अनुसंधान क्रियाविधि / Research Methodology

प्रतिचयन की समस्या (Sample problem in Hindi) – ये समस्याएँ मुख्यतः 3 प्रकार की हैं

प्रतिचयन की समस्या (Sample problem in Hindi) – ये समस्याएँ मुख्यतः 3 प्रकार की हैं

  1. प्रतिचयन की आकार की समस्या :

प्रतिचयन  की सबसे सर्वप्रथम समस्या उसके उचित आकार की ही है। उत्तम प्रतिचयन  के लिए पर्याप्त आकार का होना अत्यन्त महत्वपूर्ण है अध्ययन कर्ता को इस संबंध में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अगर प्रतिचयन  का आकार बड़ा है तो अधिक धन, समय और श्रम का व्यय अध्ययन कर्ता के लिए समस्या है और अगर प्रतिचयन  छोटा होता है तो उसकी विश्वसनीयता एवं प्रतिनिधित्व पूर्ण के संदर्भ में संदेह रहता है। अत: प्रतिचयन  में सही आकार का होना अत्यन्त आवश्यक है जिसे निम्न कारण प्रभावित करते हैं-

  • समाज की प्रकृति : समाज से एकरूपी इकाइयों की अधिकता से छोटे आकार का प्रतिचयन भी प्रतिनिधि पूर्ण और विश्वसनीय होता किन्तु अगर समग्र में विषमताएं अधिक है तो प्रतिचयन  का आकार बड़ा होना चाहिए।
  • वर्गों की संख्या : अगर समग्र में विभिन्न प्रकार के वर्ग है या उनमें भिन्नताएं अधिक हैं तो निदर्श का आकार बड़ा है।
  • उपलब्ध साधन : धन, समय, श्रम व अन्य संसाधनों की पर्याप्तता की स्थिति से प्रतिचयन का आकार बड़ा हो सकता है अन्यथा छोटा आकार साधनों की उपलब्धता के आधार पर लिया जाना चाहिए।
  • परिशुद्धता की मात्रा : सामान्तयः ऐसा माना जाता है कि बड़ा प्रतिचयन अधिक परिशुद्ध और प्रतिनिधित्व पूर्ण होता है। किन्तु यदि सही तरीके से चुनाव किया जाता है तो छोटा प्रतिचयन  भी विश्वसनीय एवं प्रतिनिधित्व पूर्ण हो सकता है।
  • अनुसंधान की प्रकृति : अगर अध्ययन गहन तथा सूक्ष्म है तो निदर्श का आकार छोटा होना चाहिए अगर अध्ययन विषय विस्तृत है तो प्रतिचयन का आकार बड़ा होना चाहिए।
  • अध्ययन के उपकरण : अगर प्रश्नावली द्वारा किसी क्षेत्र का अध्ययन करते है तो प्रतिचयन आकार बड़ा भी हो सकता है इसमें भी अगर प्रश्न छोटा और सरल है तो प्रतिचयन  में और वृद्धिबकी जा सकती है। किन्तु इसके स्थान पर यदि अनुसूची या व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित का सूचना एकत्र करनी है तो छोटा प्रतिचयन  उपयुक्त रहता है।

2. पक्षपात प्रतिचयन की समस्या :

प्रतिचयन  के चयन से पक्षपातपूर्ण रवैया से प्रतिचयन  प्रतिनिधित्व पूर्ण नही हो पाता।

