इतिहास / History

भरहुत की स्तूप | भरहुत में निर्मित स्तूप का संक्षिप्त परिचय

भरहुत की स्तूप | भरहुत में निर्मित स्तूप का संक्षिप्त परिचय

भरहुत की स्तूपस्थिति

भरहुत शुंगकालीन मूर्तिकला का मुख्य केन्द्र था! यह स्थान भूतपूर्व मध्य भारत के नागदा जिले में है। इलाहाबाद से जबलपुर जाने वाली सेन्ट्रल रेलवे की लाइन के उनचेरा और सतना के बीच का स्टेशन लंगरगांव लगता है। यह स्टेशन उनचेरा के उत्तर पूर्व में 6 मील तथा जबलपुर से ।।। मील व इलाहाबाद से 119 मील है। यहाँ पर सांची के स्तूप के ढंग पर एक बहुत बड़ा बौद्ध स्तूप था। 1873 ई० में जनरल कनिंघम को उस स्तूप के भग्नावशेष मिले थे। उनका अधिकांश भाग आस-पास के ग्रामवासी पहले ही अपने मकानों को बनाने के काम में ले चुके थे। इस कारण कनिंघम की खुदाई में केवल स्तूप की कुछ विशाल वेदिकाएँ और पूर्वी तोरण ही मिले हैं। जिन्हें उसने भारतीय संग्रहालय, कलकत्ता ‘भेज दिया था। वहाँ जो कुछ बचा रह गया था, वह बाद में विभिन्न संग्रहालयों को भेज दिया गया।

काल

भरहुत पहले मौर्य साम्राज्य में सम्मिलित था। अशोक के समय अवन्ति राष्ट्र के यह अन्तर्गत था। बाद में यह शुंगों के अधिकार में आया। उन्हीं के समय में यहाँ का स्तूप बना। मूर्ति पर लिखे लेख दूसरी शती ई0 पू0 में प्रचलित ब्राह्मी लिपि में है। यह ब्राह्मी लिपि अशोक के शिलालेखों की लिपि से काफी मिलती है। अतः भरहुत के स्तूप के बनने का समय भी लगभग दूसरी शती ई०पू० ही है। कला की दृष्टि से भी यह इसी समय का प्रतीत होता है। इस समय तक बौद्ध धर्म का जनता में काफी प्रचार हो गया था। अतः भरहुत के स्तूप पर बौद्ध धर्म का काफी प्रभाव पड़ा।

स्तूप

संग्रहालय की वेदिका पहले स्तूप के चारों ओर लगी हुई थी। बीच की जगह प्रदक्षिणा पथ कहलाती थी जिसको पहुँचने के लिए चारों ओर तोरण थे। स्तूप के अवशेष में केवल पूर्वी तोरण की ऊंचाई 22%’ है। तोरण दो स्तम्भों पर अवलम्बित है। प्रत्येक स्तम्भ का सिर 4 भागों में विभक्त है। जिनके शिखर उलटे हुए कमल की तरह हैं जिसके ऊपर दो सिंह और दो बैल बैठे हैं। यह शिखर कमानीदार तीन तेहरी का बना है।

दाहिने तोरण पर दूसरी शती ई०पू० लगभग का ब्राह्मी लिपि में एक शिलालेख है-

अर्थात्, शुंग वंश के राज्य काल में यह तोरण गागीपुत्र विश्वदेव के पौत्र और गोप्तीपुत्र आगरजु के पुत्र वात्सीपुत्र धनभूति द्वारा बनवाया गया।

दो अन्य तोरणों पर भी इसी प्रकार के लेख मिले हैं। ये तोरण शुंग राज्य के अन्तिम दिनों में बनवाये गये थे। वेदिका की ज्यादातर मूर्तियों पर विषय निर्देशक लेख तथा दानियों के नाम लिखे हैं। दान देने वाले ज्यादातर उपासक, भिक्षु या भिक्षुणियाँ थीं, जिनके निवास स्थान का भी यहाँ कुछ लेख है। इनमें मुख्यतः विदिशा (ग्वालियर राज्य), नासिक, कौशाम्बी (आधुनिक कौसम, इलाहाबाद) और पाटलिपुत्र (पटना) आदि के थे। जिससे ज्ञात होता है कि यहाँ यात्री बहुत दूर-दूर से आते थे।

इन तोरणों और वेदिकाओं पर नाना प्रकार दृश्यों का चित्रण किया गया है, जो इनकी सुन्दरता को बढ़ाने के साथ ही साथ बौद्ध यात्रियों की धार्मिक भावना को भी जागृत करते थे। वेदिकाओं में तनिक भी जगह बिना चित्रण किये नहीं छोड़ी गयी है।

