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ध्वनि सिद्धान्त | ध्वनि सम्प्रदाय का संक्षिप्त परिचय | ध्वनि का अर्थ एवं स्वरूप | ध्वनि सिद्धान्त की प्रमुख स्थापनाएं

ध्वनि सिद्धान्त | ध्वनि सम्प्रदाय का संक्षिप्त परिचय | ध्वनि का अर्थ एवं स्वरूप | ध्वनि सिद्धान्त की प्रमुख स्थापनाएं

ध्वनि सिद्धान्त (सम्प्रदाय)

ध्वनि सिद्धान्त भारतीय काव्यशास्त्र का एक सम्प्रदाय है। भारतीय काव्यशास्त्र के विभिन्न सिद्धान्तों में सबसे प्रबल एवं महत्वपूर्ण ध्वनि सिद्धान्त है। ध्वनि सिद्धान्त का आधार अर्थ ध्वनि- को माना गया है तथा अर्थ ध्वनि को समझने के लिए शब्दों के भिन्न-भिन्न रूपों, उनके भिन्न-भिन्न अर्थों और उन अर्थों का बोध कराने वाले अर्थ व्यापारों को समझना आवश्यक है। ये अर्थ व्यापार ही ‘शब्द शक्तियां’ कहलाते हैं। ध्वनि सिद्धान्त की स्थापना का श्रेय ‘आनंदवर्धन’ को है किन्तु अन्य सम्प्रदायों की तरह ध्वनि सिद्धान्त का जन्म आनंदवर्धन से पूर्व हो चुका था, स्वयं आनन्दवर्धन ने अपने पूर्ववर्ती विद्वानों का मतोल्लेख करते हुए कहा है कि-

‘काव्यास्त्मा ध्वनिरिति बुधैर्यः समाम्नातपूर्वः’

अर्थात काव्य की आत्मा ध्वनि है ऐसा मेरे पूर्ववर्ती विद्वानों का भी मत है। आनंदवर्धन के पश्चात ‘अभिनवगुप्त’ ने ‘ध्वन्यालोक’ पर ‘लोचन टीका’ लिखकर ध्वनि सिद्धान्त का प्रबल समर्थन किया-

ध्वनि का अर्थ एवं स्वरूप

ध्वनि का अर्थ सामान्य आवाज माना है। वास्तविकता यह है कि घड़ियाल पर डंडा पड़ने  के बाद एक ध्वनि या आवाज होती है, पर वह ध्वनि बहुत देर तक गूंजती रहती है, उसी का नाम‌ ध्वनि है।

‘ध्वन्यालोक’ के प्रथम उद्योत के व्याख्याकार डॉ. सागर त्रिपाठी ने इस ग्रन्थ अर्थात् ‘ध्वन्यालोक’ के अनुबन्ध चतुष्टय पर प्रकाश डालते हुए लिखा है-

‘ग्रन्थ का विषय है- ध्वनि का स्वरूप प्रयोजन है-सहृदयों को ध्वनि के स्वरूप का ज्ञान करा देना। इसका प्रयोज्य है–सहदयों का मनस्तोष। हम ध्वनि के स्वरूप की ही व्याख्या करते हैं, इस वाक्य के अर्थ के द्वारा ग्रन्थ का विषय बताया गया है। सहृदय मनस्तोष के लिए, इस पद के अर्थ के द्वारा प्रयोजन बताया गया है। स्वरूप ज्ञानरूप प्रयोजन का अर्थ सामर्थ्य से आक्षेप कर लिया गया है। इस प्रकार वाक्यार्थ होने के कारण विषय का उल्लेख प्रधान है। पदार्थगम्य होने के कारण प्रयोजन-प्रीति और आक्षेपगम्य होने के कारण प्रयोजन-ज्ञान दोनों ही अप्रधान हैं। सहृदयजन इस निबन्ध के अधिकारी हैं और विद्वानों के विवेचन प्रस्तुत स्थान से सम्बद्ध हैं। बुध (विद्वानों के द्वारा) पद में बहुवचन के प्रयोग से स्पष्ट होता है कि काव्य की आत्मा ध्वनि है, इस सिद्धान्त का प्रतिपादन एक ने नहीं, किन्तु अनेक विद्वानों ने किया है। अनेक विद्वान् जिस सिद्धान्त का निरन्तर प्रतिपादन करते आये हैं, उसका न तो प्रतिषेध ही सम्भव है और न उसकी उपेक्षा की जा सकती है।

ध्वनि सिद्धान्त की प्रमुख स्थापनाएं

छन्द के आधार पर ध्वनि सिद्धान्त की निम्नलिखित प्रमुख स्थापनाओं का ज्ञान होता है-

  1. आनन्दवर्धन से पूर्व अनेक आचार्यों द्वारा ध्वनि को काव्य की आत्मा घोषित करना- आनन्दवर्धन ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है कि पूर्ववर्ती आचार्य ध्वनि को काव्य की आत्मा मानते रहे हैं। आनन्दवर्धन की. इस स्थापना का किसी ने समर्थन नहीं किया है। डॉ. कृष्णकुमार शर्मा ने इस स्थापना का विरोध करते हुए कहा है-

