इतिहास / History

उग्रवादी कौन थे? | उग्रवादियों की विचारधारा की प्रमुख विशेषताएँ | उग्रवादियों की उपलब्धियाँ

उग्रवादी कौन थे? | उग्रवादियों की विचारधारा की प्रमुख विशेषताएँ | उग्रवादियों की उपलब्धियाँ

उग्रवादी कौन थे?

19वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में भारत में एक नवीन विचारधारा का जन्म हुआ, जिसे उग्रवाद के नाम से जाना जाता है। बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपतराय, अरविन्द घोष आदि नेता उग्रवादी विचारधारा के पोषक थे। ये नेता उग्रवादी कहलाये क्योंकि उनका दृष्टिकोण उदारवादी न होकर क्रान्तिकारी था। ये लोग प्रार्थनाओं, प्रार्थना-पत्रों एवं प्रतिनिधि मण्डलों की नीति में विश्वास नहीं रखते थे और उन्हें ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ की संज्ञा देते थे।

उग्रवादियों की विचारधारा की प्रमुख विशेषताएँ

उग्रवादियों की प्रमुख विशेषताओं को निम्नलिखित सूत्रों के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है-

(1) विचारधारा- उग्रवादियों को ब्रिटिश शासन की न्यायप्रियता तथा ईमानदारी में तनिक भी विश्वास नहीं था। वे ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालकर राजनीतिक अधिकार प्राप्त करना चाहते थे। उनकी मान्यता थी कि ब्रिटिश शासन के हित भारतीयों के हितों से सर्वथा भिन्न हैं। वे ब्रिटिश शासन को भारत के लिये अभिशाप मानते थे। उन्हें अंग्रेजों की न्यायप्रियता में विश्वास नहीं था। उनका विचार था कि ब्रिटिश शासन में सुधार किया ही नहीं जा सकता था, उसका तो अन्त किया जाना चाहिए।

(2) पूर्ण स्वराज्य के समर्थक- उग्रवादी पूर्ण स्वराज्य के समर्थक थे। वे ब्रिटेन से सम्बन्ध विच्छेद करने के पक्ष में थे। उनके मतानुसार राष्ट्रवाद तथा ब्रिटेन के प्रति निष्ठा दोनों ऐसे परस्पर विरोधी विचार हैं जिनमें समन्वय स्थापित हो ही नहीं सकता। तिलक जी का कथन था कि “यदि स्वराज्य न मिला तो भारत समृद्ध नहीं हो सकता। स्वराज्य हमारे अस्तित्व के लिये अनिवार्य है।” तिलक जी ब्रिटिश शासन को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं थे, चाहे वह कानून पर आधारित क्यों न हो। वे कहा करते थे, “स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।” इसी प्रकार लाला लाजपतराय तथा विपिन चन्द्र पाल भी स्वराज्य के प्रबल समर्थक थे।

(3) उग्रवादियों के साधन- उग्रवादियों को प्रार्थनाओं, प्रार्थना-पत्रों और शिष्ट मण्डलों की नीति में विश्वास नहीं था। वे इसे ‘राजनीतिक भक्षावृत्ति’ की संज्ञा देते थे। वे अपनी मांगें मनवाने के लिये संघर्ष और जन-आन्दोलन के पक्ष में थे। उन्होंने अपने राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिये बहिष्कार, स्वराज्य, स्वदेशी आन्दोलन और राष्ट्रीय शिक्षा पर बल दिया। उग्रवादियों की मान्यता थी कि बहिष्कार विदेशी शासन की प्रतिष्ठा और हितों के ऊपर एक सीधा आघात होगा। अतः वे राजनीतिक अधिकारों के लिये लड़ना चाहते थे।

(4) भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के समर्थक- उग्रवादी प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के प्रबल समर्थक थे। वे भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति की सर्वश्रेष्ठता में विश्वास करते थे तथा इन्हीं के अनुसार देश का नव-निर्माण करना चाहते थे। वे वेद, गीता आदि से प्रेरणा ग्रहण करते थे। तिलक जी ने भारतवासियों में राष्ट्रवाद में प्रसार के लिये ‘गणपति उत्सव’ एवं ‘शिवाजी उत्सव’ का सहारा लिया। इस प्रकार उग्रवादियों ने हिन्दू धर्म एवं प्राचीन गौरव के माध्यम से राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करने का प्रयत्न किया।

