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भाषा की प्रकृति (विशेषताएँ) – यहाँ पर 18 प्रकृतियों का वर्णन किया गया है

भाषा की प्रकृति (विशेषताएँ) – यहाँ पर 18 प्रकृतियों का वर्णन किया गया है

भाषा के सहज गुण-धर्म को भाषा की प्रकृति कहते हैं। इसे ही भाषा की विशेषता या लक्षण कह सकते हैं भाषा-प्रकृति को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं। भाषा की प्रथम प्रकृति वह है जो सभी भाषाओं के लिए मान्य होती है; इसे भाषा की सर्वमान्य प्रकृति कह सकते हैं। द्वितीय प्रकृति वह है जो भाषा विशेष में पाई जाती है। इससे एक भाषा से दूसरी भाषा की भिन्नता स्पष्ट होती है। हम इसे विशिष्ट भाषागत प्रकृति कह सकते हैं।

यहाँ मुख्यत: ऐसी प्रकृति के विषय में विचार किया जा रहा है, जो विश्व की समस्त भाषाओं में पाई जाती है –

  1. भाषा सामाजिक संपत्ति है

सामाजिक व्यवहार भाषा का मुख्य उद्देश्य है। हम भाषा के सहारे अकेले में सोचते या चिंतन करते हैं, किंतु वह भाषा इस सामान्य यादृन्छिक ध्वनि-प्रतीकों पर आधारित भाषा से भिन्न होती है। भाषा आद्योपांत सामज से संबंधित होती है। भाषा का विकास और अर्जन समाज में होता है और उसका प्रयोग भी समाज में ही होता हैं यह तथ्य द्रष्टव्य है कि जो बच्चा जिस समाज में पैदा होता तथा पलता है, वह उसी समाज की भाषा सीखता है।

  1. भाषा पैतृक संपत्ति नहीं है

कुछ लोगों का कथन है कि पुत्र की पैतृक संपत्ति (घर, धन, बाग आदि) के समान भाषा की भी प्रापित होती है। अत: उनके अनुसार भाषा पैतृक संपत्ति है, किंतु यह सत्य नहीं हैं यदि किसी भारतीय बच्चे को एक-दो वर्ष की अवस्था (शिशु-काल) मं किसी विदेशी भाषा-भाषी के लोगों के साथ कर दिया जाए, तो वह उनकी ही भाषा बोलेगा। इसी प्रकार यदि विदेशी भाषा-भाषी परिवार के शिशु का हिंदी भाषी परिवार में पालन-पोषण करें, तो वह सहज रूप में हिंदी भाषा ही सीखेगा और बोलेगा। यदि भाष पैतृक संपत्ति होती, तो वह बालक बोलने के यौग्य होने पर अपने माता-पिता की ही भाषा बोलता, किंतु ऐसा नहीं होता है।

  1. भाषा व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है

भाषा सामाजिक संपत्ति है। भाषा का निर्माण भी समाज के द्वारा होता है। कोई भी साहित्यकार या भाघा-प्रेमी भाषा में एक शब्द को जोड़ या उसमें से एक शब्द को भी घटा नहीं सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि कोई साहित्यकार या भाषा-प्रेमी भाषा का निर्माता नहीं हो सकता है। भाषा में होने बाला परिवर्तन व्यक्तिकृत न होकर समाजकृत होता है।

  1. भाषा अर्जित संपत्ति है

भाषा परंपरा से प्राप्त संपत्ति है किंतु यह पैतृक संपत्ति की भाँति नहीं प्राप्त होती है। मनुष्य को भाषा सीखने के लिए प्रयास करना पड़ता है। प्रयास के अभाव में विदेशी और अपने देश की भाषा नहीं, मातृभाषा का भी ज्ञान असंभव है। भाषा-ज्ञानार्जन का सतत प्रयास उसमें गंभीरता और परिपक्वता लाता है। निश्चय ही भाषा-ज्ञान प्रयत्नज है ओर भाषा ज्ञान प्रयत्न की दिशा और गति के अनुसार शिथिल अथवा व्यवस्थित होता है। मनुष्य अपनी मातृभाषा के समान प्रयत्न कर अन्य भाषाओं को भी प्रयोगार्थ सीखता है। इससे स्पष्ट होता है, भाषा अर्जित संपत्ति है।