वेदिका के उष्णीषों के बाहरी तरफ नाना प्रकार के कमल बने हैं। अन्दर की तरफ सिंह, हाथी आदि पशु तथा भाँति-भाँति के फलों के गुच्छे, अलंकारों आदि से सजा हुआ है। स्तम्भ के तले पर सम्पूर्ण भार को सहारा देने के लिए मोटे तोंदल कीचक बने हुए हैं। साथ ही साथ उनको खण्डहर तथा फूलों की जातक कथाओं तथा अन्य प्रकार के बेल-बूटों आदि से अलंकृत किया है।

मूर्तियाँ

भरहुत की मूर्तियों का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। प्रत्येक विषय पर यहाँ कुछ न कुछ मूर्तियाँ अवश्य मिल जायेंगी। ऐतिहासिक विषयों पर यहाँ 10-11 दृश्य हैं। यह दृश्य भगवान् बुद्ध की जीवनी से सम्बन्धित हैं। इनमें सबसे मुख्य बात यह है कि बुद्ध को इन सब दृश्यों में सांकेतिक चिह्नों, धर्मचक्र, त्रिरत्न, सिंहासन, बोधिवृक्ष, स्तूप और पदचिह्नों से दर्शाया गया है। प्रारम्भ में बौद्ध धर्मावलम्बी किसी निर्वाण प्राप्त हुये की मूर्ति बनाना उचित नहीं समझते थे। अतः इसी कारण प्रथम शती ई०पू० तक बुद्ध को मूर्ति रूप नहीं दिया गया। यह सांकेतिक चिह्न ही बुद्ध की उपस्थिति सूचित करते हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध अजातशत्रु की सवारी का दृश्य है। जब अजातशत्रु को अपने पिता बिम्बिसार को मारने का पश्चाताप हुआ तब वह जीवक के साथ रात के समय अपने सुन्दरी दल के साथ भगवान् बुद्ध के पास गया। बुद्ध जीवक की आम्रवाटिका में उस समय ठहरे हुये थे। पेड़ों पर आम आम्रवाटिका का होना बतलाते हैं। राजा यहाँ हाथियों की सवारी के साथ जाता दिखाया गया है। बाद में वह हाथी से उतरता हुआ और फिर एक सिंहासन पर रखे पदचिन्हों को जो बुद्ध का होना दिखाते हैं—प्रणाम करते दिखाई देता है। लेख है-

“अजातसत भगवतो वंदते” अर्थात् अजातशत्रु भगवान् की पूजा करता है। अन्य दृश्य इस प्रकार हैं-

(1) सर्वप्रथम दृश्य है, मायादेवी का स्वप्न। इसमें वोधिसत्व को सफेद हाथी के रूप में स्वर्ण से उतरता दिखाया गया है जो स्वप्न माया ने गर्भ ठहरने के पहले देखा था। रानी अपनी दासियों सहित सोती हुई दिखाई गई है। पैरों के पास दीपक जल रहा है। लेख है–

“भगवतो ऊकंति” यानि भगवान् स्वर्ग से उतरते हुए।

(2) बौद्ध गया में बुद्ध का ज्ञान प्राप्त करना- बोधिवृक्ष के नीचे सिंहासन पर दो त्रिरत्न बने हैं, जिनकी उपासक उपासना कर रहे हैं। दो देव ऊपर आनन्द से अपने कपड़े हिला रहे हैं। लेख है..”भगवतो सकमुनिनो बोधो” यानि भगवान् शाक्य मुनि का ज्ञान प्राप्त करना।

(3) देवों द्वारा मार की पराजय पर हर्ष प्रकट करना- मार एक पेड़ के नीचे अपनी हार का पश्चाताप कर रहा है। चार गिरोह पूजा करते दिखाये गये हैं।

(4) अप्सराओं द्वारा नृत्य- बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने पर देवों ने अप्सराओं के नृत्य का आयोजन किया। लेख में अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पद्मावती और सुभद्रा आदि अप्सराओं का नाम अंकित है। दूसरा लेख है- “साडिक समंदतुर देवान” (देवों द्वारा नृत्य और गायन)।

(5) नागराज एरापत की पूजा- एरापत बोधिवृक्ष के नीचे रखे सिंहासन की पूजा कर रहा है। नागराज पहले नाग रूप में और फिर मनुष्य रूप में दिखाया गया है। लेख है- “एरपतो नागराजा भगवतो वदते” (नागराज एरापत भगवान् की पूजा करता है)।

