शिक्षाशास्त्र / Education

माध्यमिक शिक्षा का अर्थ | माध्यमिक शिक्षा का स्वरूप एवं संगठन | माध्यमिक शिक्षा आयोग के सुझाव | कोठारी आयोग द्वारा माध्यमिक स्तर पर शिक्षा का प्रस्तावित स्वरूप

माध्यमिक शिक्षा का अर्थ | माध्यमिक शिक्षा का स्वरूप एवं संगठन | माध्यमिक शिक्षा आयोग के सुझाव | कोठारी आयोग द्वारा माध्यमिक स्तर पर शिक्षा का प्रस्तावित स्वरूप

माध्यमिक शिक्षा का अर्थ

(Meaning of Secondary Education)

माध्यमिक शिक्षा शब्द का सामान्य रूप से प्रयोग सर्वप्रथम 1882 में हण्टर आयोग (Hunter Commission) ने किया था। सन् 1947 के पश्चात् मनोवैज्ञानिक तथा गणतंत्रात्मक दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर माध्यमिक शिक्षा को किशारों (Adolescents) की शिक्षा का नाम दिया गया। माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार-“प्राथमिक शिक्षा के पश्चात् और विश्वविद्यालय शिक्षा प्रांरभ होने तक का सारा काल माध्यमिक शिक्षा का अंग माना जाता है। दूसरे शब्दों में, यदि प्राइमरी शिक्षा को स्कूल स्तर की शिक्षा से निकाल दिया जाये तो शेष को हम माध्यमिक शिक्षा कहेंगे।” अएतव माध्यमिक शिक्षा में मिडिल, हाईस्कूल तथा हायर सैकेण्ड्री कक्षायें सम्मिलित हैं। कार्टर वी० गुड (Carter V. Good) के अनुसार, “माध्यमिक शिक्षा, शिक्षा का वह समय है, जो कि मुख्य रूप से 12 से 17 वर्ष के बीच के आयु वालों का होता है। माध्यमिक शिक्षा में अध्ययन के मुख्य उपकरणों को अभिव्यक्ति, विचार क्षेत्र और जीवन में उनके प्रयोग और विस्तार, जानकारी प्राप्त करने, बौद्धिक विकास, अभिरुचि, प्रवृत्तियों, क्षमताओं, आदर्शों और आदतों को बनाने पर बल दिया जाता है। माध्यमिक शिक्षा, शिक्षा की वह अवस्था है जो कि न तो केवल प्राथमिक स्तर की वृद्धि मात्र है और न ही उच्च शिक्षा के लिये तैयारी। वह अपने आप में एक पूर्ण इकाई है।”

माध्यमिक शिक्षा का स्वरूप एवं संगठन

(Structure and Organisation of Secondary Education)

भारत में माध्यमिक शिक्षा का स्वरूप एवं संगठन प्रारंभ से ही एक जैसा नहीं रहा है। स्वतंत्र भारत में शैक्षिक ढाँचे को पुनर्गठित करने के लिए सर्वाधिक प्रयास किये गये। माध्यमिक शिक्षा आयोग ने प्रचलित माध्यमिक शिक्षा के स्वरूप तथा ढाँचे का अध्ययन किया और यह अनुभव किया कि माध्यमिक शिक्षा के स्वरूप में बहुत असमानताएँ हैं। इन असमानताओं को दूर करने के लिये माध्यमिक शिक्षा आयोग 1952-53 (Secondary Education Commission, 1952-53) ने अग्रलिखित सुझाव दिये-

माध्यमिक शिक्षा आयोग, 1952-53 के सुझाव

(Suggestions of Secondary Education Commission, 1952-53)

(1) माध्यमिक शिक्षा अपने आप में एक पूर्ण इकाई होनी चाहिये। इस अवस्था के अन्त में छात्र में किसी व्यवसाय को चुनने की योग्यता होनी चाहिये। मध्यांतर अवस्था (Middle Stage) के पश्चात् माध्यमिक अवस्था में एक वर्ष बढ़ाकर चार वर्ष की कर देनी चाहिये। प्रचलित इण्टर स्तर समाप्त कर देनी चाहिये और विश्वविद्यालय में तीन वर्ष के डिग्री कोर्स की योजना होनी चाहिए।

