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आदिलकाल के विभिन्न नाम | आदिकाल के नामकरण के संबंध में विभिन्न मत | आदिकाल के नामकरण की समस्या

आदिलकाल के विभिन्न नाम | आदिकाल के नामकरण के संबंध में विभिन्न मत | आदिकाल के नामकरण की समस्या

आदिलकाल के विभिन्न नाम

हिंदी साहित्य का आरंभिक काल जिसे विद्वानों के आदिकाल वीरगाथा काल, चारणकाल, रासोकाल, अपभ्रंश-काल आदि अनेक नामों से संबोधित किया है हिंदी का सर्वाधिक विवादग्रस्त काल है। अतएव इसके नामकरण के प्रसंग में विचार अपेक्षित है।

मिश्र बंधुओं एवं आचार्य शुक्ल के मत-  

सर्वप्रथम मिश्र बंधुओं ने इस पर विचार किया और आदिकाल के नाम से अभिहित किया। तदुपरांत वीरगाथाओं की प्रधानता देखकर आचार्य शुक्ल ने इसे वीरगाथा काल कहा।

शुक्लजी के इस नामकरण के संदर्भ में तीन बातें विशेष उल्लेखनीय हैं- (क) उन्होंने इस काल में वीरगाथात्मक रचनाओं की प्रधानता मानी है। (ख) नागपंथी योगियों व सिद्धों की कृतियों को उन्होंने शुद्ध साहित्य में स्थान नहीं दिया। (ग) जैनों द्वारा रचित साहित्य को धार्मिक साहित्य कहकर उसे रचनात्मक साहित्य की सीमा से निकाल दिया।

(1) आचार्य शुक्ल के मत की समीक्षा-  

शुक्ल के मतानुसार इस युग में दो प्रकार की रचनाएं उपलब्ध होती हैं। प्रथम अपभ्रंश की और द्वितीय देश भाषा की। अपभ्रंश की केवल चार रचनाएँ उपलब्ध हैं। ये है- ‘विजयपाल रासो’, ‘हम्मीर रासो’, ‘कीर्तिपताका’ व ‘कीर्तिकाल’। देश भाषा की आठ साहित्यिक रचनाएँ यथा- ‘खुमान रासो’, ‘पृथ्वीराज रासो’, ‘बीसलदेव रासो’, ‘जयचंद्र प्रकाश’, ‘जयमयंक चसचंद्रिका’, ‘परमाल रासो’, ‘खुसरों की पहेलियाँ’ और ‘विद्यापति पदावली। मानी जाती है। शुक्ल जी के अनुसार इन उपर्युक्त कृतियों में से दो तथा ‘बीसलदेव रासो’, के अतिरिक्त अन्य सभी कृतियाँ वीरगाथात्मक ही हैं। अतएव इस युग को वीरगाथा काल कहना ही समीचीन है। किंतु वास्तविकता इससे परे है। क्योंकि ‘खुमान रासो’ और ‘परमाल रासो’ को परवर्ती युग की रचना सिद्ध किया जा चुका है और ‘पृथ्वीराज रासो’ को अर्द्धप्रामाणिक माना जाता है। इतना ही नहीं ‘विजयपाल रासो’ की तथा हम्मीर रासों की प्रामाणिकता भी संदिग्ध ही है। खुसरों की पहेलियाँ में वीरगाथात्मक कोई प्रवृत्ति परिलक्षित नहीं होती। शेष रही विद्यापति की पदावली जिसकी भावभूमि रसराज श्रृंगार से अनुप्राणित है। उसमें राधाकृष्ण के श्रृंगारी चित्र ही अंकित हैं। अतएव आचार्य शुक्ल ने जिन कृतियों के आधार पर इसे वीरगाथाकाल कहना उपयुक्त समझा था, उन कृतियों की प्रामाणिकता में उनके द्वारा प्रतिपादित नामकरण भी वास्तविकता से परे प्रतीत होता है।