‘आनन्दवर्धन ने ध्वनि के सिद्धान्त को अपने से पूर्ववर्ती स्वीकार किया है, परन्तु आनन्दवर्धन से पूर्व यह सिद्धान्त किसी प्राचीन ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं है। इससे यह प्रतीत होता है कि आनन्दवर्धन से पहले ध्वनि सिद्धान्त काव्य के तत्त्व के रूप में मौखिक रूप से वाद-विवाद का विषय रहा होगा। कुछ आचार्य इसका प्रतिपादन करते होंगे तथा कुछ इसका विरोध करते होंगे। आनन्दवर्धन ने संबसे पूर्व इस सिद्धान्त को लिखित रूप में प्रतिपादित किया तथा ध्वनि के विरोध में जो युक्तियाँ थीं, उन सब का खण्डन करके ध्वनि सिद्धान्त की असन्दिग्ध रूप से स्थापना की।’

  1. बारह विप्रतिपत्तियों की स्वीकृति और खण्डन- जयरथ ने ‘अलंकार -सर्वस्व’ की टीका में निम्नलिखित दो श्लोक उद्धृत किये हैं, जो ध्वनि को विरोधियों द्वारा ध्वनि में दोष के रूप में माने गये हैं-

तात्पर्या शक्तिरभिया लक्षणानुमितिद्विधा,

अर्थापत्तिः क्वचित्तन्त्रं समासोत्त्याचलंकृतिः।

रसस्य कार्यताभोगो व्यापारान्तर बाधनम्,

द्वादशेत्यं ध्वनेंरस्य स्थितः विप्रतिपत्तयः॥

‘ध्वनि के सम्बन्ध में 12 प्रकार की विप्रतिपत्तियाँ कही जाती हैं। इनका विवरण प्रस्तुत है-

(1) तात्पर्य- यह अभिहितान्वयवादी मीमांसकों का मत है।

(2) अभिधा- यह अन्विताभिधानवादी मीमांसकों का मत है।

(3)(4) लक्षणा- लक्षणा के दो भेद हैं जहत्स्वार्था और अजहतस्वार्था ।

(5)-(6) अनुमिति अनुमान के दो भेद ।

  1. ध्वनि सिद्धान्त का अभाव मानने वालों के तीन विकल्प-ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने ध्वनि का अभाव मानने वालों के तीन वर्ग माने हैं-

(क) काव्य का सौन्दर्य अलंकार, गुण, वृत्ति और रीति के द्वारा ही प्रकट हो जाता है। काव्य की शोभा का अन्य कोई हेतु नहीं है।

(ख) काव्य के जिन हेतुओं की गणना हो चुकी है, उनसे भिन्न अन्य कोई हेतु नहीं हो सकता।

(ग) यदि अन्य कोई हेतु हो भी तो उसकी गणना इन अलंकार आदि बारह हेतुओं में हो जायेगी। इस प्रकार ध्वनि का कोई अपूर्व पृथक् तत्त्व नहीं है, ऐसा अभाववादियों का मत है।

  1. उपनिषद्भूतम्- आचार्य आनन्दवर्धन ने ध्वनि को सभी श्रेष्ठ कवियों के काव्यों की उपनिषद् बनी हुई बताया है। इस शब्द का अर्थ है-सभी काव्यों का जो सारभूत और छिपा हुआ तत्त्व है, वह उपनिषद् है । डॉ. कृष्ण कुमार के अनुसार, इस शब्द की व्याख्या ‘बालू-प्रिया’ टीको में इस प्रकार की हुई है-

‘उपनिषद् भूतेतिः काव्यतत्वानभिज्ञदुर्जेयत्वादतिरहस्यभूतमित्यर्थः।’

(उपनिषद्भूत पद का यह अभिप्राय है कि जो लोग काव्य के तत्त्व से अनभिज्ञ व्यक्ति हैं, उनके लिए कठिनता से जाना जा सकने के कारण अत्यधिक रहस्य बना हुआ है। इस प्रकार आनन्दवर्धन ने ध्वनि के रहस्य होने की स्थापना की है। वेदान्त आदि अध्यात्म विषयों में जो स्थान उपनिषदों का है, वही काव्यशास्त्र में ध्वनि का है।)

  1. ध्वनि के दो भेदों की स्थापना- आचार्य आनन्दवर्धन ने ध्वनि के दो भेदों की स्थापना करते हुए कहा।

योऽर्थः सहृदयश्लाघ्यः काव्यात्मेति व्यवस्थितः ।

वाच्य प्रतीयमानाख्यौ तस्य भेदावुभौ स्मृतौ ॥

(जो अर्थ सहदयों द्वारा प्रशंसित है तथा जो काव्य की आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित है, उस ध्वनि के वाच्य और प्रतीयमान नाम के दो भेद बताये गये हैं।)

