अनुसंधान क्रियाविधि / Research Methodology

Types of Sampling in Hindi – प्रतिचयन के प्रकार

Types of Sampling in Hindi
Types of Sampling in Hindi

Types of Sampling in Hindi – प्रतिचयन के प्रकार

यदि मुख्य रूप से देखा जाए तो निर्देशन दो प्रकार के होते हैं जो कि अगर अलिखित है-

  1. सम्भावना न्यादर्श (Random sampling)
  2. गैर सम्भावना न्यादर्श (Non Random sampling)

शाब्दिक अर्थानुरुप सम्भावना न्यादर्श में समग्रजन का प्रत्येक इकाई की न्यादर्श में चयनित होने की समान सम्भावना होती है। ऐसी प्रतिचयन प्रक्रिया में एकांगों का चयन संयोग पर आधारित होता है। तथा इसमें अत्यधिक प्रतिनिधित्व होता है ।

गैर सम्भावना प्रतिचयन पद्धति अन्तर्गत प्रत्येक इकाई को चुने जाने का समान अवसर नहीं है। तथा इसमें प्रतिनिधित्व नहीं होता है।

 

  1. संभावित प्रतिचयन

सम्भावित प्रतिचयन वह प्रतिचयन है जिसके अन्तर्गत समग्र की समस्त इकाइयों के चुने जाने की समान सम्भावना होती है अर्थात् इकाइयों का चयन पूर्णतः संयोग पर निर्भर होता है इसमें समग्र की इकाईयों के व्यक्तिगत महत्व को समाप्त कर उसके स्थान पर सम्नावना को प्रतिष्टित कर दिया जाता है। इस प्रतिचयन प्रक्रिया के किसी न किसी स्तर पर चयन संयोगदश होता है।

सम्भावित प्रतिचयन में इकाइयों के चुनाव के अनेक प्रकार है। यहां पर हन मुख्य प्रकारों का दर्मन करेगें।

  1. सरल दैव प्रतिचयन
  2. स्तरीकृत दैव प्रतिचयन
  3. व्यवस्थित प्रतिचयन
  4. बहुचरणीय /बहुस्तरीय प्रतिचयन
  5. गुच्छ प्रतिचयन

 

  1. सरलसरल दैव प्रतिचयन

इस प्रतिचयन को यादृच्छिकी न्यादर्शन भी कहते है यह विधि सर्वाधिक प्रचलित विधि है। इसके अन्तर्तगत सम्पूर्ण समग्र में से कुछ इकाइयों का चयन अव्यवस्थित रूप से कर लिया जाता है । उदाहरण के रूप हम गोल बर्तन में 100 एक जैसे रंग के पत्थर रखे और फिर उनमें से कोई एक पत्थर निकाले तो प्रत्येक गोली के चयन की सम्भावना 1 / 100 होगी। इस प्रकार चुना हुआ प्रतिचयन दैव प्रतिचयन होगा क्योंकि प्रत्येक गोली के चयन की सम्भावना 1/ 100 है। दैव प्रतिचयन के लिये आवश्यक है कि इन सभी संयोगो को चयन का बराबर अवसर दिया जाए। दैव प्रतिचयन नें प्रतिदर्श इकाइयों का चयन अनेक विधियां द्वारा होता है उनमें से कुछ अधिक प्रचलित विधियां हैं-

  1. लॉटरी विधि
  2. टिपेट विधि
  3. कार्ड प्रणाली
  4. ग्रिड प्रणाली

A. लॉटरी विधि – यह विधि दैव प्रतिचयन की सबसे सरल विधि है इसके अंतर्गत अनुसंधानकर्ता समग्र की समस्त इकाईयों की कम संख्या/ नाम वाली पर्चियां बना लेते हैं इसके पश्चात् इन्हे किसी बर्तन या जार में रखकर अच्छी तरह से हिला लेते हैं जब तक पर्चियां अच्छी तरह से नही मिल जाती है। फिर एक व्यक्ति की आंख में काली पट्टी बांध कर उनमें से एक पचीं निकाल लेता है इस पर्ची में अंकित क्रमांक की इकाई को न्यादर्श में सम्मिलित कर लिया जाता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक उत्तरदाताओं की वांछित संख्या प्राप्त न कर लें। मान ले हमें 2500 छात्रों को लेपटॉप वितरित करने है। हम समग्र के प्रत्येक सदस्य का नाम समान आकार की कागज की पर्ची पर लिखकर बॉक्स में डाल लेगें और उन्हें मिला दिया जाता है फिर व्यक्ति या बच्चे को 100 कागज की पर्ची निकालने के लिए आमंत्रित किया जाता है इस प्रकार उन 100 चयनित छात्रों को लेपटॉप वितरित कर दिये जाते हैं।

