समाज शास्‍त्र / Sociology

नव सामाजिक व्यवस्था का अर्थ स्पष्ट कीजिए | नव सामाजिक व्यवस्था के प्रमुख अंगों का वर्णन कीजिए

नव सामाजिक व्यवस्था का अर्थ स्पष्ट कीजिए | नव सामाजिक व्यवस्था के प्रमुख अंगों का वर्णन कीजिए

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नव सामाजिक व्यवस्था का अर्थ

किसी भी समाज के स्वरूप के लिए समाजशास्त्र में तीन शब्दों का प्रयोग किया जाता है। यथा सामाजिक संरचना (Social Order) तथा सामाजिक प्रणाली। अधिकांश भारतीय शिक्षा शास्त्री इन तीनों शब्दों के लिए हिन्दी में सामाजिक व्यवस्था का प्रयोग करते हैं। सामाजिक व्यवस्था के सम्बन्ध में गिन्सबर्ग ने परिभाषित किया है, “किसी समुदाय की सामाजिक व्यवस्था में वे सब सामाजिक संगठन आते हैं जिन्हें उसके व्यक्तियों ने बनाया होता है और साथ ही वे सब संस्थाएँ भी आती हैं जिनमें वे व्यक्ति भाग लेते हैं।”

सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत वे सभी सामाजिक घाटनाक्रम आ जाते हैं जिनका किसी दिए गए समाज में कर्त्तव्यों और सामाजिक परिस्थितियों के आपसी सम्बन्धों में सम्बन्ध होता है। साधारण भाषा में हम ‘समाज’ शब्द का जो अर्थ लेते हैं, लगभग वही अर्थ समाजशास्त्री ‘सामाजिक व्यवस्था’ पद से लेते हैं। सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत समाज की संस्थाएँ, परम्पराएँ, रीति-रिवाज, सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्य, विचारधाराएँ, दृष्टिकोण सरकार, पाठशालाएँ, परिवार, कानून, मनोरंजन आदि सभी संस्थाएँ व पक्ष आ जाते हैं।

यदि हम अधिक गहराई से यह देखना चाहें कि सामाजिक व्यवस्था किन- किन बातों वस्तुओं या उपकरणों से मिलकर बनाती हैं तो हमें इसका विश्लेषण करना होगा।

एक सामाजिक व्यवस्था (Social System) के तीन प्रमुख भाग (Components) बतलाए जा सकते हैं-

(i) सामाजिक संरचना (Social Structure)

(ii) सांस्कृतिक व्यवस्था (Cultural System)

(iii) व्यक्तित्व व्यवस्था (Personality System)

सामाजिक संरचना

किसी भी सामाजिक व्यवस्था या सामाजिक परिस्थिति में जो स्थायी या अपेक्षाकृत कम स्थायी ढाँचा या संरचना विद्यमान होती है उसे ही सामाजिक संरचना कहा जाता है। हम सामाजिक संरचना को भली-भाँति समझने के लिए अपने शरीर का उदाहरण ले सकते हैं। हमारे शरीर में मांस, चर्म, रक्त, हृदय, हड्डियाँ भोजन, प्रणाली, श्वाँस प्रणाली आदि अनेक अंग व व्यवस्थाएँ होती हैं। लेकिन जब हम मानव शरीर के ढाँचे की बात करते हैं तो हम केवल हड्डियों के ढाँचे भोजन प्रणाली, श्वास प्रणाली, स्नायु प्रणाली तथा प्रजनन प्रणाली आदि व्यवस्थाओं का ही उल्लेख करते हैं, क्योंकि हमारे शरीर की जीवित कार्यरत अवस्था इन्हीं मूलभूत, अपेक्षाकृत स्थायी तत्वों या व्यवस्थाओं पर निर्भर होती है।

ठीक इसी प्रकार किसी भी सामाजिक व्यवस्था या समाज के सुचारू रूप से चलते रहने का कार्य करने के लिए कुछ मूलभूत व्यवस्थाओं, स्थायी अथवा अपेक्षाकृत अधिक समय तक टिकी रहने वाली परम्पराओं, कार्य-प्रणालियाँ आदि की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। व्यक्ति तो आते-जाते रहते हैं लेकिन ये कार्य प्रणालियाँ अथवा व्यवस्थाएँ चलती रहती हैं। समाजशास्त्र की भाषा में मानव सम्बन्धों को नियंत्रित तथा मार्ग दर्शन करने के लिए मनुष्यों द्वारा बनाई गई व्यवस्थाओं, कार्य-प्रणालियों अथवा व्यवहार व्यवस्थाओं को संस्था का नाम दिया जाता है।

