इतिहास / History

दक्षिण के राष्ट्रकूटों के अन्तर्गत सामाजिक आर्थिक जीवन

दक्षिण के राष्ट्रकूटों के अन्तर्गत सामाजिक आर्थिक जीवन

दक्षिण के राष्ट्रकूटों के अन्तर्गत सामाजिक आर्थिक जीवन

दक्षिण भारत में उत्तर भारत के समान ही राष्ट्रकूटों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। राष्ट्रकूटों का राज्य दक्षिण भारत का सबसे बड़ा एवं विशाल राज्य था। दक्षिण भारत की राजनीति पर राष्ट्रकूट वंश दीर्घकाल तक छाया रहा। उन्होंने चालुक्यों की शक्ति को दक्षिण में धक्का पहुँचाया था। राष्ट्रकूटों ने दक्षिण भारतीय सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक और आर्थिक जीवन को ‘बड़ी सीमा तक प्रभावित किया था! वैश्य तीसरे और शूद चौथे स्थान पर थे। कुछ मामलों में वैश्य भी अस्पृश्य माने गए। कृषि और निम्न श्रेणी के व्यवसाय अपना लेने पर भी ब्राह्मण श्रेष्ठ ही रहते थे।

  1. खान-पान, रहन-सहन- समाज के उच्च वर्गों का रहन-सहन शानदार था। मांसाहारी, शाकाहारी और फलाहारी भोजन समाज में प्रचलित था। राजा, सामन्त और समृद्ध लोग सोना-चाँदी, ताँबे, पीतल के बर्तनों का उपयोग करते थे। वे बड़े-बड़े भव्य भवनों में रहते थे। नाना प्रकार के व्यंजन और मिष्यत्रों का उपयोग उनके द्वारा किया जाता था। मद्यपान भी होता था।

ब्राह्मण सामाजिक श्रेष्ठता में उच्च होते हुए भी आर्थिक दृष्टि से कमजोर थे। निम्न वर्ग मिट्टी, पत्तल-दोने आदि का उपयोग करते थे। उनका भोजन सादा और सरल था।

सूती, ऊनी और रेशमी कपड़ों का उपयोग किया जाता था। आभूषणों का भी लोगों को शौक था। बड़े लोग सोना, चाँदी, हीरे, मोती, माणिक्य आदि से अपने शरीर को सजाते थे! हार, कुण्डल, चूड़ियाँ, वल्ल्य, बाजूबन्द आदि पहने जाते थे। गरीब फूलों, कौड़ियों और सस्ती धातुओं के आभूषणों से अपने शरीर का श्रृंगार करते थे।

उबटन, ताम्बूल, इत्र, सुगन्धित तेलों का भी उपयोग किया जाता था, परन्तु जनसाधारण इन सुविधाओं का कम ही लाभ उठा पाते थे। उनका जीवन सादा, सरल और सीधा था।

  1. मनोरंजन- समाज के सभी वर्ग मनोरंजन प्रिय थे। शिकार, नृत्य, जुआ, सुरापान की गोष्ठियों, संगीत आदि से मनोरंजन किया जाता था। दक्षिण भारत में देवदासी की प्रथा बड़ी लोकप्रिय थी। अतः मन्दिरों में नृत्यों का आयोजन होता रहता था। वेश्यावृत्ति की प्रथा भी थी। इस कारण से वेश्याएँ नृत्य के द्वारा लोगों का मनोरंजन किया करती थीं।
  2. त्योहार-उत्सव- समाज में नाना प्रकार के त्योहार-उत्सव मनाए जाते थे। दीपावली, शिवरात्रि, गणेश पूजन आदि के त्योहार लोग उत्साहपूर्वक मनाते थे। तीर्थयात्राएँ भी आयोजित होती थीं। मेले भी आयोजित किए जाते थे।
  3. समाज में नारी का स्थान- दक्षिण भारत में भी नारी की सामाजिक स्थिति गिर गई थी। बहु-विवाह, बाल-विवाह आदि ने नारी की सामाजिक स्थिति को कमजोर बना दिया था। पर्दा-प्रथा उनमें न थी। विधवा विवाह निषिद्ध हो गए थे। पुत्री का जन्म अच्छा नहीं माना जाता था।

