इतिहास / History

मध्य पूर्वी गंगाघाटी की नवपाषाणिक संस्कृति में संबंध | मध्य पूर्वी गंगाघाटी की विंध्य घाटी की पाषाणिक संस्कृति में संबंध | मध्य पूर्वी गंगाघाटी की नवपाषाणिक तथा विंध्य घाटी की पाषाणिक संस्कृति में संबंध

मध्य पूर्वी गंगाघाटी की नवपाषाणिक संस्कृति में संबंध | मध्य पूर्वी गंगाघाटी की विंध्य घाटी की पाषाणिक संस्कृति में संबंध | मध्य पूर्वी गंगाघाटी की नवपाषाणिक तथा विंध्य घाटी की पाषाणिक संस्कृति में संबंध

मध्य पूर्वी गंगाघाटी की नवपाषाणिक तथा विंध्य घाटी की पाषाणिक संस्कृति में संबंध

इस संस्कृति का प्रसार क्षेत्र दक्षिणी बिहार का क्षेत्र है। इसका मुख्य पुरास्थल सारन जिले में स्थित चिरांद है। घिसकर पालिश किये गये गोलाकार नवपाषाण उपकरणों (Ground Polished Rounded Neolithic Celts) की संख्या इस संस्कृति में कम है, पर हड्डियों और मृग शृंगों के विभिन्न प्रकार के उपकरण उल्लेखनीय है- सुईयाँ (Needels), शर (Points) छिद्रक (Borers), पिन्स (Pins), पुच्छल एवं छिद्रयुक्त बाणाग्र (Tanged and Socketed Arrow heads), स्क्रेपर और लटकन (Pendant)| सामान्तर बाहु ब्लेड, अर्धचान्द्रिक (Lunate) शर आदि लघुपाषाण उपकरण (Microliths) हैं। घिसकर बनाये हुए प्रस्तर उपकरणों में सेल्ट तथा सिल-लोढ़े (Grinding Stones) की गणना की जा सकती है।

चिरांद के नवपाषाणकालीन लोगों के कलात्मक अभिरुचि को अभिव्यक्त करने वाले उपकरणों में उपरत्नों (Sem-precious Stones) पर बने सुन्दर मनके (Beads) और लटकन (Pendant) टेराकोटा और हड्डियों की चूड़ियों एवं पशु-पक्षी तथा नाग की मृणमूर्तियों का उल्लेख किया जा सकता है।

उदग्र उत्खनन (Vertical excavation) के कारण स्वभवतः घरों की रूपरेखा स्पष्ट नहीं हो पायी, पर संभवतः बांस-बल्ली के आधार पर लगभग वृत्ताकार झोपड़ियाँ बना कर लोग निवास करते थे।

यहाँ जली मिट्टी के टुकड़ों में धान की भूसी के प्रमाण मिलते हैं। गेहूं और मूंग से भी ये लोग परिचित थे। इस काल की पोंटरी मुख्यतः हस्तनिर्मित लाल, भूरी, वर्निश्ड ब्लैक एण्ड रेड वेयर है। एप्लीकं रेखांकन या लाल गेरू से यहाँ की पोटरी को अलंकृत (Decorate) भी किया गया है।

घिसकर पालिश किये गये गोलाकार नवपाषाण उपकरणों, हड्डी के उपकरणों एवं कतिपय पॉटरी में विंध्य क्षेत्र के गोलाकार नवपाषाण उपकरणों तथा पॉटरी में बहुत साम्य है। किन्तु डोरी छाप पाटरी यहाँ नहीं है।

इस संस्कृति का प्रारम्भ, द्वितीय सहस्त्राब्दी के प्रारम्भिक चरण में रखा जा सकता है (1900 से 1600 ई०पू०)

छोटा नागपुर पठार-

उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिले, बिहार, उड़ीसा और पश्चिमी बंगाल को इस संस्कृति का क्षेत्र माना गया है। बरूडीह और कुचाई दो उत्खनित स्थल है। कुचाई के आधार पर इस संस्कृति के लक्षणों को आंका गया है। जहाँ से घृष्ट गोला समतल कुल्हाड़ियाँ (Gound rounded-butt axes), फलकित कुदाल (Facetted Hoe), छेनी (Chisels) तथा गदाशीर्ष पाउण्डर और ग्राइण्डिंग स्टोन के साथ मोटी बालुकायुक्त पॉटरी और नारंगी-भूरी (Orange-brown) पॉटरी मिली है। यहाँ पर पशु-पालन और कृषि के प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन गदाशीर्ष, ग्राइण्डिंग स्टोन और पाउण्डर से अन्न उत्पादन का आभास होता है।