(2) माध्यमिक शिक्षा की अवधि 11- 17 वर्ष की आयु के बीच होनी चाहिए इस प्रकार माध्यमिक शिक्षा में मिडिल स्तर या सीनियर बेसिक स्तर सम्मिलित होगी। माध्यमिक शिक्षा का नया ढाँचा चार-पाँच वर्ष की प्रारंभिक शिक्षा के पश्चात् निम्नलिखित रूप में होना चाहिये-

(i) मिडिल या जूनियर माध्यमिक या सीनियर बेसिक स्तर जो तीन वर्ष की होनी चाहिये।

(ii) हायर माध्यमिक अवस्था जो कि 4 वर्ष की अवध का होनी चाहिये। आयोग ने वर्तमान इण्टरमीडिएट (Intermediate) को हायर सैकण्डरी (Higher Secondary) में बदलने की बात कही है, जो कि चार वर्ष की हो एवं इण्टरमीडिएट का एक वर्ष इसमें सम्मिलित किया जाये। इसी प्रकार तीन वर्ष का पाठ्यक्रम डिग्री प्राप्त करने के लिये हो। इस प्रकार सम्पूर्ण माध्यमिक शिक्षा को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(a) कक्षा 6 से 8 तक माध्यमिक स्तर।

(b) कक्षा 9 से 11 तक उच्चतर माध्यमिक स्तर।

(3) क्योंकि प्रचलित हाई स्कूलों की बहुत बड़ी संख्या एक वर्ष के अतिरिक्त शिक्षा के उत्तरदायित्व संभालने के अयोग्य है, इसलिए सभी हाई स्कूलों को माध्यमिक स्कूलों में परिवर्तित करना बुद्धिमत्ता नहीं होगी। वर्तमान हाई स्कूल भी जारी रहें तथा उच्चतर माध्यमिक स्कूल भी स्थापित किये जायें। तीन वर्षीय डिग्री कोर्स (Three Years Degree Course) में प्रवेश पाने से पहले हाई स्कूल के विद्यार्थियों को प्री-यूनिवर्सिटी (Pre-University) कोर्स में एक वर्ष लगाना चाहिए।

इस प्रकार माध्यमिक शिक्षा आयोग ने प्रचलित हाई स्कूल प्रणाली को धीरे-धीरे समाप्त कर माध्यमिक शिक्षा प्रणाली को अपनाने पर जोर दिया है। माध्यमिक शिक्षा आयोग की सिफारिशों को कार्यरूप देने के लिए समय-समय पर विभिन्न समितियाँ स्थापित की गई, जिन्होंने इसे अपनाने पर बल दिया और परिणामस्वरूप धीरे-धीरे संपूर्ण भारत में 11 वर्षीय माध्यमिक शिक्षा के स्वरूप को अपना लिया गया।

अक्टूबर, 1963 की अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा परिषद् के सुझाव

(Recommendations of All India Secondary Education Council, 1963)

अक्टूबर, 1963 में अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा परिषद् ने 12 वर्षीय शिक्षा के स्वरूप का सुझाव दिया। विभिन्न राज्यों और संघ क्षेत्रीय राज्यों के अनुभव तथा इस विषय पर विशेषज्ञों तथा विश्वविद्यालयों के सुझावों के आधार पर अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा परिषद् ने माध्यमिक शिक्षा के निम्नलिखित स्वरूप की सिफारिशें की थीं-

समस्त देश में शिक्षा का स्वरूप एक जैसा हो, जो कि निम्नलिखित हैं-

(1) प्रथम वर्ष से 6 वर्ष की आयु पर प्रवेश होने के पश्चात् 12 वर्ष का स्कूल अध्ययन हो।

(2) अंतिम चार वर्ष माध्यमिक स्तर की शिक्षा में लगाये जायें।

(3) उच्चतर माध्यमिक स्तर पर प्रथम भाग की शिक्षा माध्यमिक स्तर के प्रथम दो वर्ष पश्चात् हों, जिससे छात्र अगले दो वर्षों में विभिन्न कोसों में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिये तैयार हो जायें।

(4) उच्चतर माध्यमिक स्तर पर प्रथम भाग की शिक्षा पूर्ण होने पर उच्चतर माध्यमिक द्वितीय भाग की परीक्षा हो।

