अर्थशास्त्र / Economics

नया कल्याणवादी अर्थशास्त्र | क्षतिपूर्ति सिद्धान्त | नये कल्याणवादी अर्थशास्त्र की मान्यताएँ | हिक्स काल्डर का क्षतिपूर्ति सिद्धान्त

नया कल्याणवादी अर्थशास्त्र | क्षतिपूर्ति सिद्धान्त | नये कल्याणवादी अर्थशास्त्र की मान्यताएँ | हिक्स काल्डर का क्षतिपूर्ति सिद्धान्त

नया कल्याणवादी अर्थशास्त्र अथवा क्षतिपूर्ति सिद्धान्त

(New welfare Economics or the Compensation Principle)

परैटो की कल्याण कसौटी प्रयोग में अत्यन्त सीमित है। यह केवल स्पष्ट स्थितियों (unambiguous cases) में लागू होती है, अर्थात् ऐसी स्थितियों का मूल्यांकन करती है जिनमें कुछ व्यक्तियों की हालत में सुधार होता है बिना किसी भी अन्य व्यक्ति को हानि पहुँचाये; परैटो को कल्याण कसौटी मिश्रित स्थितियों या अस्पष्ट स्थितियों (ambiguous cases) में लागू नहीं होती, अर्थात् ऐसी स्थितियों में लागू नहीं होती जिनमें कुछ व्यक्तियों की हालत में सुधार होता है। और कुछ की हालत में गिरावट या हानि।

पेरिटियन कसौटी के अत्यन्त सीमित प्रयोग के कारण कल्याणकारी अर्थशास्त्र के पुनर्निर्माण (reconstruction) के प्रयत्न किये गये। दो विचारधाराओं (schools) का जन्म हुआ : (i) हिक्स, काल्डर तथा साइटोबोस्की ने क्षतिपूर्ति सिद्धान्त’ (compensation principle) प्रस्तुत किया; इसे ‘नया कल्याणवादी अर्थशास्त्र’ भी कहा जाता है। (ii) बर्गसन, सेम्युल्सन, इत्यादि ने ‘सामाजिक कल्याण फलन’ (social welfare function) प्रयुक्त किया। यहाँ पर हम ‘क्षतिपूर्ति सिद्धान्त’ की व्याख्या करेंगे।

काल्डर, हिक्स तथा साइटोवोस्की ने परैटो के क्रमवाचक उपयोगिता के विचार’ तथा ‘अन्त: वैयक्तिक तुलनाओं की असम्भावता को स्वीकार किया और तब पेरिटियन कसौटी को मिश्रित स्थितियों में अर्थात् उन स्थितियों में लागू करने का प्रयत्न किया जिनमें कुछ व्यक्तियों की हालत में सुधार होता है तथा कुछ व्यक्तियों की हालत में गिरावट। इस दृष्टि से कालडोर, हिक्स तथा साइटोवोस्की द्वारा निर्मित कल्याणवादी अर्थशास्त्र को ‘नया कल्याणवादी अर्थशास्त्र’ कहा जाता है। परन्तु नये कल्याणवादी अर्थशास्त्रियों ने बहुत कम नयी बात बतायी अथवा उन्होंने कोई ऐसी नयी बात नहीं बतायी जो कि वास्तव में नयी हो क्योंकि उन्होंने पेटियों की सामान्य सरल मान्यताओं को स्वीकार किया।

नये कल्याणवादी अर्थशास्त्र की मान्यताएँ

(Assumptions of New Welfare Economics)

मुख्य मान्यताएँ निम्नलिखित हैं-

(i) प्रत्येक व्यक्ति की सन्तुष्टि दूसरे व्यक्तियों की सन्तुष्टि से स्वतन्त्र (independent) समझी जाती है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने कल्याण का सर्वोत्तम निर्णायक (best judge) होता है।