अध्ययन के दौरान अभिमति मुक्त प्रतिचयन  निम्न कारण से होता है-

  • प्रतिचयन का छोटा आकार : प्रतिचयन  का आकार छोटा होने के कारण अनेक इकाइयों को चयन का अवसर नहीं मिलता और अनेक ऐसी इकाइयां भी हो सकती हैं जो महत्वपूर्ण हैं पर सम्मिलित न की गई हों, ऐसी स्थिति में प्रतिचयन  प्रतिनिधित्व पूर्ण नहीं हो सकता।
  • उद्देश्यपूर्ण प्रतिचयन : इस प्रकार के प्रतिचयन  में अध्ययन कर्ता अपनी इच्छानुसार इकाइयों का चयन करता है। इसमें वह ऐसी ही इकाइयों का चयन कर सकता है जिनसे सम्पर्क करना सरल हो। वह असुविधाजनक और कठिनाई से मिलने वाली इकाइयों को छोड़ देता है। ऐसी स्थिति में प्रतिचयन  अभिनतिपूर्ण होता है।
  • सुविधानुसार प्रतिचयन : अपनी सुविधानुसार इकाइयां का चयन करता है जो आवश्यक नहीं कि वह प्रतिनिधित्वपूर्ण इकाइयों का चयन ही करे। इसलिए अभिमति की सम्मावना बढ़ जाती है।
  • दोषपूर्ण वर्गीकरण : यदि वर्गीय प्रतिचयन में ऐसे वर्गों का चुनाव कर लिया जाता है जो अस्पष्ट, असमान व अनुपयुक्त ही तब भी अभिनति आ सकती है। इसी तरह से यदि वर्ग में असमान संख्या वाली इकाइयों में से समान संख्या में इकाइयां चुन ली जाती हैं तब भी वह असंतुलित और दोषपूर्ण हो जाता है।
  • अपूर्ण स्रोत सूची : अगर स्रोत सूची पुरानी, अधूरी या अनुपयुक्त है तो भी प्रतिचयन पक्षपातपूर्ण होगा।
  • कार्यकर्ताओं द्वारा चुनाव : कई बार कार्यकर्ताओं को यह अनुमति दे दी जाती है कि वे प्रतिचयन की इकाइयों का चुनाव अपनी इच्छानुसार करें। ऐसी स्थिति में भी चयन में पक्षपात आ सकता है।
  • त्रुटिपूर्ण देव प्रतिचयन : त्रुटिप्ण प्रतिचयन  विधि द्वारा इकाइयों के चयन में भी पक्षपात की सम्भावना रहती है। अगर अध्ययन कर्ता जान बूझ कर कार्ड /पर्चियों का निर्माण इस प्रकार करता है कि वह पहचान बना सके तो सरलता से दैव प्रतिचयन  भी अभिनति युक्त हो जाता है। और इस स्थिति में प्रतिचयन  पक्षपातपूर्ण हो जाता है क्योंकि उचित प्रतिचयन  का चयन नहीं हो पाता।

3. प्रतिचयन की विश्वसनीयता की समस्या :

चयनित प्रतिचयन  के विश्वसनीयता की जॉँच करने के लिए निम्न उपाय अपनाये जा सकते हैं –

  • सामान्तर प्रतिचयन : प्राप्त प्रतिचयन  कहां तक विश्वसनीय है इसकी परीक्ष करने के लिए सामान्तर उप-प्रतिचयन  को प्राप्त करना अक्सर बहुत उपयोगी होता है यदि दोनों में पर्याप्त सीमा तक समानता है तो प्रतिचयन  विश्वसनीय माना जाता है, अर्थात सामान्तर प्रतिचयन  के अन्तर्गत आने वाली इकाइयों की विशेषताएं मुख्य प्रतिचयन  से सम्बंधित इकाइयों की विशेषताओं से मिलती जुलती हैं।
  • समाज की तुलना : शोधकर्ता अपने ज्ञान तथा अनुमव के आधार पर प्रतिचयन की तुलना करके निर्णय दे सकता है। पर्याप्त समानता के आधार पर उसे विश्वसनीय माना जाता है।
  • प्रतिचयन का प्रतिचयन  : प्रतिचयन  की विश्वसनीयता की जांच करने का एक तरीका यह है कि चयनित प्रतिचयन  में से कुछ इकाइयां दैव प्रतिचयन  द्वारा चुनी जाती हैं और उसकी तुलना मूल प्रतिचयन  से की जाती है। यदि उपप्रतिचयन  में मूल प्रतिचयन  के गुण हैं तो प्रतिचयन  विश्वसनीय माना जाता है।
  • महत्व का परीक्षण : प्रतिचयन की विश्वसनीयता क जांच करने के लिए यह वैज्ञानिक विधि है। फिर भी इसका प्रयोग व्यवहारिक जीवन में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है प्रतिचयन  के उपयोग द्वारा प्राप्त सूचनाओं के प्रथम स्तर पर प्रमापीकरण किया जाता है अध्ययनकर्ता इस समय अपनी अन्तर्दृष्टि से ज्ञात करता है कि सूचनाएं किस सीमा तक उपयोगी हैं।
  • सर्वेक्षण की पुनरावृत्ति : यद्यपि यह एक कठिन कार्य है फिर भी सम्भव हो तो लगभग मिलते जुलते सर्वेक्षणों की पुनरावृत्ति करके उनमें लिए गये निदर्शनों की तुलना करके विश्वसनीयता की जांच की जा सकती है।

 

Research Methodology Methods And Techniques By C.R.Kothari | free pdf download

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