B. कार्ड प्रणाली- यह लाटरी विधि का संशोधित रूप है इस प्रणाली या विधि के अन्तर्गत समान आकार तथा रंग के कारडों पर समग्र की समस्त इकाइयों का नाम अंकित कर लिया जाता है फिर इन्हें एक बड़े से ड्रम में डालकर जोर से हिलाया जाता है। इसके पश्चात ड्रम में से एक कार्ड को निकाल दिया जाता है। जितनी इकाइयों का चयन करना होता है उतनी बार ड्रम को हिलाकर निकाला जाता है। इस विधि के अन्त्तगत जितने कार्ड निकाल जाते है उनसे सम्बधित इकाइयों का शोधकर्ता द्वारा अध्ययन किया जाता है।

C. टिपेट विधि या रेंडम अंक- इस प्रणाली को प्रो० टिपेट ने 1927 में गणितीय अंको के आधार पर तैयार किया था। टिपेट ने चार अंकों वाला 10400 संख्याओं की एक सूची अनेक देशों के जनसंख्या प्रतिवेदन के आधार पर तैयार की। यहां 5-5 के वर्गाकार खण्डों में यादृच्छिकी कम में अंक लिखे होते है ऐसी तालिकाएं बहुधा सांख्यिकी की पुस्तकों में भी दी रहती है।

मान ले हमें 900 की समग्र/ जनसंख्या में से 100 व्यक्तियों का एक प्रतिदर्श लेना है। इसके लिएसर्वप्रथम हम समग्र की सूची बनाकर प्रत्येक सदस्य को एक संख्या प्रदान करते है। प्रतिचयन द्वारा जो संख्याएं हमे मिलेगी उन संख्याओं वाले सदस्य हमारे प्रतिदर्श होगें । चूकि हमारी जनसंख्या में 900 सदस्य है इसलिए हमें 1 और 900 के बीच की यादृच्छिक संख्याएं चाहिए। कुछ संख्याएं 900 से अधिकतम कम संख्या से अधिक हैं जो उन्हे छोड़ दिया जाएगा और उनके आगे वाली संख्याएं ले ली जायेगी। टिपेट संख्याएं अधिक वैज्ञानिक मानी जाती है और उनका उपयोग बहुत अधिक होता है।

D. ग्रिड विधि- एस विधि का प्रयोग भौगोलिक क्षेत्र के चुनाव के लिये किया जाता है एस प्रणाली के अंतर्गत यह निर्धारित किया जाता है कि कोई विशेष अध्ययन किस क्षेत्र या किन क्षेत्रों के अंतर्गत किया जाएगा। इस प्रणाली के अंतर्गत सर्वप्रथम उस क्षेत्र का मानचित्र तैयार किया जाता है उस मानचित्र पर सेल्यूलॉइड की पारदर्शक ग्रिड प्लेट रख दी जाती है। इस प्लेट में वर्गाकार खाने बने रहते है। जिन पर नम्बर अंकित होते है। सर्वप्रथम यह तय कर लिया जाता है कि प्रतिचयन हेतु कितनी इकाइयों का चयन करना है उतने ही वर्गों को पहले काट लिया जाता है। मानचित्र के जिन कटे हुए भागों पर निर्धारित नम्बरों के वर्गाकार खाने आते हैं उन पर निशान लगा दिया जाता है। उन्हीं क्षेत्रों को अध्ययन के लिए चुन लिया जाता है।