(2) डॉ0 रामकुमार वर्मा का अभिमत और उसकी समीक्षा-

शुक्ल जी के इस साक्ष्य पर वीरगाथाओं के प्रणेता राजाश्रित चारण थे। अतः युग को चारणकाल कहना अधिक उपयुक्त माना है। डॉ0 वर्मा के मत का खंडन करते हुए डॉ0 गणपति चंद्रगुप्त लिखते हैं कि इस युग के अंतर्गत उन्होंने (वर्मा जी ने) जिन ‘रचनाओं को स्थान दिया है उनमें से अधिकांश सोलहवीं शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक में रचित हैं और जो रचनाएँ इस काल की सीमा में आती हैं उनमें किसी का भी रचयिता कोई चारण नहीं है। इस प्रकार डॉ0 गुप्त के अनुसार इस काल का नाम चारण काल असंगत प्रतीत होता है।

(3) आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का मत और उसकी समीक्षा-

द्विवेदी जी ने इस काल को ‘बीजवपन काल’ संज्ञा से विभूषित किया है। वास्तव में यह नाम भी उचित नहीं प्रतीत होता है। क्योंकि इस काल में अपने पूर्ववर्ती साहित्य की प्रायः सभी काव्य रूढ़ियों का सफल निर्वाह  हुआ है और साथ ही कुछ नवीन साहित्यिक पद्धतियों का भी विकास हुआ है। अतएव इस काल के साहित्य का ‘Literature in fancy’ की उक्ति चरितार्थ नहीं होती।

(4) राहुल सांस्कृत्यायन का मत और उसकी समीक्षा-

सांस्कृत्यायन जी ने इस काल को सिद्ध-सामन्त काल कहा है। क्योंकि इस काल के साहित्य में केवल सामन्तों की स्तुति तथा सिद्धों की वाणी नामक मात्र दो प्रवृत्तियां ही प्रमुख मानी हैं। लेकिन ध्यातव्य है कि इस काल विशेष में सिद्धों के अतिरिक्त जैन कवियों ने भी महत्वपूर्ण रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। व्यापकता एवं प्रभाव की दृष्टि से जैन कवियों का यह साहित्य कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। इसी बात की पुष्टि करते हुए डॉ0 हजारी प्रसाद द्विवेदी जी लिखते हैं कि ‘इस नाम से उन अत्यंत महत्वपूर्ण लौकिक रस की रचनाओं का कुछ भी आभास नहीं मिलता जो परवर्ती काव्य में भी व्यापक रूप में प्रकट हुई हैं। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि इस काल को ‘सिद्ध-सामंत’ युग कहना उचित नहीं।’

(5) डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत-

इस काल के नामकरण के संदर्भ में डॉ0 द्विवेदी का मत सर्वथा समीचीन प्रतीत होता है। उन्होंने मिश्र बंधुओं द्वारा रखा गया नाम ‘आदिकाल’ ही स्वीकार किया है। ‘हिंदी साहित्य का आदि काल’ तथा ‘हिंदी साहित्य’ नामक अपनी दोनों कृतियों में वे इसे ‘आदिकाल’ ही स्वीकार करते हैं। आदिकाल स्वीकार कर लेने के उपरांत भी इस नाम से पूर्णतः संतुष्ट प्रतीत नहीं होते। वे स्पष्ट लिखते हैं कि वस्तुतः हिंदी का आदिकाल एक प्रकार की भ्रामक धारणा की सृष्टि करता है और श्रोता के चित्त में यह भाव पैदा करता है कि यह काल कोई आदिम मनोभावापन्न, परंपरा, विनिर्मुक्त, काव्य रूढ़ियों के अछूते साहित्य का काल है यह ठीक नहीं है। यह काल बहुत अधिक परम्परा प्रेमी, रूढ़िग्रस्त, सजग और सचेत कवियों काल है।’

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि आलोच्य काल के नामकरण के संबंध से पर्याप्त मतांतर है। किसी एक सर्वमान्य नामकरण के लिए पर्याप्त अनुसंधान अपेक्षित है किंतु जब तक किसी संतोषजनक नाम पर न पहुंचा जाय तब तक के लिए आदिकाल नाम ही मेरी दृष्टि से उचित प्रतीत होता है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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