समाज शास्‍त्र / Sociology

निर्धनता क्या है? | निर्धनता का अर्थ एवं परिभाषा | निर्धनता के कारण | निर्धनता के प्रकार | निर्धनता के सिद्धांत

निर्धनता क्या है? | निर्धनता का अर्थ एवं परिभाषा | निर्धनता के कारण | निर्धनता के प्रकार | निर्धनता के सिद्धांत

निर्धनता क्या है?

निर्धनता समाज की एक बहुत ही जटिल समस्या है किंतु पाश्चात्य देशों की तुलना में यह समस्या भारत में कहीं अधिक जटिल है।

विभिन्न देशों में लोगों के रहन-सहन के दर्जे में अंतर इस बात को स्पष्ट कर देता है। वास्तव में निर्धारण एक सापेक्ष शब्द है। जितनी आय में एक आदमी किसी स्थान में सम्पन्न समझा जाता है उतनी ही आय में दूसरा व्यक्ति किसी अन्य स्थान पर निर्धन समझा जाता है। यह बहुत कुछ द्रव्य की क्रय शक्ति पर निर्भर करता है।

निर्धनता का अर्थ एवं परिभाषा

(Meaning and definition of Poverty)

निर्धनता को हम एक ऐसी दशा के रूप में समझ सकते है जिसमें कोई व्यक्ति अपनी और अपने आश्रितों की कम से कम आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ रहता है। विभिन्न विद्वानों ने निर्धनता की समस्या को अलग-अलग ढंग से परिभाषित करने की चेष्ठा की है।

गोडार्ड (Gddard) का कथन है, “निर्धनता व्यक्ति के लिये उन वस्तुओं की अपर्याप्त देन है जो उसके और उसके आश्रितों के स्वास्थ्य और बल के लिये आवश्यक है।”

एडम स्मिथ (Adam Smith)- लिखते है, “मनुष्य की निर्धनता व धनाढयता को मानव जीवन की आवश्यक वस्तुओं, आराम और मनोरंजन के साधनों की मात्रा में आंका जा सकता है।”

निर्धनता के कारण

(Causes of Poverty)

निर्धनता की समस्या को निम्नलिखित कारकों के अंतर्गत स्पष्ट कर सकते हैं-

  1. व्यक्तिगत कारक (Personal Factors)
  2. भौगोलिक कारक (Geographical Factors)
  3. आर्थिक कारक, कृषि संबंधी तथा अन्य (Economic Factors, Agricultural and others)
  4. सामाजिक कारक (Social factors)
  5. विविध कारक (Miscellaneous factors)

1. व्यक्तिगत कारक (Personal Factors)- निर्धनता का सबसे प्रथम कारक व्यक्ति को कार्य की अयोग्यता, अपंगता, खराब व्यसन तथा अदूरदर्शिता आदि कुछ भी हो सकता है। वैयक्तिक कारकों को हम निम्न शीर्षको में और भी स्पष्ट कर सकते हैं-

(i) मानसिक असमर्थता (Mental Disorder)- जब कोई व्यक्ति जन्म से अथवा किसी दुर्घटना के फलस्वरूप अपनी मानसिक संतुलन खोकर मानसिक रूप से विकृत हो जाता है तो उसकी कमाने की क्षमता घट जाती है एवं यही उसकी दरिद्रता का कारण बन जाती है।

(ii) दुर्घटनायें (Accidents)- रेल, मोटर या फैक्ट्री आदि में घटित घटना में प्रायः लोग अपंग हो जाते है या अपनी जान से हाथ धो बैठते है। कभी-कभी प्राकृतिक प्रकोप जैसे भूकम्प, अग्निकांड या बाढ़ भी लोगों को उखाड़ फेंकता है। ये सभी कारक दरिद्रता को बढ़ाते हैं।

(iii) अशिक्षा (Illiteracy)- अशिक्षा के कारण व्यक्ति अपनी मानसिक क्षमता की अपंगता से ग्रसित रहता है जिससे उन्हें उचित रोजगार नही मिल पाता और वे अपनी संतानों को भी पढ़ा लिखा नहीं पाते। इस प्रकार दरिद्रता पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है।