फिर भी नारी शिक्षा की और समाज ने समुचित ध्यान दिया था। राज-कन्याओं को गीत, संगीत, नृत्य और अस्त्र-शस्त्र तथा घुड़सवारी की शिक्षा दी जाती थी। अनेक महिलाएँ उच्च पदों पर भी आसीन हुईं। अक्का देवी चार प्रान्तों की शासिका थी। उसने सेना का भी नेतृत्व किया था। कर्नाटक में अनेक महिलाएँ प्रशासिका और ग्राम प्रमुख के पद पर कार्यरत थीं। रुद्रम्बा ने भी शासन चलाया था। दक्षिण भारत में इस काल में देवदासी की प्रथा का बडा प्रचलन था।

  1. विवाह- सजातीय विवाहों का अधिक प्रचलन था। अन्तर्जातीय विवाह हेय दृष्टि से देखे जाते थे। सगोत्रीय विवाहों का भी निषेध था। सती प्रथा का चलन था। बहु-विवाहों की प्रथा थी। परन्तु अन्तर्जातीय विवाह भी यदा-कदा होते थे।

सामाजिक दृष्टि से यह काल संक्रांति का काल था। दक्षिण भारत में भक्ति आन्दोलन प्रारम्भ हो गया था। इस कारण से समाज की रूढ़िवादिता को थोड़ा धक्का लगा था। लिंगायतों, आलवार सन्तों और नायनार भक्तों ने जाति के बन्धनों की भर्त्सना की थी। स्वयं रामानुज ने दक्षिण भारत के कई मन्दिरों को शूद्रों के लिए खोल दिया था। अतः समाज में नई प्रवृत्तियाँ फैल रही थीं।

आर्थिक जीवन

राष्ट्रकूटों ने सन् 740 से लेकर सन् 973 ई० तक दक्षिण भारत में शासन किया था। एक ही वंश ने करीब 225 वर्ष राज्य किया। एक ही वंश के इतने लम्बे समय के शासन काल ने शांति, सुव्यवस्था और कानून के आदर को जन्म दिया। इस कारण से अनेक आर्थिक गतिविधियों का विकास हुआ। व्यापार, व्यवसाय और अनेक उद्योग–धन्धे फले-फूले।

  1. कृषि एवं पशुपालन-परम्परागत कृषि-व्यवसाय समाज में प्रचलित था। दालें, चावल, गेहूँ, कपास आदि पैदा किये जाते थे। पशुपालन का धन्धा भी किया जाता था। गाय, बैल, भैंस, ऊँट आदि का व्यापार होता था। खेती की सिंचाई के लिए शासकों की ओर से कुएँ, बावड़ियाँ, नहरें, झीलें और तालाब बनवाए जाते थे। नदियों के किनारों की खेती की सिंचाई नदियों से होती थी। सिंचाई के साधनों की अच्छी व्यवस्था थी। अतः कृषकों की स्थिति संतोषजनक थी।
  2. अन्य व्यवसाय- लोग अन्य धन्धे भी करते थे। कपड़े बनाना, लोहे व अन्य धातुओं की नाना प्रकार की वस्तुओं का निर्माण और सुतारी, स्वर्णकार आदि के काम किए जाते थे। लोगों ने दूसरों के मनोरंजन का काम भी अपना लिया था। लोग राजकीय नौकरियाँ भी करते थे। मनोरंजन का काम करने वालों में नट, बाजीगर, नर्तक, नर्तकियाँ और वेश्याएँ आदि की गणना की जाती थी।
  3. व्यापार- कई लोग दूर-दूर से सस्ती वस्तुएँ लाकर बेचने का व्यवसाय करते थे। लेन- देन और ब्याज का धन्धा भी किया जाता था आन्तरिक व्यापार काफी फूला-फला।

लोगों की आर्थिक स्थिति कुल मिलाकर ठीक थी। राष्ट्रकूटों के निर्माणकारी कार्य उनकी आर्थिक समृद्धि के ही परिचायक हैं।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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