समाज शास्‍त्र / Sociology

भ्रष्टाचार का अर्थ | भ्रष्टाचार की परिभाषा | भ्रष्टाचार के कारण

भ्रष्टाचार का अर्थ | भ्रष्टाचार की परिभाषा | भ्रष्टाचार के कारण

भ्रष्टाचार का अर्थ

(Meaning of Corruption)

भ्रष्टाचार प्रत्येक युग में किसी न किसी रूप में होता रहा है। यह बात दूसरी है कि किस युग में कितना भ्रष्टाचार रहा है। इसलिए भ्रष्टाचार का प्रयोग संकीर्ण अर्थों में न होकर व्यापक अर्थो में किया जाता है। भ्रष्टाचार की व्याख्या केवल आधुनिक युग में ही नहीं की जाती है। इसकी व्याख्या पाचीन पुस्तकों में भी प्राप्त होती है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में न जाने कितने प्रकार के भ्रष्टाचारों की विवेचना की गयी है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए न जाने कितने प्रकार की योजनायें बनाई गयी थीं। विभिन्न विभागों में भ्रष्टाचार फैला हुआ था उसे रोकने के लिए विभिन्न प्रकार के अध्यक्षों की नियुक्ति होती थी उदाहरण के तौर पर सूगाध्यक्ष, पौताध्यक्ष।

भ्रष्टाचार की परिभाषा

भ्रष्टाचार की व्याख्या करना एक दुरूह कार्य है, क्योंकि आखिर भ्रष्टाचार को किस तरह और किस दृष्टिकोण से विवेचना की जाया फिर भी अनेक विचारकों ने इसे परिभाषित करने का प्रयत्न किया है। इलियट और मेरिल के शब्दों में, “किसी व्यक्तिगत, किन्तु अनुचित लाभ प्राप्त करने के लिए कानून अथवा कर्तव्य का जब जान-बूझकर उल्लंघन किया जाता है तो वह भ्रष्टाचार कहलाता है।”

रूयक (Roucck) का कथन है कि, “ऐसे भ्रष्ट व्यक्ति समाज में नैतिकता का गला घोंटते हैं, अविश्वास की भावना को प्रोत्साहन देकर सामाजिक विघटन की स्थिति उत्पन्न करते हैं जबकि अन्य प्रकार के अपराधों का प्रभाव सामाजिक संस्थाओं पर तुलनात्मक दृष्टि से कम होता है।”

भ्रष्टाचार के कारण

(Causes of Corruption)

भ्रष्टाचार की समस्या आधुनिक युग की सबसे जटिल समस्या है। इसके पीछे एक नहीं बल्कि विभिन्न कारकों का योगदान है। फिर भी इसके लिए प्रमुख रूप से उत्तरदायी कारकों को हम निम्न प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं –

(1) दोषपूर्ण राजनैतिक संरचना (Defective Political Structure) – भारत में स्वाधीनता के पश्चात् प्रजातांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हुई। प्रजातंत्र विभिन्न राजनैतिक दलों में तथा उनके बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की माँग करती है किन्तु हमारे यहाँ राजनैतिक दलों की भरमार है।

(2) भौतिकवादी दृष्टिकोण (Materialistic Attitude) – आधुनिक युग भौतिकवादी युग है। व्यक्ति की प्रतिष्ठा, मान-पान, सम्मान सब कुछ का व्यक्ति की भौतिक समृद्धि के आधार पर ही मूल्यांकन किया जाता है इसीलिए आजकल का मानव भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है। वह संसार के समस्त सुखों को भोगना चाहता है। धार्मिक एवं नैतिक नियमों का उसके लिए कोई विशेष मूल्य नहीं है चूँकि ये उसकी भौतिकता की दौड़ में बाधा उपस्थित करते हैं।

(3) व्यापार की प्रवृत्ति (Trade Instinct) – आज औद्योगीकरण का युग है। जगह- जगह नये उद्योगों की स्थापना ही नहीं हो रही है बल्कि छोटे-छोटे उद्योग अब बढ़कर बड़े-बड़े उद्योगों एवं कारपोरेशन्स का भी रूप लेते जा रहे हैं। इससे व्यापारी एवं उपभोक्ता का सीधा सम्बन्ध समाप्त हो रहा है और ये उद्योगपति अब बेहिचक चोर बाजारी, जमाखोरी तथा मिलावट के द्वारा जतना का गला काट रहे हैं। पहली बात तो इनका दोष पकड़ में ही नहीं आता और यदि पकड़ में आ भी जाय तो इसे सिद्ध करना बड़ा कठिन होता है।