(6) इन्द्रशाल गुहा में इन्द्र द्वारा बुद्ध के दर्शन- इसमें बुद्ध का सिंहासन इन्द्रशाल गुहा (राजगृह) में दिखाया गया है। इन्द्र अपने सहचर पंचशिख के साथ दिखाया गया है। लेख है- “इडसाल गुह” (इन्द्रशाल गुहा)।

(7) कौशलपति प्रसेनजित- राजसी ठाठ के साथ बुद्ध का उपदेश सुनते चार घोड़ों के रथ में बैठा जा रहा है। बुद्ध के बदले धर्मचक्र बना है। लेख है- “भगवतो धर्मचक्र (भगवान् का धर्मचक्र) और राजा पसेनजी कोसलो” (कोशलपति प्रसेनजित)।

(8) भगवान का त्रयस्त्रिंश स्वर्ग से उतरना- बुद्ध अपनी माता को धर्म का पाठ पढ़ाने त्रयस्त्रिंश स्वर्ग गये थे। वहीं से वह सीढ़ी से उतरते दिखाये गये हैं। बुद्ध ने पदचिन्ह सबसे ऊपर और नीचे वाली सीढ़ी पर दिखलाये गये हैं जो उनका उतरना बतलाता है। सीढ़ी के आसपास उपासक राह देखते दिखाये गये हैं।

(9) जेतवन के क्रय और दान दृश्य- श्रावस्ती के नगरसेठ सुदत्त जो अनाथों को अत्यधिक दान देने के कारण अनाथपिंडक कहलाता है—ये जैत का उपवन दान देना चाहा। जेत ने उस उपवन का मूल्य एक करोड़ रुपया माँगा। सुदत्त ने स्वीकार कर लिया, लेकिन जेत बाद में नटने लगा। दोनों ने न्यायालय की शरण ली और जिसमें निर्णय सेठ के पक्ष में हुआ। सेठ ने बाद में वह बाग खरीद कर और वहाँ विहार बनवा कर बुद्ध को दे दिया। इस शिलापट्ट में तीन वृक्ष तथा विहार जेतवन दिखाते हैं। एक बैलगाड़ी से स्वर्ण मुद्रायें उतारी जाकर बिछायी जा रह  हैं। ये मुद्रायें चौकोर हैं जो उस वक्त प्रचलित थीं। अनाथपिंडक जल की झारी से वन को दान देने की रस्म पूरा कर रहा है। दोनों विहारों के नाम को सब कुटि और गध कुटि लिखे हैं। लेख हैं- जेतवन अनाधपेडिकों देति कोटि संथतेन केता (अनाथपिंडि करोड़ो से जेतवन खरीद कर दान देता है।) “इतिहासिक’ अर्थात् इतिहासिक दृश्यों का जैसा वर्णन बौद्ध ग्रन्थों में है वैसा ही अंकन यहाँ किया गया है। शाक्य मुनि के पूर्व के बुद्धों की मूर्तियाँ भी भरहुत में नहीं पाई गई हैं। उनके लिए भी सांकेतिक चिन्हों का प्रयोग किया गया है। इन पाँच पूर्व बुद्धों—विपश्यी, विश्वभू, क्रकुच्छन्द, कनकमुनी और कश्यप को उनके भिन्न-भिन्न बोधिवृधों के नीचे रखे सिंहासनों द्वारा दिखाये गये हैं। विपश्यी का पाटलि विश्वभू का शाल, क्रकुच्छन्द की शिराष, कनक मुनि का उदुम्बर और काश्यप की निग्रोध वृक्ष हैं।

साकेतिक चिन्ह

शुंगकाल तक मूर्ति पूजा आरम्भ नहीं हुई थी। बुद्ध की मूर्ति के बदले सांकेतिक चिन्हों – स्तूप, धर्मचक्र, बोधिवृक्षों, त्रिरत्न आदि चिह्नों का प्रयोग होता था। भरहुत, साँची, बोध गया, मथुरा, सारनाथ, आदि धार्मिक स्थानों पर ईसवी शती के पूर्व तक इसी प्रकार के चिह्न बहुतायत से मिले हैं। स्वयं बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य को तथागत की मूर्ति रूप में पूजा करने से मना किया था। उसके बदले तीन प्रकार के सांकेतिक चिह्नों को प्रयोग में लाने की आज्ञा दी थी। वह थे- शारीरिक, उद्देशिक और परिभौगिक। जो वस्तुएँ भगवान् के शरीर से सम्बन्धित थीं यथा केश, नख, भस्म आदि वह शारीरिक कहलाते थे जो बुद्ध के स्मारक थे। स्तूप, धर्मचक्र, त्रिरत्न आदि उद्देशिक कहलाते हैं। परिभौगिक वस्तुएँ वह हैं जिन्हें बुद्ध प्रयोग में लाया करते थे। जैसे- मेखला, दानपत्र, सिंहासन, बोधिवृक्ष आदि।