  1. भाषा व्यवहार-अनुकरण द्वारा अर्जित की जाती है

शिशु बौद्धिक विकास के साथ अपने आस-पास के लोगों की ध्वनियों के अनुकरण के आधार पर उन्हीं के समान प्रयोग करने का प्रयत्न करता हैं। प्रारंभ में वह प, अ, ब आदि ध्वनियों का अनुकरण करता है, फिर सामान्य शब्दों को अपना लेता हैं यह अनुकरण तभी संभव होता है जब उसे सीखने योग्य व्यावहारिक वातावरण प्राप्त हो। बैसे व्याकरण, कोश आदि से भी भाषा सीखी जा सकती है, किंतु व्यावहारिक आधार पर सीखी गई भाषा इनकी आधार भूमि हैं। यदि किसी शिशु को निर्जन स्थान पर छोड़ दिय जाए, तो वह बोल भी नहीं पाएगा, क्योंकि व्यवहार के आव में उसे भाषा का ज्ञान नहीं हो पाएगा। हिंदी-व्यवहार के क्षेत्र में पलने वाला शिशु यदि अनुकरण आधार पर हिंदी सीखता हैं, तो पंजाबी-व्यवहार के क्षेत्र का शिशु पंजाबी ही सीखता है।

  1. भाषा सामाजिक स्तर पर आधारित होती है

भाषा का सामाजिक स्तर पर भेद हो जाता है। विस्तृत क्षेत्र में प्रयुक्त किसी भी भाषा की आपसी भिन्नता देख सकते हैं। सामान्य रूप में सभी हिंदी भाषा-भाषी हिंदी का ही प्रयोग करते हैं, किंतु विभिन्न क्षेत्रों की हिंदी में पर्याप्त भिन्नता है। यह भिन्नता उनकी शैक्षिक, आर्थिक, व्यावसायिक तथा सामाजिक आदि स्तरों के कारण होती है। भाषा के प्रत्येक क्षेत्र की अपनी शब्दावली होती है, जिसके कारण भिन्नता दिखाई पड़ती हैं। शिक्षित व्यक्ति जितना सतर्क रहकर भाषा का प्रयोग करता है, सामान्य अवा अशिक्षित व्यक्ति उतनी सतर्कता से भाषा का प्रयोग नहीं कर सकता है । यह स्तरीय तथ्य किसी भी भाषा के विभिन्न कालों के भाषा-प्रयोग से भी अनुभव कर सकते हैं। गाँव की भाषा शिथिल व्याकरणसम्मत होती है, तो शहर की भाषा का व्याकरणसम्मत होना स्वाभाविक है।

  1. भाषा सर्वव्यापक है

यह सर्वमान्य है कि विश्व के समस्त कार्यों का संपादक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भाषा के ही माध्यम से होता है। समस्त ज्ञान भाषा पर आधारित हैं वयक्ति-व्यक्ति का संबंध या व्यक्ति-समाज का संबंध भाषा के अभाव में अंतर है। भर्तृहरि ने वाक्यपदीय में इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहा है-

न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते।

अनुबिद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते। (वाक्यपदीय 123-24)

मनुष्य के मनन, चिंतन तथा भावाभिव्यक्त मूल माध्यम भाषा है, यह भी भाषा की सर्वव्यापकता का प्रबल प्रमाण है।

  1. भाषा सतत प्रवाहमयी है

मनुष्य के साथ भाषा सतत गतिशील रहती है। भाषा की उपमा प्रवाहमान जलस्रोत नदी से दी जा सकती है, जो पर्वत से निकलकर समुद्र तक लगातार बढ़ती रहती है, अपने मार्ग में वह कहीं सूखती नहीं है। समाज के साथ भाषा का आरंभ हुआ और आज तक गतिशील है। मानव समाज जब तक रहेगा तब तक भाषा का स्थायित्व पूर्ण निश्चित हैं किसी व्यक्ति या समाज के द्वारा भाषा में अल्पाधिक परिवर्तन किया जा सकता है, किंतु उसे समाप्त करने की किसी में शक्ति नहीं होती है। भाषा की परिवर्तनशीलता को व्यक्ति या समाज द्वारा रोका नहीं जा सकता है।

  1. भाषा संप्रेषण मूलत: वाचिक है

भाव-सप्रेषण सांकेतिक, आंगिक, लिखित और यांत्रिक आदि रूपां में होता है, किंतु इनकी कुछ सीमाएँ हैं अर्थात् इन सभी माध्यमों के द्वारा पूर्ण भावाभिव्यक्ति संभव नहीं है। स्पर्श तथा संकेत भाषा तो निश्चित रूप से अपृर्ण है साथ ही लिखित भाषा से भी पूर्ण भावाभिव्यक्ति संभव नहीं है वाचिक भाषा में आरोह-अवरोह तथा विभिन्न भाव-भंगिमाओं के आधार पर सर्वाधिक सशक्त भावाभिव्यक्ति संभव होती है। इन्हीं विशेषताओं के कारण वाचिक भाषा को सर्जीव तथा लिखित आदि भाषाओं को सामान्य भाषा कहते हैं। वाचिक भाषा का प्रयोग सर्वाधिक रूप में होता है। अनेक अनपढ़ व्यक्ति लिखित भाषा से अनभिज्ञ होते हैं, किंतु वाचिक भाषा का सहज, स्वाभाविक तथा आकर्षक प्रयोग करते हैं।