E. नियमित अंकन प्रणाली- इस विधि में सर्वप्रथम समग्र की समस्त इकाइयों को किसी विशेष ढ़ग, काल या स्थान आदि के अनुसार व्यवस्थित कर लिया जाता है। तत्पश्चात यह निश्चय कर लिया जाता है कि समग्र में से कितनी इकाइयों का चयन प्रतिचयन हेतु करना होता है। साथ ही एक इकाई से दूसरी इकाई के बीच की संख्यात्मक दूरी को भी तय कर लिया जाता है। यदि हमें 100 छात्राओं में से 10 छात्राओं का चयन करना है तो पहले हमें उन 100 छात्राओं की सूची बनानी होगी तत्पश्चात चंकि हमे 10 छात्राओं का चयन करना है अत: हर 10वी छात्रा हमारे चुनाव में आयेगी। तो पहला, दसंवा, बीसंवा, तीसंवा और इसी कम में दस छात्राओं का चयन किया जाता है।

2.स्तरीकृत या वर्गीकृत प्रतिचयन विधि-

प्रतिचयन के इस स्वरूप में समग्र को विभिन्न स्तरों या उस समूहों में विभाजित किया जाता है और फिर प्रत्येक स्तर में से स्वतन्त्र प्रतिदर्श ले लेते हैं। प्रो० सिन पाओ यांग ने लिखा है कि “स्तरित प्रतिचयन का अर्थ है कि समग्र में से उप-निदर्शनों को लेना जिनकी कि समान विशेषताएँ हैं जैसे खेती का प्रकार, खेतों का आकार भूमि पर स्वामित्व, शिक्षा स्तर, आय, लिंग, सामाजिक वर्ग आदि। उप-निदर्शनों के अंतर्गत आने वाले इन तत्वों को एक साथ लेकर प्रारूप या श्रेणी के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।” यह महत्वपूर्ण है कि परिभाषा इस प्रकार दी जाए कि समग्रजन को समजातीय स्तरों में बांट लिया जाता है फिर प्रत्येक स्तर से सरल दैव प्रतिचयन की किसी भी उपयुक्त प्रणाली के द्वारा निर्धारित संख्या में इकाइयों को चुना जाता है। स्तरीकृत प्रतिचयन का यह सबसे सरल तथा सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाला ढंग है स्तरीकृत प्रतिचयन में समग्रजन के विभिन्न स्तरों में से एक ही अनुपात में प्रतिचयन का अनुपात बराबर न हो।

उदाहरणार्थ यदि महिला प्राध्यापकों की समस्याओं का अध्ययन करने के लिए हम किसी जिले की 1000 महिला प्राध्यापकों में से 100 का चयन करना चाहते है तो सर्वप्रथम हम जिले की सभी महिला प्राध्यापकों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित कर लेते हैं इसके लिए हम सभी महिला प्राध्यापिकाओं को प्राइमरी, एल0 टी0, प्रवक्ता, प्रोफेसर आदि श्रेणियों में विभाजित कर लेते है। यदि इन चारों श्रेणियों में महिला प्राध्यापिकाओं की कुल संरख्या 480, 220, 200, 100 है तो प्रत्येक श्रेणी में से 10:1 के अनुपात में कमशः 48, 22, 20 तथा 10 का चयन दैव प्रतिचयन की उपयुक्त प्रणाली द्वारा किया जाता है। स्तरों में विभाजित होने के कारण इस प्रणाली को स्तरित प्रतिचयन विधि कहते है।

स्तरीकृत प्रतिचयन के तीन प्रकार होते हैं-

  1. अनुपातीय या समानुपातिक स्तरीकृत प्रतिचयन
  2. गैर अनुपातीय या असमानुपातिक स्तरीकृत प्रतिचयन
  3. भारयुक्त स्तरीकृत प्रतिचयन

A. अनुपातीय स्तीकृत प्रतिचयन : प्रतिचयन की इकाइयों का चयन उसी अनुपात में किया जाता है। जिस अनुपात में विभिन्न श्रेणियों की कुल संख्या समग्र के अन्तर्गत होती है। इसमें किसी स्तर से किये गये प्रतिदर्श में इकाइयों की संख्या उसी अनुपात में होती है जिसमें उस स्तर में जनसंख्या या समग्र की इकाइया। उदाहरण यदि समग्र में स्तर अ, ब, स में क्रमशः 500, 700, 900 इकाइयां है तो न्यादर्श में तीन स्तरों से इकाइयां 5 : 7 : 9 के अनुपात में होंगी।

