शिक्षाशास्त्र / Education

अधिगम स्थानान्तरण में बाधक तत्व | अधिगम स्थानान्तरण में सहायक तत्व | स्थानान्तरण का शैक्षिक महत्व | अधिगम स्थानान्तरण तथा अध्यापक के कर्तव्य

अधिगम स्थानान्तरण में बाधक तत्व | अधिगम स्थानान्तरण में सहायक तत्व | स्थानान्तरण का शैक्षिक महत्व | अधिगम स्थानान्तरण तथा अध्यापक के कर्तव्य

अधिगम स्थानान्तरण में बाधक तत्व

(i) विषय से कोई सन्दर्भ न रखने वाली पाठ्यवस्तु- जैसे एक हाई स्कूल के ज्यामिती अध्यापक ने अपने छात्रों को संयुक्त राज्य अमरीका के संविधान के पूर्वकथनों को पढ़कर उसमें से मूल अवधारणाओं को निकालने के लिए कहा । बाधा होगी क्योंकि दोनों के सन्दर्भ अलग-अलग हैं।

(ii) अनुपयोगी विधियों के प्रयोग, जैसे संस्कृत व्याकरण के सूत्रों को रट कर उनका प्रयोग केवल संस्कृत भाषा में हो सकता है न कि अन्य भाषा में।

(iii) अध्यापक द्वारा बालकों की अधिगम प्रक्रियाओं को न समझना- यदि अध्यापक हिन्दी पढ़ा रहा है लेकिन लड़के अनुसरण नहीं कर पाते तो वहाँ स्थानांतरण नहीं होगा क्योंकि बालकों को स्वयं अवबोधन नहीं हो पाता है।

(iv) जीवन में काम लाने की क्षमता न होना- उदाहरण के लिए विज्ञान का अध्ययन करके कोई चीज न बना सकना है। प्रो० वेब ने कहा है कि “कोई प्रमाण नहीं कि ऐसे परिणाम प्राप्त होंगे जब तक कि विज्ञान अध्यापक ऐसी विधियाँ न निकाले जो विज्ञान के कोर्स की सामग्री को प्रति दिन के जीवन में उठने वाली विभिन्न समस्याओं के समाधान में प्रयोग न कर सकें।”

(v) गुणांकन का अभाव छात्रों एवं अध्यापकों में होना- प्रो० वेब ने अन्यत्र भी लिखा है कि “बालकों को पहाड़ा, जोड़ और सूत्रों का अभ्यास कराया जाता है परन्तु जिन सामग्रियों का उन्हें अभ्यास कराया जाता है उनकी सार्थकता एवं अर्थ नहीं बताया जाता है।” इससे गुणांकन न होने से स्थानांतरण सम्भव नहीं है।

(vi) अध्यापक की कमी और झिझक- अधिगम स्थानान्तरण को शिक्षा देना अध्यापक के हाथ में होता है। ऐसी दशा में उसमें शैक्षिक अभिक्षमता की यदि कमी हुई और उसी कमी को छिपाने में उसने कुछ बातों को समझाने एवं बिताने में झिझक प्रकट की तो निश्चय ही अधिगम-स्थानान्तरण में यह बाधक होगा। प्रो० मर्सेल ने संकेत किया है कि पहले, अध्यापक को जानना चाहिए कि वह दूसरे क्षेत्रों में स्थानान्तरण के लिए बालकों के लिए क्या चाहता है, दूसरे, अनुभव या प्रयोग द्वारा सीखना चाहिए कि स्थानान्तरण की शिक्षा कैसे देवे, और तीसरे, आगे बढ़े और काम करे।

अधिगम स्थानान्तरण में सहायक तत्व

(i) व्यक्ति की बुद्धि और प्रयत्नशीलता- इसके आधार पर स्थानान्तरण होता है। इसके कारण परिस्थिति को समझने में सहायता मिलती है तथा एक स्थिति से दूसरी स्थिति में अधिगम करना है।

(ii) विषय-वस्तु या अवबोधन-प्रो० थॉर्नडाइक एवं वुडवर्थ ने बताया है कि यदि विषयवस्तु को समझ लिया तो उसी मात्रा में अधिगम का स्थानान्तरण होता है। उदाहरण के लिए, मनोविज्ञान को समझ लेने पर उनका स्थानान्तरण शिक्षामनोविज्ञान के क्षेत्र में किया जा सकता है।