  1. भौगोलिक कारक (Geographical factors) – भौगोलिक कारक मनुष्य के सामाजिक आर्थिक जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है। कुछ विद्वानों ने तो केवल भौगोलिक कारकों को ही मनुष्य के जीवन के समस्त पक्षों का निर्धारक कारक माना है।

निर्धनता की व्याख्या के संदर्भ में हम भौगोलिक कारकों को चार भागों में विभक्त कर उनकी भूमिका स्पष्ट कर सकते हैं।

(i) प्राकृतिक साधनों की कमी और प्रतिकूल जलवायु

(ii) प्रतिकूल मौसम

(iii) प्राकृतिक विपदायें

(iv) नाशक कीड़े

(i) प्राकृतिक साधनों की कमी और प्रतिकूल जलवायु (Lack of Natural resources and adverse climate)- सभी स्थानों पर प्राकृतिक साधन एक से नहीं होते। कुछ स्थान प्राकृतिक साधनों की दृष्टि से धनी होते हैं तो कुछ निर्धन कुछ स्थानों की मिट्टी उपजाऊ होती है जिससे वहां फसले अच्छी होती है और लोग समृद्ध होते है।

(ii) प्रतिकूल मौसम (Advese weather)- प्रतिकूल मौसम भी खेतीबारी को अत्यधिक प्रभावित करता है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, सूखा, कोहरा, पाला तथा तूफान एवं ओले फसलों को चौपट कर देते है और लोगों को गरीबी के चंगुल में बांध देते हैं।

(iii) प्राकृतिक विपदायें (Natural Calamities)- प्राकृतिक विपदाओं के अंतर्गत हम तूफान, आंधी, भूकम्प, ज्वालामुखी, अग्निकांड आदि को सम्मिलित करते हैं।

(iv) नाशक कीड़े (Insects and Pests)-  विभिन्न जीव एवं कीड़े फसलों को नष्ट करते हैं तथा अनाज की गोदामों में रखे अनाज को खराब कर देते है। ये कीड़े पशु संपत्ति को भी भारी क्षति पहुंचाते है। इससे कृषकों एवं व्यापारियों को प्रायः दरिद्रता का सामना करना पड़ता है।

  1. आर्थिक कारक (Economical factors)- आर्थिक कारकों के कारण ही प्रायः गरीबों के दानव का जन्म होता है। आर्थिक कारकों को हम दो वर्गों में बांट सकते हैं-

(A) कृषि और कृषक संबंधी कारक तथा

(B) अन्य आर्थिक कारक

(A) कृषि एवं कृषक संबंधी कारक – भारत एक कृषि प्रधान देश है किंतु फिर भी यहां कृषि की स्थिति बड़ी दयनीय है। इसके लिये हम निम्न कारकों को उत्तरदायी मान सकते है-

1. ग्रामीण क्षेत्रों में खाद की कमी।

2. सुधरे बीजों और कृषि संबंधी औजारों की कमी।

(B) अन्य आर्थिक कारक (Other Economic factors)-  कुछ अन्य आर्थिक कारक भी निर्धनता को बढ़ावा देते हैं। इनमें से तीन प्रमुख हैं-

  1. अपर्याप्त उत्पादन, कच्चे माल की कमी, तथा यातायात के साधनों में कमी।
  2. धन का असमान वितरण

निर्धनता के प्रकार

साधारण निर्धनता को दो वर्गों में विभाजित किया गया है-

(i) प्राथमिक निर्धनता (Primary Poverty)- प्राथमिक निर्धनता से आशय धन आय की कमी से होता है जिसमें व्यक्ति आर्थिक पदार्थ एवं सेवा को बताये गये भाव पर नहीं खरीद पाता। इसके फलस्वरूप यह जीवन का निम्नतम स्तर बनाये रखने पर अपने को असमर्थ पाता है।