B. असमानुपातिक स्तरीकृत प्रतिचयन : इस प्रविधि के अंतर्गत समग्र को विभिन्न श्रेणियों में से समान संख्या में इकाइयों को चुना जाता है तथा इस बात की कुछ परवाह नहीं की जाती कि सम्पूर्ण समग्र में विभिन्न श्रेणियों के अंर्तगत इकाइयां एक दूसरे की तुलना में कम है या अधिक। इस विधि का प्रयोग तब किया जाता है जब किसी एक उप समूह का आकार दूसरे उपसमूह की तुलना में बहुत छोटा है।

उदाहरण के रूप में मान लें किसी समग्र में कुल 1000 व्यक्ति हैं इनमें से 600 हिन्दू, 300 मुसलमान और 100 ईसाई हैं इनकी अभिवृत्ति की तुलना के दृष्टिकोण से यह अधिक प्रबल होगा कि सब धर्मों के लोग बराबर संख्या में हो इसके लिए हम निर्णय करते हैं कि प्रत्येक धर्म से 50 व्यक्ति लेंगे तब पहले स्तर का 12वां, दूसरे का 6वां और 3 का 1 / 2 भाग लेते हैं।

C. भारयुक्त स्तरीकृत प्रतिचयन : यह उक्त दोनों विधियों का सम्श्रिण है। इसमें पहले प्रत्येक वर्ग में से समान संख्याओं का चयन किया जाता है तत्पश्चात अधिक संख्या वाले वर्गों की इकाइयों को अधिक मदद प्रदान करके उनका प्रभाव बढ़ा दिया जाता है। यह भार इसी अनुपात में प्रदान किया जाता है जिस अनुपात में समग्र में वर्ग की इकाइयां होती है।

3.व्यवस्थित प्रतिदर्शन :

यह विधि उपयोग करने में सरल तथा आसान है प्रतिदर्शन के इस स्वरूप को अन्तराल प्रतिदर्शन भी कहा जाता है इसके अन्तर्गत पूर्व निर्धारित व्यक्तियों की सूची में से नियमित अन्तराल के पश्चात सदस्यों को चुन लेते हैं। सर्वप्रथम न्यादर्श का आकार एवं समग्र के आकार का अनुपात निश्चित कर लिया जायेगा। माना यह अनुपात 1:15 है। जैसे लक्ष्यित समग्रजन 6000 है और प्रस्तावित प्रतिदर्श का आकार 400 लेना हो तो समग्र की सूची में से 15वे व्यक्ति को लिया जायेगा। पहली संख्या का चयन हेतु लॉटरी या अन्य विधियों का व्यवस्थित उपयोग कर सकते है। व्यवस्थित प्रतिचयन सरल दैव प्रतिचयन विधि से इस अर्थ भिन्न है कि सरल दैव प्रतिचयन विधि में चयन संयोग पर निर्भर करता है जबकि व्यवस्थित प्रतिचयन में प्रतिदर्श इकाइयों का चयन पूर्ववर्ती इकाई के चयन पर निर्भर होता है।

4. बहुचरणीय प्रतिचयन :

इस विधि का प्रयोग बहुत बड़े अध्ययन क्षेत्र से एक प्रतिचयन निकालने के लिए किया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत इकाइयों के चुनाव की प्रक्रिया अनेक स्तरों में से होकर गुजरती है। प्रत्येक अवस्था या स्तर में प्रतिदर्शन दैव प्रतिचयन प्रणाली द्वारा ही होगा। अतः ऐसे प्रतिचयन में इकाइयों का चयन अनेक स्तरों द्वारा किया जाता है इसलिए इसे बहुचरणीय या बहुस्तरीय प्रतिचयन कहते हैं।

अंतः यह सामान्य तौर पर तब उपयोग किया जाता है जब अध्ययन क्षेत्र अधिक बड़ा हो और चयनित इकाइयों की भौतिक दूरी अधिक हो या समाज की पूर्ण सूची उपलब्ध नहीं हो यह निम्न चरणों में पूर्ण किया जाता है-