(iii) विषय के प्रति अभिवृत्ति-इससे स्थानान्तरण में सहायता मिलती है। गणित के सिद्धान्त समझ लेने पर यदि उसका प्रयोग “शैक्षिक सांख्यिकी” में किया जावे तो सांख्यिकी के प्रति अभिवृत्ति गणित के सिद्धान्तों के स्थानान्तरण में सहयोग देती है।

(iv) सामान्यीकरण की क्षमता- व्यक्ति में सामान्यीकरण की क्षमता अधिक होने पर स्थानान्तरण में सहायता मिलती है। सामान्य ज्ञान अधिक होने पर व्यक्ति हरेक क्षेत्र में अधिगम स्थानान्तरण करता है।

(v) विषय सामग्री की निपुणता और उस पर अधिकार होना-इससे भी स्थानान्तरण में सहायता मिलती है। उदाहरण के लिए भूगोल-इतिहास का पूर्ण ज्ञान होने से राजनीति एवं अर्थशास्त्र के अध्ययन में सुविधा होती है।

(vi) अध्यापक द्वारा प्रयुक्त शिक्षण विधि- इससे भी स्थानान्तरण में सहायता होती है। अध्यापक व्याख्या करते हुए तथा जीवन के संदर्भ में किसी भी विषय का ज्ञान देदे तो निश्चय ही एक विशेष ढंग से स्थानान्तरण होगा।

(vii) विद्यालय, कक्षा एवं पाठ्यक्रम की सुव्यवस्था- यदि अधिगम की वस्तुओं का प्रयोग विद्यालय, कक्षा और पाठ्यविषयों के अध्ययन की सुविधा देकर किया जावे तो निश्चय ही अधिगम का स्थानान्तरण होता है।

(viii) विद्यालय अधिगम एवं गृह की क्रियाओं में मेल होना-“अध्यापक बालकों का पीछा स्कूल से घर तक नहीं कर सकता और न तो घर पर अपनी क्रियाओं में जो कुछ स्कूल से सिखाया गया है उनको कैसे प्रयोग किया जावे यही बता सकता है।” इसलिए यह आवश्यक है कि जो कुछ विद्यालय में सीखा-सिखाया जावे उसका व्यवाहारिक उपयोग घर में या घर की परिस्थितियों में होगा। इसलिए विद्यालय एवं घर में मेल होना चाहिए।

स्थानान्तरण का शैक्षिक महत्व

इसका शैक्षिक महत्व निम्न दृष्टियों से है-

(क) शिक्षा के पाठ्यक्रम की दृष्टि से- पाठ्यक्रम निर्माण करते हुए अध्यापक को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि ज्ञान के विषय को दैनिक जीवन से सम्बन्धित करना चाहिए। विद्यालय के विषयों को व्यक्ति की आवश्यकता, रुचि योग्यता, सामाजिक जीवन, आदि से जोड़ देना चाहिए। इससे स्थानान्तरण सरलता से होगा।

(ख) शिक्षण विधि की दृष्टि से- धनात्मक स्थानान्तरण अधिक उपयोगी होता है। इसके लिए विशेष ढंग से शिक्षा देने की आवश्यकता पड़ती है। अध्यापक को इस बात का ध्यान होना चाहिए। इसके लिए विभिन्न सिद्धान्तवाद पर अध्यापक को ध्यान रखना चाहिए। साहचर्य के नियमों की सहायता से काम करना चाहिए।

(ग) भाबी जीवन में प्रगति की दृष्टि से व्यवहारिक ढंग से काम करने योग्य बालक हो जाये इसके लिए स्थानान्तरण का प्रयोग किया जाने । गफील, डाक्टर, मास्टर, नेता, इंजीनियर, समाज सेवक, क्लर्क, व्यापारी,  उद्योगी जो कुछ बनाना है तदनुकूल शिक्षा की व्यवस्था में स्थानान्तरण का महत्व है।