(ii) द्वैतीयक निर्धनता (Secondary Poverty)- इस प्रकार की निर्धनता व्यक्ति की अयोग्यता, लापरवाही, अज्ञानता, फिजूलखर्ची या अन्य किसी कारण से होती है और व्यक्ति अपने को निम्न स्तर पर भी कायम नहीं रख सकता।

इस प्रकार प्राथमिक गरीबी में धन के आभाव पर अधिक जोर दिया गया है जब कि द्वितीयक व्यक्ति के गुणों एवं धन के अपव्यय पर अधिक जोर देती है। किंतु दोनो का ही प्रभाव उसके रहन-सहन के स्तर और आवश्यकताओं की पूर्ति से ही संबंधित है। समय में परिवर्तन के साथ-साथ निर्धनता की अवधारणा में भी परिवर्तन आ गया है। आज सहयोग के स्थान पर प्रतिस्पर्धा का युग है, तथा सहयोग के स्थान पर शोषण का बोलबाला है। इसके अतिरिक्त आज व्यक्ति का जीवन पहले की तुलना में कहीं अधिक जोखिम से भरा है अस्तु निर्धनता के लिए आजकल सदैव व्यक्ति को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। कोई दुर्घटना भी उसे अपंग कर सकती है जिसके कारण वह निर्धनता का शिकार हो सकता है। लैण्डिस और लैण्डिस (Lands & Landis) ने लिखा भी है “उस संसार में जहाँ आर्थिक खतरे इतने अधिक है, व्यक्ति को निर्धनता के लिये कभी भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।”

निर्धनता के सिद्धांत

(Theories of Poverty)

कुछ अर्थशास्त्रियों एवं समाजशास्त्रियों ने इस बात को उठाया कि ज्ञान-विज्ञान में विकास के पश्चात भी निर्धनता का लोप क्यों नही हुआ। इस संदर्भ में माल्थस, कार्ल मार्क्स तथा सर हेनरी जार्ज ने अलग-अलग कारकों के रूप में अपने-अपने सिद्धांत को प्रतिपादित किया।

(i) माल्थस का सिद्धांत (Theory of Malthes)-  माल्थस ने अपना तर्क दिया कि भोजन की प्राप्ति के साधनों की तुलना में जनसंख्या अधिक तीव्र गति से बढ़ती है। आपके अनुसार अनाज की वृद्धि गणितीय अनुपात 1,2,3,4,5 तथा जनसंख्या की वृद्धि ज्यामितीय अनुपात में अर्थात 1,2,4,8,16,32 में होती है। इस प्रकार लगभग 25 वर्ष में जनसंख्या खाद्य सामग्री की तुलना में दो गुनी हो जाती है। ऐसी परिस्थिति में मांग और देन (Demand and Supply) का अनुपात नष्ट हो जाता है। खाद्य सामग्री की अधिक मांग के कारण उसके मूल्य में वृद्धि निर्धनता को जन्म देती है।

(ii) कार्ल मार्क्स का सिद्धांत (Theory of Karl Marx)- मार्क्स ने पूंजीवाद व्यवस्था तथा उसमें अंतर्निहित दोषों को निर्धनता का प्रमुख कारण बताया। पूंजीपति श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक न देकर उनको केवल गुजर-बसर भर के लिये धन मजदूरी के रूप में देते हैं और उनका शोषण करते हैं। अतिमूल्य के सिद्धांत के आधार पर धनी और धनी तथा निर्धन और निर्धन हो जाते हैं। (The rich become siecher and the Poor poor poorer)

(iii) सर हेनरी जार्ज (Theory of Hunnery George)- हेनरी जार्ज ने भूस्वामियों के एकाधिकार को निर्धनता का प्रमुख कारण बताया। भूस्वामी श्रमिको से किराये के रूप में उसकी आय का बड़ा हिस्सा हड़प लेते है। जिससे उनकी आर्थिक स्थिति दिन पर दिन बिगड़ती जाती है। आपने अपनी पुस्तक (Poverty and Progress) में लिखा है कि नगरों में जहाँ भूमि को फुटों में नापा जाता है, आप निर्धनता एवं विलासिता की चरम सीमायें देख सकते हैं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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