  1. भाषा चिरपरीवर्तनशील है

संसार की सभी वस्तुओं के समान भाषा भी परिवर्तनशील हैं। किसी भी देश के एक काल की भाषा परवर्ती काल में पूर्ववत नहीं रह सकती, उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य हो जाता है । यह परिवर्तन अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण होता है। संस्कृत में ‘ साहस’ शब्द का अर्थ अनुचित या अनैतिक कार्य के लिए उत्साह दिखना था, तो हिंदी में यह शब्द अच्छे कार्य में उत्साह दिखाने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। भाषा अनुकरण के माध्यम से सीखी जाती है। मूल (वाचिक) भाषा का पूर्ण अनुकरण संभव नहीं हैं। इसके कारण हैं- अनुकरण की अपूर्णता, शारीरिक तथा मानसिक भिन्नता एवं भौगोलिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों की भिन्नता। इन्हीं आधारों पर भाषा प्रतिपल परिवर्तित होती रहती है।

  1. भाषा का प्रारंभिक रूप उच्चरित होता है

भाषा के दो रूप मुख्य हैं- मौखिक तथा लिखित। इनमें भाषा का प्रारंभिक रूप मौखिक है। लिपि का विकास तो भाषा के जन्म के पर्याप्त समय बाद हुआ है। लिखित भाषा में ध्वनियों का ही अंकन किया जाता है। इस प्रकार कह सकते हैं, कि ध्वन्यात्मक भाषा के अभाव में लिपि की कल्पना भी असंभव हैं उच्च्चरित भाषा के लिए लिपि आवश्यक माध्यम नहीं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज भी ऐसे अनगिनत व्यक्ति मिल जाएँगे जो उच्चरित भाषा का सुंदर प्रयोग करते हैं किंतु उन्हें लिपि का ज्ञान नहीं होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भाषा का प्रारंभिक रूप उच्चरित या मौखिक है और उसका परवर्ती-विकसित रूप लिखित है।

  1. भाषा का आरंभ वाक्य से हुआ है

सामान्यतः भाव या विचार पूर्णता के द्योतक होते हैं। पूर्ण भाव की अभिव्यक्ति सार्थक, स्वतंत्र और पूर्ण सार्थक इकाई-बाक्य से हो संभव है। कभी-कभी तो एक शब्द से भी पूर्ण अर्थ का बोध होता है; यथा- ‘जाओ’, ‘आओ’ आदि। वास्तव में ये शब्द न होकर वाक्य के एक विशेष रूप में प्रयुक्ति हैं। ऐसे वाक्यां में वाक्यांश छिपा छोता है। यहाँ पर वाक्य का उद्देश्य अंश ‘तुम’ छिपा है। श्रोता ऐसे वाक्यों को सुनकर प्रसंग-आधार पर व्याकरणिक ढंग से उसकी पूर्ति कर लेता है। श्रोता ऐसे वाक्यों को सुनकर प्रसंग-आधार पर व्याकर्राणक ढंग से उसकी पूर्ति कर लेता है। इस प्रकार ये वाक्य बन जाते हैं- ‘तुम आओ।’ ‘तुम जाओ।’ बच्चा एक ध्व्वनि या वर्ण के माध्यम से भाव प्रकट करता है। बच्चे की ध्वनि भावात्मक दृष्टि से संबंधित होने के कारण एक सीमा में पूर्ण वाक्य के प्रतीक रूप में होती है; यथा ‘ प ‘ से भाव निकलता है- ‘ मुझे प्यास लगी है या मुझे दूध दे दो या मुझे पानी दे दो।’ यहाँ ‘खग खने ख की भाषा’ का सिद्धांत अवश्य लागू होता है। जिसके हृदय में ममता और वात्सल्य का भाव होगा, वह ही बच्चे के ऐसे वाक्यों की अर्थ-अभिव्यक्ति को ग्रहण कर सकेगा। प्रसंग के ज्ञान के बिना अर्थ-ग्रहण संभव नहीं होता है।

  1. भाषा मानकीकरण पर आधारित होती है

भाषा परिवर्तनशील है, यही कारण है कि प्रत्येक भाषा एक युग के पश्चात दूसरे युग में पहुँचकर पर्याप्त भिन्न हो जाती है । इस प्रकार परिवर्तन के कारण भाषा में विविधता आ जाती है। यदि भाषा-परिवर्तन पर बिलकुल ही नियंत्रण न रखा जाए तो तीव्रगतिं के परिवर्तन के परिणामस्वरूप कुछ ही दिनों में भाषा का रूप अबोध्य हो जाएगा। भाषा-परिवर्तन पूर्ण रूप से रोका तो नहीं जा सकता, किंतु भाषा में बोधगम्यता बनाए रखने के लिए उसके परिवर्तनक्रम का स्थिरीकरण अवश्य संभव है। इस प्रकार की स्थिरता से भाषा का मानकीकरण हो जाता है।

