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‘तौलिये’ एकांकी का साराश | उपेन्द्रनाथ अश्क द्वारा रचित एकांकी तौलिये’ की कथावस्तु

‘तौलिये’ एकांकी का साराश | उपेन्द्रनाथ अश्क द्वारा रचित एकांकी तौलिये’ की कथावस्तु

‘तौलिये’ एकांकी का साराश

कथानक-

वसन्त इस समय तो एक फर्म का मैनेजर है तथा ठाट-बाट से रह रहा है, वैसे वह गरीबी में पला है। वे छह भाई थे और उनके बीच एक ही तौलिया थी। उसी से सब भाई शरीर पोछते थे। सभी भाई स्वस्थ थे, किसी को कोई रोग नहीं था। बसन्त की पत्नी मधु सम्पन्न वातावरण में पली है। उसकी सफाई की भावना सनक की सीमा पर पहुँच गयी है। उसने अपने, अपने पुत्र के और अपने पति के अलग-अलग तौलिये निश्चित कर दिये हैं। इनमें भी नहाकर शरीर पोछने के अलग, हाथ पोंछने के अलग और हजामत के तौलिये अलग-अलग हैं।

बसन्त सफाई की इस सनका का अभ्यस्त नहीं है। उसने हजामत के तौलिये के स्थान पर पुत्र मदन का तौलिया ले लिया है। इसी बात पर मधु नाराज हो जाती है और उसका मुँह फूल जाता है। बसन्त उसके इस एरिस्टोक्रेट स्वभाव की तथा सनकी स्वभाववाले उसके मामा और मौसा का मजाक उड़ाता है, जो विलायत में रहने के कारण बहुत सफाई पसन्द बन गये हैं। बसन्त चिढ़कर मधु से कहता है कि तुम्हें मुझसे घृणा है। मधु कहती है कि आपने मुझसे विवाह करने के बाद भी मेरी रुचियों से ताल- मेल नहीं किया। मेरे कारण आप सुखी नहीं हैं। अतः मैं आज ही चली जाती हूँ।

मधु नौकरानी मंगला को बिस्तर ठीक करने का आदेश देती है और सनदूक अपने पास मँगवाना चाहती है। इधर टेलीफोन की घण्टी बजती है और बसन्त टेलीफोन सुनने लगता है। टेलीफोन रखकर बसन्त अपनी पत्नी मधु से कहता है कि तुम अपना सामान बाद में बँधवाना, पहले मेरे जाने की तैयारी कर दो। अभी-अभी बॉस (मालिक) ने मुझे बनारस जाने का आदेश दिया है। मुझे पहली गाड़ी से बनारस जाना है।

इस प्रकार बसन्त बनारस चला जाता है और मधु घर में ही रह जाती है। दो महीने बीत जाते हैं, परन्तु बसन्त नहीं लौटता। इसी बीच मधु ने अपना स्वभाव बहुत बदल लिया है। वह मेज पर चाय पीने के स्थान पर पलंग पर बैठकर चाय पीने लगी है। उसकी सहेलियाँ और कॉलेज में साथ पढ़ने वाली युवतियाँ चिन्ती और सुरो से जब वह रजाई में बैठकर चाय पीने को कहती हैं, तब वे दोनों पैर धोने का झंझट बताकर मना कर देती हैं। मधु उन्हें बिना पैर धोये ही रजाई में आने को कहकर चकित कर देती है।

मधु यह अनुभव करती है कि मेरी आँखों में घृणा का भाव देखकर ही मेरा पति बसन्त मुझे छोड़कर चला गया है। वह अपने-आपको बदलने का प्रयत्न करती है और अपनी नौकरानी मंगला से पूछती है कि क्या मैं सचमुच बदल गयी हूँ? मधु को इस बात का भी दुःख है कि उसके पति ने उसे एक भी पत्र नहीं लिखा।

इसी समय सहसा बसन्त आ जाता है और मधु को जुकाम हुआ जानकर स्वास्थ्य पर ध्यान रखने का परामर्श देता है। ड्राइंग-रूप में पलंग देखकर बसन्त को आश्चर्य होता है। मधु यह परिवर्तन बसन्त के मित्रों की सुविधा के लिए किया गया बताती है। वह पलंग पर बैठकर स्वयं चाय पीने को कहती है। बसन्त नौकरानी मंगला से चाय का पानी रखने को कहता है। स्वयं प्रसन्न होता हुआ हाथ-मुंह धोने चला जाता है। वह गुसलखाने के भीतर से ही हाथ-मुँह पोंछने को तौलिया माँगता है। मधु बाहर आकर नये तौलिये से हाथ-मुँह पोंछने को कहती है। शेखर गुनगुनाता हुआ आता है और उस गीले तौलिये से हाथ पोंछने लगता है, जिससे चाय पीने के बाद सुरो और चिन्ती ने हाथ पोंछे थे। इसे देखकर मधु बसन्त पर नाराज होने लगती है और मुँह फुलाकर सोफे पर गिर पड़ती है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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