  1. सम्पूर्ण अध्ययन क्षेत्र को कुछ सजातीय क्षेत्रों में बांट लिया जाता है। ये क्षेत्र समान क्षेत्रफल के होते हैं तथा क्षेत्रवासियों में अधिकतम समानता का प्रयास किया जाता है।
  2. प्रत्येक क्षेत्र में से कुछ ग्राम दैव निदेणन प्रणाली के आधार पर चुने जाते हैं।
  3. चयनित प्रत्येक ग्राम में से कुछ घरों का समूह दैव प्रतिचयन प्रणाली के आधार पर चुना जाता है।
  4. अंतिम चरण में इन घरों के समूह में से कुछ परिवारों को दैव प्रतिचयन प्रणाली से चुन कर अध्ययन किया जाता है।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि बहुस्तरीय प्रतिचयन दैव प्रतिचयन तथा स्तरीकृत प्रतिचयन का सम्मिलित रूप है और यदि पर्याप्त सावधानी बाती जाय तो उनमें उक्त दोनों प्रणालियों के लाभ प्राप्त हो जाते

  1. गुच्छ प्रतिचयन :

इसके अंतर्गत समग्र को बहुत से समूहों में विभाजित करके इनमें से केवल कुछ समूहों का निदर्श लेकर उनके तत्वों का अध्ययन किया जाता है तो इसे गुच्छ प्रतिचयन कहते हैं। सामाजिक सर्वेक्षणों में इसका प्रयोग यात्रा व्यय को बचाने के उद्देश्य से होता है। गुच्छ जितने बड़े होंगे प्रतिचयन की लागत उतना कम हो । विस्तृत भौगोलिक क्षेत्रों में लाभदायक है। प्रतिचयन की इस विधि में गुच्छों या समूहों का ढ़ाँचा बनाया जाता है और इस ढ़ाँचे में से दैव प्रतिदर्श चुना जाता है फिर चुने गये गुच्छों में पड़ने वाली स्वभाविक इकाई का अध्ययन किया जाता है समूह प्रतिदर्शन में प्रतिचयन दो प्रकार से होता है।

  • पद प्रतिचयन : गुच्छ प्रतिचयन में यदि हम केवल एक बार प्रतिचयन करें तो उसे एक पद प्रतिचयन कहते हैं।
  • बहुपद प्रतिचयन : यदि एक से अधिक बार प्रतिचयन करे तो बहुपद प्रतिचयन कहते है।

 

2. गैर सम्भावना प्रतिदर्शन

असम्भावित प्रतिचयन में सम्भावना एवं संयोग का कोई महत्व नहीं होता है। इसमें शोधकर्ता अपने विवेक से इकाइयों का चयन करता है। यह प्रतिनिधित्व का दावा नहीं करता किन्तु न्यादर्श को प्रतिनिधि बनाने के लिए कुछ नियमों का उपयोग करता है। अतः इसमें न तो प्रत्येक इकाई के प्रतिचयन में सम्मिलित होने की संभावना और न उसके चुने जाने की संभावना होते हैं शोधकर्ता विषय के उद्देश्यों के अनुरूप ही इकाइयों का चयन करता है। असम्भावित प्रतिचयन की तीन विधियां है जो निम्नांकित इस प्रकार हैं –

  1. उद्देश्यपूर्ण प्रतिचयन
  2. सुविधात्मक प्रतिचयन
  3. कोटा या अभ्यंश प्रतिचयन

 

  1. उद्देश्यपूर्ण प्रतिचयन : इस विधि को निर्णायत्मक प्रतिचयन या सुविचार प्रतिचयन से भी जाना जाता है। इसके अन्तर्गत अनुसंधानकर्ता का प्रयास रहता है कि वह ज्ञान और विवेक के आधार नत्रपर प्रतिनिधित्व पूर्ण इकाइयों का चयन करता है। अनुसंधानकर्ता पहले से ही समग्र की इकाइयों के बारे में पूर्ण जानकारी रखता है। अनुसंधानकर्ता विशेष उद्देश्य ध्यान में रखते हुए समग्र में से उन्हीं इकाइयों का चयन जान बूझकर करता है जिसे वह पूर्व ज्ञान के आधार पर उस समग्र का प्रतिनिधि समझता है। तो ऐसे प्रतिचयन को उद्देश्य पूर्ण प्रतिचयन कहा जाता है। उद्देश्यपूर्ण प्रतिचयन के अन्वेषक को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान नहीं होती, सर्वप्रथम अन्वेषक समग्र की समस्त इकाइयों का गहन अध्ययन करता है तत्पश्चात समग्र से उन्हीं इकाइयों का चयन करता है जो समग्र की विशेषताओं का पूर्णतया प्रतिनिधित्व करे। इसमें अनुसंधानकर्ता समग्र की सभी इकाइयों की विशेषताओं तथा प्रकृति के संबंध में पूरा पूरा ज्ञान हो। बड़े समग्र की समस्त इकाइयों के संबंध में इन इस विधि द्वारा संभव नहीं है इससे अनुसंधानकर्ता समग्र की प्रकृति, गुणों व इकाइयों की विशेषताओं से पूर्व परिचित या व्यक्ति होता है।