विभिन्न संस्थाओं से हमारा प्रतिदिन पाला पड़ता है। कदम-कदम पर हमें संस्थाओं के आदेशों, प्रतिमानों या प्रभावों से प्रभावित होकर व्यवहार या कार्य करना पड़ता है। विवाह, परिवार शिक्षा प्रणाली, कानून-प्रणाली, गोद लेने की व्यवस्था, विरासत देने-लेने की व्यवस्था, आर्थिक व्यवस्थाएँ, राजनैतिक चुनाव, दलबंदी तथा राजनैतिक पद और उनसे संबद्ध अधिकार व कर्त्तव्य, धर्म, जाति-व्यवस्था, सामाजिक स्तरण, अपराध में संबद्ध दंड-व्यवस्था, जन प्रसारण की व्यवस्था आदि विविध कार्य प्रणालियों या मानव व्यवहार की नियंत्रक व्यवस्थाओं को सामाजिक संस्थाएँ कहा जाता है। इन सभी संस्थाओं के एक विशेष रूप, ढंग या प्रतिमान से परस्पर संगठित या संरचित हेने से ही सामाजिक संरचना का निर्माण होता है।

जब हम भारतीय समाज की संरचना के बारे में जानना चाहते हैं तो हमें भारतीय समाज की इस प्रकार की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के गठन, प्रसार क्षेत्र, प्रभाव आदि की जानकारी एकत्र करनी आवश्यक होती है क्योंकि भारतीय समाज इन्हीं स्थायी महत्व की व्यवस्थाओं पर निर्भर है। जब हम इंग्लैण्ड के प्रोस्टेंट समाज की सामाजिक संरचना के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें उस समाज की सामाजिक संस्थाओं का विश्लेषण करना आवश्यक होता है। यह निश्चित ही हैं कि भारतीय सामाजिक संरचना और इंग्लैण्ड के प्रोस्टेंट समाज की संरचना में पर्याप्त अंतर देखने में आएँगे।

सांस्कृतिक व्यवस्था

सांस्कृतिक व्यवस्था अथवा संस्कृति के अन्तर्गत प्रायिः मानव मूल्यों (Values), पम्पराओं, विचारों व जीवन चलाने की विशेष शैली (Life style) को सम्मिलित किया जाता है। इनको प्रायः समाजीकरण की प्रक्रिया तथा शिक्षण या पढ़ाई-लिखाई के द्वारा सिखाया या सीखा जाता है। संस्कृति बहुत अधिक सीमा तक परिवार, पड़ोस, जाति, धर्म जैसे अनौपचारिक प्रभावों से निर्मित होती है, यद्यपि औपचारिक संस्थाओं, जैसे पाठशाला, नाट्य मंडली, प्रदर्शनी विभाग, संगीत विद्यालयों, जन संचार के साधनों आदि के योग को भी भुलाया नहीं जा सकता।

जब हम हिन्दू समाज की संस्कृति की बात करते हैं तो हिन्दू धर्म व जातियों से सम्बन्धित विशेष मूल्यों, धारणाओं, विचारधाराओं, दृष्टिकोणों, संकेतों या प्रतीकों व रहन-सहन के ढंगों के बारे में सोचना-समझना और कहना पड़ता है। लेकिन जब हम सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति के बारे में जानना चाहते हैं तो हमें न केवल हिन्दू अपितु अन्य सभी भारतीय धर्मों, सम्प्रदायों, वर्गों आदि के सांस्कृतिक मूल्यों, परम्पराओं, रीति-रिवाजों, रहन-सहन अथवा जीवन-शालियों के बारे में सही प्रकार से सोचना-समझना आवश्यक होता है।

व्यक्तिगत व्यवस्था

एक सामाजिक व्यवस्था का उल्लेख उस समय तक अधूरा रहता है जब तक कि व्याक्तित्व व्यवस्था का भी उल्लेख न कर दिया जाए। व्यक्तित्व के अन्तर्गत व्यक्ति विशेष की प्रेरणावृत्तियाँ (Motives), झुकाव, उत्तरदायित्वों के प्रति निष्ठा या लगाव, प्रभावोत्पादकता आदि आते हैं। जब हम भारतीय सामाज़िक व्यवस्था के अन्तर्गत व्यक्तित्व व्यवस्था का विश्लेषण करना चाहते हैं तो हमें यह देखना होता है कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था के सदस्यों की व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताएँ क्या-क्या हैं। यह तो स्पष्ट ही है कि भारतीय सामाजिक संरचना और भारतीय सांस्कृतिक व्यवस्था का भारतीयों की व्यक्तित्व व्यवस्था पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

उपरोक्त वर्गीकरण केवल मात्र विश्लेषण करने में सुविधा पाने के विचार से किया गया है। वास्तव में सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक व्यवस्था और व्यक्तित्व व्यवस्था में बहुत अधिक आपसी सम्बन्ध होते हैं तथा उनको अलग-अलग करना बहुत कुछ अस्वाभाविक सा लगता है। यह बात भी सही है कि सांस्कृतिक मूल्यों तथा व्यक्तित्वों की विशेषताओं में भी कई प्रकार के विशेष प्रतिमान (Patterns) देखने में आते हैं जो स्थायी न भी हों, तो भी वे बहुत लम्बे समय तक चलने वाले होते हैं और इस प्रकार सांस्कृतिक तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी मामलों में भी कुछ विशेष प्रकार के संस्थागत व्यवहार या रूप देखने में आते हैं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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