राजनीति विज्ञान / Political Science

एकात्ममक तथा संघात्मक सरकार | संघ राज्य के आधारभूत सिद्धान्त | एकात्मक सरकार के गुण | एकात्मक सरकार के दोष | संघात्मक सरकार के गुण | संघात्मक सरकार के दोष

एकात्ममक तथा संघात्मक सरकार | संघ राज्य के आधारभूत सिद्धान्त | एकात्मक सरकार के गुण | एकात्मक सरकार के दोष | संघात्मक सरकार के गुण | संघात्मक सरकार के दोष

एकात्ममक तथा संघात्मक सरकार

(Unitary and Federal Government)

स्ट्राँग के अनुसार-“एकात्मक शासन वह है जहाँ शासन की सर्वोच्च सत्ता संविधान द्वारा केन्द्र को प्रदान की जाती है, जिसमें स्थानीय संस्थाएँ अपनी शक्ति या स्वतंत्रता केन्द्र से प्राप्त करती हैं। वास्तव में इन संस्थाओं का अस्तित्व ही केन्द्र की कृपा पर निर्भर रहता है।” एकात्मक सरकार में उसकी समस्त शक्तियों का प्रयोग केन्द्रीय सरकार द्वारा होता है तथा केन्द्र द्वारा सारे देश पर शासन किया जाता है। इसमें एक विधानपालिका, कार्यपालिका तथा न्यायालय होता है। केन्द्रीय तथा प्रादेशिक सरकारों में शक्ति-विभाजन नहीं होता।

लार्ड ब्राइस के अनुसार- “संघ राज्य वह है जिसके संयोजक इकाइयों की सरकारों की शक्तियाँ एक स्वतंत्र राज्य से तो कम किन्तु नगरपालिका की शक्तियों से अधिक होती है। विशिष्ट क्षेत्र में वे लगभग स्वतन्त्र होती हैं।” संघात्मक राज्य, राज्यों का राज्य होता है। बहुत से स्वतन्त्र राज्य भौगोलिक दृष्टि से एक तथा सामान्य सुरक्षा समस्या रखने वाले राज्य यादि एक सामान्य सरकार स्थापित कर लें जो उनके कुछ विशेष विषयों पर नियन्त्रण रखें तो संघ राज्य की स्थापना कही जाती है। संघ की स्थापना में जाति, धर्म, संस्कृति आदि की एकता भी सहायक होती है। संघात्मक शासन में केन्द्र तथा इकाइयों की सरकारों में शक्ति-विभाजन होता है। दोनों अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र होते हैं तथा साधारणतया एक-दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते । भिन्न-भिन्न संघों में शक्ति-विभाजन भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है। संघवाद का आधार केन्द्र तथा इकाइयों की सरकारों की शक्तियों का विभाजन है।

संघ राज्य में लिखित संविधान का होना आवश्यक है। साथ ही संघ राज्य का संविधान पूर्णरूप से लचीला भी नहीं हो सकता। क्योंकि इस प्रकार का संविधान सर्वप्रभुत्वपूर्ण संसद की कल्पना करता है। शक्ति-विभाजन बनाये रखने के लिए संघ राज्य में स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष न्यायालय आवश्यक होता है।

डायसी ने संघ-शासन के विषय में कहा है “संघ शासन एक ऐसी राजनीतिक विधि है जिसके द्वारा राज्यों के अधिकारों को सुरक्षा देते हुए राष्ट्र की एकता स्थापित की जा सकती है।”

इसी प्रकार के० सी० व्हेयर ने कहा- “संघ शासन का अर्थ एक ऐसी पद्धति से है जिसके द्वारा सामान्य और प्रादेशिक शासकों में सामंजस्य होते हुए भी दोनों अपने अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र हैं।”

इस प्रकार संघ शासन की मुख्य विशेषता यह है कि केन्द्रीय तथा प्रादेशिक शासन अपने- अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र रह कर परस्पर बँधे होकर भी कार्य करते हैं।

संघ राज्य के आधारभूत सिद्धान्त

(Basic Principles of Federal State)

संघ राज्य के आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित प्रकार हैं:-

(1) शक्ति का विभाजन (Division of Powers)- केन्द्र और इकाइयों की सरकार में कार्य-क्षेत्र का विभाजन संघ राज्य की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