  1. भाषा संयोगावस्था से वियोगावस्था की ओर बढ़ती है

विभिन्न भाषाओं के प्राचीन, मध्ययुगीन तथा वर्तमान रूपों के अध्ययन से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि भाषा का प्रारंभिक रूप संयोगावस्था में होता है। इसे संश्लेषावस्था भी कहते हैं। धीरे-धीरे इसमें परिवर्तन आता है और वियोगावस्था या विश्लेषावस्था आ जाती हैं भाषा की संयोगावस्था में वाक्य के विभिन्न अवयव आपस में मिले हुए लिखे-बोले जाते हैं। परवर्ती अवस्था में यह संयोगावस्था धीरे-धीरे शिथिल होती जाती है; यथा-

रमेशस्य पुत्रः गृहं गच्छति।

रमेश का पुत्र घर जाता है।

‘रमेशस्य’ तथा ‘गच्छति’ संयोगावस्था में प्रयुक्त पद हैं। जब्बकि परवर्ती भाषा हिंदी में ‘रमेश का और ‘जाता है। वियोगावस्था में है।

  1. भाषा का अंतिम रूप नहीं है

वस्तु बनते-बनते एक अवस्था में पूर्ण हो जाती है, तो उसका अंतिम रूप निश्चित हो जाता हैं भाषा के विषय में यह बात सत्य नहीं है । भाषा चिरपरिवर्तनशील हैं इसलिए किसीभी भाषा का अँतिम रूप ढूँढना निरर्थक है और उसका अंतिम रूप प्राप्त कर पाना असंभव है। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि यह प्रकृति जीवित भाषा के संदर्भ में ही मिलती है।

  1. भाषा का प्रवाह कठिन से सरलता की ओर होता है

विभिन्न भाषाओं के ऐतिहासिक अध्ययन के पश्चात यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है क भाषा का प्रवाह कठिनता से सरलता की ओर होता है। मनुष्य स्वभावत: अल्प परिश्रम से अधिक कार्य करना चाहता है। इसी आधार पर किया गया प्रयत्न भाषा में सरलता का गुण भर देता है। उच्चरित भाषा में इस प्रकृति का उदाहरण द्रष्टव्य है- डॉक्टर साहब डाक्टर साहब > डाक्ट साहब झडाक्ट साब > डाक साब डाक्साब

  1. भाषा नैसर्गिक क्रिया है

मातृभाषा सहज रूप में अनुकरण के माध्यम से सीखी जाती है। अन्य भाषाएँ भी बौद्धिक प्रयत्न से सीखी जाती हैं। दोनों प्रकार की भाषाओं के सीखने में अंतर यह है कि मातृभाषा तब सीखी जाती है जब बुद्धि अविकसित होती है, अर्थात् बुद्धि-विकास के साथ मातृभाषा सीखी जाती है। इससे ही इस संदर्भ में होने वाले परिश्रम का ज्ञान नहीं होता है। हम जब अन्य भाषा सीखते हैं तो बुद्धि- विकसित होने के कारण श्रम-अनुभव होता है। किसी भाषा के सीख लेने के बाद उसका प्रयोग बिना किसी कठिनाई से किया जा सकता है। जिस प्रकार शारीरिक चेष्टाएँ स्वाभाविक रूप से होती हैं, ठीक उसी प्रकार भाषा-विज्ञान के पश्चात उसका भी प्रयोग सहज-स्वाभाविक रूप होता है।

  1. भाषा की निश्चित सीमाएँ होती हैं

प्रत्येक भाषा की अपनी भौगोलिक सीमा होती है, अर्थात् एक निश्चित दूरी तक एक भाषा का प्रयोग होता है। भाषा-प्रयाग के विषय में यह कहावत प्रचलित हैं- “चार करोस पर पानी बदले, आठ कोस पर बानी।” एक भाषा से अन्य भाषा की भिन्नता कम या अधिक हो सकती है, किंतु सीमा प्रारंभ हो जाती है; यथा-असमी भाषा असम-सीमा में प्रयुक्त होती है, उसके बाद बंगला की सीमा शुरू हो जाती है। प्रत्येक भाषा की अपनी ऐतिहासिक सीमा होती हैं। एक निश्चित समय तक भाषा प्रयुक्त होती है उससे पूर्ववर्ती तथा परवर्ती भाषा उससे भिन्न होती है। संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश तथा हिंदी के निश्चित प्रयोग-समय से यह तथ्य सुस्पष्ट हो जाता है।

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