शारीरिक वस्तुओं में सबसे सुन्दर नमूना है बुद्ध का सिर, जो देवों की सभा के मध्य में रखा दिखाया गया है। इस पर लेख है.–“सुधम्म देव सभा भगवतो चरमही’।

उद्देशिक स्मारकों के नमूनों के लिए प्रसेनजित के महलों में खम्भों के बीच स्तूप बना है। इन्हीं के बीच एक धर्मचक्र लेख सहित है-

“भगवतो धम्मचकं” विश्वभू और शाक्यमुनि के सिंहासनों पर त्रिरत्न चिह्न भी सुन्दरता से दर्शाया गया है।

बुद्ध की परिभौगिक वस्तुओं का चित्रण भरहुत के शिल्पकारों ने बहुतायत से किया है। बुद्ध के चरण दो शिलापट्टों पर दिखाये गये हैं। एक में चरण एक छत्रधारी सिंहासन पर रखे हैं। एक राजा श्रद्धा से उनके सामने झुक रहा है। दूसरे शिलापट्ट में वह दृश्य दिखाया गया है जबकि अजातशत्रु बुद्ध के दर्शन करने गया था। बुद्ध के सिंहासन में उनके चिह्न स्वरूप बनाये गये हैं। प्रत्येक का सिंहासन बोधिवृद्ध के नीचे दिखाया गया है। प्रत्येक सिंहासन छत्रधारी है जिनमें पुष्य मालाएँ लटक रही हैं। प्रत्येक बुद्ध के बोधिवृक्ष अलग-अलग हैं।

बुद्ध विपश्यी का सिंहासन पाटली वृक्ष के नीचे दिखाया गया है। दो मनुष्य श्रद्धा से उसकी ओर झुक रहे हैं और कुछ दूसरों का गिरोह बोधिवृक्ष के आस-पास खड़ा है। लेख– भगवतो विपसिनो बोधि। द्वितीय बुद्ध सिरिक्त का कोई चित्रण नहीं पाया गया है।

तीसरे बुद्ध विश्वभू का बौधिमण्ड (सिंहासन) साल वृक्ष के नीचे है। इस पर त्रिरत्न बना है और वृक्ष की शाखाओं से पुष्प मालाएँ लटक रही हैं। लेख है-“भगवती वैसमुनो बोधिसालो”

चौथे बुद्ध क्रकुच्छन्द का बोधिवृक्ष शिरीष है।

पाँचवें बुद्ध कनक मुनि का स्तम्भों पर बना बोधिमण्डप उदुम्बर बोधिवृक्ष के नीचे बना है। लेख है- “भगवतो कोनाग मेनस बोधि”!

छठे बुद्ध काश्यप का औरों की तरह ही सिंहासन न्यग्रोध वृक्ष के नीचे है। एक सुन्दरी श्रद्धा से उस पर झुक रही है। लेख-“भगवतो कसपस बोधि”।

अन्तिम बुद्ध शाक्यमुनि का बोधिवृक्ष पीपल एक महल के स्तम्भों द्वारा घिरा है। दो छत्र जिनमें पुष्प मालायें लटक रही हैं, वृक्ष के ऊपर लगे हैं। दोनों तरफ दो गगनचारी पुष्पमालायें लिखे हैं। उनके नीचे दो पुरुष हाथ में कुछ लिए खड़े हैं। महल के निचले भाग में त्रिरत्नों से घिरा सिंहासन रखा है। लेख- “भगवतो सकमुनि नो बोधि’

एक दूसरे शिलापट्ट में एक हाथियों का झुण्ड बोधिवृक्ष की पूजा कर रहा है। एक वेदिका की सूची पर एक हाथी शिखर वाले स्तम्भों का महल बना है। इन्हीं के बीच क्रकुच्छन्द का बोधिवृक्ष शिरीष जान पड़ता है। दो अन्य शिलापट्टों पर हाथियों को बोधिवृक्ष की पूजा करते दिखाया गया है। एक शिलापट्ट में मृग बोधिवृक्ष और सिंहासन की अर्चना करते दिखाये गये हैं।

