समाज शास्‍त्र / Sociology

वृद्धों की समस्या | वृद्धों की प्रमुख समस्यायें | वृद्धों की समस्याओं का समाधान करने में सरकार की भूमिका  | वृद्धों की समस्याओं का समाधान करने में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका

वृद्धों की समस्या | वृद्धों की प्रमुख समस्यायें | वृद्धों की समस्याओं का समाधान करने में सरकार की भूमिका  | वृद्धों की समस्याओं का समाधान करने में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका

वृद्धों की समस्या

पिछले कुछ दशकों में प्रत्येक देश की जनसंख्या में वृद्धों या बुजुर्गों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि हुई है और साथ ही उनके प्रति समाज का दायित्व (Responsibility) भी बढ़ा है। अब वृद्धावस्था को विश्व स्तर पर एक सामाजिक आर्थिक एवं मानवीय मामला समझा जाने लगा है। संयुक्त राष्ट्र संघ में यह मामला सबसे पहले सन् 1948 में उठाया गया था। तत्पश्चात सन् 1982 में विएना में वृद्धावस्था के संबंध में एक विश्व सम्मेलन आयोजित किया गया। जनसंख्या में वृद्धों की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1999 को बुजुर्गों के सम्मान में अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध घोषित किया गया। भारत ने भी वर्ष 2000 को राष्ट्रीय वृद्ध वर्ष (National Elder Year) के रूप में मनाने का निश्चय किया। पिछले 50 वर्षों में व्यक्ति की औसत आयु में 20 वर्ष से भी कुछ अधिक की वृद्धि हुई है।

इसका तात्पर्य यह है कि 50 वर्ष पूर्व व्यक्ति की जो आयु थी उसकी तुलना में आज वे 20 साल अधिक जीवित रहते है। सन् 1995 में जीवन प्रत्याशा (Life expectation) 65 वर्षों से भी अधिक हो गयी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के उत्तरार्द्ध में हुई प्रगति के कारण भारत में वृद्धों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। सन् 1901 में 60 वर्षों से अधिक उम्र की आबादी का आकलन 1.2 करोड़ किया गया था जो सन् 1951 में बढ़कर 5.1 करोड़ हो गयी। सन् 2000 में 60 वर्ष से अधिक आबादी 7.57 करोड़ तथा सन् 2025 में 14.61 करोड़ हो जाने का अनुमान है। इस देश में ही 80 वर्ष से अधिक आयु वर्ग वाले लोगों की संख्या 36.3 लाख तथा सन् 2050 तक 1.06 करोड़ तक हो जाने का अनुमान है।

वृद्धों की प्रमुख समस्यायें

(Major Problems of Elderly)

वृद्धों की समस्याओं को निम्न प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है-

  1. सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएँ (Social-Cultural Problem)
  2. आर्थिक समस्याएँ (Economic Problem)
  3. स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ (Health Problem)
  4. जीवन के प्रति परिवर्तित रूख की समस्याएँ (Problem related to changing attitude toward life)

कई कारणों से पारम्परिक सहयोग कार्यक्रम काफी कमजोर पड़ता जा रहा है। इसके लिए नगरीकरण, आधुनिकीकरण, आतंकवाद, गरीबी तथा आर्थिक सुरक्षा जैसे तनाव उत्तरदायी है। पारिवारिक संसाधनों की कमी की वजह से बुजुर्गों को प्रायः भार स्वरूप देखा जाने लगा है। भारत में गरीबी एवं निम्न आय के कारण वृद्ध लोग अपने पुत्रों और परिवार के अन्य सदस्यों पर आश्रित हो गये है। प्रौढ़ आश्रितता के अनुपात में दिनों दिन वृद्धि होती जा रही है। पुरुषों की तुलना में स्त्रियों का आश्रयदाता अनुपात अधिक है।

वृद्धावस्था के कारण स्वास्थ्य संबंधी जो प्रमुख गड़बड़ियाँ सामने आती हैं वे हैं- मोटापा, ओसिओ, आर्थोराइटिस, चिंता, तनाव एवं कब्ज आदि। धूम्रपान अथवा कोई अन्य नशा करने वाले व्यक्ति को कई प्रकार की बीमारियाँ वृद्धावस्था में आ घेरती है। कई बीमारियों को नियन्त्रित किया जा सकता है। वास्तविकता यह है कि वृद्ध जनों के स्वास्थ्य को उतना महत्व नही मिल पाता है जितना मिलना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्ग स्वयं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र (Primary Health Centre) केंद्र तक नहीं पहुंच पाते हैं। बीमार वृद्ध व्यक्तियों के लिए तो वहाँ तक पहुंचना और भी कठिन है। ऐसे क्षेत्रों में गैर सरकारी संगठन चल स्वास्थ्य इकाइयों के माध्यम से बुजुर्ग की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को हल करने में काफी योगदान दे सकते हैं। कई इकाइयाँ अभावग्रस्त एवं उपेक्षित उन बुजुर्गों की सहायता करती है जिनके पास आर्थिक साधनों का अभाव है और जो स्वयं चल-फिर नहीं सकते।