असम, चित्तगांग, उप हिमालय और दार्जिलिंग क्षेत्रों में प्रसारित इस संस्कृति में आवास-स्थलों से भूरे रंग (Gray or Brown) का कॉर्डेड वेयर, स्कंधयुक्त गोले समन्तान्त वाली घर्षित कुल्हाड़ियाँ (Shouldered and round butt ended Ground axes) लोढ़ा और मूसल (Muller and pestles) आदि प्राप्त हुए हैं। कृषि और पशुपालन के प्रत्यक्ष प्रमाण इस संस्कृति से भी नहीं उपलब्ध हुए हैं, लेकिन झूम कृषि (Slash and burn) संभवतः इसी काल से इस क्षेत्र में होती जा रही है।

तिथि निर्धारक अन्य सामग्रियों के अभाव में, तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर राउण्डेड सेल्ट और कॉर्डेड वेयर की, इस संस्कृति को, द्वितीय सहस्त्राब्दी के प्रथम चरण में निर्धारित कर सकते हैं।

मध्यगंगा घाटी के दक्षिणवर्ती पठारी प्रदेश, बेलनघाटी एवं विंध्य की उत्तरवर्ती पाद पहाड़ियों तथा पठार, जिसमें वाराणसी, दक्षिण मिर्जापुर, दक्षिण इलाहाबाद तथा सोन घाटी तथा रीवा का त्योंथर का क्षेत्र सम्मिलित है, नवपाषाणिक मानव के उद्भव एवं विकास का स्थल रहा है। समय-समय पर इस क्षेत्र में त्रिकोणात्मक ओपदार कुल्हाड़ियाँ (Celt) जिनका कि प्रसार दक्षिण भारत में है धरातल से प्रतिवेदित होते रहे हैं। इनके अतिरिक्त इसी क्षेत्र से गोलाकार समन्तान्त की कुल्हाड़ियाँ भी यदाकदा मिलती थीं। इनकी स्थिति तथा अन्तर्सम्बन्ध को समझने के लिए प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शर्मा के नेतृत्व में इस क्षेत्र का सघन सर्वेक्षण किया तथा कोलडिहवा, महगड़ा, पंच्चोह, इन्दारी, कुनझुन, टोकवा आदि स्थलों पर उत्खनन भी किया जिसके फलस्वरूप इस सम्पूर्ण क्षेत्र की नवपाषाणिक संस्कृति पर यथेष्ट प्रकाश पड़ा है। उपर्युक्त स्थलों में कोलडिहवा तथा महगड़ा इस क्षेत्र का पूर्णतया प्रतिनिधित्व करते हैं।

पशुपालन भी इनकी अर्थव्यवस्था का प्रमुख साधन था। ये भेड़, बकरी तथा मवेशियों को पालते थे। इस सम्बन्ध में यहाँ से प्राप्त पशुबाड़ा विशेष उल्लेखनीय है। जिसमें मवेशियों, बकरी/भेड़ के खुर के निशान भी मिले हैं। पशुबाड़ा लगभग आयताकार था। यह 12.5 x 7.5 मीटर (उत्तर-दक्षिण) लम्बा चौड़ा था। बाड़े में 28 विविध प्रकार के (10 से०मी० से 15 से०मी०) स्तम्भगर्त बाड़े के चारों ओर 1.08 मीटर की औसत दूरी पर मिले हैं। गर्मों की दूरी के आकलन से प्रतीत होता है कि इसमें तीन प्रवेश द्वार थे जो क्रमशः 2.25 मी० 1.55 मी० तथा 1.50 मी० चौड़े थे। प्रवेश द्वार के दोनों तरफ मोटे खम्भे रहे होंगे जिनकी औसत मुटाई लगभग 15 से०मी० थी। बाड़े के ऊपर किसी भी प्रकार का छाजन नहीं था। बाड़े के भीतर की मिट्टी भी अपेक्षाकृत अधिक काली थी। इसमें कोई उपकरण अथवा मृद्भाण्ड के अवशेष नहीं मिले। बाड़े के चारों ओर आवासों के प्रमाण मिले थे।

यहाँ से प्राप्त मृदभाण्डों को चार स्पष्ट वर्गों में विभाजित कर सकते हैं। 1. रस्सीछाप युक्त पात्र परम्परा, 2. खुरदरी पात्र परम्परा, 3. ओपदार लाल पात्र परम्परा तथा 4. ओपदार काली पात्र परम्परा। सभी मृद्भाण्ड हस्तनिर्मित तथा अधपके हैं। बर्तनों में गहरे अथवा छिछले कटोरे, तथा गोलाकार घड़े प्रमुख थे। अन्य प्रकारों में टोटीदार कटोरे, थाली तथा हाण्डी आदि उल्लेखनीय हैं। बर्तनों पर अलंकरण पट्टी चिपकाकर (Applique bands) का आड़ी बेड़ी रेखाओं तथा उत्कीर्णन करके किया गया है। कोई भी चित्रित पात्र नहीं मिला है।

