शिक्षाशास्त्र / Education

भारतीय समाज का शिक्षा पर प्रभाव | शिक्षा के नवनिर्माण में समाज का योगदान | भारतीय समाज के पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा व्यवस्था

भारतीय समाज का शिक्षा पर प्रभाव | शिक्षा के नवनिर्माण में समाज का योगदान | भारतीय समाज के पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा व्यवस्था

भारतीय समाज का शिक्षा पर प्रभाव-

शिक्षा का तात्पर्य उस सामाजिक प्रक्रिया से है जिसके द्वारा व्यक्ति समाज के पर्यावरण के प्रति क्रिया व प्रतिक्रिया, समायोजन और प्रत्यायोजन करता है, एक दूसरे सामाजिक प्राणियों के साथ सम्बन्ध बनाता है और उपयोगी अनुभव धारण करने में समर्थ होता है। वर्तमान भारतीय समाज में जनतंत्रीय व्यवस्था लाने का प्रयास किया जा रहा है परन्तु रूढ़िवादिता के कारण नया संगठन से नहीं पर रहा है, इससे शिक्षा के संगठन में कठिनाई उपस्थित हो रही है और ऐसा करना एक बड़ी कुशलता के साथ प्रयास हो गया है। डॉ० एस० एस० माथुर का विचार है कि “हमारे देश में शिक्षा वर्तमान समय में एक उलझन में है। ऐसी दशा में इसके बारे में कोई आश्चर्य नहीं है। हमारी शिक्षा का नियोजन, संगठन और प्रशासन बिना समाज के संदर्भ में किया गया है। यह भारतीय लोगों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के अनुकूल मुश्किल तथा उसमें पाई जाने वाली दिशाओं से है। इसका स्पष्ट कारण यह है कि विकास के लम्बे इतिहास में भारतीय समाज से यह (शिक्षा) दूर रही है।

समाज का दायित्व-

भारतीय संविधान के अनुसार यह कर्त्तव्य होता है कि वह प्रत्येक सदस्य को जनतंत्र के सिद्धांतों को समझने और प्रयोग में लाने के योग्य बनावे और इसके लिए प्रत्येक नागरिक को शिक्षा के सभी साधन और अवसर प्रदान करे। समाज बिना किसी भेदभाव के ऐसी सुविधाएँ प्रदान करे। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि वर्तमान भारतीय समाज का यह दायित्व होता है कि वह योग्य नागरिक का निर्माण करे। इसके कारण प्रत्येक राज्य व प्रशासन शिक्षा के प्रचार व प्रसार के लिए सभी को समान रूप से आर्थिक सहायता करे। सभी सदस्यों को एक स्तर तक की सामान्य शिक्षा और बाद में रोजगार व्यवसाय की शिक्षा प्रदान करना जरूरी होता है। ऐसी शिक्षा व्यक्ति की अपनी योग्यता, क्षमता और शक्ति पर निर्भर करती है। इसके साथ-साथ समाज रोजगार के रास्ते भी निकाले ताकि लोग बिना काम-काज किये समाज पर बोझ स्वरूप न रहें।

समाज द्वारा प्रयत्न-

अपने दायित्व को पूरा करने में भारतीय समाज ने शिक्षा के लिए काफी प्रयत्न किए हैं। शिक्षा की व्यवस्था सामाजिक संगठनों के द्वारा वैयक्तिक (प्राइवेट) रूप से काफी दिनों से चलती आ रही है। प्राइवेट समितियों द्वारा विद्यालय चलाए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए एक ओर हिन्दू समाज के विद्यालय हैं तो दूसरी ओर मुसलमान, ईसाई, सिक्ख, जैन, बौद्ध लोगों के द्वारा विद्यालय चल रहे हैं। इन सभी में सभी लोग शिक्षा लेने का अधिकार रखते हैं।

