शिक्षाशास्त्र / Education

वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य केन्द्र | वैदिककालीन शिक्षा के स्तर

वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य केन्द्र | वैदिककालीन शिक्षा के स्तर

वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य केन्द्र

(Main Education Centers During the Vedic Period)

वैदिक काल में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था परिवारों और उच्च शिक्षा की व्यवस्था गुरुकुलों में होती थी। इनकी स्थिति निम्न प्रकार थी-

(1) ये गुरुकुल प्रारंभिक वैदिक काल में तो प्रायः जन कोलाहल से दूर प्रकृति की गोद में स्थापित होते थे।

(2) उत्तर वैदिक काल में ये गुरुकुल बड़े-बड़े नगरों और तीर्थ स्थानों पर स्थापित होने लगे थे।

तीर्थ स्थान धर्म प्रचार के केन्द्र होने के साथ-साथ उच्च शिक्षा के केन्द्रों के रूप विकसित हुए। तक्षशिला, पाटलिपुत्र, कन्नौज, केकय, मिथिला, धार, तंजौर और मालखण्ड आदि प्रमुख नगरों में तथा प्रयोग, काशी, अयोध्या, उज्जैन, नासिक और काँची आदि तीर्थ स्थानों में मुख्य शिक्षा केन्द्र थे। मुख्य शिक्षा केन्द्रों का वर्णन निम्न प्रकार हैं-

(1) तक्षशिक्षा (Takshashila)- तक्षिशिला उत्तरी भारत के तत्कालीन गांधार राज्य की राजधानी थी। इस नगर को तत्कालीन गांधार नरेश भरत ने बसाया था। कालांतर में उसने इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया और देश के विभिन्न भागों से विद्वानों को बुलाकर बसाया। उसने उन्हें अनेक गांव दान में दिये और शिक्षा की उपयुक्त व्यवस्था का कार्यभार सौंपा। परिणामतः यह नगर समकालीन राज्य की राजधानी के साथ-साथ एक शिक्षा नगर के रूप में विकसित हुआ। यहाँ संस्कृत, साहित्य, व्याकरण चारों वेदो और ध्म तथा दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान निवास करते थे। कुछ विद्वान आयुर्विज्ञान के विशेषज्ञ थे। परिणामतः तक्षशिला वैदिक साहित्य, दर्शन और आयुर्विज्ञान की शिक्षा के मुख्य केन्द्र के रूंप में विकसित हुआ। यहाँ विभिन्न कौशल एवं व्यवसायों की शिक्षा की भी उत्तम व्यवस्था थी।

(2) केकय (Kaikeysa)- केकय मध्य भारत के तत्कालीन केकय राज्य की राजधानी थी। उपनिषद काल में यह शिक्षा का मुख्य केन्द्र था। यहाँ संस्कृत भाषा, व्याकरण, साहित्य, वेद, धर्म और दर्शन की शिक्षा का समुचित प्रबंध था। केकय नरेश अश्वपति विद्वानों का आदर करते थे उन्होंने अपनी राजधानी में प्रमुख विद्वानों को बसाया था। वे राजधानी में विद्वत् सम्मेलन भी आयोजित करते थे । कला- कौशलों, व्यवसायों और सैनिक शिक्षा की भी समुचित व्यवस्था थी।

(3) मिथिला (Mithila)- मिथिला मध्य भारत के तत्कालीन मिथिला राज्य की राजनघानी था यहाँ धर्म और दर्शन के विद्वानों के सम्मेलन होते थे। उपनिषद काल में वैदिक शिक्षा के मुख्य केन्द्र के रूप में इसका विकास हुआ। इस नगर में धर्म और दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान निवास करते थे। धर्म और दर्शन की शिक्षा प्राप्त करने सुदूर स्थानों से इच्छुक यहाँ आते थे। उत्तर वैदिक काल में यहाँ कला-कौशल एवं सैनिक शिक्षा की भी व्यवस्था हुई।

(4) प्रयाग (Prayag)- प्रयाग (इलाहाबाद) प्रारंभ से ही ऋषियों की तपोभूमि रहा है। वैदिक कला में इस क्षेत्र के गंगातटवत्ती क्षेत्रों में अनेक ऋषिआश्रम थे जो धर्म और दर्शन की शिक्षा के मुख्य केन्द्र थे। यह एक तीर्थ स्थान तथा धार्मिक स्थल होने के साथ-साथ ऋषियों की तपोभूमि था। अत: यह धर्म एवं दर्शन की शिक्षा के केन्द्र के रूप में विकसित हुआ।

(5) काशी (Kashi)- काशी (वाराणसी) भी प्रारंभ से ही ऋषियों को तपोभूमि और विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ का मुख्य केन्द्र रहा है। यहाँ के गंगातटवर्ती क्षेत्रों में अनेक ऋषिआश्रम थे। काशी नरेश अजातशत्रु को उपनिषदीय ज्ञान (ब्रह्म विद्या) का पंडित माना जाता था उन्होंने यहाँ विद्वानों को आमंत्रित कर आत्मा-परमात्मा और ब्रह्म के स्वरूप के विषय में शास्रार्थ कराया था।

(6) काँची (Kanchi)- काँची को धार्मिक व्यक्ति दक्षिण काशी कहते थे। यह आज काजीवरम् है। उत्तर वैदिक काल में यहाँ वेदों के विद्वानों ने वैदिक धर्म और दर्शन की शिक्षा देना प्रांरंभ किया था । पर ये पुरोहित व कर्मकाण्डी थे। अतएव इन्होंने यहाँ कर्मकाण्डप्रधान शिक्षा का ही विकास किया। यह आज तक ब्राह्मणीय शिक्षा का मुख्य केन्द्र चला आ रहा है।

