार से भी बनाई जाती है। इसका एक उद्देश्य प्रायः दूसरों से छिपाकर अपने कथ्य को सम्प्रेष्य बनाना होता है।

भाषा के कुछ अन्य रूप

भाषा के उपर्युक्त प्रधान रूपों के अतिरिक्त कुछ गौण (भाषा विज्ञान में अपेक्षाकृत कम प्रचलित) रूप इस प्रकार से हैं-

  1. साहित्यिक भाषा – साहित्य में प्रयुक्त होने वाली आदर्श भाषा जिसमें अलंकारों और मुहावरों आदि का प्रयोग रहता है।
  2. जीवित भाषा- प्रयोग और प्रचलन की भाषा।
  3. मृतभाषा- भूतकाल में कभी प्रचलित परन्तु आज जिसका प्रचलन नहीं अथवा नहीं के बराबर है। कुछ लोग ‘संस्कृत’ को इस प्रकार की भाषा मानते हैं।
  4. राजभाषा- सरकारी काम-काज की भाषा, जिसका सामान्य रूप राष्ट्र भाषा का होता है परन्तु शासकीय आवश्यकता के अनुसार नये शब्दों का निर्माण होता रहता है। संसद, परिवहन, अध्यादेश, अकादमी, मुख्यालय, आकाशवाणी तथा दूरदर्शन आदि इसी प्रकार के शब्द हैं।
  5. जातिभाषा- व्यवसाय अथवा प्रजाति विशेष द्वारा परम्परागत रूप में प्रयोग में लाई जाने वाली भाषा। जैसे-ब्राह्मणों की भाषा, कायस्थों की भाषा, कहारों की भाषा आदि।
  6. स्त्री-भाषा- स्त्रियों द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली भाषा।
  7. पुरुष- भाषा- पुरुषों द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा।

(आज से कुछ समय पूर्व स्त्री शिक्षा के प्रचलन के अभाव के कारण स्त्रियों की भाषा एक प्रकार से ग्राम्यता लिए रहती थी। संस्कृत नाटकों में उच्च वर्ग के पुरुष पात्र संस्कृत बोलते हैं और निम्न वर्ग के पुरुष और स्त्रियाँ प्राकृत का व्यवहार करती है।)

  1. मिश्रित भाषा- जब दो भिन्न प्रदेशों के व्यक्ति एक-दूसरे के व्यवहार में आते हैं तो दोनों की भाषाओं की एक खिचड़ी बन जाती है। हिन्दी भाषा बंगला भाषी से मिलने पर ‘नमस्कार’ को ‘नमस्कार’ अथवा नमष्कारम्, भाई के लिए ‘दादा’ शब्दों का प्रयोग करने लग जाता है।
  2. सहायक भाषा- प्रयोग व्यवहार में न रहने पर आधार अथवा ज्ञानवदुर्धन के लिए अपनाई जाने वाला भाषा सहायक भाषा है। संस्कृत का प्रचलन भले न हो परन्तु नये शब्द रूपों के लिए हिन्दी संस्कृत पर ही निर्भर है।
  3. सम्पूरक भाषा- कार्य विशेष के लिए सीखी जाने वाला भाषा सम्पूरक भाषा है।
  4. परिपूरक भाषा- सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति करने वाली भाषा परिपूरक भाषा है। जैसे भारत में अंग्रेजी का ज्ञान आज के भारत की सामाजिक आवश्यकता है।
  5. तुल्यभाषा- मातृभाषा के स्थान पर अथवा मातृभाषा के रूप में अपनायी जाने वाली भाषा तुल्य भाषा कहलाती है। भारत देश में और विदेशों में अपनी मातृभाषा व स्थानापन्न अंग्रेजी का प्रयोग करते देखे जाते हैं। इस रूप में आज अंग्रेजी तुल्य भाषा है।
  6. सम्पर्क भाषा- देश के विभिन्न प्रान्तों के भिन्न-भिन्न भाषा-भाषियों के साथ क्षेत्र तथा इन राज्यों के पारस्परिक सम्बन्ध योजना की भाषा का नाम सम्पर्क भाषा है। भारत में यह कार्य आज तक अंग्रेजी करती रही है परन्तु अब उसका स्थान हिन्दी लेती जा रही है।
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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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