राजनीति विज्ञान / Political Science

डेविड ईस्टन का सिद्धान्त | ईस्टन के व्यवस्था-विश्लेषण की प्रमुख विशेषताएँ | ईस्टन का व्यवस्था-विश्लेषण

डेविड ईस्टन का सिद्धान्त | ईस्टन के व्यवस्था-विश्लेषण की प्रमुख विशेषताएँ | ईस्टन का व्यवस्था-विश्लेषण | ईस्टन के व्यवस्था-सिद्धान्त का मूल्यांकन | डेविड ईस्टन के आगत निर्गत विश्लेषण

डेविड ईस्टन का सिद्धान्त

(The Theory of Easton)

ईस्टन ने व्यवस्था की परिभाषा करते हुए कहा है-“राजनीतिक व्यवस्था वह व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत हम किसी भी समाज की उन अन्त क्रियाओं का अध्ययन करते हैं जो न केवल समाज में साधिकारिक विवरण का आधार होते हैं वरन् व्यावहारिक भी होते हैं।”

ईस्टन का व्यवस्था-सिद्धान्त अनेक नामों से पुकारा गया है-

(i) निर्देश-निर्गत विश्लेषण (Input-Output Analysis) |

(ii) व्यवस्था-सिद्धान्त (System Analysis) ।

(iii) सामान्य व्यवस्था सिद्धान्त का प्रवाह रूप (Flow-model of General System Theory) |

यंग (Young) ने इसे एक बड़े व्यवस्थात्मक उपागम की संज्ञा दी है। यह राजनीति विज्ञान की मौलिक दृष्टि द्वारा प्राप्त किया गया है। मीहान (Meehan) ने ईस्टन को राजनीति विज्ञान का सर्वाधिक प्रसंगत और सुव्यवस्थित प्रकार्यवादी कहकर पुकारा है। उसके विश्लेषण की आधारभूत इकाई व्यवस्था है। ईस्टन ने अन्तर (Inter) तथा आन्तर (Intra) व्यवस्थाओं के व्यवहार को अपने अध्ययन का विषय बनाया है।

ईस्टन ने व्यवस्था-सिद्धान्त का सृजनात्मक पक्ष ग्रहण किया है। उसने व्यवस्था को विशिष्ट समस्याओं अथवा व्यवस्थाओं के विश्लेषण में प्रयुक्त नहीं किया है। उसके अनुसार व्यवस्था विचारधारात्मक, विश्लेषणात्मक और अमूर्त अवधारणा है।

ईस्टन के व्यवस्था-विश्लेषण की प्रमुख विशेषताएँ

(Characteristics of Easton’s System Analysis)