(ii) प्रत्येक व्यक्ति की रुचियों (testes) को स्थिर (constant) मान लिया जाता है।

(iii) उत्पाद तथा उपयोग में कोई बाहरी प्रभाव (external effects) नहीं होते हैं।

(iv) यह ‘उपयोगिता के क्रमवाचक विचार’ तथा ‘उपयोगिता की अन्त:वैयक्तिक तुलनाओं की असम्भवता’ को मानता है।

(v) यद्यपि कल्याण वस्तुओं के उत्पादन की मात्रा तथा वितरण के स्वभाव पर निर्भर करता है, परन्तु इन अर्थशास्त्रियों ने यह माना कि ‘उत्पादन और विनिमय की समस्याओं’ को ‘वितरण की समस्याओं से अलग किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, इन अर्थशास्त्रियों की कल्याण कसौटी उत्पादन की कुशलता (efficiency) की वस्तुगत (objective) बात पर आधारित है और यह सामाजिक कल्याण में उन परिवर्तनों का अध्ययन करता है जो कि उत्पादन के स्तर में परिवर्तन के परिणामस्वरूप होते हैं, यह वितरण की समस्या या वितरण सम्बन्धी न्याय (distributive justice) की बात को छोड़ देता है।

हिक्स काल्डर का क्षतिपूर्ति सिद्धान्त

(Hicks Kaldor Compensation Principle)

हिक्स, काल्डर तथा साइटोवोस्की ने ‘क्षतिपूर्ति सिद्धान्त’ को. प्रस्तुत किया और सोचा कि उन्होंने आर्थिक कुशलता के एक ऐसे जाँच-सिद्धान्त (test) को खोज लिया है जिसके आधार पर नैतिक निर्णयों से स्वतन्त्र होकर आर्थिक नीतियों तथा नुस्खों की वांछनीयता (desirability) का एक वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जा सकता है। परन्तु उनका यह दावा सिद्ध नहीं हुआ जैसाकि उनके सिद्धान्त की कमियों के प्रकाश में आने से पता लगा।

कल्याण के क्षतिपूर्ति सिद्धान्त को दो भागों में विवेचना की जाती है-

(i) काल्डर हिक्स की कसौटी (Kaldor Hicks Criterion)

(ii) साइटोवोस्की की दोहरी कसौटी (Scitovosky’s Double Criterion)

पहले हम काल्डर-हिक्स की कसौटी को लेते हैं। काल्डर की कसौटी को निम्न शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है :

यदि एक नीति-परिवर्तन (policy change) समाज की स्थिति A से स्थिति B में ले जाता है, तब स्थिति B उस हालत में पसन्द की जायेगी। स्थिति A की तुलना में और अर्थशास्त्री नीति के सम्बन्ध में नैतिक निर्णयों से स्वतन्त्र होकर सिफारिश या सुझाव दे सकेंगे, यदि लाभ-प्राप्तकर्ता (gainers) इस योग्य हैं कि वे हानि-प्राप्तकर्ताओं (losers) की क्षतिपूर्ति (compensation) कर सकें और फिर भी स्थिति B में पहले से अच्छी हालत में रह सकें।

दूसरे शब्दों में, काल्डर के अनुसार एक नीति वांछनीय मान ली जायेगी, चाहे वह ‘परैटो की अनुकूलतम स्थिति’ (Pareto’s optimum position) में न ले जाये, यदि लाभ-प्राप्तकर्ता ‘क्षतिपूर्ति’ या अधिक क्षतिपूर्ति (over-compensation) कर सकें या ‘घूस’ (bribe) दे सकें हानि-प्राप्तकर्ताओं को, ताकि हानि-प्राप्तकर्ता उस नीति को स्वीकार कर लें। उदाहरणार्थ, एक नीति से यदि लाभ-प्राप्तकर्ता 300 रु० के बराबर लाभ प्राप्त करने की आशा करते हैं तथा हानि- प्राप्तकर्ता 100 रु० के बराबर हानि प्राप्त करने की आशा करते हैं, तो 100 रु० से कुछ अधिक की ‘घूस’ (bribe) हानि-प्राप्तकर्ताओं की ‘क्षतिपूर्ति’ या अधिक-क्षतिपूर्ति’ कर सकेगी और फिर भी लाभ प्राप्तकर्ता अच्छी स्थिति में (better off) रह सकेंगे।