अन्य मूर्तियाँ

भरहुत में बहुतेरे देवलोकीय पुरुषों की आदमकद मूर्तियाँ मिली हैं। इनमें मुख्य कर देव, यक्ष-यक्षिणियाँ, नागों, अप्सराओं आदि की खुदे नामों की मूर्तियाँ हैं। यहाँ यक्ष यक्षिणियों, नागों आदि का चित्रण हिन्दु देवी-देवताओं के रूप में दिखाया गया है। इस समय साधारण लोगों में इसका ही ज्यादा प्रचार था। इसी कारण बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए इनका चित्रण बहुत ही उपयुक्त समझा गया। सांची में भी इसी कारण इनका चित्रण बहुतायत से पाते हैं। कोई छ: यक्षों—कुबेर, विरुढक, सूचिलोम, सुपावस आदि की मूर्तियाँ हैं।

जलवासी नाग प्रारम्भ में बुद्ध के उपासक माने जाते हैं। इस कारण नागों को विविध रूपों में हम भरहुत में पाते हैं। कहीं नागराज अपनी नागिनों के साथ, तो कहीं बुद्ध की पूजा करते दिखाये गये हैं। किसी में स्वयं बुद्ध नाग को उपदेश देते, तो कहीं चक्रवाक नाग या इलापत्र नाग धर्म वशीभूत हुए दिखाये गये हैं।

देव मूर्तियों में चुलका की और सिरिया की मूर्तियाँ हैं। कुछ एक मूर्तियों पर निर्देशक लेख न होने के कारण उनको पहचानना कठिन है। इनमें कुछ अपने-अपने विशेष कारणों या वाहनों से पहिचानी जाती हैं। यथा गंगिता सुपावस और घुलकोका अपने वाहन हाथी चन्द्रा और सुदर्शना मकर से, महीमाता कमल से और सरस्वती अपनी वीणा से।

समुद्र कन्याएँ

अप्सराएँ नृत्य, संगीत और सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध हैं। ये ज्यादातर तपस्वियों की तपस्या भंग करने में लगी रहती हैं। भरहुत में मुख्य कर सुभद्रा, सुदर्शना, मिश्रकेशी और अलम्बुषा अप्सराओं को दिखाया गया है। एक शिलापट्ट में वह वाद्य यन्त्रों के साथ नृत्य करती दिखायी गई है। इस नृत्य का आयोजन बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने की खुशी में किया गया था।

अट्टालिकाएँ

विधि प्रकार के भवन भी भरहुत में दिखाये गये हैं। इनमें केवल राजमहल ही नहीं दिखाये गये हैं, बल्कि प्रत्येक श्रेणी के पुरुषों के निवास स्थान हैं। कहीं राजाओं के महल हैं तो कहीं साधारण पुरुषों के मकान या झोंपड़ियाँ हैं। कहीं मन्दिर या चैत्य हैं तो कहीं पर्णशालाएँ हैं। इस प्रकार सभी प्रकार की इमारतें दिखायी गई हैं। राजमहलों में तीन मंजिल का विजयंत प्रासाद है जो स्तम्भों के ऊपर अवलम्बित है। ऊपर गुम्बददार छत है। दूसरा महल पुण्यशाला है जो प्रसेनजित के नाम से प्रसिद्ध है। बहुत से महलों के स्तम्भ अशोकीय स्तम्भों की नकल पर बने हैं। दो ऐसे ही स्तम्भों के शिखर पर हाथी बनाये गये हैं। धनवानों के साथ ही साथ गरीबों का होना भी आवश्यक है। एक तरफ महल बने हैं तो फिर गरीबों की झोंपड़ियाँ भी क्यों न भरहुत में होती। झोपड़ियाँ एक मंजिली हैं जिनमें गुम्बददार छत वाला बड़ा कमरा है। हवा तथा प्रकाश आने के लिए भी छेद बने हैं। छतें छाई हुई हैं। मकान बिना पकाई ईंटों का बना है। दीवारों में आले भी बने हैं। गोलार्द्ध गुम्बद वाली छतों वाली कुटिया भी दिखाई पड़ती हैं। इनके दरवाजे बहुत ही संकड़े हैं। छतें छाई हुई हैं। दीवारें गोबर से लीपी हुई हैं। यह योगियों के निवास स्थान हैं। जेतवन विहार के दृश्य में कोसम्ब और गंधकुटी दिखायी गयी हैं। यह एकमंजिला है। इन कुटियों पर कलश भी बने हैं। दो मंजिला इमारतों में धर्मचक्र को धारण करने वाली इमारत मुख्य हैं। विभिन्न दृश्यों में स्तूप भी दिखाये गये हैं।

सार्वजनिक पुरुषों की मूर्तियाँ

भिन्न-भिन्न पुरुषों की मूर्तियों में काफी सजीवता और स्वाभाविकता है। राजपुरुषों में बुद्ध की माता मायादेवी, अजातशत्रु, प्रसेनजित आदि की मूर्तियाँ हैं। ये लोग विभिन्न प्रकार के गहने बहुतायत से पहने हैं। राजसीठाठ भी पूर्णतया दिखता है।