ईस्टन के व्यवस्था विश्लेषण सिद्धान्त की मुख्य विशेषतायें निम्न प्रकार हैं:-

  1. राजनैतिक व्यवस्था अन्तक्रियाओं का एक समुच्चय है जो सामाजिक व्यवहार की पूर्णता से निकाला गया है तथा जिसके द्वारा किसी समाज के लिये मूल्य वितरित किये जाते हैं (A political system is a set of inter-actions abstracted from the totality of social behaviour through which values are allocated for a society)। इस प्रकार ईस्टन ने राजनीति की एक नवीन परिभाषा दी है। उसने अपने सिद्धान्तों में मूल्यों के सत्तात्मक वितरण पर बल दिया है। ‘सत्तात्मक’ (Allocation) का अभिप्राय सत्तायुक्त अथवा शक्ति रखने वाले व्यक्तियों के निर्णयों (Decisions) से है। केवल यही सत्तायुक्त व्यक्ति बाध्यकारी नियमों का निर्माण करते हैं।
  2. प्राकृतिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं में कतिपय सामान्य गुण अथवा धर्म है (There are certain properties common to both natural and social system)- जिस प्रकार प्राकृतिक व्यवस्थाओं में कुछ गुण एवं धर्म होते हैं, उसी प्रकार सामाजिक व्यवस्थाओं में भी गुण तथा धर्म होते हैं। ये गुण तथा धर्म उन्हें किसी भी आने वाले विज का सामना करने की शक्ति प्रदान करते हैं। ।
  3. राजनीतिक व्यवस्था स्थिर न होकर गतिशील व्यवस्था है (Political System is not static but a dynamic phenomenon)- यदि राजनीतिक व्यवस्था स्थिर हो जाये तब वह व्यर्थ हो जाती है। परिवत्र्यों में परिवर्तन होता रहता है। प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है; अतः इसका स्वरूप तथा गुण भी परिवर्तनशील है।
  4. राजनीतिक व्यवस्था एक मुक्त व्यवस्था है जो पर्यावरण से प्रभावित होती रहती है (A Political System is open system influenced by environment)- पर्यावरण में निरन्तर परिवर्तन आते रहते हैं। ये. पर्यावरण राजनीतिक व्यवस्था पर प्रभाव डालते रहते हैं जिसके परिणामस्वरूप वह भी परिवर्तित होती रहती है।
  5. राजनीतिक व्यवस्था अपने पर्यावरण से चुनौती पाती रहती है (A Political System gets challenges from its environment)- पर्यावरण परिवर्तित होता रहता है। राजनीतिक व्यवस्था उससे चुनौती पाते रहने के कारण स्वयं को उसके अनुसार ढालती है।
  6. राजनीतिक दशा किसी भी दशा में सम्भव हो सकती है यदि निवेश और निर्गत में उचित सन्तुलन हो (Political System may be in a steady if there is proper balance between outputs and inputs)- राजनीतिक व्यवस्था के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण दशायें निवेश तथा निर्गत मध्य उचित सन्तुलन का विद्यमान होना है।
  7. राजनीतिक व्यवस्था निर्णायक क्षेत्र में वास करती है (Political System lives in a critical range)- निवेश तथा निर्गत के मध्य सदैव उचित सन्तुलन होना आवश्यक नहीं है। यह भी सम्भव है कि निवेश अधिक हो एवं निर्गत अत्यल्प जिसके परिणामस्वरूप व्यवस्था के टूटने की स्थिति आ पहुंचे।
  8. राजनीतिक व्यवस्था के लिए कुछ संरचनात्मक आधार चाहिये, वे आधार संस्थात्मक व्यवस्था के रूप में भी सम्भव हैं (The survival of a Political System requires certain structural basis, these structural basis may be in the form of institutional arrangements) राजनीतिक व्यवस्था कुछ संरचनात्मक आधारों पर निर्भर करती है। ये आधार संस्थात्मक व्यवस्था के रूप में भी हो सकते हैं।
  9. राजनीतिक व्यवस्था के उद्देश्य-राजनीतिक समुदाय, शासन व्यवस्था और सत्ता (Objects of the political system-political community, regime and authorities)- राजनीतिक व्यवस्था के निम्नलिखित तीन उद्देश्य हैं (a) राजनीतिक समुदाय (Political Community), (b) शासन व्यवस्था (Regime) तथा (c) सत्ता (Authority)
  10. राजनीतिक व्यवस्था में उपव्यवस्थाओं का निहित होना (The Political System consists of sub-systems)- राजनीतिक व्यवस्था में व्यवस्था के अतिरिक्त उपव्यवस्थायें भी होती हैं, उदाहरणार्थ वे समूह जो विनिश्चयन प्रक्रिया के अन्तर्गत होते हैं।

ईस्टन का व्यवस्था-विश्लेषण

(System Analysis of Easton)

अन्त क्रियाओं के समुच्चय से ईस्टन चार महत्वपूर्ण अवधारणाओं की प्राप्ति करता है-

  1. व्यवस्था (System)|
  2. पर्यावरण (Environment)|
  3. अनुक्रिया (Response)।
  4. प्रतिसम्भरण (Feedback)।