आजकल पूर्वप्राथमिफ, प्राथमिक, माध्यमिक स्तर पर शिक्षालय स्थापित करने, इन्हें सुचारु रूप से चलाने का प्रयल समाज के द्वारा किया जा रहा है। यह बात अवश्य है कि समाज का दृष्टिकोण आर्थिक लाभ की ओर भी पाया जाता है। शिक्षा की व्यवस्था एक प्रकार का रोजगार है जिसमें समाज के चतुर लोग लगे हैं। दूसरी ओर परोपकार तथा कल्याण की भावना से भी समाज द्वारा विद्यालय चलाए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए जैसे रामकृष्ण मिशन के द्वारा या क्रिश्चियन मिशन के द्वारा चलने वाले विद्यालय हैं। इन विद्यालयों में शिक्षा के विषय या पाठ्यक्रम भी कहीं कहीं प्रबंध करने वाले स्वयं बना लेते हैं परन्तु ज्यादातर विद्यालयों में राज्य द्वारा संस्तुत पाठ्यक्रम अपनाए जाते हैं। पूर्व प्राथमिक एवं प्राथमिक स्तर पर शिक्षकों की नियुक्ति वैयक्तिक समितियाँ ही करती हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षकों शोषण भी किया जाता है। शिक्षा की नई नीति में ऐसे व्यक्तिगत विद्यालयों को पूरी छूट दे दी गई है। कुछ पब्लिक स्कूल भी पूर्वप्राथमिक, प्राथमिक और माध्यमिक स्तर तक चल रहे हैं। ऐसे पब्लिक स्कूलों का माध्यम अधिकांशतः अंग्रेजी है और ऐसे विद्यालय में शिक्षा मँहगी पड़ रही है फिर भी मध्यम श्रेणी के भारतीय परिवारों के बच्चे उसमें बड़ी मात्रा में प्रवेश लेते हैं। इनके द्वारा संस्तुत पाठ्यक्रम अपने-अपने होते हैं और शिक्षा-विधि भी अपनी-अपनी होती है। परन्तु विषय और विधि दोनों पाश्चात्य परम्परा पर आधारित हैं। ऐसी स्थिति में बालकों के व्यक्तित्व का विकास भारतीय पर्यावरण के प्रतिकूल होना पूर्णतया सम्भव है जिसे हम भारतीय समझ नहीं पाए हैं। वास्तविकता तो यह है भारतीय समाज में जहां एक ओर गाँव और शहर में अत्यन्त साधारण विद्यालय और साधारण शिक्षा-व्यवस्था है वहीं दूसरी ओर पब्लिक स्कूलों को प्रोत्साहन देने से दो प्रकार के शिक्षा-स्तर देखे जा रहे हैं जिससे शिक्षा का स्तर उठने के बजाय गिरता ही जा रहा है और छात्र अपने पर्यावरण के साथ समायोजन करने में असमर्थ पाए जाते हैं। उचित तो यह है कि शिक्षा नीति ऐसी बने कि सभी विद्यालय एक ही स्तर की शिक्षा प्रदान करें। गाँवों और शहरों में एक समान शिक्षा गरीब और अमीर लड़के-लड़कियाँ प्राप्त करें, तभी सुधार सही तौर पर होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा योजना-

सामाजिक तौर पर भारत अर्धविकसित राष्ट्र माना जाता है फिर भी सामाजिक, परिवर्तन और आधुनिकीकरण की ओर कदम उठाए जा रहे हैं। राजनेतागण एवं शासक वर्ग विकसित नागरिक के रूप में आगे-आगे सोचते हैं और योजनाएँ बनाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी आज सातवीं पंचवर्षीय योजना चलाई जा रही है। इस योजना के बीस वर्ष पूर्व राष्ट्रीय शिक्षा योजना (1964-66) में चलाई गयी। इस योजना ने बताया कि यदि संकल्प और कौशल के साथ काम किया जाय तो दूसरे देशों के साथ भारत भी विकास करेगा। बीस वर्ष पहले राष्ट्रीय शिक्षा योजना का प्रारूप पेश किया गया परन्तु भारतीयों की मानसिकता दुरूह रही और आज भी उसकी संस्तुतियाँ कार्यान्वित नहीं हो सकी। यह प्रभाव भारतीय समाज का भारतीय शिक्षा पर पड़ रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा योजना चिन्तन-मनन का सीधा प्रभाव है परन्तु जब तक सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक स्थिति दृढ़ नहीं होती है तब तक सारी योजना कोरी कागजी कार्यवाई रहेगी। भारतीय जनतंत्र में राजनीति के चक्कर में लगे लोग आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति ध्यान में नहीं रखते हैं। इससे एक नुकसान यह भी हुआ है कि राजनैतिक गुटबन्दी ने शिक्षा की दुर्दशा कर दी है। ‘बड़े लोग’ के बच्चे उच्च स्तरीय शिक्षा के अधिकारी बन गए हैं और बाकी लोगों के बच्चे कूड़खाने जैसे विद्यालयों में शिक्षा के लिये जबरन जा रहे हैं। यह रही राष्ट्रीय शिक्षा योजना की क्रियाशीलता। नई शिक्षा नीति ने कम्प्यूटर, दूरदर्शन, दूर संचार साधन से शिक्षा देने के लिए संस्तुति दी है। नवोदय विद्यालय चलाए जाने की सिफारिश दी और कोशिश की जा रही है जिसमें चयन-विधि से प्रवेश मिलेगा। क्या सभी बच्चों को नवोदय विद्यालय में पढ़ाया जाना चाहिए? क्या भारतीय जनतंत्र में शिक्षा के समान अवसर सभी को इससे मिलेगा? क्या केवल कुछ धनीमानी शिक्षित नागरिकों के बच्चों के लिए अच्छी व्यवस्था राष्ट्रीय विकास होगा? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो नई शिक्षा नीति और राष्ट्रीय शिक्षा योजना के कारण उभरते हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय समाज का, राजनीति का योजना का प्रभाव शिक्षा पर क्या पड़ रहा है यह स्वतः स्पष्ट हो रहा है।