डॉ. कृष्ण कुमार ने ध्वनिकार की इस स्थापना पर आपत्ति प्रस्तुत करते हुए लिखा है-

‘इस कारिका में ध्वनिकार ने काव्य के दो प्रकार के अर्थों का कथन किया है तथा दोनों अर्थों को काव्य की आत्मा-रूप तथा सहृदयों द्वारा प्रशंसित बताया गया है । इस प्रकार ध्वनिकार के कथन में ही परस्पर विरोध प्रतीत होता है। ध्वनिकार पहले तो कहते हैं कि ध्वनि जो कि प्रतीयमान अर्थ है, काव्य की आत्मा है। अब वे कहते हैं कि वाच्य अर्थ भी काव्य की आत्मा है। इस प्रकार ध्वनिकार के पहले कल ‘तेन ब्रूमः सहदय मनः प्रीतये तत्स्वरूपम’ और इस कारिका में परस्पर असंगति उत्पन्न हो जाती है। आचार्य विश्वनाथ ने ‘साहित्यदर्पण’ में इस असंगति को उठाकर इस प्रकार आपत्ति की है-

यच्च ध्वनि कारिणोक्तम्-

अर्थः सहृदयश्लाघ्यः काव्यात्मा यो व्यवस्थितः ।

वाच्य प्रतीयमानाख्यौ तस्य भेदावुभौस्मृतौ ॥

तत्र प्राप्तः आत्मत्वं ‘काव्यस्यात्मा ध्वनिः’ इति स्वकथन विरोधादेवास्ताम्।

(सहृदयों द्वारा प्रशंसित जो अर्थ काव्य की आत्मा निश्चित किया गया है, उसके वाच्य और प्रतीयमान दो भेद बताये गये हैं, वहाँ काव्य की आत्मा ध्वनि स्वीकार की गयी है। उसके दो भेद अपने ही कथन का विरोध है।)

परन्तु यह असंगति जो विश्वनाथ द्वारा भी प्रदर्शित की गयी है, वास्तविक नहीं है। ध्वनिकार ध्वनि को ही काव्य का आधारभूत तत्त्व मानते हैं। काव्य का यहाँ जो उन्होंने कथन किया है, वह ध्वनि के लक्षण की भूमिका को बनाने के लिए ही किया है। ध्वनिकार स्वयं वृत्ति में यह कहते हैं। कि इस कारिका की रचना ध्वनि के लक्षण की भूमिका को बनाने के लिए की गयी है।

‘ध्वनेरेव’ में ‘एव’ पद इस तथ्य को स्पष्ट कर देता है कि यह कारिका भूमिका के रूप में है। बाच्य अर्थ के बिना व्यंग्य अर्थ की प्रतीति नहीं होती, क्योंकि व्यंग्य अर्थ के बोध के लिए पहले वाच्य अर्थ का जानना अनिवार्य है। इसीलिए ध्वनिकार ने वाच्य अर्थ का यहाँ उल्लेख किया है। इसको अग्निपुराण में इस प्रकार स्पष्ट किया गया है-

‘ननु ध्वनिरूपं ब्रूमः। इति प्रतिज्ञाय वाच्य प्रतीयमानाख्यौ द्वौ भेदावर्थस्येति वाच्याभिधाने का संगतिः कारिकायाः इत्याशंक्य संगतिः कर्तुमवताणिकां करोति ध्वनेरेवेति।’

  1. ध्वनि की प्रतीयमानता की स्थापना- प्रतीयमान अर्थ ही ध्वनि है। यह बात उदाहरण के द्वारा ध्वनिकार आचार्य आनन्दवर्धन ने इस प्रकार स्पष्ट की है-

प्रतीयमानं पुनरन्यदेत वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम्।

यत्तत्प्रसिद्भावयवातिरिक्तं विभाति लावण्यमिवांगनासु ॥

प्रतीयमानं पुनरन्येदव वाच्यात् वस्तु अस्ति।

(महाकवियों की वाणियों में यह प्रतीयमान अर्थ पुनः कुछ अन्य ही वस्तु है। यह प्रतीयमान इस प्रकार का है, जो सहृदयजनों में प्रसिद्ध है और लोक-प्रसिद्ध अवययों गुणालंकार आदि से भिन्न है और इसी प्रकार शोभायमान है, जिस प्रकार अंगनाओं में लावण्य शोभायमान होता है।)

ध्वनिकार का तात्पर्य यह है कि लावण्य अंगनाओं के किसी अंग विशेष तक सीमित नहीं रहता, अपितु सारे शरीर में व्याप्त रहता है। उसे अंगना के शरीर से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह उसके शरीर का अंग न होकर उसमें व्याप्त है। इसी प्रकार ध्वनि को काव्य से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह काव्य के अंग के समान नहीं है, अपितु आत्मा के समान पूरे काव्य में व्याप्त रहता है।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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