1. व्यवस्था (System)- व्यवस्था सामान्यतः व्यवस्थाओं की सीमा के पार वातावरण से तथा परस्पर अन्त क्रिया करने वाली संरचनाओं तथा प्रतिक्रियाओं का समुच्चय है। यह समाज के लिये मूल्यों का साधिकार विनिधान, समाज के उद्देश्यों की प्राप्ति एवं राजनीतिक कार्यों का सम्पादन करती है। राजनीतिक व्यवस्थायें सर्वत्र विद्यमान होती हैं। रूप कोई भी हो सकता है। व्यवस्था के अन्तर्गत समस्त प्रक्रियायें औपचारिक तथा अनौपचारिक, प्रकार्य संरचनायें, मूल्य, आचार आदि सम्मिलित हो जाते हैं। राजव्यवस्था समाज-व्यवस्था की उपव्यवस्था है। इसी प्रकार राजव्यवस्था में अनेक उप-व्यवस्थाएँ होती हैं।

2. पर्यावरण (Environment)- यह आवश्यक है कि राजव्यवस्था मुख्य व्यवस्था होने के नाते वातावरण के प्रति अनुक्रिया करती रहे । पर्यावरण दो प्रकार का होता है-

(i) समाज बाह्य पर्यावरण (Extra-societal Environment)|

(ii) समानान्तर पर्यावरण (Intra-societal Environment) ।

प्रथम वर्ग में अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थिति, व्यवस्थायें तथा अन्तर्राष्ट्रीय सामाजिक व्यवस्थायें सम्मिलित हैं। दूसरे वर्ग में पारिस्थितिक, प्राणीशास्त्रीय, व्यक्तित्वपरक, सामाजिक, सांस्कृतिक, समाज संरचनात्मक तथा जनसंख्यात्मक व्यवस्थायें सम्मिलित हैं।

  1. अनुक्रिया (Response)- प्रत्येक राजव्यवस्था में अपने वातावरण के प्रति अनुक्रिया की जाती है। वह दो प्रकार के कार्य करती है-

(i) समाज के हेतु मूल्यों का विनिधान ।

(ii) अपने अधिकांश सदस्यों को इन विनिधानों का बाध्यकारी स्वीकार करने हेतु प्रेरित करने का प्रबन्ध।

राजव्यवस्था पर निरन्तर विभिन्न प्रकार के दबाव पड़ते रहते हैं। इन दबावों का सामना करने हेतु व्यवस्था अनेक अनुक्रियायें करती है। यदि राजव्यवस्था इन दबावों का सामना करने में समर्थ न हो सके तब व्यवस्था समाप्त हो जाती है। अत: राजव्यवस्था में निहित दबावों का सामना करने की क्षमता का निरन्तर मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है।

निवेश एवं निर्गत (Input and Output)-  वे अनुक्रियायें जो व्यवस्था पर्यावरण द्वारा डाले जाने वाले दबावों, प्रभावों आदि का सामना करने के लिये करती हैं, निवेश एवं निर्गत अनुक्रियायें कहलाती हैं। पर्यावरण से उत्पन्न समस्त दबाव, प्रभाव, माँग, संकट आन्दोलन आदि निवेश कहलाते हैं। इनका सामना व्यवस्था द्वारा किया जाता है। व्यथास्था निवेशों को प्रक्रमित करके उन्हें निर्गतों में परिवर्तित कर देती है। निर्गत पर्यावरण को सन्तुष्ट करने का प्रयास करते हैं। सन्तुष्ट हो जाने पर व्यवस्था को समर्थन प्राप्त हो जाता है। इसके विपरीत सन्तुष्टि प्राप्त न होने पर व्यवस्था का विरोध हो जाता है।