(4) कम वेतन और अधिक खर्चे (Less Income and More Expenditure) – आधुनिक युग में शहरी सभ्यता में व्यक्ति की आमदनी चाहे कुछ भी क्यों न हो, हर व्यक्ति ऐशों आराम की जिन्दगी बिताना चाहता है। इन बढ़ी हुई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति को अधिक धन चाहिए तथा इसके लिए उसे भले या बुरे तरीकों से पैसा कमाना पड़ता है।

(5) जनसांख्यिक विषमतायें (Demographic Diversities) – भारत में न केवल जनाधिक्य की समस्या है बल्कि जनसंख्यात्मक विषमता भी पाई जाती है। विभिन्न धर्मो, सम्प्रदायों, जातियों एवं प्रजातियों के लोगों में आपस में घनिष्टता का अभाव पाया जाता है जिसके कारण न तो व्यक्ति दूसरे के स्वार्थों को ध्यान में रखता है, न उसके साथ कोई लगाव महसूस करता है और न ही गलत कार्यो के करते समय हिचकता है।

(6) नौकरशाही का विस्तार (Expansion of Bureaucracy) – नौकरशाही व्यवस्था के अन्दर कुछ चुने हुए लोगों के द्वारा शासन कार्य को चलाया जाता है। अब उच्च पदों पर अयोग्य व्यक्ति प्रतिष्ठित हो जाते हैं, तो एक ओर तो वह प्रशासन को चौपट कर देते हैं और दूसरी ओर भाई-भतीजावाद (Nepotism) को बढ़ावा देकर वे अपने लोगों को ही लाभ के पदों पर नियुक्त करने की चेष्टा करते हैं।

(7) सामाजिक मूल्यों में पतन (Decline in Social values)-  एक युग था जबकि हमारे समाज में साम्प्रदायिकता, सत्यनिष्ठा, प्रेम एवं सहयोग के सामाजिक मूल्यों की प्रधानता थी किन्तु आज बढ़ी हुई महँगाई तथा मौलिकवादिता ने व्यक्ति को व्यक्तिवादी बनाकर स्वार्थी, लालची एवं कपटी बना दिया है।

(8) कानून की अज्ञानता (Ignorance of Law)-  भारत का जन साधारण अभी कानूनी दाँवपेंचों से लगभग पूर्णतया अनभिज्ञ है और इसी अनभिज्ञता का हमारे देश के तथाकथित संभ्रान्त, प्रतिष्ठित एवं जनता के सेवक कहे जाने वाले लोग नाजायज फायदा उठाते हैं। बड़े-बड़े व्यापारी एवं काला धन्धा करने वाले लोग भोले-भाले लोगों को फुसलाकर उनको लूट रहे हैं।

(9) उचित दण्ड की कमी (Lack of Proper Punishment)-  एक ओर तो हमारे कानून दोषपूर्ण हैं जिनके कारण चोरबाजारी, घूस एवं जालसाजी धड़ल्ले से चल रही है तथा दूसरी ओर हमारे यहाँ उचित दण्ड की कमी है। व्यक्ति बड़े से बड़ा अपराध करके भी आसानी से छूट जाता है। दण्ड का भय न होने के कारण निर्भीक होकर अनैतिक एवं गैर सामाजिक कार्य करता है।

(10) नगरीकरण (Urbanization)-  आज औद्योगीकरण के बढ़ते चरणों ने नगरीकरण की प्रक्रिया को भी तेज कर दिया है। यातायात एवं सन्देशवाहन के साधनों के प्रसार ने सामाजिक गतिशीलता में वृद्धि करके व्यक्ति के जीवन में गति एवं अस्थिरता प्रदान कर दी है। यह गतिशीलता लम्बवत् एवं क्षैतिजीय दो रूपों में प्रकट हो रही है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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