शिक्षाशास्त्र / Education

शैक्षिक प्रबन्धन क्या है? | विद्यालय में वित्तीय संसाधनों का प्रबन्धन

शैक्षिक प्रबन्धन क्या है? | विद्यालय में वित्तीय संसाधनों का प्रबन्धन

शैक्षिक प्रबन्धन (Educational Management)-

मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु विविध प्रकार के संगठनों का आवश्यकता होती है जैसे कि औपचारिक एवं अनोपचारिक, आर्थिक, सामाजिक, व्यावसायिक तथा राजनैतिक आदि। संगठन निश्चित उद्दश्यों का प्राप्त करने वाले व्यक्तियों का एक समह होता है तथा इन संगठनों को निर्देशित, समन्वित तथा एकीकृत करने के लिये ही प्रबन्धन की आवश्यकता होती है।

प्रबंधन का सरल शब्दों में अर्थ संगठन में व्यक्तियों से कार्य कराना है। अंग्रेजी शब्द मेनेज-मैन-टेक्टफुली को ही मैनेजमेन्ट कहते हैं। अत: प्रबन्धन का अर्थ व्यक्तियों से कार्य लेना है।

शिक्षा प्रबन्धन एक विशेष प्रक्रिया है। मानव समूह तथा संस्थाओं के संचालन के लिये अर्थात् विद्यालय के कमियों तथा विद्यालयों संस्था के संचालन के लिये शैक्षिक प्रबन्धन का होना अत्यन्त आवश्यक है।

शिक्षा प्रबन्धन का उद्देश्य स्वतंत्रता से पूर्व तो मात्र यह था कि विद्यार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान के माध्यम से केवल उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये तैयार कर सकें या फिर थाड़ बहुत पढ़ लिखकर व बाबूगारी कर सकें, जिससे अंग्रेजी शासन चलाने में सहयोग दे सके। इस अवधारणा के अनुकूल हा विद्यालयों में शैक्षिक प्रबन्धन आवश्यक होता था। स्वतंत्रता के पश्चात् दश में आमूलचूल परिवर्तन किया गया। शिक्षा को जीवन से जोड़ने की आवश्यकता अनुभव को गया। साथ ही विद्यालय प्रबन्धन की आवश्यकता को भी महसूस किया गया।

विद्यालय प्रबन्धन से तात्पर्य भौतिक एवं मानव संसाधनों को विद्यालय में परयाप्त मात्रा में इस दृष्टि से उपलब्ध कराना है कि विद्यार्थी को अपेक्षित शिक्षा प्राप्त करने हेतु अनुकूल वातावरण मिल सके एवं विद्यार्थियों द्वारा पर्याप्त रूप से उपयोग भी किया जाना चाहिए। साथ ही दोनों प्रकार के संसाधनों में समन्वय भी स्थापित हो सके। संसाधनों में समन्वय से तात्पर्य है कि मानव संसाधन, भौतिक संसाधनों के अधिक से अधिक उपयोग के अवसर प्राप्त करने में सहायता द तथा विद्यालय को एक ऐसा केन्द्र बनने में सहायता दें, जिसका उपयोग स्थानीय।समुदाय भी कर सके।

शैक्षिक प्रबन्धकों को यह भी देखना चाहिए कि जो संसाधन विद्यालय में उपलब्ध हैं उन पर पूर्ण नियंत्रण रखें। अर्थात् देखें कि सभी साधनों का सही रूप से उपयोग हो तथा साधनों का दुरुपयोग न हो, तथा ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो कि उनका उपयोग ही न होता हो तथा जुटाये गये सभी संसाधन निरर्थक प्रमाणित होते हों।

विद्यालय में वित्तीय संसाधनों का प्रबन्धन (Managing Financial Resources in Schools)-