“इसके अतिरिक्त, काल्डर के अनुसार, जो नीतियाँ उनकी कसौटी पर सही उतरती हैं, वे नीतियाँ उत्पादन में वृद्धि करेंगी, इस प्रकार ऐसी नीतियों के उत्पादन तथा वितरण पक्षों (aspects) के बीच अन्तर किया जा सकेगा;” अर्थात् उत्पादन तथा वितरण के पक्षों को अलग रखा जा सकेगा।

हिक्स ने काल्डर के दृष्टिकोण को स्वीकार किया और उसको मान्यता दी। हिक्स के शब्दों में, “यदि व्यक्ति A, एक परिवर्तन के परिणामस्वरूप, इतनी अच्छी स्थिति में लाया जा सकता है कि यह दूसरे व्यक्ति B के नुकसान को क्षतिपूर्ति कर सकता है और फिर भी उसके (अर्थात् A के) पास कुछ बचा रहता है, तो इस प्रकार का परिवर्तन या संगठन निश्चित रूप से एक सुधार है।”

एक महत्त्वपूर्ण बात ध्यान में रखने की है। एक स्थिति की दूसरी स्थिति की तुलना में श्रेष्ठता (superiority) को जानने के लिए काल्डर-हिक्स कसौटी यह नहीं कहती कि क्षतिपूर्ति भुगतान वास्तव में दिये जाने चाहिए; यदि भुगतान वास्तव में दिये जाते हैं तो ऐसा करने से आय के वितरण में परिवर्तन उत्पन्न हो जायेगा और वितरण पक्ष विश्लेषण में प्रवेश कर जायेगा जिसके कारण नीतियों के मूल्यांकन के लिए अन्त:वैयक्तिक तुलनाएँ (interpersonal comparisons) करनी पड़ेंगी। कल्याणवादी अर्थशास्त्र को नैतिक निर्णयों से स्वतन्त्र रखने के लिए इन अर्थशास्त्रियों ने बताया कि क्षतिपूर्ति भुगतान वास्तव में दिया जाता है या नहीं, यह बात एक नैतिक या राजनीतिक निर्णय (ethical or political decision) है जो कि सरकार या राजनीतिज्ञों द्वारा लिया जाना चाहिए। काल्डर हिक्स कसौटी के अनुसार एक नीति कदम (policy measure) वांछनीय है, इसको जानने के लिए यह पर्याप्त है कि लाभ प्राप्तकर्ता क्षतिपूर्ति कर सकते हैं हानि-प्राप्तकर्ताओं की; अर्थात् जोर कल्याण की ‘सम्भावित वृद्धि’ (potential increase in welfare) पर है। दूसरे शब्दों में, लाभ-प्राप्तकर्ताओं की हानि-प्राप्तकर्ताओं को पर्याप्त मात्रा में क्षतिपूर्ति कर सकने की सम्भावना एक नीति की ‘सम्भावित श्रेष्ठता’ (potential superiority) को स्थापित करती है।