निवेश को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

(i) माँगें (Demand),

(ii) समर्थन (Support)|

(i) माँगें (Demand)-  माँगों के अन्तर्गत कार्य, दायित्व, विधि-निर्माण, सेवायें, आशा- पूर्ति, प्रदर्शन आदि सम्मिलित हैं जो पर्यावरण द्वारा राजव्यवस्था से कराये जाते हैं। ईस्टन ने इनको ‘मूल्यों का वितरण या विनिधान’ की संज्ञा दी है। इन मांगों पर मात्रा, विषय वस्तु, तीव्रता, स्रोत, प्रकार आदि के दृष्टिकोण से विचार किया जाता है। राजव्यवस्था निवेश सपरिवर्तन एवं माँग दबावों का सामना करने के उद्देश्य से कुछ नियामक तत्वों की रचना करती है। उदाहरण के लिये संरचनात्मक तन्त्र (Structural Mechanism), सांस्कृतिक तन्त्र (Cultural Mechanism), संचार माँगें (Communication Channels) तथा विभिन्द्र न्यूनीकरण प्रक्रियायें (Reduction processes) आदि।

(ii) समर्थन (Support)- समर्थन से सम्बन्धित निवेश व्यवस्था और पर्यावरण के मध्य माँगों को निकाल देने के पश्चात् शेष बचे निवेश हैं।

राजव्यवस्था का तीन विशिष्ट वस्तुओं के प्रति समर्थन होता है-

(i) राजनीतिक श्रम-विभाजन पर आधारित राजनीतिक समुदायों के सम्बन्ध में,

(ii) राजव्यवस्था के आधारभूत मूल्यों, राजनीतिक संरचना तथा मानकों के प्रति,

(iii) किसी निर्दिष्ट समय पर शक्ति धारण करने वाले राजनीतिक व्यक्तियों के प्रति।

निर्गत सत्ताधारकों के वे कार्य हैं जिनके द्वारा शासक राजनीतिक समुदाय की माँगों को या स्वयं उन्हीं के द्वारा प्रस्तावित माँगों को रूपान्तर प्रक्रिया के माध्यम से पूरा करने के प्रयास करते हैं। उदाहरणार्थ कर का उगाहना, सार्वजनिक व्यवहार और आचरण का नियमन, सम्मान, वस्तुओं, सेवाओं आदि का विनिधान अथवा वितरण आदि।

  1. प्रतिसम्भरण (Feedback)- प्रतिसम्भरण राजनीतिक व्यवस्था की वे प्रतिक्रियायें हैं जो व्यवस्था के भावी समायोजन के लिये उसको विद्यमान घटनाओं के ज्ञान का लाभ प्राप्त करने के योग्य बनाती हैं। प्रतिसम्भरण व्यवस्था की सततता को भी बनाये रखने में सहायक सिद्ध होता है।

ईस्टन के व्यवस्था-सिद्धान्त का मूल्यांकन

(Evaluation of Easton’s Theory of System Analysis)

ईस्टन के व्यवस्था सिद्धान्त की आलोचना निम्नलिखित प्रकार से की गई:-

(i) अपूर्ण सिद्धान्त (Incomplete Theory)- ईस्टन का प्रारूप (Model) केवल द्वितीय स्तरों के परिवर्तनों का ही विश्लेषण कर सका है। इसके द्वारा क्रांतिकारी परिवर्तनों, वृद्धि (Growth), पतन (Decline), निपात (Downfall), विभंग (Disruption) आदि परिवर्तनों तथा घटनाओं का विश्लेषण नहीं किया जा सकता।

(ii) सीमित (Limited)- ईस्टन की व्यवस्था सततता की सीमाओं से आगे नहीं जा सकती। वह उसी तक सीमित है। ईस्टन ने अपने अध्ययन में अमूर्त और विश्लेषणात्मक व्यवस्थाओं पर ही विचार प्रस्तुत किये हैं। उसने मानव-व्यवहार के मूर्त प्रतिमानों के अध्ययन की उपेक्षा कर दी है। इसी कारण उसके सिद्धान्त में महत्वपूर्ण तथ्य जैसे मतदान (Election), नेतृत्व (Leadership) आदि से सम्बन्धित राजनीति के विषयों पर कोई प्रकाश नहीं डाला गया है, जो एक गम्भीर कमी है।