(5) धर्म पर आधारित राष्ट्रवाद- उग्रवादियों का राष्ट्रवाद धर्म पर आधारित था। अरविन्द का कहना था कि राष्ट्रवाद एक धर्म है जो कि ईश्वर की ओर से आया है ! राष्ट्रवाद का दमन नहीं किया जा सकता। राष्ट्रवाद ईश्वरीय शक्ति से जीवित रहता है।

(9 हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक- उग्रवादी हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे। तिलक तथा लाला लाजपतराय ने राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के लिये इहन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया।

उग्रवादियों की उपलब्धियाँ

उग्रवादियों ने राष्ट्रीय आन्दोलन को गतिशील करने तथा देश में राष्ट्रीय चेतना के प्रसार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। यथा-

(1) राष्ट्रीय आदोलन को गतिशील बनाना- उग्रवादियों ने राष्ट्रीय आन्दोलन के कार्य-क्षेत्र को व्यापक बनाया। यह आन्दोलन केवल एक उग्रवादी आन्दोलन ही नहीं रह गया, वरन् एक जनवादी आंदोलन बन गया । उग्रवादियों द्वारा अपनाये गए बहिष्कार, स्वदेशी आन्दोलन,‌ राष्ट्रीय शिक्षा आदि साधनों ने राष्ट्रीय आन्दोलन के कार्यक्षेत्र को व्यापक बना दिया और राष्ट्रीय आन्दोलन में निम्न एवं मध्यम वर्ग के लोग भी शामिल होने लगे।

(2) राष्ट्रीय चेतना का प्रसार- उग्रवादी नेताओं ने संघर्ष त्याग और बलिदान द्वारा भारतवासियों में राष्ट्रीय जागृति उत्पन्न की। उन्होंने अन्यायपूर्ण, शोषणकारी, शासन से मुक्ति प्राप्त करने पर बल दिया और बहिष्कार स्वदेशी आन्दोलन तथा राष्ट्रीय शिक्षा के कार्यक्रमों द्वारा जन-साधारण में नवीन चेतना उत्पन्न की। इस प्रकार उग्रवादियों ने देशवासियों में साहस निर्भीकता, आत्म-निर्भरता, स्वाभिमान आदि की भावनाएँ उत्पन्न की और ब्रिटिश शासन से संघर्ष करने के लिये जन-आन्दोलनों को प्रोत्साहन दिया।

(3) कांग्रेस की विचारधारा पर प्रभाव- उग्रवादियों ने कांग्रेस की उदारवादी विचारधारा को भी प्रभावित किया। उग्रवादियों से प्रेरित होकर ही 1906 में कांग्रेस द्वारा स्वराज्य, स्वदेशी बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के प्रस्ताव पास किये गए। उग्रवादियों के सिद्धान्तों की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आने वाला राष्ट्रीय आन्दोलन उग्रवादियों के सिद्धान्तों पर आधारित किया गया। महात्मा गाँधी द्वारा चलाये गये ‘असहयोग आन्दोलन’ और ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ में बहिष्कार, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा के तत्त्व सम्मिलित थे।

(4) बहिष्कार और स्वदेशी आन्दोलनों को प्रोत्साहन- उग्रवादियों द्वारा अपनी माँगे मनवाने के लिये बहिष्कार एवं स्वदेशी आन्दोलन शुरू किए गए जिन्हें पर्याप्त सफलता मिली। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बहिष्कार तथा स्वदेशी आन्दोलन को अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई।

(5) रचनात्मक कार्यक्रम- उग्रवादियों ने रचनात्मक कार्यक्रम पर भी बल दिया। उन्होने एक ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की योजना बनाई जो राष्ट्र द्वारा नियन्त्रित होने के साथ ही देश के हितों के अनुकूल हो तथा नवयुवकों में राष्ट्रीयता की भावना का संचार करे। उग्रवादियों ने समाज-सुधार के कार्यों में सक्रिय भाग लिया तथा एक नवीन एवं प्रगतिशील समाज की रचना पर बल दिया। उन्होंने जाति प्रथा, बाल-विवाह, बहु-विवाह, दहेज प्रथा, सती प्रथा, छुआछूत आदि का विरोध किया और स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह आदि को प्रोत्साहन दिया।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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