(2) सीमित सरकार (Limited Government)- शक्ति-विभाजन के परिणामस्वरूप संघ राज्य में सीमित शक्ति वाली ही सरकार होती है। संविधान केन्द्र तथा इकाइयों की सरकारों का क्षेत्र सीमित करता है।

(3) लिखित संविधान (Written Constitution)- संघ राज्य का संविधान लिखित होना आवश्यक होता है। शक्ति-विभाजन के अनुसार विभिन्न सरकारों की शक्तियाँ लिखित होनी चाहिए, जिससे हर समय गड़बड़ी न हो।

(4) संविधान की प्रभुता (Supremacy of the Constitution)-  संघ राज्य में संविधान की सर्वोच्चता प्राप्त होती है तथा सरकार संविधान के अनुसार समस्त कार्य करती है।

(5) स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष न्यायपालिका (Independent Judiciary)- संघ राज्य में स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष न्यायपालिका का होना आवश्यक है। क्योंकि केन्द्रीय सरकार तथा राज्य- सरकारों में शक्ति-वितरण के कारण किसी भी समय संघर्ष हो सकता है। अतः उनके निर्णय के लिये नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए, संविधान की प्रभुता की रक्षा के लिए एक स्वतन्त्र और शक्तिशाली न्यायपालिका का होना आवश्यक है।

एकात्मक सरकार के गुण

(Merits of Unitary Government)- 

एकात्मक सरकार में पाये जाने वाले गुण निम्नलिखित प्रकार हैं:-

(1) एकात्मक सरकार वाले देश में एकता की भावना अधिक दृढ़ होती है, देशभक्ति की भावना तीव्र होती है तथा संघर्ष की भावना भी कम होती है। इसका कारण देश में एक प्रकार का प्रशासन होना है।

(2) एकात्मक सरकार होने से देश में एक ही प्रकार की शासन-नीति होती है। अतः विभिन्न सरकारों द्वारा बनाये गये कानूनों और शासन-नीतियों में संघर्ष नहीं हो सकता। शासन में भ्रष्टाचार, अकुशलता तथा अदक्षता के लिए एक ही सरकार उत्तरदायी होती है। अतः जनता पर निश्चित रूप से तथा सफलतापूर्वक उत्तरदायित्व आरोपित किया जा सकता है।

(3) एकात्मक सरकार का समस्त देश पर शासन के प्रत्येक विषय पर अधिकार होने से उसको अपनी नीति के विरुद्ध अन्य सरकार के विरोध का खतरा नहीं होता है। अतः एकात्मक सरकार दूसरे देशों की अपेक्षा अधिक स्वतन्त्रतापूर्वक तथा विश्वासपूर्वक व्यवहार कर सकती है, क्योंकि उसके निर्णय का कोई संगठित विरोध नहीं हो सकता।

(4) वर्तमान युग में राष्ट्र के आर्थिक जीवन पर सरकार के नियन्त्रण में वृद्धि हो रही है। राष्ट्रीय आर्थिक योजनाएँ शासन-प्रबन्ध का सामान्य अंग हो रही हैं। इन योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के लिये एक केन्द्रीय शक्ति द्वारा सम्पूर्ण देश के आर्थिक साधनों पर नियन्त्रण आवश्यक है। एकात्मक सरकार सरलतापूर्वक सारे देश के लिये एक विस्तृत योजना बना सकती है तथा उसे पूरा कर सकती है। क्योंकि इसके लिये उसे किसी आन्तरिक सरकार के सहयोग की आवश्यकता नहीं होती।

एकात्मक सरकार के दोष

(Demerits of Unitary Government)-

एकात्मक सरकार के मुख्य दोष निम्नलिखित प्रकार हैं:-

(1) एकात्मक सरकार जनसाधारण में अधिक राजनीतिक चेतना उत्पन्न नहीं कर पाती।

(2) एकात्मक सरकार के अन्तर्गत स्थान-विशेष के निवासी स्थानीय स्वराज्य प्राप्त नहीं कर पाते। उन्हें अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं करने का अधिकार नहीं होता।