नई शिक्षा नीति (1986)

भारतीय समाज में जनतांत्रिक व्यवस्था होने और विकास पथ की ओर बढ़ने के कारण 1985 में भारत सरकार ने आर्थिक तथा तकनीकी प्रगति के उद्देश्य से यह घोषित किया कि एक नई शिक्षा नीति बनाई जाय जो 1968 की शिक्षा नीति का सुधार भी करे। 1968 की शिक्षा नीति के बाद शैक्षिक सुविधाएँ पर्याप्त रूप से बढ़ा दी गई थी। और 10 + 2 + 3 की संरचना बना दी गई थी। परन्तु इनका अनुप्रयोग पूरी तरह से न हो सका था। इसलिए 1986 की नई शिक्षा नीति चलाई गई ताकि शिक्षा भारतीय जीवन, समाज की जरूरतों, तथा युग की चुनौतियों का सामना करने के लिए उपयुक्त साधन बनाया जावे, अतएव नई शिक्षा नीति ने शिक्षाओं को राष्ट्रीय एकता, वैज्ञानिक प्रवृत्ति, मानसिक स्वतंत्रता और आध्यात्मिक मूल्यों की पुनः प्राप्ति का अपूर्व निवेश माना। राष्ट्रीय शिक्षा की संरचना 10 + 2 + 3 की ही रही, पूरे देश में एक ही पाठ्यचर्या बनाई गई, मानवीय और अन्तर्राष्ट्रीय सहकारिता और शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना शिक्षा के माध्यम से विकसित करने के लिए जोर दिया गया। हरेक शैक्षिक स्तर पर सामान्य, तकनीकी तथा सामाजिक तौर पर उपयोगी शिक्षा की व्यवस्था की गई। जीवन पर्यन्त शिक्षा की प्रक्रिया चलती रहे इसके लिए सतत शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, श्रमिक शिक्षा, सामूहिक संचार शिक्षा, दूर शिक्षा, खुले विद्यालय व विश्वविद्यालय, जनसंचार शिक्षा के माध्यम से तकनीकी व वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा (नॉन फॉरमल एजूकेशन) आदि कार्यक्रमों की व्यवस्था हुई है। शैक्षिक तकनीकी के प्रयोग पर बल दिया गया। पर्यावरण के प्रति सचेत रहने के लिए भी शिक्षा के साधन को अपनाया जा रहा है। शिक्षा में नव प्रवर्तन, शोध एवं निर्माण के लिए बल दिया जा रहा है। इस प्रकार आज का भारतीय समाज शिक्षा में द्रुतगामी और दूरगामी परिवर्तन कर रहा है ताकि समाज के लोग 21वीं शताब्दी की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए पहले से सशक्त बन जावें।

शिक्षा के नवनिर्माण में समाज का योगदान-

अब भारत में यह स्पष्ट अनुभव हो रहा है कि समाज का योगदान शिक्षा के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। केवल राज्य व शासन इस उत्तरदायित्व को पूरा नहीं कर पा रहे हैं इसलिए नई शिक्षा नीति में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि “गैर सरकारी तथा स्वेच्छाकारी प्रयल जिसमें सामाजिक क्रियावादी समूह शामिल हैं, इनको प्रोत्साहित किया जावेगा तथा इनका उचित प्रबंध होगा और उचित आर्थिक सहायता भी इन्हें दी जावेगी। इसके साथ ऐसे कदम भी उठाए जावेंगे कि शिक्षा को व्यवसाय बनाने वाली संस्थाओं की स्थापना रोकी जाय ।