(iii) संदिग्ध सफलता (Success Doubtful)- ईस्टन ने अपने व्यवस्था सिद्धान्त का निर्माण करते समय एक एकीकृत सिद्धान्त की आशा व्यक्त की थी, पर उसकी यह आशा पूर्ण होती प्रतीत नहीं होती । सततता के दृष्टिकोण से भी उसको पूर्ण तार्किक एवं आनुभविक आधार पर सर्वभावी व्यवस्था के प्रश्नों पर विचार प्रस्तुत करने में पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हो सकी है।

(iv) विवरणात्मक प्रश्नों की उपेक्षा (Distributive Question Neglected)- ईस्टन ने अपना ध्यान समग्र व्यवस्था के समावेशक प्रश्नों पर ही केन्द्रित किया है। परिणामतः ईस्टन इस अध्ययन में सफलता प्राप्त नहीं कर सका है कि किसे क्या प्राप्त होता है ? दूसरे शब्दों में वह विनिधानात्मक अथवा वितरणात्मक प्रश्नों का अध्ययन करने में असमर्थ रहा है।

(v) कमियाँ (Shortcomings)- ईस्टन के सिद्धान्त में व्यक्तियों, व्यक्ति समूहों तथा व्यक्ति के कार्यों को भी उपयुक्त स्थान प्राप्त नहीं हो सका है। वस्तुतः वह कुछ पेंचीदगियों में फैसे रहने के कारण अनेक क्षेत्रों में लक्ष्य की प्राप्ति में सफल नहीं हो सका है और न ही उनकी प्रक्रियाओं आदि का ही अध्ययन कर सका है। उसकी अपनी आन्तरिक कमजोरियों के कारण उसका निवेश-निर्गत विश्लेषण राजनीति का सामान्य सिद्धान्त नहीं बन सका है। उसने कतिपय महत्वपूर्ण राजनीतिक तथ्यों को भी बिना अध्ययन के त्याग दिया है।

(vi) असंगतता (Inconsistencies)- इस सिद्धान्त में विभिन्न दोष जैसे स्थितिवादिता, औपचारिकता और बुद्धिवादिता का भी समावेश हो गया है। उसने सूचीकरण पर अत्यधिक बल दिया है। परिणामत: उसकी राजनैतिक व्यवस्था का स्वरूप विद्रूप हो गया है। वह राजनीतिक व्यवस्था एवं अराजनीतिक व्यवस्था के मध्य अन्तर- भी नहीं कर सका है। उसे व्यवस्था की अवधारणा का पूर्ण विकास करने में सफलता प्राप्त नहीं हो सकी है। उसकी यह अवधारणा अभी तक व्यवहार में नहीं लायी जा सकी है। वह यह नहीं सिद्ध कर सका है कि राष्ट्रीय सरकार जैसी राजनीतिक संस्था किस प्रकार व्यापारिक संस्था अथवा क्लब-जैसी अराजनीतिक संस्था से भिन्न है। वह राजनीतिक जीवन की व्यवहार-व्यवस्था का सामान्य सिद्धान्त निर्मित करने का दावा करता है पर वह सिद्ध नहीं कर सका है कि किस प्रकार सततता का विशिष्ट पक्ष ग्रहण कर यह सम्भव हो सकता है।

उसने अग्रसर होने से पूर्व कतिपय अवधारणाओं का स्वतः ही निर्माण कर लिया है। ये अवधारणायें अन्योन्याश्रित हैं। परिणामतः उसका सिद्धान्त एक उच्च आनुभविक संगति न बनकर एक अमूर्त संरचना ही बन कर रह जाता है। यह अमूर्त संरचना संन्देहपूर्ण, अवधारणात्मक रूप से धुंधली और आनुभविकता के दृष्टिकोण से अनुपयोगी है।

योगदान (Contribution)-

तथापि ईस्टन के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता। उसे राजनीति में व्यवस्था विश्लेषण के प्रतिपादन करने का श्रेय प्राप्त है। इस सिद्धान्त के अन्तर्गत उसने अनेक उपयोगी धारणायें विकसित की हैं। उसका प्रयास सदैव ही राजनीतिक जीवन को व्यवहार-व्यवस्था का सामान्य सिद्धान्त बनाने की दिशा में रहा है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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