(3) एकात्मक सरकार को स्थानीय समस्याओं या मामलों का पूर्ण ज्ञान नहीं होता।

संघात्मक सरकार के गुण

(Merits of Federal State)-

संघात्मक सरकार के मुख्य गुण निम्नलिखित प्रकार हैं-

(1) संघात्मक सरकार की महत्वपूर्ण विशेषता है कि यह विभिन्न देशों, राष्ट्रीयताओं और राज्यों के सामान्य हितों के लिए एक सामान्य राज्य स्थापित करती है। एक-दूसरे से सम्बद्ध छोटे-छोटे राज्य, जो आत्मनिर्भर नहीं हो सकते तथा असुरक्षित भी हैं, वे संघ निर्माण द्वारा सुरक्षित रह सकते हैं।

(2) संघात्मक प्रणाली में संघ के विभिन्न पूर्ण स्थानीय स्वतन्त्र होते हैं। ये स्थानीय समस्याएँ हल करने, तथा स्थानीय मामलों का प्रबन्ध करने के लिए पूर्ण स्वतन्त्र होते हैं। स्थानीय प्रशासन अधिक कुशल हो जाता है, क्योंकि स्थान विशेष की समस्याओं को उस स्थान के निवासी अधिक अच्छी तरह समझ सकते हैं। इसके अतिरिक्त जनता भी अधिक स्वतन्त्रता का अनुभव करती है। क्योंकि प्रत्येक बात के लिये वह दूर की सरकार के अनुशासन में नहीं रहती। संघात्मक पद्धति द्वारा राष्ट्रीय एकता तथा प्रादेशिक स्वाधीनता में समन्वय स्थापित होता है।

(3) संघवाद स्थानीय विषयों का शासन-प्रबन्ध स्थानीय और इकाइयों की सरकारों को सौंपकर केन्द्रीय सरकार का भार कम कर देता है। इस प्रकार संघ सरकार राष्ट्रीय समस्याओं को सुलझाने और अखिल राष्ट्रीय विषयों का प्रबन्ध करने में अधिक समय और शक्ति लगा सकती है।

(4) संघ शासन-प्रणाली में सरकार की शक्तियाँ विभक्त हो जाने पर सरकार निरंकुश नहीं हो सकती। शक्ति स्वभावतः एक के हाथ में जाकर केन्द्रित होकर उतनी ही निरंकुश हो जाती है। परन्तु संघवाद ‘सीमित सरकार’ के सिद्धान्त पर आधारित होने के कारण शक्ति के केन्द्रीयकरण द्वारा उत्पन्न निरंकुशता का भय कम होता है। साथ ही संघवाद संविधान की प्रभुता और न्यायपालिका की स्वतन्त्रता और निष्पक्षता पर बल देता है, जिससे जनता की स्वतन्त्रता की रक्षा भी होती है।

संघात्मक सरकार के दोष

(Demerits of Federal Governments)-

संघात्मक सरकार के कुछ दोष निम्नलिखित प्रकार हैं:-

(1) संघवाद में विभाजक शक्तियों को बल मिलने के कारण राष्ट्रीय एकता में दुर्बलता उत्पन्न होती है।

(2) केन्द्र एवं इकाइयों की सरकारों के पृथक तथा स्वतन्त्र होने के कारण उनकी नीतियों में विभिन्नता आ जाती है। इससे उनमें संघर्ष उत्पन्न होता है तथा संघर्ष सुलझाने के लिए न्यायपालिका की शरण लेनी पड़ती है।

(3) संघ सरकार एकात्मक सरकार उतनी दृढ़ता तथा आत्मविश्वास से अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में भाग नहीं ले सकती। इसका कारण है संघ सरकार द्वारा किये गये बहुत से समझौते । सन्धियाँ पालन करने के लिये उसे राज्य सरकारों पर निर्भर रहना पड़ता है।

(4) वर्तमान समय में देश की प्रगति तथा समृद्धि के लिये राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक योजनाएँ बनाई जाती हैं। इसके लिये समस्त आर्थिक सत्ता केन्द्रीय सरकार के हाथ में होनी चाहिए। परन्तु वास्तविक संघ में केन्द्र को इस प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त नहीं हो पातीं। साथ ही आर्थिक विकास के लिये देश को आर्थिक इकाई मानना होता है। कभी-कभी तो सम्पन्न प्रदेश के हित को पिछड़े प्रदेश की उन्नति के लिये बलिदान करना आवश्यक समझा जाता है। संघात्मक प्रणाली में ऐसा करने के लिये केन्द्र को अत्यधिक शक्तिशाली होना चाहिये।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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