साधारण स्त्री पुरुष ज्यादातर धोती पहने हैं जिसकी पट्टी की तह आगे की ओर लटकी रहती है। आदमी कन्धे पर दुपट्टा लटकाये हुए हैं, लेकिन औरतों के सिवाय गहनों के कुछ नहीं है। सिर पर आदमी साफा भी बाँधे रहते हैं। औरतें भी सिर पर ओढ़नी ओढ़े हैं। स्त्री-पुरुष दोनों ही गहने पहनने का शौक रखते थे। दोनों ही कुण्डल, हार, भुजबंद, मेखला आदि धारण करते थे। कुछ सुन्दरियों के हार में त्रिरत्न चिन्ह भी लटका रहता है। कपड़े बहुत ही महीन और सूती होते थे। ओढ़नियों और साफों पर कसीदा कढ़ा रहता है। स्त्रियाँ सुन्दरता के लिए अपने गालों आदि को गोदाती भी थीं। ऐसी ही गोदाई चोड़ पक्षी के मुंह पर फूलों से की गई है।

एक वेदिका स्तम्भ पर एक योद्धा की मूर्ति बनी है। इस योद्धा की शकल सूरत से इसको उत्तर पश्चिमी देश का वासी होना मालूम होता है। वह लम्बी बाहों का घुटनों तक लम्बा चोंगा पहने है। पैरों में जूते और बांयी तरफ तलवार लटक रही है। दायें हाथ में फूलों का गुच्छा लिये है। सिर के बाल छोटे और गुच्छेदार हैं। योद्धा का यह वर्णन मेगस्थनीज के समय के योद्धा के वर्णन से बहुत मिलता है। कुछ लेखक तो इसको असुर राज वेपचित्ति और कुछ इसे सूर्यदेव मानते हैं।

बहुत से शिखा बाँधे जटीले साधु, तपस्वी और अग्निपूजक, रपिव्राजक अग्नि पात्र लिये, बाल और नाखून बढ़ाये भी यहाँ अंकित हैं।

पशु-पक्षी

विभिन्न प्रकार के पशु और पक्षी भी यहाँ दिखाये गये हैं। इनमें कुछ अलौकिक पशु भी हैं। अलौकिक पशुओं में सिंह की पूंछ मय एक हाथी और एक उड़ता घोड़ा है।

सिंह, गैंडा, बैल, हाथी, शूकर, हरिण, बिल्ली, भेड़, कुत्ता, गिलहरी, बन्दर आदि 14 प्रकार के साधारण पशु हैं। हाथी नाना प्रकार से दिखाया गया है। वह दौड़ते, खाते, चलते, पानी पीते, पानी उछालते व बोधिवृक्ष के सामने श्रद्धा से झुकता दिखाया गया है। बन्दर भी आदमियों से लड़ता, हाथियों को फांसता, आदमियों से बातें करते दिखाया गया है। एक दृश्य में चार बन्दर एक हाथी को मोटे रस्से से बाँधे लिये जा रहे हैं। दूसरे दृश्य में हाथी के पीछे ढोल और तुरही बजाते दिखाये गये हैं। एक अन्य दृश्य में बन्दर एक बड़े चिमटे से एक पक्षी का दाँत निकाल रहे हैं। चिमटा रस्सी से बंधा है जिसे एक हाथी खींच रहा है। हाथी को जल्दी खींचने के लिए बन्दर ढोल और तुरही बजा रहे हैं। एक बन्दर हाथी को गोंद रहा है। एक दूसरे दृश्य में दो कुत्ते एक शूकर पर आक्रमण कर रहे हैं। पक्षियों में मुख्यतः तोता, मोर, हंस, बतख, मुर्गा आदि हैं।

बहुत से गोलाकार तथा अर्द्ध-गोलाकार मण्डलों में अलंकरण किया गया है। इनमें मुख्यतः पशुओं, पुष्पों और वृत्ताकार चित्रों का चित्रण है। बहुत से फूलों में स्त्रियों व पुरुषों के मुख बने है। कई दृश्यों में अलंकरण के लिए कमल की बेलें भी बनी हैं। सबसे सुन्दर नमूना वह है जिसमें एक गमले में कमल दिखाये गये हैं, जिसके पास ही कछ पक्षी बैठे हैं। एक गोल मण्डल में गजलक्ष्मी बनी हैं।

विविध दृश्य

भरहुत के बहुत से दृश्यों का विषय निर्देशक लेख नहीं हैं। इस कारण उनके विषय में जानना बहुत ही कठिन है, लेकिन इनमें बहुत से काम करते व्यक्तियों के दृश्य हैं। यह दृश्य उस काल के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन पर प्रकाश डालते हैं। ये निम्नलिखित हैं-