(घ) भाषा, गणित, विज्ञान का विकास- ये कुछ ऐसे विषय हैं जिसमें अधिगम के विभिन्न सिद्धान्तवाद का प्रयोग करके इनका विकास किया जा सकता है। उदाहरण के लिए समान तत्व का सिद्धान्त भाषा के विशाल मालपूर्ण होता है। सामान्यीकरण का सिद्धान्तबाद गणित एवं विज्ञान के अध्यापन के लिए महत्वपूर्ण है। अतः स्पष्ट है कि विषयों के विकास में स्थानान्तरण का महत्व होता है।

(ड.) गलतियों के सुधार की दृष्टि से- प्रो० वेब में बताया है कि ‘जब तथ्यों का ज्ञान होता है तब तक उन परिस्थितियों में जिन व्यक्ति को अधिकतम अनुभव होता है, कम गलतियाँ होती है।” इससे स्पष्ट है कि अधिगम के अन्तरण से गलतियों में सुधार होता है, इस दृष्टि से उसका महल पाया जाता है।

(च) समस्या हल करने की दृष्टि से- इस सम्बन्ध में प्रो० मैगियांक के शब्दों पर ध्यान देना चाहिए। “जटिल, अमूर्त, और अर्थपूर्ण पाठ्यवस्तुओं का और प्रत्ययों (तर्क) द्वारा समस्याओं को हल करना बहुत हद तक स्थानान्तरण के कार्य हैं, जहाँ व्यक्ति किसी समस्या के आधारभूत सम्बन्धों को गहराई तक देखता है या जहाँ उसे उनकी अन्तर्दृष्टि प्राप्त होती है, यहाँ अन्तरण में योगदान करने वाली एक बड़ी परिस्थिति बन जाती है।” समस्या हल करने में अधिगम का स्थानान्तरण महत्वपूर्ण होता है।

अधिगम स्थानान्तरण तथा अध्यापक के कर्तव्य

प्रो० वेब ने बताया है कि “उसके लिए समस्या यह है कि छात्रों को कैसे सिखाया जावे कि वे एक स्थिति में पाए हुए अनुभवों का जहाँ तक व्यावहारिक हो, यथासम्भव अन्य स्थितियों में भी उनका उपयोग कर सके ।” ऐसी परिस्थिति में अध्यापक को निम्नलिखित चीजें ध्यान में रखनी चाहिए-

(i) व्यापक ज्ञान, स्पष्ट ज्ञान और कौशल अध्यापक में होना चाहिए।

(ii) तीव्रबुद्धि के बालकों की ओर अधिक ध्यान देना अध्यापक का कर्तव्य है।

(iii) मनोवैज्ञानिक विधि से बालकों के अनुफूल उसे शिक्षा देनी चाहिए।

(iv) अन्त में अध्यापक पढ़ाए गए पाठ का सूक्ष्मीकरण और सामान्यीकरण प्रस्तुत करे।

(v) शिक्षण देते समय सहसम्बन्ध के साथ ज्ञान प्रदान करना चाहिए।

(vi) अध्यापक बालकों के समक्ष समस्या रखे और बालकों को अपनी सूझ-बूझ के प्रयोग के लिए अवसर दे।

(vii) निरर्थक, अरोचक, अनुपयोगी ज्ञान न देना चाहिए।

(viii) बालकों को चिन्तन के लिए अभिप्रेरित करना चाहिए।

(ix) बालकों को विषयवस्तु में रुचि एवं अभिवृत्ति के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

(x) सीखे हुए अनुभव एवं ज्ञान को जीयन की वास्तविक परिस्थिति में अनुप्रयोग के लिए छात्रों को अवसर प्रदान करना अध्यापक का ही कर्तव्य है।

(xi) जहाँ तक सम्भव हो अध्यापक बालकों को ऋणात्मक अन्तरण के अवसर न दे।

(xii) अध्यापक बालकों का शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक एवं सामाजिक स्वास्थ्य ठीक रखे।

(xiii) अध्यापक बालकों को उनकी सामर्थ्य के अनुकूल अधिगम के २६ नान्तरण का अधिक अभ्यास करावें।

(xiv) अध्यापक सीखी वस्तुओं को धारण करने के लिए बालकों को सुविधा, साधन एवं उत्साह प्रदान करे।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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