वृद्धों की समस्याओं का समाधान करने में सरकार की भूमिका

(Role of Government for Solution of the Problem of Elderly)

वृद्धों की समस्याओं को हल करने की दिशा में कई कारगर कदम उठाये गये, जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं-

(1) वृद्धजनों को दी जा रही सुविधाओं में सबसे प्रमुख है- वृद्धावस्था पेंशन योजना। यह पेंशन बेसहारा लोगों को दी जाती है, जिनकी आमदनी का कोई नियमित स्रोत नही होता है। इस योजना के अंतर्गत 75 रुपये मासिक की पेंशन दी जाती है जो कि काफी कम है, किंतु फिर भी इसका लाभ 53 लाख बुजुर्ग उठा रहे है।

(2) अनेक राज्य सरकारें भी वृद्धावस्था पेंशन योजनाएं चला रही है। इसके अंतर्गत केंद्र सरकार से पेंशन नही मिलने वाले बुजुर्गों को पेंशन दी जाती है। इस पेंशन की राशि बिहार में 60 रुपये है जबकि राजस्थान में 300 रुपये है।

(3) बेसहारा बुजुर्गों को अत्रपूर्णा योजना के अंतर्गत प्रतिमाह दस किलो खाद्यान्न दिया जाता है। यह खाद्यान्न उन लोगों को दिया जाता है, जिन्हें कोई पेंशन नहीं मिल रही है।

(4) आयकर अधिनियम में बुजुर्ग नागरिकों के लिए आयकर में रियायत दी जाती है।

(5) अपनी बचत योजनाओं के माध्यम से भारतीय जीवन बीमा निगम भी वरिष्ठ नागरिकों को कई प्रकार की सुविधायें उपलब्ध कराता है।

वृद्धों की समस्याओं का समाधान करने में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका

(Role of Non-Government Organization for Solution of the Problem of Elderly)

वृद्धों की समस्याओं को हल करने में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका कम महत्वपूर्ण नही है। देश में कई ऐसे गैर सरकारी संगठन हैं जो बुजुर्गों के कल्याण की दृष्टि से कार्य कर रहे है। ये संगठन ग्रामीण और नगरीय दोनों ही क्षेत्रों में कार्यरत है। वृद्ध लोगों को प्रमुखतः तीन बातों की आवश्यकता पड़ती है- 1. वित्तीय सुरक्षा की 2. स्वास्थ्य सुरक्षा की, 3. भावनात्मक सुरक्षा की। गैर सरकारी संगठन इन तीनों ही क्षेत्रों में किसी न किसी रूप में कार्य कर रहे हैं।

वृद्धजनों को कई प्रकार की गंभीर बीमारियों एवं शारीरिक अक्षमताओं की अधिक सम्भावना बनी रहती है। यद्यपि वर्ष 2000 तक सबके लिए स्वास्थ्य सुविधाओं के लक्ष्य को प्राप्त करने की बात कही गयी थी, किंतु अभी यह लक्ष्य काफी दूर है। इसका कारण यह है कि वृद्धजनों के स्वास्थ्य पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए उतना नहीं दिया गया है। यहाँ गैर सरकारी संगठन चल-स्वास्थ्य इकाइयों के माध्यम से ग्रामीण वृद्धजनों की काफी सहायता कर रहे है। ये संगठन गाँवों एवं नगरों में शिविर लगाकर बुजुर्गो के लिए मोतियाबिन्द के मुफ्त इलाज की सुविधा भी प्रदान कर रहे है।

गैर सरकारी संगठन अपनी विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से बुजुर्गों को वित्तीय सुरक्षा (Financial Security) प्रदान करने की पूरी-पूरी कोशिश कर रहे हैं। ये संगठन बुजुर्गो को उनकी शारीरिक शक्ति के अनुसार छोटे-छोटे कार्यो से लगाकर उनकी आय को बढ़ाने में सहायता कर देते हैं।

वृद्धों की भावनात्मक समस्याओं का एक प्रमुख कारण अलगाव एवं परिवारजनों की उपेक्षा का भाव है। इससे उनमें अकेलापन और निराशा के भाव उत्पन्न हो जाते है। वृद्धों की दिन के समय देखभाल के लिए गैर सरकारी संगठनों के द्वारा केंद्र संचालित किये जा रहे हैं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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