किसी संस्था अथवा संगठन के संचालन के लिए वित्तीय स्रोतों की आवश्यकता होती है। तभी कोई संस्था समुचित रूप से संचालित की जा सकती है। इसी प्रकार विद्यालयी शिक्षा के संचालन हेतु वित्तीय प्रबन्धन किया जाता है। यदि व्यापक रूप से ध्यान दिया जाये तो शिक्षा संस्थाओं के लिए वित्तीय प्रबन्धन की आवश्यकता के प्रमुख चार क्षेत्र

  1. सामान्य शिक्षा सेवा के संचालन हेतु,
  2. शिक्षा सुविधाओं के विस्तार हेतु,
  3. शिक्षा सेवाओं के विस्तार के लिए, तथा
  4. शिक्षा अवसरों की असमानताओं को दूर करने के लिए।

शिक्षा के वित्तीय प्रबन्धन के स्रोत तथा साधन (Financial Resources and Material of Education)-

शिक्षा के वित्तीय प्रबन्धन में निम्नलिखित स्रोतों तथा साधनों का उपयोग किया जाता है-

  1. भूमि अनुदान तथा अन्य आय द्वारा,
  2. समाज द्वारा अनुदान,
  3. छात्रों की फीस द्वारा,
  4. राज्य कोष तथा सहायता अथवा राज्य के अनुदान, तथा
  5. अन्य समाज सेवी संस्थाओं द्वारा वित्तीय सहायता जैसे- विश्व बैंक और यूनेस्को आदि।

भारत में विद्यालयों के प्रकार (Types of Schools in India) –

शिक्षा के वित्तीय प्रबन्धन के आधार पर देश के विद्यालया को निम्न चार वर्गों में बाँट सकते हैं-

  1. राजकीय तथा केन्द्रीय विद्यालय अनुदान प्राप्त विद्यालय।
  1. अनदान रहित गैर सरकारी विद्यालय जा किसी परीक्षा लेने वाले संगठन से मान्यता प्राप्त होते हैं।
  1. निजी व्यक्तियों के समूह द्वारा स्थापित विद्यालय।

विद्यालय का बजट (Budget of School )-

विद्यालय का बजट बनाने में, आमतौर से व्यय सम्बन्धी वर्गीकरण निम्न प्रकार होता है-

  1. वेतन एवं भक्ते- शिक्षकों, विभिन्न कर्म चारियों, प्रधानाध्यापक, पुस्तकालय तथा
  2. अध्यक्ष इत्यादि।
  3. पुस्तकालय।
  4. दृश्य-श्रव्य सामग्री।
  5. उपकरण तथा फर्नीचर।
  6. स्वास्थ्य सेवाएँ।
  7. विद्यालय की बस अथवा अन्य आवागमन के साधन।
  8. विद्यालय भवन।
  9. बिजली तथा पानी के बिल।
  10. खेल के मैदानों का रख-रखाव।
  11. खेलकूल के सामान का क्रम एवं रख-रखाव।।
  12. विद्यालय के सामान तथा भवन इत्यादि का बीमा, किराया तथा रख-रखाव।
  13. उधार के लिये धन पर ब्याज।
  14. मध्याह्न भोजन।
  15. सहगामी क्रियाएँ।
  16. परीक्षा व्यय ।
  17. छात्रवृत्तियाँ।
  18. विविध व्यय तथा अन्य निर्धारित मद।

विद्यालय बजट का प्रबन्धन (Management of the Budget of the School) –

बजट के स्वीकरण के पश्चात् यह विद्यालय को वापस भेज दिया जाता है और स्वीकृत बजट के अनुसार ही विभिन्न मदों में विद्यालय व्यय करते हैं। विद्यालय यदि बड़ा होता है तब लेखा अधिकारी अथवा लेखा लिपिक की सहायता से कार्य करता है। व्यय राज्य सरकार द्वारा निर्धारित वित्तीय नियमों के अनुसार ही करना पड़ता है। इस सम्बन्ध में सरकारी या गैरसरकारी विद्यालयों को, जिन्हें भी सरकार अनुदान देती है, कोई छूट नहीं है। इसलिए प्रधानाध्यापक के लिए अत्यन्त आवश्यक है कि वह लेखांकन के नियमों को बहुत अच्छी तरह जानता हो।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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