शिक्षा के स्तर

(Stages of Education)

डा० एस० के० अल्तेकर के अनुसार-“प्राचीन भारत में संभवत: 400 ई० पू० से पहले प्राथमिक शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी। बालक का परिवार ही उसकी शिक्षा का केन्द्र था। उसके पश्चात्, कुछ ब्रह्मणों ने व्यक्तिगत रूप से शिक्षा देने का कार्य आरंभ किया।” परिणामतः जिस शिक्षा-प्रणाली का विकास हुआ, उसमें प्राथमिक और उच्च शिक्षा की समुचित व्यवस्था थी। प्राचीन भारत में शिक्षा के यही दो स्तर थे। इनका संक्षिप्त वर्णन अग्र प्रकार हैं-

(1) प्राथमिक शिक्षा

(Primary Education)

(i) परिचय (Introduction)- प्राथमिक शिक्षा पर ब्राह्मणों का आधिपत्य नहीं था। इसी कारण धर्मग्रंथों में इसका विवरण न देकर इसकी उपेक्षा की गयी है तथापि ‘ऋग्वेद’ में यत्र त्र ऐसे संकेत मिलते हैं, जिनसे पाठशाला की भाँति किसी शिक्षा-संस्था की कल्पना की जा सकती है।

(ii) प्रवेश व अवधि (Entrance and Duration)- प्राथमिक शिक्षा का आरंभ 5 वर्ष की आयु में ‘विद्यारम्भ संस्कार’ से होता था और सभी जातियों के बालकों के लिए अनिवार्य था। अर्थात् सभी जातियों के बालक प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। डॉ० ए०एस० अल्तेकर का मत है कि इसकी अवधि 6 वर्ष की थी।

(iii) पाठ्यक्रम (Curriculum)- सर्वप्रथम बालकों को कुछ वैदिक मंत्रों का उच्चारण करना और बोलना सिखाया जाता था जब वे उन मंत्रों को कंठस्थ कर लेते थे तब उनको पढ़ने और लिखने की शिक्षा दी जाती थी तदुपरांत उनको साहित्य और व्याकरण से परिचित कराया जाता था।

(2) उच्च शिक्षा

(Higher Education)

(i) परिचय (Introduction)- प्रारंभ में केवल प्राथमिक शिक्षा की ही व्यवस्था थी, किन्तु सामाजिक प्रगति के साथ-साथ शिक्षा के विषयों की संख्या में वृद्धि होने के साथ-साथ उनके लिए पृथक शिक्षा- संस्थाओं की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये विशिष्ट विद्यालयों की स्थापना ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी तक हो गई थी। यही से उच्च शिक्षा के इतिहास का सूत्रपात होता है।

(ii) प्रवेश व अवधि (Entrance and Duration)- उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार केवल ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को ही प्राप्त था। इन जातियों के बालक सामान्य रूप से क्रमश: 8, 11 और 12 वर्ष की आयु में शिक्षा-संस्था में प्रवेश करते थे। साहित्य एवं धर्मशास्त्र के अध्ययन की अवधि 10 वर्ष की थी। प्रत्येक वेद के अध्ययन की अवधि 12 वर्ष की निश्चित थी।

(iii) पाठ्यक्रम (Curriculum)- पाठ्यक्रम में परा (आध्यात्मिक) विद्या और अपरा (लौकिक) विद्या-दोनों को स्थान दिया गया था इनका विवरण निम्न प्रकार हैं-

(a) परा- परा विद्या के अन्तर्गत वेद, वेदांग, पुराण, दर्शन, उपनिषद् आदि आध्यात्मिक विषय थे।

(b) अपरा- अपरा विद्या के अंतर्गत इतिहास, तर्कशास्त्र, भूगर्भशास्त्र, भौतिकशास्त्र आदि लौकिक विषय

(iv) शिक्षण-विधि (Method of Teaching)-मुद्रित पुस्तकों का अभाव होने के कारण शिक्षण-विधि प्रायः मौखिक थी। सामान्तया यह व्यवस्था निम्न प्रकार थी-

(a) छात्र, गुरू से वेदादि ग्रंथों को सुनते थे।

(b) छात्र गुरु के उच्चारण का अनुकरण करते थे और पाठ्य-विषय दोहराते थे।

(c) तदुपरांत, छात्र एकांत में पाठ्य-विषय का का मनन, चितन, स्वाध्याय और पुनरावृत्ति करते थे।

(d) शिक्षण विधि में प्रवचन, व्याख्यान, प्रश्नोत्तर, वाद-विवाद, शास्त्रार्थ आदि का भी प्रयोग किया जाता था।

(v) परीक्षाएँ व उपाधियाँ (Examination and Degrees)- शिक्षा समाप्त होने पर छात्रों की मौखिक परीक्षा होती थी। इसके लिए उन्हें विद्वानों की सभा में उपस्थित होना पड़ता था, जहाँ उन्हें विद्वानों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर देने पड़ते थे।

(vi) शिक्षा-संस्थाएँ (Educational Institutions)- प्राचीन काल में शिक्षा प्रदान करने की अनेक प्रकार की शिक्षा-संस्थाएँ थीं; जैसे–

(a) टोल (Tol)- टोल में संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी। एक टोल में एक शिक्षक होता था।

(b) चरण (Charana)- चरण में वेद के एक अंग की शिक्षा प्रदान की जाती थी। प्रत्येक चरण में एक शिक्षक या।

(c) घटिका (Ghatika)- घटिका में धर्म और दर्शन की उच्च शिक्षा प्रदान की जाती थी। प्रत्येक घटिका में अनेक शिक्षक होते थे।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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