आधुनिक समय में यह भी अनुभव किया जा रहा है कि शिक्षा की उपाधियों को सेवाओं की प्राप्ति से अलग रखा जाय जिससे व्यवहार-कुशल और काम में दक्ष लोगों को अवसर मिल सके यद्यपि हरेक सेवा के लिए चयन का आधार प्रतियोगिता ही होगी। इस कार्य के लिए एक ‘राष्ट्रीय परीक्षा सेवा’ की स्थापना की जावेगी। इस संस्था का कार्य होगा ऐच्छिक आधार पर अभ्यर्थियों की उपयुक्तता को निश्चित करना। इस प्रकार के परीक्षण से विशिष्ट कार्यों के लिए उपयुक्त क्षमता वाले व्यक्ति चुने जावेंगे और एक मानक भी बन सकेगा। फलस्वरूप प्रत्येक क्षेत्र में और प्रत्येक कार्य में योग्य, क्षमता वाले व्यक्ति स्थान पावेंगे और इससे सन्तोष (जॉब सैटिस्फैक्शन) मिलेगा। सफलता के लिये यह बहुत जरूरी है और अधिक उत्पादन का प्रेरक भी है। शिक्षा का व्यवसायीकरण तथा कार्य-अनुभव पर बल देना भी आज की शिक्षा योजना में मुख्य बात है। इससे व्यावहारिक कुशलता मिलेगी, श्रम के प्रति लगाव होगा, समुदाय के लिए उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन किया जा सकेगा। अतएव समाजोपयोगी उत्पादन कार्य के लिए लोगों को आकर्षित किया जावेगा।

भारतीय समाज के पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा व्यवस्था-

आधुनिक भारतीय जनतंत्र ने शिक्षा की व्यवस्था अपने सभी नागरिकों के लिए की है । इस दृष्टि से समानता के लिए शिक्षा की योजना की गई है। इसमें शहर और गाँव को समान समझा गया, स्त्री और पुरुष को समान देखा गया, समान सुविधा दी गई। भारतीय समाज की अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन-जातियों, पिछड़ी जातियों, अल्पसंख्यकों, विकलांगों सभी के लिए शिक्षा का प्रबन्ध किया गया है और सभी को यथावश्यक समान सुविधा दी जा रही है। इस प्रकार की व्यवस्था का कारण भारतीय समाज का शासन पर दबाव है और संविधान की धाराएँ हैं। समाज में जनतंत्र के सिद्धान्तों को लागू करने से सभी वर्गों को समानाधिकार है कि सभी वर्ग के लोग शिक्षा प्राप्त करें विशेष कर जिन्हें आर्थिक और अन्य कठिनाइयाँ हैं। गाँवों में दूरी के कारण शैक्षिक सुविधा आज भी कम मिलती है। ऐसी दशा में गाँधी जी की बेसिक शिक्षा का समर्थन करते हुए ग्रामोपयोगी संस्थाएँ, ग्रामीण विश्वविद्यालय तक खोले जावेंगे। कृषि विद्यालय और प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र भी उपयोगी शिक्षा योजना के अन्तर्गत है। इनकी स्थापना से भी समाज का पिछड़ापन दूर किया जा सकेगा। पिछड़े वर्गों एवं अनुसूचित वर्गों तथा विकलांगों को शिक्षा संस्थाओं में नियुक्तियाँ भी दी जा रही हैं। जनजातियों के विद्यालयों में उनके समाज से ही शिक्षित स्त्री-पुरुषों को अध्यापक बनाया जा रहा है। यही स्थिति अनुसूचित जातियों, ईसाई और मुसलमान लोगों के साथ मिलती है। अल्पसंख्यकों के विद्यालयों की व्यवस्था उन्हीं को सौंप दी गई है और वे स्वायत्त (ऑटोनोमस) माने जाते हैं। समाज का ही यह प्रभाव है कि अब भारतीय शासन शिक्षा को ‘पब्लिक इन्टरप्राइज’, स्वायत्त और विकेन्द्रित बनाने का विचार रखता है। इन दिशाओं में प्रयल प्रारम्भ हो गया है जो शिक्षा नीति 1986 के अनुसार हो रहा है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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