(1) एक भेड़ को लिए जाते हुए एक गड़रिया।

(2) एक निर्धन पुरुष की झोंपड़ी।

(3) दो बैलों की बैलगाड़ी, जिसके पास ही जमीन पर हाँकने वाला बैठा है।

(4) अपनी मालकिन की सेवा करती हुई एक दासी।

(5) एक तपस्वी एक ऊँचे आसन पर चार शिष्यों के साथ बैठा है।

(6) खड़े हुए स्त्री पुरुष। स्त्री के हाथ में एक पक्षी है और पुरुष हाथ में एक फूल।

(7) कुछ केले जैसे फल लिए हुए दो मनुष्य बैठे हैं। दो अन्य पुरुष खड़े हैं। भाव-तोल कर रहे हैं।

(8) मकान के आँगन में गृहस्वामिनी टोकरे की कुछ वस्तुओं को दूसरे टोकरे में खाली कर रही है, जिसको शायद उसका पति पकड़े है। एक दूसरा आदमी भार सम्हाले है।

(9) एक झोंपड़े के छेद से एक स्त्री बाहर खड़े दो आदमियों की बातें सुनने का प्रयत्न कर रही है।

(10) एक ऋषि तीन स्त्री पुरुषों के साथ अपनी कुटिया में बैठा है। शायद यह ऋषि भारद्वाज हो और ये स्त्री पुरुष राम, सीता और लक्ष्मण हों।

(11) एक आदमी थाली में चपाती खाता दिखलाया गया है।

(12) दो बन्दरों के साथ एक आदमी पानी के धड़े ले जा रहा है।

(13) एक ऋषि एक शिकारी को हरिण मारने से रोक रहा है।

(14) दो स्वदेशी व्यापारी दो विदेशियों से हाथी दाँत बेचने के लिए भाव तोल कर रहे हैं।

(15) एक मोढ़े पर बैठा ऋषि एक स्त्री से वार्तालाप कर रहा है।

(16) दैनिक कार्यों में उपयोग होने वाली वस्तुएँ—बरतन, वाद्ययंत्र, नाव, रथ आदि की प्रतिकृतियाँ देखने योग्य हैं।

जातक कथाओं के दृश्य

भरहुत में अनेक जातकों के दृश्य हैं। गौतम के रूप में जन्म लेने के पहले बोधिसत्व कई प्रकार के पशु तथा मनुष्य रूप में जन्मे थे। अपने पूर्व जन्मों में वह सदा ही परोपकारी जीव रहे। इन्हीं का दिग्दर्शन यहाँ बहुत ही संक्षेप में कराया गया है। इन पर लिखे लेखों से दर्शक बहुत ही शीघ्र जातक कथा को पहचान लेता है। कुछ एक पर लेख नहीं है, लेकिन वह भी दृश्य देखने से ज्ञात हो जाते हैं। शिल्पकारों ने यही सोच कर चित्रण किया है कि देखने वाले दर्शक यात्री जातक कथाओं से पूर्णतया परिचित हैं।

(1) लटुकिक जातक- हाथी को पहाड़ के ऊपर चढ़ते और फिर वहाँ से गिरते दिखाया गया है।

(2) सुजात जातक- सुजात (बोधिसत्व) बैल को दाना पानी देते दिखाया गया है।

(3) कुक्कुट जातक- मुर्गा पेड़ पर से बांग दे रहा है और नीचे बैठी बिल्ली उसे उतर आने को कह रही है।

(4) निग्रोधमृग जातक-वधिक कुल्हाड़ा लिए बनयान मृग के पास खड़ा है। उपवन को दिखाने के लिए पेड़ बना है।

(5) मिग पोतक जातक–बोधिसत्व तपस्वी को उपदेश दे रहे हैं, जो एक मृग के मर जाने पर शोक कर रहा है।

(6) मखादेव जातक– राजा मखादेव कुर्सी पर बैठे नाई से बाल बनवा रहे हैं। दूसरे दृश्य में नाई राजा के सामने हाथ जोड़े खड़ा दिखाया गया है।

(7) भिस जातक- शक्तदेव कमल नालों को बोधिसत्व को देते दिखाये गये हैं। पीछे की ओर कुटिया के पास उनकी बहन, हाथी और बन्दर दिखाये गये हैं।

(8) वडिक जातक– वडिक एक फल का रस घड़े में निकाल रहा है।

(9) असदिस जातक- असदिस अपने ज्येष्ठ भ्राता बोधिसत्व को शत्रुओं से बचाने के लिए धनुष और बाण लिए खड़ा है