काल्डर-हिक्स की कसौटी का रेखीय प्रस्तुतीकरण

(Graphic Represe- ntation of Kaldor-Hicks Criterion)-

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सरलता के लिए माना कि समाज में दो व्यक्ति A तथा B हैं और दो वस्तुओं X तथा Y का उत्पादन हो रहा है। चित्र 1 में उत्पादन Q1 स्तर के सन्दर्भ (reference) Q1L ‘उपयोगिता सम्भव रेखा’ (utility possibility curve) है। चित्र 1 में x-axis पर व्यक्ति A की ‘क्रमवाचक उपयोगिता’ या उपयोगिता स्तर (अर्थात् U A) को दिखाया गया है; और Y-axis पर व्यक्ति B की ‘क्रमवाचक उपयोगिता’ या उपयोगिता स्तर (अर्थात् U A) को दिखाया गया है। यह उपयोगिता सम्भव रेखा’A तथा B के उपयोगिता स्तरों के विभिन्न संयोगों को बताती है। चित्र 11.1 में हम बिन्दु C से F के परिवर्तन पर विचार करते हैं, परैटो की कसौटी के आधार पर इस परिवर्तन का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है क्योंकि इसके परिणामस्वरूप B को तो लाभ होता है परन्तु A को नुकसान होता है। Q1L उपयोगिता सम्भव रेखा बिन्दु F से गुजरती है। परन्तु इसी उपयोगिता सम्भव रेखा पर बिन्दु D तथा G भी है जो कि बिन्दु F से धन के पुनर्वितरण द्वारा प्राप्त किये जा सकते हैं (which can be obtained from F by a redistribution of wealth); बिन्दु D और G बिन्दु C के ऊपर दायें को हैं अर्थात् वे segment (भाग) DE पर हैं। काल्डर-हिक्स कसौटी के अनुसार C से F को चलन एक सुधार है क्योंकि यहाँ पर बिन्दु F से धन का ऐसा पुनर्वितरण सम्भव है जिससे कि परिवर्तन के परिणामस्वरूप, किसी को भी हानि नहीं होती है। बिन्दु D पर और निश्चित रूप से बिन्दु G पर, व्यक्ति A को उसकी हानि के लिए क्षतिपूर्ति मिल जाती है। अतः

काल्डर-हिक्स कसौटी के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि बिन्दु C से बिन्दु F को चलन एक सुधार है, यदि……..(और केवल यदि) बिन्दु C नीचे है उस उपयोगिता सम्भव रेखा के जो कि बिन्दु F से गुजरती है।

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अब हम काल्डर-हिक्स की कसौटी की व्याख्या करने के लिए चित्र 2 पर विचार करते हैं। दिये हुए उत्पादन स्तर Q1 से सम्बन्धित उपयोगिता सम्भावना रेखा Q1L है; तथा उत्पादन स्तर Q2 से सम्बन्धित उपयोगिता सम्भावना रेखा Q2M है; और ये दोनों रेखाएँ एक-दूसरे को किसी एक बिन्दु पर काटती हैं। माना कि हमारा शुरू का बिन्दु (starting point) D है। बिन्दु D से R,H, या T किसी भी चलन एक ‘परैटो सुधार’ (a pareto improvement) है। परन्तु बिन्दु D से E के चलन का पेरिटिबन कसौटी के आधार पर मूल्यांकन नहीं किया जा सकता क्योंकि ऐसा चलन व्यक्ति A की हालत में सुधार तथा व्यक्ति B की हालत में गिरावट उत्पन्न करता है। परन्तु ऐसे चलन का काल्डर-हिक्स की कसौटी के आधार पर मूल्यांकन किया जा सकता है। काल्डर-हिक्स कसौटी के अनुसार बिन्दु D से E को चलने या परिवर्तन वांछनीय है (या कल्याण में वृद्धि करने वाला है) क्योंकि बिन्दु D उस उपयोगिता सम्भव रेखा QM2 के नीचे है जो कि बिन्दु E से गुजरती है। [इस निष्कर्ष को पहले हम चित्र 1 के सन्दर्भ में निकाल चुके हैं और उसे इस पृष्ठ पर शुरू में काले टाइप में दे चुके हैं।]

उपर्युक्त बात को हम इस प्रकार भी व्यक्त कर सकते हैं। धन के पुनर्वितरण के परिणाम-स्वरूप, बिन्दु E से उसी उपयोगिता सम्भव रेखा QM2 पर चलन एक बिन्दु न तक ले जा सकता है; और बिन्दु H पेरिटियन कसौटी के आधार पर निश्चित रूप से बिन्दु D से श्रेष्ठ या अच्छा है। अत: हम कह सकते हैं कि बिन्दु E, जो कि बिन्दु H की स्थिति को उत्पन्न (generate) कर सकता है, बिन्दु D से अच्छा है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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