जैन्सन के अनुसार “उद्देश्यपूर्ण निदर्श से तात्पर्य इकाइयों के समूह को इस प्रकार चुनने से है कि चुने हुए वर्ग मिलकर जहां तक हो सके, वही औसत अथवा अनुपात प्रदान करें जो समग्र में है । “इस प्रकार सुविचार अथवा उद्देश्यपूर्ण प्रतिचयन में अनुसंधानकर्ता अपने उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उन्हीं इकाइयों का चयन करता है जो क्षेत्र का सर्वाधिक प्रतिनिधित्व करती हों।

उदाहरण : किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय के प्रोफेसर द्वारा छात्रों की समस्याओं से संबंधित शोध कार्य करना है तो वह महा0 में स्थित केन्टीन, पुस्तकालय, वाचनालय, मैदान तथा बारण्डा में जाकर शोध से संबंधित अध्ययन का लेता है।

  1. सुविधापूर्ण प्रतिचयन : सुविधापूर्ण प्रतिचयन में जो कोई भी इकाई को व्यक्ति सुविधापर्वक उपलब्ध होती है उसका अध्ययन कर लिया जाता है या जो शोध के दौरान अचानक शोधकर्ता के सम्पर्क में आ जाते हैं। समग्र में से यदृच्छ चयन को अवैज्ञानिक तथा अप्रामाणिक प्रणाली है किन्तु अनेक शोध कार्यों हेतु इसका प्रयोग किया जाता है। इसे आकस्मिक, अवसरवादी तथा लापरवाही पूर्ण पूर्ण प्रतिचयन भी कहते हैं। इस विधि के अवैज्ञानिक एवं पक्षपातपूर्ण होते हुए भी कई बार अध्ययन हेतु इसी का प्रयोग किया जाता है। इसका उपयोग तब किया जाता है-
  • समग्र पूर्णतया स्पष्ट न हो।
  • जब प्रतिचयन की इकाइयां स्पष्ट न हो।
  • जब स्रोत सूची अप्राप्त हो।

यह विधि सरल, मितव्ययी, गहन अध्ययन एवं यथार्थ प्रतिचयन की सम्भावना के गुण रखती है।

  1. कोटा प्रतिचयन : यह वर्गीय प्रतिचयन का ही एक रूप है। इसके अन्तर्गत सर्वप्रथम समाज को कई वर्गों में विभाजित किया जाता है तत्पश्चात प्रत्येक वर्ग में से चुनी जाने वाली इकाइयों की संख्या तय कर ली जाती है इसके पश्चात प्रत्येक स्तर से आवश्यक अंश ( कोटा) में इकाइयों का चुनाव अपने विवेक से करता है। इस पद्धति को भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उपयुक्त नही माना जाता क्योंकि इस प्रणाली में इकाइयों का चयन अनुसंधानकर्ता की स्वेच्छा पर निर्भर करता है। कोटा प्रतिचयन का उपयोग करते समय अनुसंधानकर्ता यह ध्यान रखता है कि अध्ययन के दृष्टिकोण से किन-किन लक्षणों या विशेषताओं के आधार पर विभिन्न वर्गों में से इकाइयों का चयन करना उपयुक्त होगा तत्पश्चात प्रत्येक वर्ग में से कितनी इकाइयों से तथ्यों का संकलन करना है। इस संख्या को ही अभ्यंश या कोटा कहा जाता है। प्रत्येक वर्ग से इकाइयों की संख्या का चयन करने के पश्चात अनुसंधानकर्ता इन वर्गों में अपनी इच्छानुसार इकाइयों का चयन करने हेतु पूर्णतः स्वतंत्र होता है।

 

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