(5) माध्यमिक स्तर की शिक्षा लगभग पुराने इण्टरमीडिएट के समकक्ष हो, जिससे छात्रों को बिना प्री-यूनिवर्सिटी परीक्षा दिए तीन वर्षीय डिग्री कोर्स में प्रवेश मिल जाये।

इसी प्रकार भारत सरकार द्वारा स्थापित कोठारी आयोग 1964-66 ने भी शिक्षा के स्वरूप का अध्ययन किया और अपने सुझाव दिये हैं।

कोठारी आयोग द्वारा माध्यमिक स्तर पर शिक्षा का प्रस्तावित स्वरूप

(Structure of Secondary Education as Recommended by Kothari Commission)

कोठारी आयोग के अनुसार सम्पूर्ण शिक्षा का माध्यमिक स्तर का स्वरूप निम्नलिखित प्रकार से होना चाहिये-

(1) एक से तीन वर्ष की पूर्व स्कूलीय शिक्षा (Pre-School Education)|

(2) प्राथमिक स्तर 7-8 वर्ष का हो जो दो भागों में पूर्व प्राईमरी स्तर 4-5 वर्ष और उच्च प्राईमरी स्तर 3 या 2 वर्ष तक हो।

(3) लोअर माध्यमिक (Lower Secondary) स्तर 3 या 2 वर्ष तक का हो।

(4) उच्च माध्यमिक स्तर (Higher Secondary) में 2 साल की सामान्य शिक्षा और 1 से 3 वर्ष की व्यावसायिक शिक्षा।

(5) सामान्य शिक्षा में विषय विभाजन पद्धति कक्षा 10 के पश्चात् की जाये।

(6) दो प्रकार के माध्यमिक विद्यालय होंगे-हाईस्कूल 10 वर्ष के पाठ्यक्रम वाले होंगे और उच्चतर माध्यमिक विद्यालय 11 व 12 वर्षों के पाठ्यक्रम के होंगे।

(7) बड़े और कुशल विद्यालय-सामान्यतया कुछ उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के चौथाई होंगे।

शिक्षा के संगठन के क्षेत्र में भी कोठारी आयोग ने अपने सुझाव दिये हैं। इसके अनुसार-

(1) नया उच्चतर माध्यमिक पाठ्यक्रम 11 कक्षा में प्रारंभ होगा तथा कक्षा 11 और 12 मे विशेष पढ़ाई विभिन्न विषयों में होगी, परन्तु जब तक कक्षा 12 नहीं जुड़ती तब तक कक्षा 9 से 11 तक का पाठ्यक्रम जारी रहेगा।

(2) प्री-यूनीवर्सिटी कक्षा को विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों से उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में 1975-76 तक हस्तांतरित किया जाये और दो साल का पाठ्यक्रम 1985-86 तक सम्पन्न किया जाये।

(3) माध्यमिक शिक्षा बोर्डों का पुनर्गठन किया जाये ताकि ये उच्चतर माध्यमिक स्तर के उत्तरदायित्व को भी संभाल सके।

(4) उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं का आरंभ चुने हुए विद्यालयों में राज्य शिक्षा विभाग द्वारा पूर्ण इकाई के रूप में तथा पूर्ण आर्थिक सहयोग से किया जाये।

(5) माध्यमिक विद्यालयों में दो स्तर पर कक्षा 7-8 के पश्चात् तथा 10 के पश्चात् विभिन्न प्रकार की व्यावसायिक शिक्षा पाठ्यक्रम की व्यवस्था हो। इन पाठ्यक्रमों की अवधि 1 से 3 वर्ष तक हो, जिससे कि युवकों को रोजगार के लिए तैयार किया जाये।

(6) प्रथम कक्षा में प्रवेश पाते समय बच्चे की आयु 6 वर्ष से कम न हो।

(7) प्रथम सार्वजनिक परीक्षा (First Public Examination) 10 साल की स्कूल की शिक्षा के अन्त में होनी चाहिये।

अत: हम देखते हैं कि माध्यमिक शिक्षा का स्वरूप किसी एक बिन्दु पर आधारित नहीं होता है। विभिन्न परिस्थितियाँ आवश्यकतायें इसके लिए उत्तरदायी हैं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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