(10) चम्मसाटक जातक–भिक्षुक एक डण्डे पर कुछ लिये जा रहा है, उधर एक भेड़ा उस पर आक्रमण करने का विचार कर रहा है। दूसरे में भिक्षुक पूर्णतया धराशायी हो जाता

(11) मणिकण्ठ जातक- एक वैरागी और मणिकण्ठ नामक नाम दिखाये गये हैं। नाग के रत्न भी लगा है।

(12) महाजनक जातक- राजा महाजनक, उनकी रानी सिवला और तीरंदाज दिखाये गये हैं।

(13) बेस्संतर जातक-राजकुमार बेस्संतर अपने हाथों से उतरते हैं और दान की रस्म पूरी कर, घड़े से ब्राह्मण को जल देकर हाथी दान कर रहे हैं।

(14) महाकपि जातक- राजा अपने सहचरों के साथ आम्रवृक्ष के नीचे खड़ा है। बोधिसत्व (महाकवि) दो वृक्षों के बीच झूल रहे हैं, जिनके ऊपर से दूसरे बन्दर निकल रहे हैं।

(15) छदन्त जातक- बनारस की रानी के आज्ञानुसार वधिक हाथी के दांत काट रहा है।

(16) अलम्बुसा जातक- एक तपस्वी एक मृगी से उत्पन्न शिशु को उठा रहा है।

(17) महाबोधि जातक- एक तपस्वी अपने एक हाथ में छाता तथा दूसरे में डण्डे के एक सिरे पर कुछ बंधी वस्तुएँ लिये जा रहा है।

(18) सस जातक- मृग (बोधिसत्व) वणिक को नदी के किनारे पर ला रहा है। एक राजा, हरिण की ओर तीर चला रहा है, लेकिन बाद में हाथ जोड़े उपदेश सुन रहा है।

(19) कक्कट जातक- हाथी अपने पैरों के नीचे केंकड़े कुचल रहा है।

(20) दुमिव मक्कट जातक-बोधिसत्व बन्दर को पानी पिला रहे हैं, जो बाद में पेड़ पर चढ़ कर मुँह बना रहा है।

समीक्षा

भरहुत इस प्रकार विषयों की अनेकता और विभित्रता के लिए प्रसिद्ध है। मूर्तियों में सौन्दर्य और पूर्णता है। इनमें सजीवता और स्वाभाविकता है। यह सब कुछ होते हुए भी इस कला में वह खूबी नहीं है जो मौर्यकाल में थी। इनमें वह सुथरापन नहीं जो अशोकीय स्मारकों में है। अशोकीय कला और भरहुत की समानता करना न्याययुक्त भी नहीं है। अशोकीय कला राज कला है, वे कलाकार राजाश्रित थे। इधर भरहुत की कला लोक-कला है। इन स्मारकों के विभित्र दृश्य, विभिन्न कलाकारों ने विभिन्न समयों में बनाये हैं। ये तो केवल दानी यात्रियों द्वारा बनवाये गये थे। अतः इनमें कई दक्ष और अदक्ष शिल्पकारों के हाथ लगे। फिर इनमें कैसे वह समानता और सुथरापन आता! यह कला भी केवल भरहुत तक ही नहीं रही। भरहुत से दूर स्थानों मथुरा सारनाथ, बौद्ध गया आदि में यही लोक कला विद्यमान है। इस समय तक सर्वसाधारण जनता में बौद्ध धर्म का पूर्णतया प्रचार हो गया था और इस कारण अपने धार्मिक विचारों को अपने ही लोकरूप में देखना चाहते थे। इसी कारण भरहुत लोककला उनके ही जीवन से ओतप्रोत है। उनके भावों की छाया है। सच पूछो तो इनको मूर्तियाँ न कहकर पत्थर से काटे गये चित्र कहना अच्छा होगा। सब ही चिपटे डौल की मूर्तियाँ हैं। ये चित्र भरहुत शैली की विशेषता है। भरहुत की कला का समय दूसरी शती ई०पू० का है। इस समय तंक बुद्ध की मूर्ति का आविर्भाव नहीं हुआ था। भरहुत में जहाँ कहीं बुद्ध को दिखाने की आवश्यकता पड़ी वहीं सांकेतिक चिन्हों का प्रयोग किया गया। इसी काल में बने सांची में भी इसी प्रकार सांकेतिक चिन्हों—छत्र, धर्मचक्र, आसन आदि से बुद्ध का बोध कराया गया है। भरहुत का यह आधार विषय आज भी धर्म प्रचार का विषय बन रहा है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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