विध्य के उत्खनित नवपाषाणिक स्थलों कोलडिहवा, महगड़ा तथा कुनझुन से अनेक तिथियाँ उपलब्ध हैं। कोलडिहवा से चार उपलब्ध तिथियाँ 6570 ± 210 ई०पू०, 4530 ± 185 ई०पू०, 1440 ± 150 ई०पू० 1400 ± 100 ई०पू० है। इसके अतिरिक्त महगड़ा से उष्मादीप्ति तिथियाँ हैं, जो क्रमशः 2265 ई०पू० तथा 7616 ई०पू० हैं। तिथियों में विसंगति के बावजूद यहाँ की नवपाषाणिक संस्कृति को 3530 – 3335 से 1565-1265 ई०पू० के अन्तर्गत रखा जा सकता है।

गोलाकार समन्तान्त की लघु पाषाण कुल्हाड़ियाँ बिहार, असम, मेघालय तथा नागालैण्ड में अनेक पुरास्थलों से प्राप्त हुई हैं। असम में ये, डोरीछाप पात्र परम्परा से भी सम्बन्धित हैं। किन्तु दोनों संस्कृतियाँ अपनी समग्रता में भिन्न हैं। स्कंधित उपकरण जो असम के उपकरण समुदाय का एक अंग है यहाँ पर नहीं मिलते। दक्षिण पूर्व-एशिया में बर्मा में स्पिरिट गुफा (Spirit cave) नॉन-नाक-था (Non Nak Tha) और पदाह -लिन (Padah Lin) से डोरीछाप मृद्भाण्ड नवपाषाणिक संदर्भमें प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार वियतनाम में होआबिन्ह (Hoabinh) तथा कम्पूचिया में लांगस्पीन(Laang spean) से भी डोरीछाप मृद्भाण्ड प्राप्त हुए हैं। यह उल्लेख्य है कि डोरीछाप में समानता के बावजूद पात्र परम्परा के रंग तथा अलंकरण में भिन्नता है। दोनों की सांस्कृतिक परम्परा में भी अन्तर है अतः केव मृद्भाण्डों के साम्य पर कोई निष्कर्ष निकालना समीचीन नहीं लगता। उपर्युक्त स्थलों पर पर इसकी तिथि छठी-पांचवीं सहस्राब्दी ई०पू० के लगभग आंकी गई है।

विद्वानों के समक्ष उत्तरी विंध्य क्षेत्र की संस्कृति के सम्बन्ध में यह एक अहम् प्रश्न है कि इसकी उत्पत्ति पर दक्षिण पूर्वी एशिया तथा पूर्वी भारत का प्रभाव था अथवा इसकी उत्पत्ति स्थानीय थी। दक्षिण पूर्वी एशिया के प्रभाव को स्थापित करने के लिए गोल समन्तान्त कुल्हाड़ी तथा डोरीछाप पात्र परम्परा का साम्य पर्याप्त नहीं है। इसके अतिरिक्त अन्य सांस्कृतिक उपादानों में भी साम्य होना आपेक्षित है, जो नहीं है। पुनः दोनों क्षेत्रों के मध्य इस प्रकार के और स्थल मिलने चाहिए तथा काल का विस्तार भी अधिक होना चाहिए।

यह उल्लेख्य है कि इसी क्षेत्र में मध्य पाषाण युगीन स्थल लेखहिया (19 कि०मी०), बघहीखोर (14 कि०मी०) तथा चोपानीमाण्डो के उत्खनन में डोरीछाप पात्रपरम्परा के कतिपय ठीकरें प्राप्त हुए हैं। लेखहिया के तृतीय चरण (Geom. Microlithic phase) में मृद्भाण्ड मिलने लगते हैं। यह मुख्यतया लाल तथा हल्के भूरे अथवा खाकी रंगों की हैं। इस पर कुछ अलंकरण उत्कीर्ण हैं। 63 ठीकरों पर डोरीछाप मृद्भाण्ड के प्रमाण मिले हैं। इनके अतिरिक्त ओपदार काली पात्र परम्परा तथा खुरदुरी पात्र परम्परा के भी कतिपय ठीकारे लेखहिया में मिले हैं। शर्मा ने इस सम्भावना का उल्लेख किया है कि यह लेखहिया III काल, चोपानी माण्डों में अन्त तथा महगड़ा के प्रारम्भ का अर्न्तवर्ती हो सकता है। बघहीखोर के प्रथम लेयर से भी डोरीछाप मृदभाण्ड के कुछ प्रमाण मिले हैं। चोपानी माण्डो के विकसित मध्यपाषाणिक काल (Advance Mesolithic phase) में भी इस प्रकार के पात्र मिले हैं। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह प्रस्तावित किया जा सकता है कि महगड़ा की पात्र परम्परा के विकास का आधार क्षेत्रीय मध्यपाषाण युगीन पात्र परम्परा होगी। लेखहिया से प्राप्त नवीनतम तिथियों के आलोक में यह सम्भावना अनुचित नहीं प्रतीत होती।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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